सोमवार, 19 अक्टूबर 2009

कितना शिगुफा, कितना सच (संदर्भ ग्रामीण मेडिकल कॉलेज )

गांवों में खोले जायेंगे मेडिकल कॉलेज ! सुनकर आश्चर्य होता है। लेकिन यह एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देने वाली बात भी नहीं है, क्योंकि यह देश के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद का बयान है। गुलाम नबी आजाद ने कहा है कि गांवों में डाक्टरों की कमी को दूर करने के लिए सरकार जल्दी ही मेडिकल शिक्षा का वैकल्पिक योजना शुरू करने वाली है। इससे गांवों में ज्यादा डॉक्टर तैयार हो सकेंगे जो ग्रामीणों की चिकित्सा के लिए बाध्य होंगे। आजाद के मुताबिक मौजूदा व्यवस्था के साथ ही एक वैकल्पिक मेडिकल शिक्षा व्यवस्था भी शुरू की जा रही है। इसके तहत ग्रामीण मेडिकल कॉलेजों में दस हजार से कम आबादी वाले गांवों के छात्रों को ही दाखिला दिया जायेगा। उनका कहना है कि इससे गांव के छात्रों को मेडिकल की शिक्षा आसानी से उपलब्ध हो जायेगी। मगर इसके लिए एक शर्त होगी कि एक नियत समय तक उन्हें गांवों में ही रह कर प्रैक्टिस करनी होगी। मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया (एमसीआई) इसके लिए प्रस्ताव तैयार कर चुका है। जल्दी ही इसे लागू किया जाएगा। आजाद ने कहा है कि इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी मेडिकल शिक्षा की गुणवता से समझौता नहीं किया जाएगा।
गुलाम नबी आजाद के उपर्युक्त कथन को दो संदर्भों में लिया जा सकता है। पहला यह कि उन्होंने ग्रामीण चिकित्सा व्यवस्था की बेचारगी को लेकर जो कुछ कहा, वह सच है और किसी केंद्रीय मंत्री की जुबान से इस सच्चाई को सुनकर थोड़ी खुशी तो जरूर होती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। वह यह कि क्या सच में सरकार इस दिशा में कुछ करने जा रही है या फिर यह महज एक शिगुफा बनकर रह जायेगा? अगर इस समस्या को लेकर सरकार की पिछले छह दशकों की उपलब्धि पर गौर करें तो निराशा ही हाथ लगती है। आज तक तो होता यही रहा है कि सरकार की घोषणाएं (खासकर ग्रामीण चिकित्सा व्यवस्था के प्रति) बयान, अखबार, सेमिनारों से बाहर नहीं आ सकी है । अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब पिछली सरकार के बड़बोले स्वास्थ्य मंत्री अंबुमनि रामदौस ने कहा था कि देश की चिकित्सा व्यवस्था को सुधारने के लिए अप्रवासी भारतीय डॉक्टरों को स्वदेश लौटने की इजाजत दी गयी है। उन्होंने तब कहा था कि हजारों अनिवासी भारतीय डॉक्टर स्वदेश लौटने के लिए बेकरार हैं( गौरतलब है कि सिर्फ अमेरिका में भारत के 65 हजार डॉक्टर कार्यरत हैं)। लेकिन इस घोषणा को आठ महीने हो चुके हैं पर आजतक एक भी डॉक्टर अमेरिका, इंगलैंड, जर्मनी आदि देशों को छोड़कर स्वदेश की खाक छानने वापस नहीं लौटे। कुछ ऐसा ही हश्र विदेशी मेडिकल कॉलेजों के छात्रों की डिग्री का मान्यता देने की घोषणा की भी हुई । जबकि देश की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की असलियत रोंगटे खड़े कर देते हैं। इन आंकड़ों को देखकर विश्वास नहीं होता कि भारत को स्वतंत्र हुए छह दशक से ज्यादा हो गये हैं।
भारतीय चिकित्सा परिषद के अनुसार, वतर्मान में देश में 870 लोगों का स्वास्थ्य एक डाॅक्टर के भरोसे है। इसमें पिश्चमी पद्धति के डाॅक्टरों को हटा दिया जाये तो यह अनुपात 1600 में 1 बैठता है। योजना आयोग के अनुंसार, फिलहाल देश में छह लाख डाॅक्टरों, दो लाख दंत चिकित्सकों और लगभग 10 लाख चिकित्सा सेवकों की जरूरत है। यह िस्थति अचानक पैदा नहीं हुई है। इसके लिए देश की
दोषपूर्ण चिकित्सा नीति जिम्मेदार रही है। अस्सी के दशक में बोहरे समिति का गठन किया गया था। इस समिति से देश की स्वास्थ्य परििस्थतियों को सुधारने के लिए अध्ययन करने और सुझाव देने की मांग की गयी थी। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट दी, लेकिन इस पर आंशिक कारर्वाइर् भी नहीं हुइर्। आथिर्क उदारीकरण के बाद तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी भारत को चिकित्सा ॠण और अनुदान के प्रति कोताही बरतनी शुरू कर दी । इन संस्थाओं का निर्देश साफ था कि भारत सरकार चिकित्सा व्यवस्था को भी उद्योग की शक्ल दें आैर चिकिसा की सावर्जनिक सेवाओं से अपना हाथ खीचते चले जाये। जाहिर है उनकी मंशा भारत के चिकित्सा क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने की है ताकि विदेशी कंपनियां देश की विशाल जनसंख्या को चिकित्सा व्यवसाय के जरिये लूट सकेऔर चिकित्सा उद्योग के सहारे अपनी झोली भर सके। इसकी परिणति अब छिपी नहीं है। सावर्जनिक चिकित्सालय से गायब होती सुविधाएं, उपकरण, जांच प्रयोशालाओं और घटती सुविधाएं इस बात का संकेत है कि सरकार उनके ही निर्देशों पर काम कर रही है। इन चिकित्सालयाें में सुविधाओं की सतत कमी और घटिया स्वास्थ्य-व्यवस्था के कारण ही अब अधिकतर साधन संपन्न लोग निजी अस्पतलालों और डाॅक्टरों के शरण में जा रहे हैं। लेकिन ये चिकित्सालय सिर्फ़ शहरी अमीरों को ही नसीब है। ग्रामीण आबादी तो भगवान के रहमोकरम पर ही है। एक अध्ययन के मुताबिक,गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली देश की 30 करो़ड आबादी आज भी बुनियादी स्वास्थ्य-व्यवस्था से वंचित है।
जहां तक आजाद की घोषणा की व्यवहारिक संभावना की बात है तो यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि देश के 80 प्रतिशत गांव आज भी महाविद्यालयों से वंचित हैं। ऐसे में गांवों में मेडिकल महाविद्यालय की बात, तो दिवास्वप्न ही लगती है। हालांकि यह जरूरी है। तमाम सुविधाओं से वंचित भारत की सत्तर प्रतिशत ग्रामीण आबादी का यह हक भी है।

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

एक कुम्हार की याद

जंगल पंडित मेरे गांव के सबसे पुराने कुम्हार थे। बहुत वृद्ध हो गये थे। ठीक से नहीं पता, लेकिन 90 से ऊपर के ही रहे होंगे। तीन सप्ताह पहले, ठीक अष्टमी के दिन उनका निधन हो गया। संयोग से उस दिन मैं भी गांव में ही था। गांव वालों के लिए यह कोई बड़ी खबर नहीं थी। सभी दशहरा मेले का आनंद लेने में मग्न थे और एक कुम्हार का मर जाना, उनके लिए कोई मायने नहीं रखता था। हालांकि जंगल पंडित उनके लिए बहुत मायने रखते थे। मुझे जंगल पंडित के निधन का दुखद समाचार अपनी मां से मिला। उस दिन अपनी सास के कहने पर जंगल पंडित की बहु मेरी मां के पास आयी थी। बहुत देर तक रोती रही थी। कह रही थी- "बूढ़वा के मरने के समय भी गाम (गांव) की बात कह रहा था। पूछ रहा था कि ओकर मौत के बाद के संभालेगा ई गाम को ? हम का जवाब देते माय ? बस आंखि नोर(आंसू) से भइर गिया। लेकिन दुख ई रहा कि एको ठो गाम वाला उनको मरने के दिन भी देखने नैय आया। ''
जंगल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि एक धरोहर थे। उनके बेटे-पोते ने मिट्टी से तौबा कर ली है। कोई पंजाब में है तो कोई अरब में। पिछले कई वर्षों से वह गांव की प्राचीन परंपरा का भार ढो रहा था। शादी, ब्याह, होली, दशहरा, उपनयन में कुम्हारों की अनिवार्य भूमिका वह अकेले निभा रहा था। उसका कहना था," फर्ज को कैसे छोड़ दूं ? बाप-दादा की परंपरा को कैसे तोड़ दूं ।'' वैसे कहने के लिए तो गांव में कुम्हारों के सौ परिवार हैं, लेकिन मिट्टी के काम से सभी तौबा कर चुके हैं। नयी पीढ़ी तो चाक की चर्चा करते ही भड़क उठती है।
मैंने मां से पूछा-"अब गांव के लोग क्या करेंगे ? कहां से लायेंगे ब्याह की मटकूरी, पूजा की मूर्ति दीपावली के दीप और श्मशान घाट के पातिल ?''
मां कुछ देर तक चुप रही, फिर बोली- " क्यों बाजार है न ? लोग बाजार से ले आयेंगेसब कुछ। मिट्टी न सही, प्लास्टिक के तो मिल ही जाते हैं।''
मैंने पूछा - " पर कुम्हार कहां से लायेंगे ? जंगल पंडित बाजार में मिलेगा क्या ?''
इसका जवाब मां के पास नहीं था। सच कहूं तो इसका जवाब मेरे पास भी नहीं है।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

कितनी कसौटी पर प्यार

1
वो हमारा पहला प्यार था
इसलिए दुनिया हमें प्यार का समुद्र लगती थी
तब हमें वे पगडंडियां भी खूबसूरत लगतीं
जिधर से वह गुजरती थी
+
तब हम सारी दुनिया से भलीभांति अनजान थे
हालांकि हम नादां नहीं थे
हम पाइथागोरस के प्रमेय के साथ न्यूटन के तीनों लॉ में भी सिद्ध थे
भर्तहरि से लेकर प्रेमचंद तक, भिज्ञ थे
यह तब की बात है जब
हमारी आवाज बदल रही थी और मूछों के पोम आने लगे थे
+
टोले वाले को शंका हुई
परिवार वाले को चिंता
और वे सभी एक साथ उद्वेलित हो गये
जैसे हम प्यार में नहीं, आसमानी आग में हो
जैसे हम फिर से अबोध हो गये हों
और खेलते-कूदते धथूरे के जंगल पहुंच गये हों
+
हमें मालूम था कि हम
दुनिया के सबसे पवित्र क्षण में हैं
हालांकि पत्रों में वह भी करती थी मोहव्वत
पर हकीकत में भयानक अपराध बोध से ग्रस्त
अपनी नजरों में छोटी होते-होते
अंततः मेरी नजरों में भी छोटी हो गयी
और मेरे लिए प्रेम की परिभाषा बदल दी
हम जान चुके थे
कि वह पाश्चाताप में है
एक बार, दो बार, तीन बार
हमारे पहले प्यार का अंतिम संस्कार

2
वो शायद हमारा दूसरा प्यार था
और हम शहर में थे
वह बेझिझक थी
बेवाक और बेलौस भी
हम साथ-साथ वर्ग, पुस्तकालय और सिनेमा जाते थे
बहुत कुछ कहते-सुनते थे
सिवाय उस 'ढाई आखर' के
+
वह हमारे साथ थी
लेकिन हमारी नहीं थी
खूबसूरती के बावजूद
सच में वह किसी की नहीं थी
न दिन की न दुनिया की
उसे बहुत दूर जाना था
लेकिन मेरी कोई मंजिल नहीं थी
और इस तरह दूसरा प्यार भी मारा गया, बगैर प्यार के
पहली बार रिवाज के हाथों
दूसरी बार बाजार के हाथों
+
हाय !
इस रंध्र रिवाज, इस अंध बाजार
के आगे
"प्यार''
कितना लाचार है

(एक निवेदन- इसे निजी अनुभव नहीं , कविता का अनुभव माना जाये। यह किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि प्रवृत्ति का वर्णन है। कवि तो महज हेतु-सेतु है )
 

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

जमीन

जमीन
जिसने हमें पैदा किया
सिखाया
उछलना- कूदना , दौड़ना और धुपना
बीजों को अंकुरित कर, बताया
जनने का रहस्य
लहलहाते पौधों से कहलवाया
कि जिंदगी प्रेम का ही दूसरा नाम है
वृक्षों के छांव में बिठाकर, कहा
कि देना ही सबसे बड़ा लेना है
++
हमें याद है कि
हम बचपन में अक्सर लेख लिखते थे
'मां' पर
और चर्चा करते थे ' जमीन' की
और जीत लेते थे पहला पुरस्कार
++
बहुत कठिन है जमीन से कट जाना
जमीन से ऊपर उठ जाना
और सबसे दर्दनाक है
जमीन से कटकर वापस जमीन पर गिर जाना
 
 

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

हिंसा के बीज/ संदर्भ खगड़िया जनसंहार

गरीबी और अमन-चैन एक साथ नहीं रह सकते। जहां गरीबी रहेगी वहां शांति का रहना नामुमकिन है। गरीबी अभिशाप है तो इसमें ताप भी है जो समाज को जला देता है। इसमें घृणा है जो समाज को खंड-विखंड कर देता है। सतत गरीबी हिंसा को न्यौता देती है और एक दिन पूरे समाज को खून के रंग में रंग देती है। लेकिन हमारे नीति-निर्माता आज भी गरीबी को गरीब के हाथों की लकीर मानने की मानसिकता में कैद है। वे समझते हैं कि गरीब कमजोर, अशिक्षित और निरीह होते हैं। वे सत्तानशीनों का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते। लेकिन पिछड़े इलाके में लगातार बढ़ती हिंसक वारदातें साबित करती हैं कि जिसे हम गरीबी कहते हैं वह अब बारूद का रूप लेने लगा है और जिन्हें हम गरीब मानते हैं वे रक्त पिपाशु मानव समुदाय में परिवर्तित हो रहा है। बिहार के खगड़िया जिला का जनसंहार इसका ताजा उदाहरण है।
लगभग एक दर्जन नदियों के बीच बसा यह जिला बिहार के अत्यंत पिछड़े जिलों में से एक है। भले देश ने स्वतंत्रता प्राप्ती का 63वां सालगिरह मना लिया हो, लेकिन खगड़िया जिला आज भी मध्यकालीन युग में है। वर्षों से यहां के लोग घोर गरीबी में जी रहे हैं। साल में छह महीने तक इस जिले का एक तिहाई हिस्सा बाढ़ में डुबा रहता है। इसे आप डुबा जिला भी कह सकते हैं। घर-घर में बेरोजगारी है। मवेशी और मकई के सहारे खगड़िया ने कई दशकों तक गुजारा किया है। बगैर रोड, स्कूल, शिक्षा और चिकित्सा के समय काटा है। लेकिन अब वे जलालत की इस जिंदगी से निजात पाना चाहते हैं। टेलीविजन और मीडिया के जरिये वे भी दुनिया की रंगीनियों को देख रहे हैं। जब वे बांकी की दुनिया से खुद की तुलना करते हैं तो व्यवस्था के प्रति उनके मन में भारी घृणा पैदा होती है। यह अलग बात है कि सरकार को लोगों के आक्रोश का कोई इल्म नहीं । खगड़िया जिले के कुछ गांवों में जाइये, आप पूरा गांव घुम जायेंगे, लेकिन आपको एक अदद मैट्रिक पास युवक नहीं मिलेगा। हां, हर घर में देसी बंदूक , रिवॉल्वर, कारतूस और बम मिल जायेंगे।ज्यादातर सुदूरवर्ती गावों में डकैतों के कई गिरोह हैं। वे घोड़ा और बंदूक रखते हैं । दिन में सोते हैं और रात को दूर-दूर तक डकैती करने चले जाते हैं। कोसी, बागमती,करेह और गंगा का विशाल दियारा उन्हें सुरक्षित ठिकाना मुहैया कराता है, जहां पुलिस कभी नहीं पहुंचती। हर साल इन दियारों में दर्जनों लाशें गिरती हैं, लेकिन पुलिस कुछ नहीं कर पाती।
माओवादी नक्सलियों ने इसका फायदा उठाया है। नक्सलियों को क्या चाहिए ? ...गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा... खगड़िया जिले में ये तीनों उपलब्ध है। इसलिए विगत पांच-छह वर्षों में नक्सलियों ने इस जिले में भी अपना नेटवर्क तैयार कर लिया। लेकिन सरकार हाथ-पर-हाथ धरकर बैठी रही। सरकार हमेशा इसी मुगालते में रही कि खगड़िया, सहरसा, सुपौल और मधेपुरा में कभी नक्सली पहुंच ही नहीं सकते। क्योंकि कोशी अंचल के समाज में जातीय घृणा और विभाजन जैसी कोई बात नहीं है। यहां हिंसा हो ही नहीं सकती क्योंकि यह अंचल शांति-प्रिय क्षेत्र रहा है। लेकिन सरकार के सारे चिंतक और नियंता भूल गये कि गरीबी से बड़ी घृणा कुछ नहीं होती, कि गरीबी खुद अपने आप में एक भयानक हिंसा है। अगर हिंसा नहीं तो हिंसा के बीज तो है ही।
अमौसी नरसंहार के बाद यह बात साबित हो गयी है कि अब कोशी प्रमंडल भी माओवादी नक्सलियों के चंगुल से मुक्त नहीं रहा। अब उन्होंने अपना नेटवर्क इतना मजबूत कर लिया है कि वह इलाके में ऑपरेट कर सकते हैं। सहरसा के कोशी दियारा में भी दो साल पहले उसने अपने वजूद का एहसास कराया था। तब पुलिस भौचक्क रह गयी थी जब एक दिन अचानक दो दर्जन हथियारबंद माओवादियों से सहरसा पुलिस की भिड़ंत हो गयी थी। इससे पहले वे इस गलतफहमी में थे कि सहरसा जिले में माओवादियों का अस्तित्व नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि पिछले एक दशक से माओवादी कोशी अंचल में अपना नेटवर्क फैलाने में लगे हैं।
खगड़िया के अमौसी जनसंहार को देखकर लगता है कि अब वे इन इलाके में ऑपरेट करने की स्थिति में आ गये हैं। गांवों में ठिकाने खोजने के लिए उन्हें लोगों का समर्थन चाहिए। इसके लिए वे जातियों के बीच खूनी घृणा फैलायेंगे। जब ऐसी पांच-दस घटनाएं घट जायेंगी तब उन्हें आराम से किसी एक समुदाय का समर्थन हासिल हो जायेगा, जिसका वे तथाकथित मसीहा बनेंगे। नारे देंगे। लेवी लेंगे। लाश के बदले लाशें गिरेंगीऔर धीरे-धीरे पूरा इलाका माओवादियों के गिरफ्त में आता चला जायेगा। मध्य बिहार में उसने इसी तरह अपने लिए जमीन तैयार की थी। लेकिन सरकारों के पास इससे निपटने की कोई ठोस नीति नहीं है। अगर सरकार के पास कोई नीति होती, तो खगड़िया आज भी उतना ही दरिद्र नहीं होता जितना वह स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले था।
यह सच है कि कोशी अंचल सामाजिक सद्‌भाव के लिहाज से देश का सबसे आदर्श इलाका है। तमाम उन्मादी राजनीति के बावजूद यह इलाका आज भी सामाजिक समरसता में विश्वास रखता है। लेकिन पिछड़ेपन, गरीबी और सरकारी उपेक्षा (इसमें राज्य और केंद्र दोनों की भूमिका रही है) और अतिवादी शक्तियों के षड़यंत्र के कारण इसमें तेजी से छीजन हो रहा है।

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

हमें अब भी है यकीन

प्रिये,
हम आज भी उसी क्षण में हैं
या फिर उसकी बारंबारता में हैं
आज भी
उठा ले जाते हैं ताकतवर
हमारे खलिहानों से अन्न
आैर कर देते हैं बेदखल
हमें हमारी ही जमीन से
प्रिये,
हम आज भी उसी क्षण में हैं
या फिर उसकी बारंबारता में हैं
आज भी
बेहिचक चलते हैं
हमारे पेटों पर लात
विरोध करने पर
अपना ही खेत, बन जाता है जालियावाला बाग
प्रिये,
हम आज भी उसी क्षण में हैं
या फिर उसकी बारंबारता में हैं
आज भी
हम हंस नहीं सकते
भर मुंह हंसी, जिसे तुम हंसी कह सको
और नहीं जी सकते
कोई जिंदगी, जिसे तुम जिंदगी कह दो
प्रिये,
हम आज भी उसी क्षण में हैं
या फिर उसकी बारंबारता में हैं
आज भी
हमें सुनाई देती हैं
घोड़ों की टाप
भाले-तोप और बरछियों की आवाज
और दिखाई देते हैं
हमारी छतों से लटकती, उनकी तलवार
प्रिये ,
आज भी हम उसी क्षण में हैं
या फिर उसकी बारंबारता में हैं
आज भी
बनते हैं
इंसान के लहू से इंसान का राज
आदमी के खाल से आदमी का ताज
हमारी आह से उनका दरबार
प्रिये,
हम आज भी उसी क्षण में हैं
या फिर उसकी बारंबारता में हैं
लेकिन, आज भी
नहीं टूटा है हमारा तिलिस्म
बिखरी नहीं है उम्मीद
हमें अब भी है यकीन, हमें अब भी यकीन
 

सोमवार, 21 सितंबर 2009

मोबाइल, मेहंदी और अफवाह

दूरसंचार क्रांति के अद्‌भूत यंत्र यानी मोबाइल फोन ने भौगोलिक दूरियां खत्म कर दी है। निश्चित रूप से इससे मानव-विकास की प्रक्रिया को रफ्तार मिली है और दूरी के कारण कमजोर पड़ते सामाजिक-रिश्ते को नया जान मिला है। चंद शब्दों में इसके फायदे नहीं गिनाये जा सकते। लेकिन अगर आम आदमी में जागरूकता न हो तो यह यंत्र कहर का सबब भी बन सकता है। इसका एक उदाहरण कल झारखंड और बिहार में देखने को मिला । कल तकरीबन 24 घंटे तक झारखंड और बिहार के लाखों लोग भयानक दहशत में रहे। एक शक ने अफवाह का रूप धारण कर लिया और देखते ही देखते दोनों सूबे में कोहराम मच गया। अफवाह यह उ़ड़ी कि मेहंदी लगाने से लड़कियों की मौत हो रही है। हालांकि सच्चाई यह थी कुछ जगह मेहंदी लगाने के बाद लड़कियों को एलर्जी की समस्या हुई थी। लेकिन बात का बतंगड़ बनाकर इसे जानलेवा करार दिया गया। सुनी सुनाई बातों पर लोग यकीन करने लगे और अपने सगे-संबंधियों को तुरंत फोन पर इसकी सूचना देने लगे। जुबान-दर-जुबान अफवाह में मिर्च-मसाले लगते गये और रात तक दोनों सूबे के कई शहरों में कोहराम मच गया। घबड़ाकर बदहवास हुये लोगों से अस्पताल भरने लगे। बड़ी संख्या में औरतें-लड़कियां डर के मारे बदहवास होने लगी। इस तरह एक काल्पनिक रोग के भय के चलते वास्तव में बीमार होने लगे। बदहवासी अपने-आप एक गंभीर बीमारी है। वैज्ञानिक शोध के मुताबिक दुनिया में जितने लोग सांप के विष से नहीं मरते उससे कहीं ज्यादा सर्प दंश के भय से उपजे बदहवासी के कारण मौत के मुंह में समा जाते हैं।
कहा जाता है कि कल सुबह रांची के निकट ओरमांझी कस्बे के चकला गांव से यह अफवाह उड़ी कि मेंहदी लगाने से 11 बच्चियों की मौत हो गयी है। संबंधित क्षेत्रों की कुछ मस्जिदों से भी एेलान किया गया कि बच्चियां मेंहदी न लगाये, जिसने लगाया हो वह तत्काल धो ले। इसके बाद अस्पतालों में बच्चियां और महिलाएं तबीयत खराब होने की शिकायत लेकर पहुंचने लगीं। इनमें कुछ हाथ में जलन,कुछ बदन में दर्द तो कुछ ने कंपकंपी की शिकयत की।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह अफवाह ठीक ईद के चांद देखने के बाद फैली। जिसके कारण हजारों लोग पर्व का आनन्द भी नहीं उठा सके। कहां तो उत्सव का दिन था और लोग सुबह से पर्व मनाने की तैयारी कर रहे थे और कहां अफवाह के कारण सारे उत्साह भय और तखलीफ तब्दील हो गये। गौरतलब है कि बिहार और झारखंड में ईद के चांद दिखने के बाद औरतें मेहंदी लगाती हैं। चूंकि कई जगह मस्जिद से लाउडस्पीकरों के जरिये मेंहंदी लगाने से मना किया गया, इसलिए लोग ज्यादा भयभीत हो गये। अफवाहों से निपटने के लिए प्रशासन की ओर से जो प्रयास होना चाहिए वह नहीं हो सका। यह चिंता की बात है। लेकिन उससे भी ज्यादा चिंताजनक है- आम आदमी की अज्ञानता और भेड़िया-धंसान वाली मानसिकता। पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि लोग बगैर अपनी आंखों से देखे और बुद्धि से परखे ही मोबाइल का बटन दबाना चालू कर देते हैं। पता नहीं इसमें उन्हें क्या मजा आता है, लेकिन मैंने देखा है कि ऐसी अफवाह फैलाने में कुछ लोगों को मजा आता है। वे कभी मोबाइल में विस्फोट की अफवाह फैलाते हैं तो कभी गणेश जी को दूध पिलाने लगते हैं। यह संचार के इस क्रांतिकारी यंत्र के दुरूपयोग का जीता-जागता नमूना है। सच तो यह कि हर प्रौद्योगिकी अपने साथ-साथ दुरूपयोग की संभावना भी लेकर आती है। यह तो उपयोग करने वाले पर निर्भर करता है कि वह उसका कितना सदपयोग करते हैं और कितना दुरूपयोग।
वैसे आजकल सौंदर्य प्रसाधन में मिलावट की बात आम हो गयी है। अब वे दिन लद गये जब लोग अपने बाड़ी से मेंहंदी के पात चुनकर लाते थे और घर में इसे तैयार करते थे। अब मेहंदी भी पाउच में आने लगी है जो हर्बल न होकर केमिकल है। साबित तथ्य है कि केमिकल पदार्थों के मिश्रण के अनुपात में थोड़ी गड़बड़ी होने से दवा जहर बन जाती है। लेकिन जिस देश में दवा में मिलावट रोक पाने में सरकार असक्षम हो वहां मेहंदी की मिलावट को कौन रोकेगा ? अब देखने की बात है कि इसे लेकर कोई कार्रवाई होती है या फिर ' दिन गये बात गयी' की तर्ज पर ही इस मामले को भी निपटा दिया जाता है।
 
 
 

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

हिन्दी नहीं, यह हिन्दुस्तान का विरोध है

उस देश के लगभग पचास फीसद लोगों की मादरे-जुबान हिन्दी है। वहां के नब्बे फीसदी लोग हिन्दी बोलते हैं जबकि तकरीबन शत-प्रति-शत नागरिक इस भाषा को समझने की काबलियत रखते हैं। उस देश में ब़डी संख्या में हिन्दी फिल्में देखी जाती हैं आैर वहां के रेडियो स्टेशनों से अक्सर हिन्दी के नये-पुराने गाने प्रासारित होते रहते हैं। वहां के राष्ट्रीय टेलीविजन से लेकर प्राइवेट टेलीविजन तक हिन्दी फिल्म व सीरियल प्रसारित करते हैं। यहां तक कि उस देश की राष्ट्रभाषा भी हिन्दी-संस्कृत परिवार से निकली उप-भाषा है जिसकी लिपि देवनागरी हैआैर जिसके नब्बे प्रतिशत शब्द या तो हिन्दी के हैं या फिर हिन्दी परिवार की भाषा मैथिली, भोजपुरी, बंगाली आदि के। लेकिन व्यतिरेक-विडंबना देखिये, उस देश में हिन्दी का विरोध हो रहा है। क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के चूल्हे पर हिन्दी की हांडी च़ढायी जा रही है। वहां के निवार्चित उपराष्ट्रपति को हिन्दी में शपथ लेने के कारण पदच्यूत होना प़डा है। अब तक शायद आप समझ गये होंगे कि मैं किस देश की बात कर रहा हूं। जी हां, मैं नेपाल की ही बात कर रहा हूं, जहां इन दिनों हिन्दी विरोध की राजनीति सातवें आसमान पर है। मैं उस नेपाल की बात कर रहा हूं जिसे भारत ने अपना हृदय के लहू से पाला-पोसा है। अपने हिस्से की रोटी खिलाकर जवान किया है। मैं उस नेपाल की भी बात कर रहा हूं जो आज भी भारत की मदद के बगैर महज दस दिन भी जिंदा नहीं रह सकता। यह वही नेपाल है जिसके भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स़डक, परिवहन आैर इंर्धन की व्यवस्था आज भी भारत ही करता है, बिल्कुल छोटे भाइर् की तरह।
उप राष्ट्रपति परमानंद झा को कुर्सी से बेदखल किये जाने को लेकर नेपाल के मधेश इलाके में भारी आक्रोश है। नेपाल के सवा करो़ड मधेशी इसे अपना अपमान मान रहे हैं। वैसे भी वर्षों से राजनीतिक आैर सामाजिक उपेक्षा के शिकार मधेशी राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए पिछले तीन साल से आंदोलनरत है। हालांकि इसका आगाज आज से चालीस वषर् पहले ही हो गया था। अब मातृभाषा के अपमान ने उनके जले पर नमक छि़डक दिया है, जिसके परिणामस्वरूप मधेश इलाका एक बार फिर से सुलग उठा है।
हालांकि मधेशी आैर गैर-मधेशी नेपाली लोगों के लिए यह भाषाइर् टकराव का मुद्दा है, लेकिन अगर गहराइर् से देखें तो इसकी ज़डें कहीं आैर हैं। दरअसल, यह हिन्दी विरोध का मुद्दा नहीं, बिल्क इसके तार भारत-विरोध की साजिश से जु़डी हुइर् है जिसका नेतृत्व नेपाल की चरमपंथी पाटिर्यां कर रही हैं। कहने की जरूरत नहीं कि नेपाल में तेजी से पांव पसारती चरमपंथी शिक्त्ायां पिछले डे़ढ दशक से वहां भारत-विरोध का माहाैल तैयार करने में लगी हुइर् हैं। ये वहीं शिक्तयां है जो येन-केन-प्रकारेन नेपाल को अपनी मुट्ठी में कैद करने के लिए बेताब हैं। पहले उन्होंने इसके लिए बुलेट को माध्यम बनाया फिर बैलेट को । आैर जब इन सबके बावजूद बात नहीं बनी तो वे अब सामाजिक विद्धेष आैर अिस्थरता फैलाकर अपने नापाक लक्ष्य को हासिल करने में जुट गयी हैं। बुलेट से बैलेट तक के सफर में तो वे बहुत हद तक सफल रहे, लेकिन सेना को गिरफ्त में लेने की उनकी चाल विफल हो गयी। चीन के इशारे पर काम कर रहीं ये शिक्त्ायां (जिन्हें मालूम नहीं कि चीन को दुनिया का सबसे गैरभरोसेमंद देश माना जाता है आैर जिसके बारे में कहा जाता है कि वह किसी का नहीं है) अपनी योजना की नाकामी के लिए भारत को जिम्मेदार मानती हैं। इसलिए अब वे उन तमाम सूत्रों आैर हेतु-सेतु पर हमला बोल रही हैं जो भारत आैर नेपाल को आपस में जो़डते हैं। जाहिर है हिन्दी भाषा, हिन्दवी संस्कृति आैर भारत-नेपाल मैत्री संधि दोनों देशों को एक सूत्र में पिरोते हैं, इसलिए वे बारी-बारी से इन सबों पर आक्रमण कर रही हैं। अब तो वहां ग्रेटर नेपाल की मांग भी होने लगी हैं। ग्रेटर नेपाल का मतलब है आधा बिहार, आधा उत्त्ार प्रदेश,उत्त्ारी बंगाल आैर समूचे सििक्कम को नेपाल में शामिल कराना। नेपाल की स़डकों पर आये दिन ग्रेटर नेपाल के नक्शे के साथ बेध़डक प्रदशर्न होते रहते हैं। नेपाल की किसी भी सरकार ने रिश्ते के इन भस्मासुरों को कभी गिरफ्तार नहीं किया आैर न ही यह जानने की कोशिश की कि आखिर ये बंकारा बछ़डे किन खूंटे के बल उछल-कूद कर रहे हैं।
वास्तव में उपराष्ट्रपति परमानंद झा का मामला, भारत विरोध की गहरी साजिश की एक क़डी है, जिसे व्यापक फलक में देखनी की जरूरत है। अगर इस क़डी कलइर् खोलनी हो तो पूरी जंजीर की प़डताल करनी प़डेगी। दरअसल, आज से कोइर् साल भर पहले परमानंद झा भारी बहुमत से नेपाल के उपराष्ट्रपति चुने गये थे। एक अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाक्रम के तहत तब मधेशी जनाधिकार फोरम के उम्मीदवार श्री झा को नेपाली कांग्रेस आैर एमाले ने समथर्न दिया था। यह समीकरण इसलिए फलीभूत हुआ क्योंकि ये तीनों पाटिर्यां उस समय माओवादियों को रोकना चाहती थी। इस समझाैते के तहत तीनों पाटिर्यों ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति आैर संविधान सभा के अध्यक्ष पद आपस में बांट लिया थाआैर माओवादी पार्टी मुंह ताकते रह गयी। लेकिन बाद के दिनों में सत्त्ााइर् टकराव के चलते जनाधिकार फोरम आैर एमाले के रिश्ते में कांटे उग आये । इसलिए हिन्दी भाषा का जिन्न बोतल से बाहर निकाल दिया गया आैर इस पर वहां के उच्चतम न्यायालय ने भी अपनी मुहर लगा दी। जबकि मधेशी जनाधिकार फोरम आैर श्री झा का कहना है कि उच्चतम न्यायालय का फैसला ही गलत है क्योंकि उसने संविधान के जिस आलोक में यह निणर्य सुनाया है उस पर अभी संविधान सभा में फैसला होना है। पूवर् न्यायाधीश श्री झा का तकर् है कि उन्होंने हिन्दी में शपथ लेकर कोइर् गुनाह नहीं किया है, क्योंकि हिन्दी को संविधान में शामिल कराने की मांग को पूरा किये जाने के समझाैता-आश्वासन के बाद ही उसकी पार्टी चुनाव प्रकि्रया में शामिल हुइर् थी। इसके अलावा उन्होंने कहा कि उन्होंने शपथ पत्र पर दस्तखत करने के बाद ही हिन्दी में शपथ लिया था। अगर उनकी शपथ असंवैधानिक थी तो उसके शपथ-पत्र को अभी तक अवैधानिक घोषित क्यों नहीं किया गया है। इसके अलावा अगर उनकी शपथ अमान्य थी तो एक साल तक राष्ट्रपति ने उनके शपथ डाक्यूमेंट को नामंजूर क्यों नहीं किया।
सच तो यह है कि नेपाल सरकार इन दिनों जिस अंतरिम संविधान के तहत काम कर रही है, उसके कइर् प्रावधानों के विरोध में सभी पाटिर्यों ने आवाज उठायी है। अगर नेपाल के माजूदा अंतरिम संविधान के बरक्श देखें तो खुद उच्चतम न्यायालय के अिस्तत्व पर सवालिया निशान लग जाता है। उहापोह की इस िस्थति से मुक्त होने का जो एक मात्र रास्ता है, वह है नये संविधान का निमार्ण। एक साल पहले इसी के लिए संविधान सभा का चुनाव हुआ था। इसलिए श्री झा के मामले के निबटारे के लिए संविधान सभा से बेहतर कोइर् आैर संस्था नहीं थी। लेकिन सबकुछ जानते हुए उनकी हिन्दी में शपथ लेने के फैसले को असंवैधानिक करार दिया गया आैर नेपाली भाषा में शपथ लेने के लिए कहा गया। जाहिर सी बात है कि ऐसा करने के बाद मधेशी पार्टी मधेशियों से नजर नहीं मिला सकती थी, इसलिए श्री झा ने पद छो़डने का फैसला कर लिया।
बहरहाल, भारत ने इसे लेकर कोइर् प्रतिकि्रया नहीं दी है। स्पष्ट है भारत कोइर् बयान देकर नेपाल के अंदरूनी मामले में दखल देने के संभावित आरोप से बचना चाहता है। लेकिन इस मामले पर भाषा शािस्त्रयों की चुप्पी समझ में नहीं आती। उन साहित्यकारों की चुप्पी भी, जो भाषा को सरहद से परे मानते हैं । हालांकि इसमें कोइर् दोमत नहीं कि भाषा बहती सलिला सदृश होती है। इतिहास साक्षी है कि कोइर् भी ताजो-तख्त भाषा का कुछ नहीं बिगा़ड सकी, तो इस मुअॆ राजनीति की हैसियत ही क्याहै। राजनीति तो बदचलन होती है, पल-पल बदलती रहती है। नेपाली लोग किसी स्कूल या काॅलेज में हिन्दी नहीं सिखते, इसे वह मां की गोद में ही उच्चारणे लगते हैं। आैर यह समय की कसाैटी पर कसा-परखा सच है कि मां के आंचल से उपजने वाली भाषा किसी कागजी प्रमाणपत्र का मोहताज नहीं होती। परमानंद झा ने इसी सच का साथ दिया है। भाषाइर् प्रतिबद्वता के इतिहास में यह घटना एक मिसाल के ताैर पर याद की जायेगी। भारत के तथाकथित हिन्दी प्रेमी नेताओं को परमानंद झा से प्रेरणा लेनी चाहिए।
 

बुधवार, 16 सितंबर 2009

बाइ इलेक्शन वाया वाइ पास

दहाये हुए देस का दर्द-56
साठ साल में तो घूरे के दिन भी फिर जाते हैं । लेकिन इस देश की राजनीति के दिन फिरने के संकेत कहीं नहीं दिखते। हमारी बदकिस्मती यह है कि बार-बार नेताओं के हाथों मोहरा बनना हमारी नियति बन गयी है। आज भी राजनेताओं की नजर में समाज एक चेश बोर्ड ज्यादा कुछ नहीं, जिस पर सिर्फ चाल चले जा सकते हैं और जीत हासिल कर सत्ताई कुर्सी कब्जाया जा सकता है। साल-दर-साल यही होता आ रहा है। कहते हैं कि विपत्ति में इंसान अपनी क्षुद्रता को भूल जाता है, लेकिन हमारे राजनेता दैवी आपदा और राष्ट्रीय संकट के समय भी शतरंज के खिलाड़ी ही बने रहने के आदि हैं। इसका ताजा उदाहरण है- बिहार का हालिया विधानसभा उपचुनाव।
बिहार में कुल सत्रह विधानसभा सीटों पर हाल में ही उपचुनाव संपन्न हुये हैं। बाढ़ से उजड़े कोशी अंचल की तीन विधानसभा सीटों पर भी उपचुनाव हुये। इनमें सुपौल जिले की त्रिवेणीगंज, सहरसा जिले की सिमरी बख्तियारपुर और अररिया जिले की अररिया सीटें शामिल हैं। ये सीटें विधायकों के एमपी बन जाने के कारण खाली हुई थीं। उम्मीद थी कि चुनाव प्रचार के दौरान नेता बाढ़ से तबाह हुये लोगों की बात सुनेंगे और कोशी अंचल में चारों ओर यत्र-तत्र बिखरी हुई तबाहियों को मुद्दा बनायेंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। सभी पार्टियों ने इस मुद्दे को नक्कारखाने में डाल दिया। बड़ी कुशलता से राजनीतिक पार्टियों ने बाढ़ के मुद्दे पर मिट्टी डाल दी और लोगों को पता भी नहीं चला। कोई सांप्रदायिकता का बेसुरा राग अलापने लगा, तो कोई जातिवाद के ठुमके लगाने लगे। और इस तरह जनता के असल मुद्दे गौण हो गये। चुनावी प्रचार के दौरान किसी भी पार्टी के किसी नेता ने बाढ़ का जिक्र तक नहीं किया। चाहे केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस हो या राज्य में सत्तासीन राजग या फिर बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी, राजद और लोजपा।
सब-के-सब एक साथ अंधे हो गये । कांग्रेस की ओर से काबिल माने जाने वाले सलमान खुर्शीद और जगदीश टाइटलर ने अपने प्रत्याशियों के लिए कई सभाएं कीं। दोनों नेता केंद्र सरकार का गुणगान करते रहे और हर सभा में कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली। लालू और रामविलास महादलित-दलित के राग पर सवारी करते रहे। संक्षेप में कहें, तो सब पार्टियों ने उसी पुराने फार्मूले का इस्तेमाल किया- तुम मुझे गाली दो, मैं तुझे गाली दूंगा। जनता जब तक समझ सकें कि किसने किसको गाली दी, तब तक वोट हो जायेगा।
जबकि बाढ़ से उजड़े इलाके के लोग आज भी किसी फरिश्ता का इंतजार कर रहे हैं। रोजगार के अभाव में लोग पलायन कर रहे हैं। यहां तक कि बाढ़ में ध्वस्त हो चुकी आधारभुत संरचना की पुनर्स्थापना जनता की महती जरूरत है। अभी तक न तो ध्वस्त हुई सड़कों का पुणनिर्माण हो सका है और न ही टूटे रेलवे ट्रैक दुरूस्त हो सके हैं। केंद्र सरकार के कामों की दुहाई देने वाले सलमान खुर्शीद को शायद पता नहीं कि केंद्र सरकार का रेलवे मंत्रालय 15 महीने में बाढ़ से टूटे महज 40 किलोमीटर रेलवे ट्रैक को रिस्टोर नहीं कर सका। कोशी नदी को साधने के लिए केंद्र सरकार पिछले एक साल में एक कदम आगे नहीं बढ़ सकी है। उन्हें नहीं मालूम कि कोशी अंचल के लोग इसका स्थायी समाधान चाहते हैं। लोग पूछ रहे हैं कि पिछले एक साल में केंद्र सरकार ने इस दिशा में क्या किया? लेकिन किसी नेता ने इसका जवाब नहीं दिया । जवाब दें भी तो कैसे, वे तो वाय पास से निकलने के आदि हैं। शहर में बिना घुसे ही शहर को पार कर जाते हैं।

रविवार, 13 सितंबर 2009

भ्रष्टाचार के महाकाल में एक ईमानदार आवाज

आज देश के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन पर फिदा होने का मन करता है। लंबे अर्से बाद शीर्ष कुर्सी पर बैठे किसी व्यक्ति को दिल से शुक्रिया कहने का मन करता है। अन्यथा भ्रष्टाचार के कैंसर से छटपटाते इस देश की कराह सुनने की फुर्सत कहां है हमारे कर्णधारों को। अधिकतर भ्रष्टाचार को सामाजिक शिष्टाचार मान चुके हैं और दिलो-जान से इसमें शामिल है। कुछ दूर बैठकर तमाशा देख रहे हैं और कुछ धृतराष्ट्र की तरह आंख पर पट्टी बांधकर आत्मपलायन कर चुके हैं। निरीह जनता को मालूम नहीं कि वे क्या करे ? उन्हें भ्रष्टाचार के इस कैंसर का अंजाम भी कहां मालूम ? लेकिन जिन्हें मालूम है, वे भी क्या कर रहे हैं ? उद्धारक का नकाब लगाकर पियक्कड़ी कर रहे हैं। और जाने-अनजाने देश की अंतिम यात्रा की प्रतीक्षा ही तो कर रहे हैं
यह भ्रष्टाचार का महाकाल है। इसलिए अधिकतर की मति मारी जा चुकी है। आंख रहते अंधे और कान होते बहरे होने का युग-दोष भारत को ग्रस चुका है। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने अपने नैतिक दायित्व को निभाहते हुए जवान खोली है। यह साहस का काम है। महाकाल के इस भयानक बेईमान समय में मुख्य न्यायाधीश ने एक आवाज लगायी है। यह आवाज़ नहीं चेतावनी -हार्न है । शायद उनकी आवाज दूर तक जायेगी। जानी चाहिए । अगर यह आवाज भी नहीं सुनी गयी, तो यकीन मानिये हमें जगाने और हार्न बजाने के लिए कोई अवतार नहीं होने वाला।
कहते हैं कि किसी भी देश का भविष्य उसका युवा वर्ग तय करता है। लेकिन देश के युवा क्या भ्रष्टाचार के इस आपादमस्तक व्याप्त वायरस को नहीं देख रहे ? युवाओं ! भ्रष्टाचार ने हमारे भविष्य को कैद कर लिया है। यह जींस और गोगल्स का वक्त नहीं, देश को बचाने के लिए आगे आने का वक्त है। जरा सुनो, तो मुख्य न्यायाधीश ने क्या कहा है ?
क्या कहा मुख्य न्यायाधीश ने
1 सभी महत्वाकांक्षी योजनाएं बिचौलियों व दलालों के चंगुल में
2 रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा
3 राशन कार्ड, बिजली और पानी के कनेक्शन में भी भ्रष्टाचार
4 भ्रष्ट अधिकारियों की संपत्ति जब्त की जाये

5 ठगा महसूस कर रहा है आम आदमी
मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन ने कल शनिवार (१२-09) को दिल्ली में कहा कि नरेगा सहित गरीबों और दलितों के उत्थान के इरादे से शुरू की गयी लगभग सभी महत्वाकांक्षी योजनाएं बिचौलियों और दलालों के चंगुल में फंसकर तड़प रही हैं। उन्होंने कहा कि देश में चारों ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है। भ्रष्टाचार की जद में न्यायपालिका भी आ चुकी है। वह भ्रष्टाचार से संबंधित अपराधों के खिलाफ़ लड़ाई के मुद्दे पर सीबीआइ की ओर से अायोजित संगोष्ठी में बोल रहे थे। उन्होंने कहा- जनवितरण प्रणाली भी भ्रष्टाचार का ग़ढ बना हुआ है। चाहे राशन कार्ड बनवाना हो या बिजली और पानी का कनेक्शन लेना हो, सब जगह भ्रष्टाचार है। इस पर अंकुश लगाने की जरत है। आम आदमी इसका सबसे बड़ा शिकार बन रहा है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार से न्यायपालिका भी अछूती नहीं है। यह अत्यंत दुखद है। न्यायपालिका का अर्थ केवल न्यायाधीशों से ही नहीं, अपितु न्याय प्रणाली से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े सभी लोगों से है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा प्रभावित आम आदमी होता है, जो कदम-कदम पर खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रहा है। उन्होंने हवाला कारोबार के जरिये आतंकियों को धन उपलब्ध कराने और रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा तो है ही, कानून व्यवस्था भी इससे प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि विदेशों में भ्रष्टाचार को मौलिक मानवाधिकारों के उल्लंघन का महत्वपूर्ण कारण समझा जाने लगा है, लेकिन भारत का कानून कुछ अलग तरह का है। उन्होंने भ्रष्टाचार में शामिल व्यक्तियों को शत-प्रतिशत सजा दिलाने की आवश्यकता जताते हुए कहा कि इसके लिए अभियोजन एजेंसियों को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। अभियोजन एजेंसियां ज्यादा जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि अपराधियों के छूट जाने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार अभियोजन एजेंसियां होती हैं। मजबूत अभियोजन और सटीक गवाही के अभाव में अपराधियों के रिहा होने से उस मुकदमे का निस्तारण करनेवाले न्यायाधीश को भी हताशा होती है। ऐसे अपराधियों को सजा सुनिश्चित कराने के लिए देश में सशक्त व प्रभावी अभियोजन एजेंसियों की आवश्यकता है।
 

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

पूर्णिमा और अमावाश्या का फर्क

दादियां मिथकों में जीती थीं
इसलिए जब -तब बांचती रहती थीं
कि अमावाश्या के दिन जन्मे बच्चे
बड़े होकर चोर हो जाते हैं
यह बात
दादी की दादी की दादियों ने भी बांची थीं
इसलिए, गांव की प्रसवासन्न मांएं
उन दिनों अमावाश्या से डरती थीं
लेकिन
अचानक युग ने जैसे पलटी मार ली
अमावाश्या और पूर्णिमा का फर्क
जैसे सदा के लिए खत्म हो गया
जैसे खत्म हो गये गांधी, विनोबा और हरिशचंद्र
जैसे खत्म हो गये ईमान और सिद्धांत
और इस तरह
बच्चे जन्म लेने से पहले ही चोर हो गये
++
अब कोई मां
नहीं डरती अमावश्या से
उन्हें मालूम है अपने बच्चों का भविष्य
वे तोड़ चुकीं हैं, दादियों की बेड़ियां
शुक्र है खुदा का
कि आज दादियां जिंदा नहीं हैं
 
 
 

सोमवार, 7 सितंबर 2009

राहत और रिश्वत

दहाये हुए देस का दर्द- 55
हमने देखी एक प्रचंड बाढ़
बाढ़ के बाद
धरती पर एक भीषण उजाड़
खाली गोद
बिछुड़े अबोध
पोछी मांग
इसके बाद
हमने देखी
शायद सबसे बड़ी राहत
शायद सबसे बड़ी रिश्वत
चरपहिये से दौड़ते गिद्ध
दोपहिये से झपटते चील और कौअॆ
और इस तरह
हम भूल गये उस बाढ़ को
उसकी प्रचंडता को
अब हमें
वह बाढ़ बहुत निरीह लगने लगी है
क्योंकि हमारे सामने
बाढ़ से लंबी लकीर खींची जा चुकी है
 

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

इस तरह भी बन जाता है एक देश

इधर
इनके सिर पे टूटा है आसमान
और पेट पर बंधे हैं पत्थर
जैसे ये आदमी नहीं
आदम जात का आखिरी मुहावरा हो
उधर
वे बनाते हैं तीन को तीस
और डेढ़ बीत के पेट में रखते हैं पूरे कायनात
जैसे वह आदमी नहीं
बरमूडा का अखाड़ा हो
और
इस तरह बन जाता है एक देश
जैसे वह देश नहीं
देश का कबाड़ा हो

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

कहीं देर न हो जाये (रिवर इंटरलिकिंग : एक विश्लेषण)

अब यह बात लगभग साबित हो चली है कि भारत की अधिकतर नदियां मानवीय हस्तक्षेप के कारण अपना मूल चरित्र खो चुकी है। इसलिए जल संकट इस देश की एक स्थाई समस्या बन गयी है। कहीं नदियां सूख रहीं हैं, कहीं अत्यधिक प्रदूषण के कारण उसका पानी इस्तेमाल करने योग्य नहीं रहा है तो कहीं उसकी जल धारण क्षमता खत्म हो रही है। यानी हर स्थिति में जल-संकट। कमी से सुखाढ़ तो अधिकता से बाढ़। इस समस्या निजात पाने के लिए तीन दशक से नदियों को जोड़ने की बात की जा रही है, लेकिन अभी तक न तो इसकी पुख्ता तैयारी हो सकी है और न ही मतैक्य हो सका है। देश की वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक विसंगतियों को देखते हुए इस बात की उम्मीद भी काफी कम है कि यह योजना कभी धरातल पर उतर सकेगी।
सन 1980 में केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय और केंद्रीय जल आयोग ने इसके लिए एक अध्ययन योजना बनायी जिसे नेशनल पसर्पेिक्टव प्लान (एनपीपी) कहा गया। 1982 में केंद्र सरकार ने इसके विभिन्न आयामों पर अनुसंधान करने के लिए एनडब्लूडीए (नेशनल वाटर डेव्‌लपमेंट एजेंसी) नामक एजेंसी का गठन किया। इसके बाद लंबे समय तक यह महापरियोजना ठंडे बस्ते में रही। दोबारा 2002 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने इसमें दिलचस्पी दिखाते हुए कुछ कदम उठाये। गाैरतलब है कि अक्तूबर 2002 में उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया था कि एक दशक के अंदर ही इसके लिए आवश्यक कदम उठाए जाये। बाद के दिनों में देश की प्रमुख नदियों को परस्पर जो़डने आैर डैम व नहरों के माध्यम से अनुपयोगी (सरप्लस) जल को देश भर में वितरित करने वाली इस महापरियोजना को लेकर एक टास्क फोर्स का गठन किया गया। टास्क फोर्स ने विभिन्न प्रकार के अनुसंधान आैर अध्ययन के बाद इस योजना के लिए एक प्रारूप तैयार किया, जिसकी सुसंगता (फिजीविलिटी) आैर विस्तृत परियोजना (डीपीआर) अभी बांकी है। केंद्रीय जल संसाधन विभाग के अनुसार, इस दिशा में काम हो रहा है।
प्रस्तावित प्रारूप में इसके लिए देश में कुल 30 नदी-बेसिन-लिंक बनाने का प्रस्ताव है। इनमें से 16 लिंक दक्षिणी प्रायिद्वपीय (पेनिसुलर) भागों में तथा 14 उत्त्ारी क्षेत्रों बनाये जाने का प्रस्ताव है। प्रारूप को सरकार को साैंपते समय एनडब्लूडीए के अध्यक्ष सुरेश पी प्रभु ने कहा था, "नदियों के जो़डने से देश को जल उपलब्धता के असंतुलन से बहुत हद तक निजात मिल सकता है। परियोजना पूरी होने के बाद समुद्र में मिलकर बेकार हो जाने वाले पानी का समुचित उपयोग हो सकेगा।' एनडब्लूडीए के अनुसार, परियोजना पूरी होने के बाद लगभग 200 अरब घन मीटर (बिलियन क्यूबिक मीटर) पानी को एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकेगा। इसके अलावा लगभग सा़ढे तीन करो़ड हेक्टेयर जमीन की सिंचाइर् हो सकेगी। गंगा, ब्रह्मपुत्र आैर उनकी सहायक नदियों से आने वाली बा़ढ में 20 से 30 फीसद तक कमी होगी। बकाैल सुरेश प्रभु, "देश में जलविद्युत्‌ ऊजार् की असीम संभावना है। लेकिन आज भी हमारी कुल बिजली उत्पादन में जलविद्युत्‌ का हिस्सा मात्र 25 फीसद है । नदियों को जो़डने के बाद इसमें भारी ब़ढोत्त्ारी होगी। हम इस परियोजना की मदद से 34 हजार मेगावाट पनबिजली का उत्पादन कर सकते हैं।' जहां तक लागत राशि की बात है तो एनडब्लूडीए ने अपने प्रस्ताव में कहा था कि वषर् 2002 के मूल्यों आधार पर इसमें कुल 5 लाख 60 हजार करो़ड रुपये खचर् होने का अनुमान है।
लेकिन इन तमाम आकलनों आैर उम्मीदों के बाद भी इस परियोजना को लेकर अभी तक मतैक्य नहीं हो सका है। कइर् पयार्वरणविद्‌ , सामाजिक कायर्कतार् आैर नदी विशेषज्ञ इसकी आलोचना कर रहे हैं। इनमें प्रसिद्ध पयार्वरणविद्‌ अनुपम मिश्र, डाॅ अरुण कुमार सिंह आैर सामाजिक कायर्कतार् मेधा पाटकर आैर वंदना शिवा भी शामिल हैं। आलोचकों का कहना है कि यह योजना न केवल अव्यवहारिक है, बिल्क इससे पानी की समस्या घटने के बजाय ब़ढेगी आैर राज्यों के बीच पानी को लेकर झग़डों में इजाफा होगा।
इस आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। कोई भी राज्य यह नहीं चाहेगा कि उसका पानी मुफ्त में दूसरे को मिले। प्राकृतिक संपदाओं पर क्षेत्रीय अधिकार को पूरी दुनिया स्वीकार करती है। इसलिए यह सोचना कि किसी क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा मुफ्त में अन्य क्षेत्रों को दे दिया जायेगा और विरोध नहीं होगा, सरासर मुर्खता होगी। हालांकि आलोचकों का कहना है कि इससे आम लोग आैर किसानों को लाभ नहीं होगा, बिल्क नेता, अफसरशाही आैर ठेकेदार मालामाल होंगे। यह तर्क भी अपने जगह सोलह आने सच है। देश की राजनीति और अफसरशाही के भ्रष्ट आचरण को देखकर इससे कौन इंकार करेगा। अभी तक का अनुभव यही बताता है कि नदियों के प्रबंधन की योजना इसलिए घातक साबित हो रही है क्योंकि यहां भ्रष्टाचार के कारण हर प्रबंधन अंततः कुप्रबंधन में तब्दील हो गयी। कोसी तटबंध परियोजना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। याद रहे कि साठवें दशक में जब कोशी परियोजना पर काम चालू हुआ था तो उस समय प्रसिद्ध अभियंता केएल राव की अध्यक्षता में इसकी फिजीविलीटी पर अध्ययन कराया गया था। राव ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि तटबंध एक तात्कालिक उपाय है। उन्होंने स्पष्ट हिदायत दी थी कि कोशी तटबंध को हमेशा विशेष निगरानी और नियमित देखरेख में रखना पड़ेगा। लेकिन हुआ इसका उलट। कोशी तटबंध की मरम्मत और अपग्रेडेशन के नाम पर आवंटित राशियों का हमेशा बंदरबांट होता रहा। न तो कभी उसे अपग्रेड किया गया और न ही उसके रखरखाव पर ध्यान दिया। आज परिणाम सबके सामने हैकि कोशी तटबंध लगभग नाकाम हो चुका है और अब उसके अंदर नदी को रख पाना लगभग असंभव हो चुका है। यही हश्र अन्य तटबंधों का भी हुआ।
नदियों को जोड़ने की योजना की तकनीकी सुसंगता (कंपैटिबिलिटी) पर भी सवाल उठते हैं। केंद्रीय जल आयोग के पूवर् अध्यक्ष आैर जल प्रबंधन के विशेषज्ञ एमएस रेड्‌डी ने कुछ समय पहले इस परियोजना की तकनीकी खामियों की ओर लोगों का ध्यान दिलाया था। उन्होंने कहा था कि ऐसी परियोजना कि लिए पयाप्तर् वैज्ञानिक अध्ययन आैर सर्वेक्षण की आवश्यकता होती है आैर अभी जो बातें कही जा रहीं हैं उनमें कइर् खामियां हैं। तकनीकी आैर पयार्वरण संबंधी अ़डचनों के अलावा इसकी राह में आैर रो़डे भी हैं। यह नेपाल आैर बांग्लादेश के गंभीर सहयोग के बिना संभव नहीं है। इसके दो डैम आैर तीन नहर नेपाल में बनने हैं। लेकिन नेपाल सरकार ने अभी तक इसमें कुछ खास दिलचस्पी नहीं दिखाइर् है। बांग्लादेश पहले ही विरोध दजर् कर चुका है। लिहाजा योजना अभी भी कागज, कल्पना, चर्चे आैर बहस तक ही सीमित है।
हालांकि इसमें कोइर् दोमत नहीं कि जल संकट अब विकट शक्ल अिख्तयार कर चुका है। प्रदूषण, जलवायु परिवतर्न आैर दोषपूणर् जल प्रबंधन नीति के कारण नदियों के साथ-साथ देश के भू-जल की िस्थति भी लगातार चिंताजनक होती जा रही है। ऐसे में एक व्यापक आैर बहु-स्वीकायर् राष्ट्रीय जल नीति की आवश्यकता से कोइर् इनकार नहीं कर सकता। ऐसा न हो कि हम नदियों को जो़डने की बात करते-करते इतनी देर कर दे कि फिर हमारे हाथ में करने लायक कुछ बचे ही नहीं। लेकिन लाख टके का सवाल है कि क्या भारतीय राजनेता और यहां के नीति-निर्माता इस समस्या की गंभीरता को कभी समझेंगे। हर चीज में व्यक्तिगत नफे-नुकसान की खोज करने वाले आज के राजनेता व अफसर को देखकर तो ऐसा नहीं लगता।
 

शनिवार, 29 अगस्त 2009

मरनो भला विदेश में

दहाये हुए देस का दर्द-54
इन दिनों बिहार के कोशी प्रमंडल में कबीर की वाणी- "मरनो भला विदेश में जहां न अपना कोय'' साकार हो रही है। कोशी प्रमंडल के गांवों में पलायन की आंधी आयी हुई है। जिसे देखो वही कंधे पर गठरी बांधकर रेलवे स्टेशन की ओर भागे जा रहा है। कोई गुजरात जा रहा है, तो कोई पंजाब। कोई लुधियाना तो कोई सूरत। कोई अजमेर तो कोई कश्मीर भी। और न जाने कहां-कहां... गांव- के- गांव खाली हो गये हैं। सिर्फ बच्चे, बुढ़े और औरतें ही बच गये हैं। सुपौल के राघोपुर स्टेशन पर एक मजदूर से पूछता हूं, "क्यों भाई, अभी तो धान रोपाई का सीजन है, क्यों भागे जा रहे हो ?'' जवाब मिलता है, " नै रोपाया धान, अब तो पूर्वा नक्षत्र जाने वाला है। अब का होगी रोपाई-धोपाई ? कब तक सरं (आकाश) की ओर ताकते रहते? तो सोचे कि परदेश ही चला जाऊं, वैसे भी गांव में अब लालटेन लेकर भी खोजियेगा तो एको जन (आदमी) नहीं मिलेगा।'
जी हां, गांव खाली हो गये हैं। आदमी को जीने के लिए अन्न चाहिए। अन्न की खोज में इंसान गांव क्या दुनिया तक को छोड़ देता है। झारखंड के गांवों में अक्सर देखते रहा हूं। पलामू में तो हजारों किसानों ने सरकार से दुनिया छोड़ने की लिखित अनुमति मांगी है। उनका कहना कि वे मरने से पहले कलंकित होना नहीं चाहते। भुखमरी के बाद हमारी बहुत फजीहत होती है। सरकार और राजनीतिक पार्टियां हमारी लाशों पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आती। कोई हमारी मौत को भुखमरी साबित करने के लिए पिल पड़ता है तो कोई इसे बीमारी से हुई मौत साबित करने के लिए एड़ी-चोटी एक कर देता है। इससे तो बहुत बेहतर है- इच्छा मौत। हम भूख के हाथों मरना नहीं चाहते, हमें इच्छा मौत का अधिकार दे दो।
यह हमारी व्यवस्था का एक पहलू है। इसमें भूख है, गरीबी है, पलायन है, बाढ़ और सुखाड़ है और असंतोष भी है । दूसरी ओर व्यवस्था का दूसरा पहलू भी है। इसमें सरकार है, मंत्री-विधायक-एमपी हैं, अधिकारी और सत्ताई दलाल हैं और सब-के-सब चकाचक हैं। व्यवस्था के इस पहलू में करोड़ों रुपये का बजट वाला स्वनामधन्य नरेगा भाी है। बकौल प्रधानमंत्री, "नरेगा ने मजदूर-पलायन को रोकने में बहुत मदद की है।' सच में, इस नरेगा में बहुत पैसा खर्च हो रहा है। तभी तो हर बीडीओ के चार-पांच शहरों में फ्लैट हो गये हैं। गांव में मुखिया लोगों की जमीन का रकवा बढ़ रहा है। अब वे भी चरपहिया से कम पर पैर नहीं धरते। जन सेवक बाबू लोगों के बच्चे हैवी डोनेशन पर डॉक्टरी की पढ़ाई करने बड़े शहर जा रहे हैं। और जिला परिषद एवं ब्लॉक समिति वाले विधायक बनने के लिए कसमसा रहे हैं। नरेगा का कमाल जो है भैया।
कोशी प्रमंडल के सुपौल जिले के ही नरेगा-बजट को देखें। 50 करोड़ रुपये सालाना । अभी तक 19 करोड़ वे खर्च भी कर चुके हैं। आप पूछेंगे कैसे - वे जवाब देंगे, रिकॉर्ड बुक देख लीजिए। अब तक कई लाख मजदूरों को काम दिया जा चुका है। तीन लाख मजदूरों को जॉब कार्ड वितरीत किया जा चुका है। आप पूछेंगे- हुजूर वहां गांव में तो कोई है ही नहीं, फिर आपने आप रजिस्टर में हजारों मजदूरों की अंगुलियों के निशान कहां से ले आये? आप तो जादूगर ठहरे हुजूर! जो पिछले दो साल से गांव में नहीं है, आपने उसकी उंगली के निशान भी ले लिये! जादूगरी के इस हुनर पर दिलो-जां लुटाने का मन करता है! वो जवाब देंगे- गांव जाकर देखिये, हर दिन हजारों मजदूरों को रोजगार दिया जा रहा है। आप कहेंगे- हुजूर वहां कोई नहीं है! बुढ़े-बच्चे से काम लेते हैं क्या ?
इसके बाद वे आपको, ड्रिंक ऑफर करेंगे, तले हुए चखना के साथ। चौअन्नी बिखेरते हुए अठन्नी दिखायेंगे ! अगर मान गये तो बल्ले-बल्ले, नहीं तो ? वे आपको पागल-ढागल करार देकर हाजत में बन करवा देंगे। आप हाजत में रोयेंगे और वे आपका मजाक उड़ायेंगे। सा.. बहुत आया था मजदूरों का फरिश्ता बनने।

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

अपनी-अपनी क्रांति

अभी-अभी स्कूल को टाटा,बाय-बाय कर कॉलेजे में दाखिल हुए टीन एजर्स की महफिल थी वह। इसलिए वहां सब कुछ जवा-जवां था। वे अपने-अपने टेंशन को जिंस की उस खूंटी पर टांग आये थे जिसे पहनने के बाद वे खुद को 'बाजीगर' के शाहरुख खान समझने लगते थे। जवाने की सारी माथापच्चियों को उन्होंने पीएचडी के पचड़े में फंसे बुढ़ाते हुये छात्रों के नाम छोड़ा रखा था। बेईमानी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, कट्टरवाद जैसे रोगों से उन्हें चिढ़ थी। वे शब्दों के माने अपने हिसाब से लगाते थे और वफा कहने पर किसी लड़की का नाम लेकर रोमांटिक गाना गुनगुनाने लगते थे। बेवफाई जैसे शब्दों के उल्लेख के साथ ही वे भड़क उठते थे और किसी लड़की का नाम लेकर देसी-विदेशी गाली बकने लगते थे। वे विश्वविद्यालय में नये थे। इसलिए पीएचडी के पचड़े में पड़े बुढ़ाते छात्रों के लिए माफी के काबिल थे। पीएचडी के पचड़े में पड़े बुढ़ाते छात्र उन्हें अपनी बारिस घोषित कर चुके थे और अक्सर अपने निर्जान बैठकों में कहते थे- सालों, तुम्हें नहीं मालूम कि कभी हमारे पसीने भी गुलाल हुआ करते थे। जब तक हम जवान रहे, जांघों के ही गुलाम रहे। हमारे समय में भी यौन क्रांति हुई थी जिसने सारी क्रांतियों को निगल ली। लेकिन टीन एजर्स उनसे सहमत नहीं थे, कहते थे-''अपना फ्रस्टेशन हम पर मत निकालिये, हमे तो बस विस कीजिए।''
और इस तरह एक दिन अचानक 20 हजार युवक-युवतियों से हमेशा भरा रहने वाला वह विश्वविद्यालय मर गया। बंजर और बेजान हो गया। दर्जनों क्रांतियों का गवाह रहने वाला उसका मनोरम परिसर, मासुक-मासुकाओं के पार्क में तब्दील हो गया। जबकि परिसर से बाहर देश घायल होकर कराह रहा था ...

शनिवार, 22 अगस्त 2009

प्रचंड का फ्रस्ट्रेशन

सत्ता गंवाने के बाद निराश होना स्वाभाविक है। बड़े-बड़े नेता भी सत्ता गंवाने के सदमा को आसानी से नहीं पचा पाते हैं। सत्ता की राजनीति करने वाले नेताओं को तो कुर्सी के बगैर सियासत बेस्वाद लगती है। लेकिन जो नेता सामाजिक क्रांति के लिए राजनीति करते हैं या फिर इसका दावा करते हैं, वे भी अगर सत्तालोलुपों की तरह कुर्सी के लिए अनाप-शनाप बकने लगे तो इसे क्या कहा जाये? उनका फ्रस्ट्रेशन या बौखलाहट?
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाली माओवादी पार्टी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड इन दिनों ऐसा ही कुछ कर रहे हैं। शायद वह इन दिनों भारी अवसाद में हैं या फिर वह बुरी तरह बौखला गये हैं। इसलिए वे अब अनाप-शनाप बकने लगे हैं। हाल के दिनों में उन्होंने भारत को लेकर जो विषवमन किया है, उनसे से तो यही संकेत मिलता है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब प्रचंड ने अपने इंग्लैंड दौरे पर जाने से महज कुछ समय पहले बयान दिया कि भारत नेपाल के जरिये चीन पर आक्रमण करना चाहता है। इंग्लैंड में उन्होंने कहा कि हिमालय की तराई की (भारत समेत) जनता लाल क्रांति के लिए बेचैन है। इंग्लैंड से लौटने के तुरंत बाद उन्होंने सीमाई शहर बीरगंज में बयान दिया कि नेपाल के प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल की भारत यात्रा नेपाली इतिहास की सबसे बड़ी अपमानजनक घटना है। जब पत्रकारों ने उनसे इसका कारण पूछा तो उन्होंने जो जवाब दिया उसे सुनकर शायद स्कूली बच्चे को भी शर्म आ जाये। प्रचंड ने कहा कि माधव कुमार नेपाल को नई दिल्ली में कोई तरजीह नहीं दी जा रही है। भारतीय मीडिया भी उन्हें कोई भाव नहीं दे रहा। मीडिया में न तो माधव नेपाल की तस्वीर छप रही न ही खबर। लेकिन जब वे खुद नेपाली प्रधानमंत्री के रूप भारत पहुंचे थे तो भारतीय मीडिया उनके पीछे-पीछे दूम हिलाते फिर रहे थे।
अब प्रचंड से कौन पूछे कि माधव नेपाल बाकायदा पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के साथ और नेपाल के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में भारत पहुंचे हैं।इसलिए उनके स्वागत के बास्ते भारत को अलग से कोई व्यवस्था नहीं करनी है, बल्कि भारत में इसके लिए आधिकारिक तौर पर स्थापित और सतत्‌ चलायमान प्रावधान है,जिसे प्रोटोकॉल कहते हैं। जहां तक मीडिया के पीछे भागने का सवाल है, तो प्रचंड को मालूम होना चाहिए कि मीडिया व्यक्ति के पीछे नहीं भागता, बल्कि व्यक्ति के न्यूजवर्दीनेस के हिसाब से उसे कवरेज देता है। कई बार ऐसा मौका आता है जब मीडिया न्यूजवर्दीनेस के कारण कई बड़ी हस्तियों की मौजूदगी के बावजूद अदना आदमी के आसपास मधुमक्खी की तरह जमा हो जाते हैं। प्रचंड को पिछली बार इस वजह से ही भारतीय मीडिया ने ज्यादा तरजीह दीथी। पता नहीं वे इस बात को क्यों नहीं समझ पाये। क्या प्रचंड इतने नादान हैं कि वह इस तथ्य को नहीं समझ नहीं पाये और व्यापक मीडिया कवरेज के कारण खुद को नेपाल नहीं, अमेरिका-रूस के राष्ट्राध्यक्ष समझने लगे ?
दरअसल प्रचंड अपने ही बुने जाल में बुरी तरह फंसते जा रहे हैं। दो नावों की सवारी अब उन्हें महंगी पड़ रही है। एक ओर तो वह प्रजातांत्रिक प्रक्रिया में भागेदारी भी करना चाहते हैं दूसरी ओर अपने सशस्त्र माओवादी कैडरों के वजूद को भी बरकरार रखना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने पिछले दिनों मुख्य सेनापति को हटाकर कठपुतली सेनापति बनाने की कोशिश की, जिसमें उन्हें मुंह की खानी पड़ी। वे चाहकर भी वैकल्पिक सरकार के गठन को रोक नहीं सके। जबकि जिन आकाओं ने उन्हें आगे बढ़ाया है उनके दबाव उन पर बढ़ते जा रहे हैं।
दरअसल, अब यह बात लगभग साबित हो चली है कि प्रजातांत्रिक व्यवस्था में शामिल होना नेपाली माओवादियों की एक चाल थी और उनका अंतिम लक्ष्य कुछ और था। वे बैलेट के जरिये मुख्य धारा में शामिल होकर नेपाल की सारी शक्तियों को अपने हाथ में लेना चाहते थे, जिनमें वे बुरी तरह असफल हो गये। जाहिर है यह काम सेना को अपने नियंत्रण में लेकर ही संभव था, जिसे नेपाली कांग्रेस, एमाले और एमपीआरएफ ने विफल कर दिया। प्रचंड को शंका है कि ऐसा भारत के इशारे पर हुआ । वह यह मानकर चलते हैं कि भारत के हस्तक्षेप के कारण उनका सर्वसत्तावादी एजेंडा अपने मुकाम तक नहीं पहुंच पा रहा है। इसलिए वे रह-रहकर भारत के खिलाफ अनाप-शनाप बकने लगते हैं। लेकिन इस क्रम में वह भारत-नेपाल के सदियों पुराने साझे सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक और भौगोलिक संबंध को भूल जाते हैं। जिसका सीधा अर्थ होता है नेपाल के लगभग 50 प्रतिशत लोगों की इच्छाओं को नजरअंदाज करना। कहने की जरूरत नहीं कि ये लोग भारत के साथ खून का रिश्ता रखते हैं। यह भी एक स्थापित तथ्य है कि नेपाली अर्थव्यवस्था सीधे तौर पर भारत पर आश्रित है। इनके अलावा नेपाल और भारत की जो भौगोलिक बनावट है उसमें भारत नेपाल को छोड़कर नहीं चल सकता। प्रकृति ने दोनों देश को एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जोड़ रखा है। अगर दोनों अलग-अलग चलना भी चाहे, तो नहीं चल सकते। हिमालय भारत के पर्यावरण और पारिस्थितिकी , मानसून और जल-चक्र को सीधे तौर पर नियंत्रित करता है। हिमालय से निकलने वाली नदियां भारत में तबाही लाती हैं। इसका समाधान और इलाज नेपाल में है। दुनिया की कोई संस्था या न्यायालय यह नहीं कह सकता कि भारत और नेपाल एक-दूसरे के बगैर जीना सीख ले।
परन्तु नेपाली माओवादी पार्टी और प्रचंड को यह बात नागवार गुजरती है। वे रिश्ते के इन बुनाबटों व तासीरों और अंतर्निभरता में जाना नहीं चाहते, जिसे इंसान ने नहीं, बल्कि प्रकृति ने रचा है। वे तो परदेश से निर्देशित अपने स्व-अर्थी एजेंडा को बढ़ाने पर आमादा हैं। भले ही इसके कारण दोनों देशों की करोड़ों जनता के दिल छलनी हो जाये या फिर नेपाल कंगाल और बिहार बाढ़ में डूब जाये।
 

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

बाग में टहला किये बाजार की तरह

रोज सबेरे टहला किये बागों में हम, लेकिन हमें याद नहीं कि बागों में मुरझाये फूलों ने क्या पूछा था हमसे। टूटी डाली और झुके हुये तनों से लिपटी पत्तियों ने आवाज दी थी मुझे, लेकिन हम टहलते रहे जैसे हम बाग में नहीं, बाजार में हो। ताजा हवा की तलाश में न जाने कहां-कहां भटका किये हम। ऊंचे पहाड़ों और हिल स्टेशनों से हो आये हम। लेकिन नहीं समझ सके पहाड़ की तन्हाई को । उसके सीने में यत्र-तत्र बिखरे प्लास्टिक के कचरे को। उन झरने के क्रंदन को, जिसके पानी मैले हो गये हैं। दरअसल, हम कभी किसी बाग के हुये ही नहीं, किसी पहाड़ से मिले ही नहीं । जिस पहाड़ पर हमने छुट्टी बितायी, वह पहाड़ नहीं पयर्टन-केन्द्र था। हम तो हमेशा अपने 'अहं ' में ही रहे, जिसमें बाग और पहाड़ के लिए कोई जगह ही नहीं। कितनी बड़ी हो गयी है हमारी महत्वाकांक्षा, हमारी लिप्सा, हमारा स्वार्थ, हमारी भोगेच्छा ? शायद सारे बागों से बड़े ! शायद सभी पहाड़ों से बड़े !!

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

Lesson From Kusaha Breach

( KOSHI BARRAGE: ON THE PATH OF TINAU HATISUNDE BARRAGE)
By Dinesh Kumar Mishra
There was no end to the miseries of people in the Kosi Basin as the river used to change its course. It is a vibrant river and used to inflict immense losses in the districts of Purnea and Saharsa. All that is history now… Now, the river is jacketed on either side and has been controlled. This has benefited the people living in the countryside of the embankments and the biggest benefit is that the people there are not scared of the river that it would bother them anymore. The areas that have been protected by the embankments have got a new lease of life and after travelling to those places one gets an impression that the life has started afresh there.”
This was Kedar Pandey on behalf of the government in the Bihar Vidhan Sabha on October 6, 1959.
Every word was proved wrong 50 years down the time line on August 18, 2008, when the Kosi breached its eastern afflux bundh at Kusaha in Nepal. The floodwaters engulfed 35 blocks and 993 villages spread over five districts. Nearly 3.3 million people and 3.68 lakh hectares were trapped in floods; 2.34 lakh houses were destroyed and 527 persons died in the disaster.
This was the eighth incident of its kind in the past 45 years. There is no reason for people to be complacent about the cover provided by the Kosi embankment, as the threat of a breach continues to loom large. In a similar incident on the Kosi’s eastern embankment in 1984, the river wiped out 11 villages in Navhatta block of Saharsa district and engulfed 196 villages in seven blocks of Saharsa and Supaul districts of north Bihar. The floodwaters spread over 67,000 hectares and 4.58 lakh people were rendered homeless. They sheltered on the remaining portion of the embankment for more than six months.
The Kusaha breach was plugged in the month of May this year at an estimated cost of Rs 143.42 crore, approved by the Centre, which sanctioned Rs 1,010 crore for emergency relief after the breach was declared a national calamity on August 28, 2008. The state government reportedly mobilised an equal amount for relief and many NGOs did their own bit. Despite all these inputs, the state needs another Rs 14,800 crore to bring back the victims and the state economy on the rails. It is time to do the sums on the benefits of the Kosi Project.
Unresolved debate
Embankments prevent a river from overflowing its banks during floods but they also prevent the entry of floodwater including the flow from the tributaries. Thus, while the countryside is deprived of the fertilizing silt contained in floodwater, waterlogging starts along the embankments. The situation is aggravated by seepage under the embankments. Theoretically, sluice gates located at these junctions should solve the problem but in practice such gates quickly become useless. As the riverbed rises above the surrounding land, the gates only let water out. So the only option is embankments for the tributary as well. This results in water being locked up between two embankments. Moreover, no embankment has yet been built or can be built that will not breach. When a breach occurs, there is a deluge, as happened at Kusaha last year.
Some engineers say when embankments are built along any river, its velocity increases and the water can erode the banks and dredge the bottom of the river, thereby increasing its capacity reducing the chances of a flood. Unfortunately, there is no evidence to substantiate these claims, at least not in India. The debate on embankments is yet to be resolved among the engineers and the politicians have the last laugh when they decide on technical matters.
Pro-embankment lobby succeeds after Independence
The British refrained from constructing embankments after their project to contain the Damodar failed in the middle of the 19th century. The situation changed drastically after Independence. In 1956, Kanwar Sain, chairman of the Central Water and Power Commission, addressing a meeting of the Institution of Engineers in Patna had said: “Essentially, it has to be a choice between the demand of the people for immediate flood protection and evolving a plan of flood control that can be guaranteed flawless. If the plans for control of Kosi are to be held in abeyance until an absolutely trouble-free solution can be found we may be certain no work will be done for a long time to come.” The Centre obviously did not wait for an ‘absolutely trouble-free solution’.
Return to status quo
With the plugging of the breach at Kusaha, status quo has been restored. The people have been assured that the embankment would not breach in future but nothing can be far from truth. The river will now flow within the embankments and the sediments it contains will continue to raise its bed level. This in turn will force the authorities to raise the embankments and the river will be rising above the lowest points of its catchment area. Any breach will devastate the area, as it did in 2008. One is reminded of a statement of Captain F C Hirst in 1908, on the Hwang Ho (China) embankments. He had said, “...Each succeeding generation has been compelled to raise the height of the embankments, to make them keep pace with an ever- increasing flood level…. unusually heavy flood breaks down or overtops the embankments, and the pent-up waters deal death to the posterity of those who, originally in good faith, prepared the way for disaster”.
Groping in dark
This is not the place to discuss shortcomings in maintaining and repairing embankments, but to discuss the shortcomings of embankments themselves. The government is busy whipping the old horse of the proposed Barahkshetra Dam on the Kosi in Nepal. It has been doing this for the past 72 years, and occasionally talks about interlinking rivers. Its special task force sends feelers about a pair of embankments within the embankments to reduce the waterway and increase the velocity of flow that would help re-section the river and reduce the floods. In case of the Bagmati, it has a proposal to send floodwaters to the subsoil, and so on. It has nearly 10,000 engineers but never asks them to say that the dam in Nepal is not possible in the near future, and come out with a solution to the Kosi where we do not have to depend on others. Will they ever do it?
(The author is the convenor of Barh Mukti Abhiyan, Bihar)

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

कोस-कोस में कोशी उर्फ प्रलय की पहली वर्षी

दहाये हुए देस का दर्द-53
आज एक बार फिर धरती घूमकर वहीं पहुंच गयी होगी जहां वह 18 अगस्त 2008 को पहुंची थी। हम कहते हैं कि कुसहा में कोशी आज ही टूटी थी, जहां आज कुछ भी नहीं है। हालांकि कुसहा से आगे भी क्या है ? घाव- ही-घाव । कुसहा से आगे भी धरती बदली हुई हैऔर जहां-जहां से कोशी निकली थी, हर जगह उसके निशान हैं। कहीं मारने के , तो कहीं मारकर छोड़ देने के । जो रेत कोशी ने लायी थी उस पर बलुआही घास उग आये हैं। जो दर्द कोशी ने परोसे थे , उन पर मक्खियां भिनभिना रही हैं । हां, समय के मलहम ने घाव के ऊपर काली चमड़ी जरूर लगा दी है। थोड़ा- सा खुरचो नहीं कि ताजा खून निकल आये। हम भी नहीं खुरचेंगे, क्योंकि मुझे मालूम है कि घाव में ठेसहा (बार-बार चोटिल होने) होने की प्रवृत्ति होती है। और अगर राजनीति में नहीं जाना हो तो उसे सहलाने का कोई मतलब नहीं।सहलाने से नींद आती है, घाव ठीक नहीं होते। अस्पताली मलहम तकदीर वालों को ही नसीब होती है, कोशी को समय के मलहम के सिबय किसी वैद्य की आस नहीं। जहां जाओ, जिस गांव में जाओ, कोशी मौजूद है। कहीं याद में, कहीं फरियाद में। रात में भी और दिन में भी। बच्चे के जन्म में और वृद्धों की मौत में भी । बच्चा जन्मा, लेकिन उत्सव नहीं क्योंकि कोशी के मारे को दो जून की रोटी नहीं मिल रही तो उत्सव कहां से मनायें।











(साल भर बाद भी : पानी हटा पर तस्वीर नहीं बदली )