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शनिवार, 7 सितंबर 2013

तब हम गड्ढे वाले भी गाते

समंदर !
अगर रास्ता आगे से बंद न किया गया होता
अगर दिल्ली इस कदर बिल्ली न हुई होती
और बहती हुई हवा रोकी न गयी होती
और निकले हुए आंसू, पोंछे गये होते,
सच कहते हैं समंदर
तब तेरी शान में हम गड्ढे वाले भी गाते
पूनम की रात, ज्वार-भाटे के गीत 

शनिवार, 8 जून 2013

हम


बच्चा कोई भी हो
बीच खेल से
बांह पकड़कर खींच लाओ,तो रोता है 
कुछ चॉकलेट लेकर चुप हो जाता है
कुछ चॉकलेट फेंककर भी चुप नहीं होता
मगर हम नहीं समझते
शायद इसलिए
कि हम चॉकलेट देने और बांह मरोड़ने के आगे
सोच ही नहीं पाते

शनिवार, 25 मई 2013

बगुला

  
 वह पानी का जीव कभी नहीं था
 पर पानी के पास ही रहता आया, सदियों से
 पानी के बिल्कुल पास, मगर लहरों से बहुत दूर
 हालांकि युगों के साथ उसके रंग बदलते रहे
 लेकिन उसके मुंह का गंध कभी नहीं बदला
 रत्ती भर भोथरा नहीं हुआ उसकी चोंच का नोक
 तमाम नारे
 और तमाम अकाल के बाद भी
 वह बगुला ही रहा

शनिवार, 23 मार्च 2013

नियति नहीं यह अवसाद है


 
अवाम होने के मजाक में
मुंह मूंदकर रोते जाना
आंख खोलकर सोये रहना
हमारी नियति नहीं, अवसाद है
बगुल-ध्यान में है "मसीहा''
बायें हाथ में जाल, दायें में हथियार है
हमेशा आस्तीन में छिपा था जवाब
आज भी दर-दर भटक रहा मूल सवाल है

सोमवार, 11 मार्च 2013

दूसरी पीढ़ी भी जवान होगी


एक पीढ़ी तैयार होगी
लूटे हुए पैसों के पालने में झूलती हुई
घोटाले के उड़नखटोले में उड़ती हुई
बेईमानी की छत के नीचे  सोती हुई
हर फिक्र को हवा में उ़डाती हुई 

पीढ़ी जवान होगी
शायद अनजान ही रहेगी इतिहास से
 

उसी समय एक दूसरी पीढ़ी भी रहेगी
लूटे हुए खेतों में रोती हुई
छीने हुए घरों को तलाशती हुई
उड़ते उड़नखटोले को निहारती हुई
पेट की भूख को दिमाग में महसूसती हुई
यह पीढ़ी भी जवान जरूर होगी
और इतिहास का निशान इसके ललाट पर होगा

जो कहते हैं कहें
मैं कैसे कह दूं, साथी
सब कुछ अच्छा होगा

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

आप का ताप


आप
और आपे का ताप
तपने से क्या होता है
हमने लोहे को चटकते देखा है।
चैत्य की दूब से पूछो
सावनी अहंकार के बारे में
हां,
रोशनी पकाता और परोसता है सूरज
प्रकाश खाने वालों को ब्लैकहोल कहते हैं ।

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

नयी आदत


 ताले जितने थे
 सबके सब तोड़े जा चुके
 और हम अब भी चाबी संभाल रहे 
 जवाब नहीं हमारा
 पहले खाते हम थे
 मेमियाता था मेमना
 अब हम खाते भी हैं, मेमियाते भी हैं

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

भरोसा

  
   अपने वजूद की  पतंग में
   अक्सर भरोसे की डोरी बांधता हूं
   और
   उस मैदान का आंसू पोंछता हूं
   जिसका धावक दौड़ हार गया है
   भरोसा जरूरी है
   आदमी के लिए
   मैं भटकी नदी को समुद्र का पता बताता हूं
   बछड़ा जरूर कूदेगा  
   मैं उख़ड़े खूंटे गाड़ रहा हूं

सोमवार, 24 सितंबर 2012

पेट और प्रजातंत्र


पड़ोसी पेटजरूआ न कहे
पानी पीकर डकारते  रहे बाप
कई-कई  रात
कई-कई  साल
पेट को कोई कितना परतारे
पानी पीकर कब तक कोई डकारता  रहे
अब आती है भूख, तो चलते हैं हाथ
जलता है दिमाग
 
आप कह सकते हो मुझे द्रोही
राजनीतिक विरोधी
या बहका हुआ कोई अलोकतांत्रिक
नहीं, मुझे नहीं है विश्वास
मैं प्रजातंत्र को कान में नहीं
हाथ में महसूसना चाहता हूं

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

थोड़ी स्त्री होकर

                   1
विश्व का नक्शा बहुत पेचीदा है
आड़ी-तिरछी  रेखाओं की "ओझरी" है दुनिया
एटलस पर छड़ी रखकर
बताया था विद्यालय के "मास्साब" ने
यह अमेरिका और यहां रहा सीरिया
कांगो, सोमालिया,वाशिंगटन,जेनेवा से वियतनाम तक
देश-देश, दरिया-दरिया
समंदर से ज्वालामुखी तक
घूमती थी ''मास्साब'' की छड़ी
पर हर बार छूट जाती थी धरती
धरती का नमक
धरती की गमक 
जीवन
राग-द्वेष और क्रंदन
हालांकि पिघलती बर्फ
उजड़ते अफ्रीका
सूखती दरिया
उसर  होती जमीन
धूसर होते रंग
और बढ़ते क्रंदन के बावजूद
धरती अब तक बची हुई थी
बूढ़ी, बीमार, उपेक्षित मां की तरह
                 2
ग्लोब पर कान लगाओ
कान  फट जायेगा
''एक्स-एक्स''  की  चीख से
दिल दहल जायेगा
अजन्में भ्रूणों की  मृत्यु-कराह
वियतनाम से वेंकूवर तक फैली हुई है
स्त्री-लिंगी कोंपलें कट रही हैं
''बांसों'' में बहस है
लेकिन स्त्री-कोंपलों की कटाई पर मौन सहमति है
                 3
कविता की आंख से देखो
तो  कलई खुल जाती है
विश्व की
विश्व महिला दिवस की
जिसे मनाने के लिए
जेबी में एक पुड़िया "महिला-रंग" ही काफी है
संपादकों की सूची तैयार है
"महिला-पुरुषार्थों" की कुछ गाथाएं
प्रकाशित होंगी, ऐन महिला दिवस पर
वे महिलाएं जो सफल होकर "पुरुष" हो गयीं
सबको बतायी जायेंगी
सबको दिखायी जायेंगी
सरकारें और संस्थाएं घोषणाएं करेंगी
महिला दिवस पर
और ग्लोब मारे गये महिला-भ्रूणों से भर जायेगा
                4
महिला दिवस मनाने के लिए
एक चुटकी "महिला-रंग" की जरूरत न पड़े
इसलिए मैंने खुद को थोड़ी स्त्री की
स्त्री होकर देखा
दिखाई दी धरती
जो जनना छोड़ रही है
दिखाई दिया बीज
जो अंकुरना भूल रहा  है
दिखाई दी बेटियां
जो जवान होना नहीं चाहतीं
याद आये ''मास्साब''
और ''मास्साब'' की छड़ी
एक दीवार
दीवार पर लगे निर्जीव एटलस
और एटलस पर टंगे देश
पीली बांस की तरह निष्प्राण और आर्कषण-हीन
ताकि अनिद्रा न हो
मैंने स्मरण की ग्लोब छोड़ चुकी दादी को
भूली हुई लोरियों को
और इस तरह
मैंने बचा ली एक कविता
और
मानस की महिला
थोड़ा-सा दिवस
कुछ परियां 
परियों की कहानियां
और
थोड़ी-सी दुनिया

बुधवार, 18 जुलाई 2012

दर्द न मिले, तो दुखता है

  

  दर्द !
  अब न मिले
  तो दुखता है

  नहीं बंधु !!
  घाव नहीं है यह
  हथेली का ठेल्ला (गांठ) है
  कुदाली दो पारने को
  पत्थर दो तोड़ने  को
  बस यही एक दवा है

  नहीं !!!
  नहीं लगती चोट
  इस बात को लेकर
  जी अक्सर कचोटता है
  

शुक्रवार, 1 जून 2012

छूटना


गांव में था
गाड़ी छूट जाती थी
गाड़ी में हूं
गांव छूट गया है
पर  सांसें अब तक फुल रही हैं
गांव हो या गुड़गांव

'छूटहों'  के लिए
दोनों समानार्थक होते हैं

निरर्थकता का एहसास !
जैसे पटरी जमीन पर नहीं
देह पर बिछी  हो
हजारों सफर के बाद
जिन्हें पड़े रहना है
नहीं !
यह बिछुड़न नहीं 
विरह के गीत भी नहीं
छूटना
लुप्त होना है
फोन मां को लगाओ
बात मैने से होगी
बेटा परदेश में
बाड़ी के आम कौए खा रहे
कोंटी की लीची, 'खरुवान'
छूटना !!
अंततः दुखना है
कहा था, पेड़ों ने
जिन्हें शाखाविहीन कर दिया था
ज्येष्ठ की आंधी 

लाल-लाल लस्से निकल आये थे
पेड़ की देह पर
लस्से का सच कौन बताये 

इस तूफानी समय में
सब कुछ लस्सा है

जो छूट गये हैं, जड़ से
लस्से उनकी देह में भी हैं
पेड़ों की तरह बेजुबान
और अव्यक्त


(शब्दार्थ- छूटहा- जो पीछे छूट गये हो। खरुवान- आवारा बच्चों की टोली )