शनिवार, 29 मई 2010

नीतीश की विश्वास यात्रा और परती की परिकथा

दहाये हुए देस का दर्द-65
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का "विश्वास मेल'' आज कालजयी कथा शिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु की जन्म भूमि औराही हिंगना (सिमराहा) पहुंचने वाला है। कोशी अंचल में मुख्यमंत्री की विश्वास यात्रा का यह अंतिम पड़ाव होगा। मुख्यमंत्री का "विश्वास मेल'' सहरसा, सुपौल, कटिहार और मधेपुरा से गुजर चुका है। मुझे नहीं मालूम कि इन जिलों के लोगों का विश्वास जीतने में मुख्यमंत्री कितने कामयाब हुये। हालांकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि कोशी अंचल की लगभग एक करोड़ आबादी बड़ी बेसब्री से नीतीश के "विश्वास मेल' का बाट जोह रही थी। लोग जानना चाहते थे कि कुसहा हादसा के बाद मुख्यमंत्री ने उनसे जो बड़े-बड़े वादे किए थे, उनका क्या हुआ। कहे थे कि पहले से बढ़िया कोशी अंचल बनायेंगे। उखड़े हुए खूंटे फिर से गाड़ेंगे और कोशी की प्रचंड धारा में भसिया गयी बस्तियों को दोबारा बसायेंगे। रेत के कारण परती (बंजर) हुई जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए हर संभव उपाय किया जायेगा। किसानों को ट्रेनिंग दी जायेगी, मिट्टी की जांच होगी वगैरह-वगैरह। अब जब "विश्वास मेल'' पास कर गया है, तो कुछ दिल फेंक युवक कहते हैं- "...वादे तो टूट जाते हैं।'' बात सही भी है। वादे तो प्रधानमंत्री ने भी तोड़ दिया। राष्ट्रीय आपदा कहकर जो दिल्ली गये, सो गये ही रह गये।
आखिर वही हुआ जो कोशी में सदियों से होता आ रहा है। पहले बाढ़ फिर विपत्ति और उसके बाद परती खेतों की अंतहीन परिकथा- परती परिकथा। वही फणीश्वरनाथ रेणु की "परती परिकथा।'' दूर-दूर तक रेत ही रेतऔर रेत से लड़ती मानवीय जिजीविषा। मानो कह रहे हो, नियति को जो हो मंजूर, हम तो हार नहीं मानेंगे। कुछ ने ककड़ी लगायी, कुछ ने खिरा, कहीं-कहीं परबल... लेकिन लाख प्रयास के बाद भी धान और गेहूं इन रेतों में नहीं उगे।
दिन बीता, महीने बीते और अब तो कुसहा की दूसरी वर्षी भी आने वाली है। लेकिन न तो परती जमीन में फसल लहलहाई और न ही उखड़े हुए खूंटे पर टाट और ठाट चढ़े। लेकिन हर गांव में कुछ आलीशान मकान जरूर बन गये हैं। मुखिया, वार्ड सदस्य, प्रखंड सदस्य और पंचायत सेवक साहेब लोगों के दोनों गाल में पान ही पान है। बीडीओ, प्रखंड प्रमुख और जिला पार्षदों का क्या कहना ! उनकी तो दसों उंगली घी में है। मजाल है कि आप उनसे कबूल करवा लें कि कोशी त्रासदी के भुक्तभोगियों को कुछ नहीं मिला। "पान तो आप खा गये, लोगों को तो उसकी डंटी भी नहीं मिली हजूर ?''। ऐसा कहते ही वे जोर से ठहाका लगायेंगे। गलफर के कोने से लीक करते पान के पीत को आपकी धोती से पोंछ लेंगे। अगर आपके ताल्लुकात कलम-अखबार या कैमरा-माइक आदि से है, तो वे आप के साथ हल्की-फुल्की दिललगी भी कर लेंगे। यह जताने के लिए वे आपकी बात को लंगोटिया यार की तरह ले रहे हैं, अगर दूसरा कोई होता तो बीच सड़क पर दौड़ा देते। बोलेंगे, "आप भी न गजबे करते हैं। मुख्यमंत्री का प्रोग्राम चल रहा है यार। काहे दाल-भात में मूसलचंद बनते हो, फटे में टांग डालते हो जी!''
पर मुख्यमंत्री को विश्वास चाहिए। जनता का विश्वास ! इसलिए वे सभाओं में ब्यौरे दे रहे हैं। पुरानी योजनाओं की खूबी गिना रहे हैं और नयी योजनाओं की धड़ाधड़ घोषणा भी कर रहे हैं। पर पिछली घोषणाओं का मूल्यांकन करना नहीं चाहते। स्थानीय-नेता और अधिकारी ने जो कह दिया, वह ब्रह्म बात। वही एक सांच, बाकी सब झूठ। रेणुग्राम में भी यही सब होना है। यह रेणु के देहावसान के चार दशक बाद की "परती परिकथा'' है। चचा फणीसर, आप नहीं रहे, लेकिन कोशी की धरती पर परती की परिकथा जारी है।

मंगलवार, 25 मई 2010

इस दिल्ली में

कोई दो आषाढ़ पहले
लायी गयी थी मां
'कुसहा' से कोसों दूर
इस दिल्ली में

खोजती है मां
खड़, खेत और खलिहान
बांस के जंगल और चिड़ियों की चहचहाहट
इस दिल्ली में

बेटा-बहु करते है खूब सेवा
पोता रोज ले जाता है पार्क
लेकिन
नहीं लगता मां का मन
इस दिल्ली में

बुदबुदाती है मां
अकेल में
न परिछन, न डहकन ना चुमाउन,!
न कोहवर न अरिपन !!
रामा हो रामा !
कैसी-कैसी शादी !!
इस दिल्ली में

सोचती है मां
क्या कभी आयेगी कोशी
राह भटक कर
इस दिल्ली में

शुक्रवार, 14 मई 2010

गरीबी, गेट्‌स और गुलरिया


( कभी नहीं भूलूंगा इस अनुभव को : नाव से कोशी नदी पार कर गुलरिया जाते (ऊपर ) और ग्रामीणों से बात करते बिल गेट्स )
दहाये हुए देस का दर्द-64
वैषम्य (कंट्रास्ट) में अचरज होता है और हर अचरज समाचार होता है। इससे बड़ा कंट्रास्ट और क्या हो सकता है कि दुनिया के सबसे अमीर शख्सों में शुमार होने वाला कोई अमीरजादा बिहार के कोशी दियारा के निर्धनतम लोगों की बस्ती में पहुंच जाये । उस बस्ती में जहां आज तक देश की कोई सरकार नहीं पहुंच सकी। न कोई रोड पहुंच सका और न ही कोई स्कूल, अस्पताल खुल सका। अभी 12 मई को ऐसा ही हुआ जब माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के मालिक बिल गेट्‌स बिहार के खगड़िया जिले के गुलरिया गांव पहुंच गये। उन्होंने जिले के अलौली प्रखंड में स्थित एक दलित गांव- गुलरिया को गोद लिया है। (याद रहे यह वही अलौली है जहां रामविलास पासवान जैसे नेता का जन्म हुआ और जो पिछले दिनों भीषण नरसंहार का गवाह बना) गेट्‌स की स्वयंसेवी संस्था- "बिल एंड मिलिंडा फाउंडेशन' इस गांव में कल्याण कार्य करना चाहती है। इसके लिए उन्होंने बिहार सरकार के साथ एक एमओयू भी किया है।
घटना में कंट्रास्ट है, अचरज है और एडवेंचर भी है। एक ऐसे दौर में जब आर्थिक लाभ और हानि ही आदमी के सारे कर्मों के सबसे बड़े निर्धारक-तत्व बन गये है, तब अगर कोई आदमी (खासकर बड़ी कॉरपोरेट हस्ती) सामाजिक कल्याण के बास्ते सात समुद्र पार से गुलरिया जैसे दुर्गम-दरीद्र गांव पहुंच जाये, तो इसे एक अद्‌भूत घटना ही मानी जायेगी। यही कारण है कि मीडिया बिल गेट्‌स की इस यात्रा को हाथों-हाथ ले रहा है। यह बात दीगर है कि गुलरिया गांव के निरक्षर-निर्धन ग्रामीण गेट्‌स के जाने के तीन दिन बाद भी इस घटना का मतलब समझ नहीं पाया है। वे हेलीकॉप्टर उतरने की जगह को उसी तरह निहार रहा है जैसे कक्षा का कोई कमजोर विद्यार्थी शिक्षक के जाने के बाद ब्लैक बोर्ड को अपलक निहारता है। लेकिन गांव में पहली बार हेलीकॉप्टर उतरा, हेलीकॉप्टर से सूट-बूटधारी गोरे-चमकीले लोग उतरे और कैमरे के फ्लैश से फूस के घर जगामगा उठे। इसलिए उन्हें लगता है कि कोई चमत्कार होने वाला है। हालांकि अंधकार में रहने के आदि गुलरिया के स्त्री-पुरुषों को नहीं मालूम कि आगंतुक महोदय कौन थे, यहां क्यों आये थे। वे अपने अनुभवों से पूरे वाकये को समझने की कोशिश करते हैं, तो और भी उलझ जाते हैं। उनके अनुभव तो यही बताते हैं कि बिहार के गांवों में हेलीकॉप्टर चुनाव के दिनों में ही उतरता है, जिनसे हाथ जोड़े नेता अवतरित होते हैं, जो वोट मांगकर चले जाते हैं और फिर पांच साल तक बिला (गुम) जाते हैं। जैसे बिला जाती है दियारा की जमीन, कोशी और करेह नदियों की धाराओं में या फिर कोई नबालक बच्चा जनमअष्टमी के मेले में। लेकिन इस शख्स ने तो न वोट मांगा और न ही हाथ जोड़ा। माजरा कुछ भी समझ में नहीं आता है, गुलरिया के अम्मन सदा को। पत्रकार पूछते हैं- "आपके गांव में दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति आये हैं, बोलिए आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?' अम्मन सदा कहता है,"का कहें हुजूर बचवा लोग बहुते खुश है, पहली बार उनको हेलीकप्टर देखे के मिला। हमहूं खुश हैं कि आप सब हमर जर-जनानी के फुटो घींच रहे हैं।'
बावजूद इसके, बिल गेट्‌स की इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। अगर उनकी पहल गरीबों के कल्याण की भावना से प्रेरित है, तो यह निश्चित रूप से पुनीत कार्य और प्रशंसा की बात है। गेट्‌स "कॉरपोरेट वेलफेयर' की जिस नयी अवधारणा को मूर्त रूप देना चाह रहे हैं, उसका स्वागत दुनिया के कई बुद्धिजीवि पहले ही कर चुके हैं। व्यक्तिगत स्तर पर मैं भी इसे एक सकारात्मक पहल मानता हूं।
लेकिन बात यहीं पूरी नहीं होती। बात इससे काफी आगे तक जाती है। कॉरपोरेट वेलफेयर, सोसल रेसपांसिबलिटी जैसी चीजों के अलावा इस घटना में कुछ हिडेन मैसेज भी हैं, जिनसे हम नजर नहीं बचा सकते। क्या हमारे लिए यह शर्म की बात नहीं है कि आज भी हमारे गांव पश्चिमी देशों के लिए एक एडवेंचरस प्लेस से ज्यादा कुछ नहीं । जहां की गरीबी से वे द्रवित नहीं, बल्कि रोमांचित होते हैं। गेट्‌स भी रोमांचित हुए, बोले- "व्हाट इज दिस ?' एक अधिकारी ने जवाब दिया- "दिस इज इंडीजिनस ओवन सर, मेड बाय स्वायल।'
अब थोड़ा इतिहास देख लें। दो-ढाई सौ वर्ष पहले भी अंग्रेज हमारे गांव जाते थे। हमारी गरीबी, भुखमरी, फटेहाली उनके लिए गहरे रोमांच का विषय होता था और हमारे सड़कविहीन-साधनविहीन दुर्गम गांव उनकी नजरों में "एडवेंचरस स्पॉट्‌स' हुआ करते थे। पलासी के युद्ध से पहले वे हमारी गरीबी, हमारे पिछड़ेपन के प्रति सहानुभूति व्यक्त करते रहे और पलासी का युद्ध जीतते ही उन्होंने भारत के सारे संसाधनों पर कब्जा जमा लिया। हम उनके उपनिवेश बनकर रह गये । दो सौ वर्षों तक वे हमारे ही संसाधन लूटकर हम पर अपना हुक्म चलाते रहे। हम गरीब से दरीद्र हो गये और वे हमारे संसाधनों के बल पर दुनिया के सभ्यतम और समृद्धतम नागरिक बन बैठे।
लेकिन 1947 के बाद गौर वर्ण वालों का यह काला कारनामा खत्म हो गया। पर क्या कहानी खत्म हुई ? अगर कहानी खत्म होती तो आज न कोई गुलरिया होता और न ही किसी गेट्‌स का "पोवर्टी टुरिज्म' होता। पिछले 63 वर्षों में गरीबी उन्मूलन की बातें तो खूब हुई, लेकिन क्या सच में गरीबी खत्म हो सकी ? हालांकि इसके लिए साल-दर-साल योजनाएं बनायी गयीं, उस पर अकूत राशि भी खर्च हुई, लेकिन न तो गांव समृद्ध हुआ और न ही ग्रामीणों की स्थिति में सुधार आया। हालांकि यह भी सच नहीं है कि पिछले 63 वर्षों में देश में विकास का काम बिल्कुल हुआ ही नहीं। पिछले छह दशकों में देश ने कई मोर्चे पर उल्लेखनीय तरक्की की, लेकिन उसका फायदा सीमित लोगों और सीमित क्षेत्रों में सिमट कर रह गया। बिहार और कोशी इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण है। अगर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का आर्थिक इतिहास सामने रखकर देखें, तो पता चलता है कि कोशी इलाके के साथ सभी सरकारों ने भारी अन्याय किया है। चाहे वह सरकारी योजना चलाने की बात हो या फिर बुनियादी ढांचे के निर्माण या फिर औद्योगिकीकरण की पहल, कोशी को हमेशा उपेक्षित रखा गया। यही कारण है कि अब यह इलाका बिल गेट्‌स जैसे लोगों के लिए "पोवर्टी टुरिज्म' का स्पॉट बन बैठा है।
सरकार समेत तमाम पढ़े-लिखे लोगों को पता है कि बिल गेट्‌स के प्रयास से भारत की गरीबी कम नहीं होने वाली। हां, ऐसे प्रयासों से चंद लोगों, चंद एनजीओ और चंद अधिकारियों की जेबें जरूर गर्म होंगी। गुलरिया के बुढ़ों को एक कहानी मिल जायेगी, जिसे वे अपने पोते-परपोते को सुनायेंगे। लेकिन दियारा के गांव में गरीबी की लू व शीतलहरी यों ही चलती रहेगी। साल-दर-साल। हां, यह बात अलग है कि इसके कारण बिल गेट्‌स को कॉरपोरेट वेलफेयर का मसीहा करार दिया जायेगा। कई पुरस्कार और सम्मानों से उन्हें नवाजा जायेगा। बाजारवाद के अनुयायियों को एक "शेफ्टी वाल्व' मिल जायेगा। ताकि वे सेमिनारों और अखबारों में चीख-चीखकर कह सके कि बाजारवाद, समाजवाद का दुश्मन नहीं है। बाजारवाद को भी गरीबी और गरीबों की बराबर फिक्र है। बस, इससे ज्यादा कुछ नहीं। आमीन।

बुधवार, 12 मई 2010

वह देहाती आदमी

सड़कों पर चलने के लिए
शायरन और लालबत्तियां अनिवार्य हो जायेंगी
और टेलीविजन के सीरियल
घर में रहने की शर्त बन जायेंगे
तो वह देहाती आदमी
खिड़की के रास्ते लौट जायेगा अपना गांव
जहां के मेड़ पांवों में नहीं चुभते
और आज भी
'आदमी' कोई एक्सक्लूसिव न्यूज नहीं होता

एक दिन वह देहाती आदमी
इस शहर को राम-राम कहेगा
सड़कों पर रोप देगा मुलायम दूब
झोपड़ी के बच्चों में बांट देगा
मंडी के सब अमरूद
उठती इमारतों में लगा देगा
बांस का सोंगर
और संसद के सामने गायेगा आल्हा-उदल
और हां !
वह देहाती आदमी
जाते-जाते एक पत्थर जरूर फेंकेगा
शहर के सबसे सुरक्षित घर पर

सोमवार, 3 मई 2010

आखिरी पहर

तीन बार टूट चुका है चांद
तीन बार खांस चुकी हैं दादी
तीन गिलास पानी पी चुका हूं मैं
और पास के बरसाती खंतों (गड्‌ढे) से
अब तीसरे मेढक की कराह आ रही है
शायद यह पहले दोनों का बच्चा रहा होगा
जिसे खंते के सांप ने ही निगला होगा
मेरा मन कहता है वह धामिन होगा
कवि मन कहता है वह दोमुंहा होगा
मैं क्या करूं
मेरी बस्ती सो रही है
अपनी देह में दूसरे की नींद
शायद यह रात का आखिरी पहर है

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

फिर कांग्रेस के जाल में शिबू

झारखंड के राजनीतिक संकट पर त्वरित टिप्पणी
मुख्यमंत्री की कुर्सी को अपनी पुश्तैनी संपत्ति समझने की गलतफहमी के शिकार शिबू सोरेन एक बार फिर कांग्रेस के जाल में फंस गये हैं। उनकी स्थिति " शिकारी आयेगा, जाल बिछायेगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं...' का जाप करने वाले तोते के समान हो गयी है। जिस तरह कहावती तोता "शिकारी आयेगा... ' का जप करते-करते शिकारी के जाल में फंस गया था, ठीक उसी तरह शिबू सोरेन भी "कांग्रेस धोखेबाज है, कांग्रेसी धोखेबाजी की राजनीति करते हैं... ' का मंत्र जपते-जपते उनके बिछाये हुए जाल में फंसकर अपने प्राण से प्रिय मुख्यमंत्री की कुर्सी से बेदखल होने की स्थिति में पहुंच गये हैं। हैरत की बात यह कि वह पहले भी इस जाल में दो बार फंस चुके हैं, लेकिन सबक लेना उनकी फितरत में नहीं है । उनकी स्थिति कुमहार के बैल की तरह है जो हर उस आदमी के पीछे हो लेता है , जिसके हाथ में मिट्टी लगी हो।
गठबंधन धर्म के उल्लंघन के आरोप में भाजपा ने उनकी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है और शिबू सोरेन की चार महीने की अल्पवय सरकार अल्पमत में आ गयी है। फिलहाल, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में समर्थन वापसी की इस घटना का ताबड़तोड़ पोस्टमार्टम हो रहा है और झारखंड की आगे की राजनीतिक स्थिति को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। लेकिन सच यह है कि यह खेल अंदर खेला जा चुका है। कुछ भी अचानक नहीं हुआ है। न ही शिबू सोरेन ने तैश में आकर संसद में कांग्रेस के पक्ष में मत दिया और न ही भाजपा ने इसके प्रतिशोध में समर्थन वापसी का ऐलान किया। बल्कि शिबू सोरेन और कांग्रेस के बीच दो सप्ताह पहले ही सब-कुछ तय हो गया था। यह नौबत तब बनी जब भाजपा ने साफ-साफ कह दिया कि वह शिबू के बेटे हेमंत सोरेन को किसी भी कीमत पर नेता नहीं मानेंगे। जबकि शिबू को यह विश्वास हो चला था कि अब उनके विधायक चुने जाने की संभावना समाप्त हो चुकी है क्योंकि लाख कोशिश के बावजूद वे अपने पसंद की विधानसभा सीट को खाली नहीं करा पाये। चूंकि वे पिछले चार महीने से गैरविधायक मुख्यमंत्री हैं, इसलिए संवैधानिक बाध्यता के कारण अगले दो महीने में उनका सत्ता से हटना लगभग तय था। इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी को बचाने और सत्ता को अपने आंगन में बनाये रखने के लिए उन्होंने दूसरा रास्ता तलाशना शुरू कर दिया। उधर कांग्रेस तो पहले से घात लगाकर बैठी ही थी, जैसे ही उसे लगा कि शिबू सोरेन निरूपाय हो चले हैं, उसने तुरंत अपना जाल फेंक दिया। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, कांग्रेस ने शिबू को एक नायाब सत्ता-पैकेज का ऑफर दिया है। इसके तहत शिबू को केंद्र में मंत्री बनाने के आश्वासन के साथ उनसे कहा गया है कि वे झामुमो, कांग्रेस, बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा के साथ गठबंधन कर नयी सरकार बनाने के लिए रास्ता तैयार करे। जाहिर है शिबू को इस पैकेज में उम्मीद की नयी किरण दिखायी दी। वे यह मानकर चल रहे हैं कि इस समीकरण के सहारे वह खुद तो केंद्र में मंत्री बनेंगे ही साथ-साथ मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी अपने बेटे या किसी कठपुतली विधायक को बैठाने में कामयाब हो जायेंगे।
लेकिन चीजें जितना आसान शिबू को दिख रही हैं, उतना आसान हैं नहीं। पहली दिक्कत तो यह है कि सत्ता के इस बेशर्म खेल में बाबू लाल मरांडी आसानी से शामिल होंगे नहीं। शिबू सोरेन और कांग्रेस ऐसे बेशर्म खेल तो कई बार खेल चुके हैं, लेकिन बाबूलाल मरांडी की पहचान इनसे बिल्कुल भिन्न है। एक तो बाबूलाल मरांडी हमेशा से मर्यादा की राजनीति में विश्वास करते रहे हैं, दूसरी उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि कांग्रेस और झामुमो के इस सत्ता नोच प्रतियोगिता में शामिल होते ही, उनकी छवि रसातल में चली जायेगी। चूंकि बाबूलाल दूर की सोचते हैं, इसलिए इस बात की संभावना बहुत कम है कि वे इस पैकेज को स्वीकार करें। ऐसी स्थिति में दूसरी सूरत यह बनती है कि कांग्रेस और झामुमो मध्यावधि चुनाव से बचने का हवाला देकर बाबूलाल का बाहर से समर्थन प्राप्त कर ले। अगर ऐसा हुआ, तो भी यह तय है कि तोड़-जोड़ से बनने वाली अगली सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगी। और अंततः राष्ट्रपति शासन के हालात उत्पन्न हो जायेंगे, जो कांग्रेस की असल मंशा है। कांग्रेस चाहती है कि जनता में यह मैसेज जाये कि कांग्रेस ही इस प्रदेश में एक स्थायी सरकार दे सकती है।
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि झारखंड एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता के दुश्चक्र में फंस गया है और फिलहाल इससे मुक्ति का कोई संकेत कहीं नहीं दिख रहा। समझ में नहीं आता कि इसे बहुदलीय लोकतंत्र की विडंबना कहें या फिर सत्ताई राजनीति का फलसफा।

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

कविता की जरूरत

जब

देश और दातुन का फर्क मालूम न चले

जीवन का मतलब दीमक हो जाये

और किसी पेड़ के नीचे

सायास पता लगे कि

बंदूक

, गोली, बारूद से ज्यादा डरपोक कुछ नहीं

तो

कविता मजबूरी हो जाती है

जब

हम नहीं कह पाये रस्सी को सांप

गांव की उस निर्दोष बेवा को बांझ

सुबह को सांझ और किनारे को मांझ

तो

कविता मजबूरी हो जाती है

जब

हर खबर पहले से सुनी हुई लगे

प्रेम और टेस्टासटेरॉन समानार्थी हो जाये

तो कविता मजबूरी हो जाती है

तो कविता ही एक जगह बचती है

कुछ कहने के लिए

कुछ सुनने के लिए

कुछ समझने के लिए

रोने

-गाने और चिल्लाने के लिए

मर जाने या मार देने के लिए

+

कविता मेरा भ्रम नहीं

कविता मेरा श्रम नहीं

लिखने के लिए भी नहीं

और छपने के लिए भी नहीं

++

कविता

काजल की कोठरी में बेदाग की तलाश है

निरर्थक शोर के बीच अर्थ का प्रयास है

खामोशी तोड़ने का आखिरी औजार है

मां की मनाही

और प्रेमिका की हां है

कविता

आखिरी सांस तक मानव बने रहने की जिद है

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

बिल में रहने की मजबूरी


बिहार के अररिया ज़िले के एक गॉंव के आदिवासी पिछले 13 अप्रैल को आए तूफ़ान के बाद क़ब्रनुमा घरों में जिंदगी गुज़ार रहे हैं.ये आदिवासी तूफ़ान से इतने डरे हुए हैं कि वे अपनी ध्वस्त झोंपड़ियों के बाहर छह फुट लंबे, चार फुट चौड़े और चार फुट गहरे क़ब्रनुमा घरों को सुरक्षित मान रहे हैं.कुसियार ग्राम पंचायत के संथाली टोला के संथाल जनजातियों ने अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ इन क़बनुमा घरों का आविष्कार किया है.स्थानीय लोग इन घरों को 'बिल' कहते हैं.

तूफ़ान का डर

'बिल' में तमाम कठिनाइयों के बाद भी उन्हें इस बात का विश्वास है कि अगर फिर तूफ़ान आया तो उनके परिवार के सदस्यों को जान नहीं गंवानी पड़ेगी . तूफ़ान में कुसियार गॉंव प्रखंड में 10-12 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि अररिया समेत पूर्णिया, सुपौल, किशनगंज, कटिहार आदि ज़िलों में मरने वालों की संख्या इससे कहीं बहुत अधिक थी. संथाली टोला के बैजनाथ मुर्मु और हप्पनमये किस्कू बताते हैं, ' हमारे पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था. शुरू के दो तीन दिन हमने खुले आसमान के नीचे गुज़ारे. इस दौरान भीषण गर्मी ने हमें इन बिलों को बनाने को प्रेरित किया.' "हम हर दिन इस दहशत में जी रहे हैं कि फिर कोई जानलेवा तूफ़ान कभी भी आ सकता है. ऐसे में हमारे लिए ' बिल' से सुरक्षित कोई जगह नहीं हो सकती है. उन्होंने कहा', हम हर दिन इस दहशत में जी रहे हैं कि फिर कोई जानलेवा तूफ़ान कभी भी आ सकता है. ऐसे में हमारे लिए इससे सुरक्षित कोई जगह नहीं हो सकती'.अररिया ज़िला नेपाल की सीमा से सटा हुआ है. यह बिहार के सबसे पिछड़े इलाक़ों में से एक है.कुसियार गॉंव राष्ट्रीय राज्यमार्ग से तीन किलोमीटर की दूरी पर है. वहॉं पहुँचने के लिए इंसान और जानवरों के पैरों के निशान ही रास्ता बताते हैं.बिहार का शोक कही जाने वाली कोसी नदी की एक सहायक नदी के किनारे बसे इस गॉंव में बरसात के दिनों में नाव से ही पहुँचा जा सकता है. संथाली टोला में जनजातियों के क़रीब साठ परिवार आबाद हैं. इन लोगों ने अपने लिए 10-12 बिल बनाए हैं. इन बिलों में वे अपने बच्चों के साथ बकरियों को भी रखते हैं. जोजों टुड्डू और बोढ़न हांसदा के बच्चे भूख और गर्मी से बीमार हो गए हैं. उन्हें प्रशासन की ओर से अबतक न तो दवा मिली है और न ही खाने को अनाज.

मुश्किल ज़िंदगी

जोजों कहते हैं

, "हम भुखमरी के शिकार हैं आँधी ने हमारे चॉंपाकलों (हैंडपंप) को भी तहस-नहस कर दिया है. इससे अब पानी का इंतजाम भी बहुत मुश्किल से होता है.'उन्होंने कहा, "सरकार से न तो हमें अब तक कोई रहत सामग्री नहीं मिली है.गॉंव के प्रधान लक्ष्मी ऋषिदेव बताते हैं, "हमें आश्चर्य है कि सरकार की घोषणाओं के बाद भी स्थानीय प्रशासन ने हमारे गॉंव की अबतक सुध नहीं ली है. अब लोग उग्र होते जा रहे हैं.' इस संबंध में प्रशासन का अपना तर्क है. प्रखंड विकास अधिकारी नागेंद्र पासवान कहते हैं कि अभी नुक़सान का सर्वेक्षण हो रहा है.वहीं सर्कल इंस्पेक्टर अमरनाथ सिंह कहते हैं कि उन्हें अगले तीन दिन में सर्वेक्षण ख़त्म कर के राहत सामग्री वितरित की जाए.उन्होंने बताया कि वे लोग भी अपने लिए राहत सामग्री मांग रहे हैं जिनका कुछ नुक़सान भी नहीं हुआ है.गॉंव के प्रधान कहते हैं कि उन्हें अबतक राहत सामग्री का इंतज़ार है. उन्होंने बताया कि अभी तक कोई भी पदाधिकारी हमे देखने तक नहीं आया है तो धांधली का सवाल ही कहॉं है.संथाली जनजातियों का यह टोला सरकारी जमीन पर 50 साल पहले ही आबाद हुआ था. उनके पूर्वज रोज़गार की तलाश में यहॉं आए थे.

(बीबीसी हिंदी डॉट कॉम से साभार)


रविवार, 11 अप्रैल 2010

जनता दरबार

मैं गया "जनता दरबार''

पाया मैंने राज दरबार

मैं गया "जनता दरबार''

पाया मैंने "एक अने मार्ग''

मैं गया "जनता दरबार'

देखी मैंने महंगी कार

लेकर जो आये थे फरियाद

छोड़कर सारा घर और बार

बैठे थे कोने में लाचार

++

देर शाम को लौटै हम

सोचे ज्यादा बोले कम

मानो मुफ्त में नाटक देख आये हम

(5 अप्रैल को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दरबार से लौटकर)

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

घटवर्णी !


घटवर्णी, घटवर्णी, घटवर्णी


घाट-घाट पर घटवर्णी


बाट-बाट पर घटवर्णी


ओजस्वी जुबान में


विद्रोही बयान में


न बात न विरोध


केवल मादक-मोहिनी


घटवर्णी,घटवर्णी,घटवर्णी


कभी हाथ जोड़े आते हैं


कभी बंदूक ताने आते हैं


कभी सेवा-सेवा जपते हैं


न्याय-न्याय भी रटते हैं


सत्ता -पैसा मिल जावे तो


गंगा भी वैतरणी


घटवर्णी,घटवर्णी,घटवर्णी

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

बांध और बागमती


A Padyatra : 2nd April to 6th April 2010

The Bagmati is regarded as one of the holiest rivers of India but of
late this river has become a target of the vested interests who have
started making hay while the sun shines.
This river was embanked for the first time in late 1960s in its lower
reaches with a hope that such a work will protect the areas of
Darbhanga, Samastipur and Khagaria districts against recurring
floods. That was never to be. The river kept on breaching the
embankments or else the people living along the river kept on cutting
the embankments as a routine as the water logging caused by the
embankments had made their life miserable. Local production processes
came to a standstill and the people were forced to migrate to other
places in search of employment. It is hard to find a place to stand on
the platforms of the railway stations of Darbhanga or Khagaria. due to
migrant's exodus.
These embankments were extended in Sitamarhi district in upper reaches
in the 1970s and that brought nearly 95 villages within them who had
to be relocated. Only 68 villages have been provided with
rehabilitation so far and the rest 27 are still in waiting list. They
are living either within the embankments, on the embankment or along
the 20 feet wide strip of land along the embankments. They are still
waiting for relocation despite thirty years of completion of the
project. Those relocated were not paid the cost of construction of the
new house but just a paltry sum of money to move their belongings.
There was no question of land for land as that much of land was not
available at all. They are expected to cultivate their land within the
embankments. This land often gets eroded or gets sand cast and
virtually no agriculture is possible there. Loitering in search of
employment and getting humiliated all over the country is their fate.
As if that were not sufficient, effluents of two sugar mills are
discharged into the river, one from the Rauthat district in Nepal and
the other, the Riga Sugar Mill in Sitamarhi. A local MLA, Pt. Damodar
Jha had raised a question in the Bihar Vidhan Sabha about the
pollution caused by the Riga Sugar Mill way back in 1955 and the
government had promised that within a year , ie by 1956, everything
will be brought under control. That has not happened so far.
Governments have come and gone but the plight of the people never


improved. Nearly 9,000 hectares of land remains not only waterlogged
round the year but the pollution caused by the river water has caused
all sorts of health hazards there. The area is now known as Kala Pani.
The government has started raising and strengthening these embankments
almost all over the state and the Bagmati too has fallen prey to this
spree. The adverse results of this effort would be visible in years to
come because there is no likelihood of reduction in the quantity of
water and silt in the river nor there is any possibility lowering of
the river bed because of such sediments. This will add to seepage
through the embankments and the water logging will rise in future.
Then, no embankment has been constructed so far in anywhere in the
world that would not breach. Higher and stronger the embankments,
greater would be the vulnerability of the people to flood disaster.
Barh Mukti Abhiyan - Bihar, Jal Jamav Virodhee Sangharsh Samiti -
Saran, Gaon Vikas Manch - Sitramarhi, Sitamarhi Lok Sewa Sansthan -
Sitamarhi, Sitasmarhi Samaj Shodh Sansthan -Sitamarhi, Kartavya Sewa
Sangha -Awapur, Kshitij - Sonbarsa, National Council Of Social
Welfare- Bakhar, and Shyam Jan Sewa Bharti - Sonakhan have organized a
padyatra that will start from Bhanaspatti in Sitamarhi ( 28th
Kilometer from Muzaffarpur on the Muzaffarpur Sitamarhi Road) on the
2nd April 2010 and will end up in Basbhitta near Dheng bridge on the
6th April 20101 to highlight the issues faced by the people of the
basin. All are invited.

मंगलवार, 30 मार्च 2010

सब्सिडी से जुड़ा एक सवाल

बात बहुत पुरानी नहीं है। सत्तर-अस्सी के दशक में देश की सरकारी तेल कंपनियां सरकार को औसतन 15 से 20 हजार करोड़ रुपये का सालाना लाभ देती थीं। आज सरकार इन कंपनियों को हर वर्ष 50-60 हजार करोड़ रुपये चुकाती है और हर साल इसका आकार बढ़ रहा है। जी हां, मैं पेट्रोलियम सब्सिडी की बात कर रहा हूं। हमारी सरकार पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस पर आज भी भारी सब्सिडी दे रही है। एक सर्वेक्षण रिपोर्ट है कि आज लगभग 60 प्रतिशत घरेलू गैस उपभोक्ता आर्थिक तौर पर इतने समृद्ध हैं कि उन्हें सब्सिडीयुक्त रसोई-गैस की आवश्यकता नहीं है। यह उपभोक्ता-वर्ग चाहता है कि उन्हें समय पर सिलिंडर की आपूर्ति की गारंटी मिले, तो वे हंसी-खुशी सिलिंडर की पूरी कीमत (जो आज की तारीख में लगभग 600 रुपये प्रति सिलिंडर पड़ेगा) चुका देगा। आधिकारिक जांच-पड़ताल में भले ही इस सर्वेक्षण के आंकड़े थोड़े आगे-पीछे खिसक जायें, लेकिन यह सच्चाई से परे नहीं है। और इस पर सहज विश्वास किया जा सकता है। वह इसलिए कि आज भी देश की 95 प्रतिशत आबादी तक रसोई-गैस के कनेक्शन नहीं पहुंचे हैं। और मुझे लगता है कि आम ग्रामीणों तक यह सुविधा कभी पहुंचेगी भी नहीं। यह संभावना भी प्रबल है कि हमारी आने वाली पीढ़ियां जब गैस और सिलिंडर का इतिहास पढ़ेंगी तो वे यह भी पढ़ेंगी कि जब भारत में लोकतंत्र का बागीचा पूरे शबाब पर था तो यहां भी रसोई-गैसों का आगमन हुआ। लेकिन यह सुविधा आयी, लोकप्रिय हुई और खत्म भी हो गयी, लेकिन देश की बहुसंख्यक ग्रामीण आबादी इससे सदा वंचित ही रही। कहने की जरूरत नहीं कि पेट्रालियम गैस की कहानी 2040-50 तक खत्म होनी है। इस कहानी को खत्म होने से कोई नहीं रोक सकता। जो भी हो, भारत का अब तक का इतिहास तो भेदभाव की दास्तानों से पिरिपूर्ण रहा है। अगर इसमें गैस भेदभाव का यह रोमांचक सच भी जुड़ जायेगा, तो कौन-सा आसमान टूटेगा।

यहां सवाल उठता है कि विशुद्ध अर्थशास्त्र के आधार पर सरकार चलाने का दावा करने वाले यूपीए के विद्वान नेताओं को यह बात मगज में क्यों नहीं घूसती। सरकार इन 60 प्रतिशत उपभोक्ताओं को सब्सिडी से वंचित क्यों नहीं करती? अगर ऐसा कर दिया जाये तो सरकार को भारी सब्सिडी के बोझ से भी मुक्ति मिलेगी और सब्सिडी का लाभ उन्हें मिलेगा जो वास्तव में इसके हकदार हैं और आर्थिक रूप से पीछे छूटते चले जा रहे हैं? अब जबकि राज्य की सरकारें सिलिंडर की सब्सिडी को खत्म कर रही है, तो निम्न मध्यमवर्ग की एक बड़ी आबादी का हलक सूख रहा है। यह वो आबादी है जो महंगाई की मार से पूरी तरह टूट चुकी है और जो अपने तमाम कष्टों को आइपीएल मैचों में भूला देने को ही समझदारी मानती है।

बुधवार, 17 मार्च 2010

विनाश काले विपरीत बुद्धि

(कब उठेगा यह लाल पर्दा ? स्थान- प्रतापगंज, जिला- सुपौल )

दहाये हुए देस का दर्द -62

19 महीने में धरती सूर्य का डेढ़ बार चक्कर लगा लेती है। इतनी अवधि में ब्रह्मांड में बहुत-से तारे, ग्रह और नक्षत्र एक छोर से दूसरे छोर पर पहुंच जाते हैं। बड़े-बड़े युद्ध अपने अंजाम को प्राप्त हो जाते हैं। 19 महीने में एक भारतीय नागरिक पांव-पैदल देश की चौहदी माप सकता है। लेकिन 19 महीने में सात किलोमीटर की क्षतिग्रस्त रेलवे पटरी को दुरुस्त नहीं किया जा सकता ! यह दुनिया के शीर्ष रेलवे नेटवर्क में शुमार किए जाने वाले भारतीय रेल की असलियत है।

आपको याद होगा कि 18 अगस्त 2008 को जब कोशी ने पूर्वी बिहार में तांडव नृत्य किया था, तो उसने जहां-तहां रेल पटरियों को तोड़-मरोड़ दिया था। तब उसका कहर बिहार के सुपौल, सहरसा, अररिया और मधेपुरा जिले की लाइफ लाइन कही जाने वाली सहरसा-फारबिसगंज रेल लाइन भी पर जमकर बरपा था। बाढ़ की चपेट में आकर जहां-तहां रेल-सड़क और बिजली के खंभे ध्वस्त हो गये थे। हालांकि पानी हटने के बाद पता चला कि सौभाग्य से बाढ़ में रेल-पटरी और स्टेशनों को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है और कुल मिलाकर छह-सात किलोमीटर की पटरी ही बुरी तरह प्रभावित हुई है। पानी के बावजूद प्रतापगंज, छातापुर और ललितग्राम स्टेशन तब सुरक्षित बच गये थे। हां, इस प्रलयंकारी बाढ़ में सात-आठ छोटे पुल जरूर पूरी तरह ध्वस्त हो गये थे। पानी हटने के बाद तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद ने इलाके के लोगों को आश्वस्त किया था कि जल्द ही इस लाइन की रेल सेवा को दोबारा बहाल कर दिया जायेगा। लेकिन महीना-दर-महीना बीतता रहा, पर सहरसा-फारबिसगंज रेल सेवा चालू नहीं हुई। इसे लेकर कई बार स्थानीय लोगों ने आंदोलन तक किया, लेकिन रेल महकमा कान में रूई और तेल लेकर सोता रहा। रेल के किसी भी आला अधिकारी ने क्षतिग्रस्त पटरियों और पुलों के पुनर्निमाण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। परिणामस्वरूप मरम्मत का काम बीरबल की खिचड़ी की कहावत को चरितार्थ करती रही।इस बीच कुसहा में कोशी के टूटे तटबंध को बांध भी दिया गया। इसके बाद तो रेल अधिकारी के पास यह बहाना भी नहीं बचा कि पानी के कारण मरम्मत के काम में बाधा उपस्थित हो रही है। आज भी रेलवे के कोई अधिकारी यह बताने की स्थिति में नहीं है कि इस लाइन पर दोबारा कब रेल के इंजन और डिब्बे का दर्शन हो सकेगा।

यहां एक साथ कई सवाल उठते हैं। सबसे पहला सवाल यह कि क्या अगर सहरसा-फारबिसगंज रेल लाइन महाराष्ट्र, पंजाब, बंगाल, गुजरात, दिल्ली या दक्षिण के राज्यों में होती, तो रेलवे का ऐसा ही सलूक होता ? उत्तर बिहार में अगर बाढ़ के कारण रेल लाइन क्षतिग्रस्त होती है तो तटीय राज्यों में समुद्री तूफानों के कारण आये दिन रेल,सड़क, बिजली आदि की लाइनें क्षतिग्रस्त होती रहतीं हैं। तब भारतीय रेल पूरी तत्परता से आगे आता है और क्षतिग्रस्त पटरी को दुरुस्त भी कर लेता है। लेकिन पूर्वोत्तर बिहार के साथ उसने इतना भद्दा मजाक क्यों किया है ? इसलिए कि इस इलाका का उल्लेख पूंजीपतियों की डायरी में नहीं है और यहां के लोग बात-बात पर हथियार नहीं उठाते हैं ? भले ही रेल मंत्री या शीर्ष रेल अधिकारी ऐसे सवालों का जवाब देना जरूरी नहीं समझे, लेकिन हकीकत यही है। हकीकत यह है कि दिल्ली में बैठे देश के नीति-नियंता अब बाजार, हिंसा और वोट बैंक को छोड़ दूसरी कोई भी भाषा नहीं समझते। इसे बिडंबना नहीं तो क्या कहा जाये। वैसे भी अपने यहां एक प्राचीन कहावत काफी प्रचलित है- विनाश काले विपरीत बुद्धि !

रविवार, 14 मार्च 2010

शोर मचाओ, शोर मचाओ

शोर मचाओ, शोर मचाओ

जोर-जोर से सब चिल्लाओ

गला फाड़ो, माइक उठाओ

लेख-आलेख- कविता लिखो

बहस-मुबाहिसे जारी रखो

बहनें खुश हैं !

माएं खुश हैं !

दादी-नानी-मौसी खुश हैं !

नर्सरी की नैंसी खुश है !

काठ की कठपुतली खुश है !

कूड़ा चुनती कुसिया खुश हैं !

दिल्ली से हम देख रहे हैं

अस्मत खोयी बेवा खुश है

"दुमकावाली'' मुर्दा खुश है

लकड़ी चुनती बुढ़िया खुश हैं !

भूखनगर की भूतिया खुश हैं !

तैंतीस प्रतिशत

जिंदावाद

तैंतीस प्रतिशत

मुर्दावाद

प्रतिशत में प्रतिशत

जिंदावाद

भूख लगी है ?

शोर मचाओ ...

बिन दाना के मां मरी है ??

मुखर्ता है शोक मनाना

शोर मचाओ, शोर मचाओ ...

शंख बाजे

काल भागे

घंट बाजे

पिशाच भागे

शोर बाजे

भूख भागे

शोर बाजे

महगी भागे

इसलिए

शोर मचाओ, शोर मचाओ

जोर-जोर से शोर मचाओ

 

 

गुरुवार, 4 मार्च 2010

जल नीति के मसौदे पर सुझाव आमंत्रित

बिहार जल संपदा से परिपूर्ण राज्य है किंतु फिर भी यहां जल उपलब्धता कम रहती है। भौगोलिक परिस्थितियों एवं अन्य कारणों से जल के विभिन्न उपयोगों जैसे सिंचाई, पीने और घरेलू उपयोग, औद्योगिक, तापीय और जल विद्युत आदि के लिये बढ़ती हुई मांगों को पूरा करने के लिये जल का समुचित प्रबंधन आवश्यक हो गया है। भौगोलिक स्थिति और वर्षा के असमान वितरण के कारण बिहार का उत्तरी भाग बाढ़ की चपेट में रहता है तो दक्षिणी भाग सूखे की मार झेलता है। राज्य में कुल जल उपलब्धता तो अधिक है लेकिन उपयोग योग्य जल कम है।राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 94।163 लाख हेक्टेयर है जिसमें से 56.68 लाख हेक्टेयर पर ही खेती होती है 9.44 लाख हेक्टेयर अन्य परती जमीन है जिसे प्रोत्साहन देकर कृषि योग्य बनाया जा सकता है। राज्य की वर्तमान आबादी 8.288 करोड़ है जबकि 2025 तक 13.13 करोड़ तक अनुमानित है। वर्तमान में सिंचाई एवं अन्य कृषि निवेशों से 1.675 टन प्रति हेक्टेयर की उत्पादकता का स्तर प्राप्त हुआ है जो अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम है। भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये 3.5 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादकता का लक्ष्य प्राप्त करना होगा। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये जल संसाधनों के प्रबंधन में सुधार लाना आवश्यक हो गया है।इन परिस्थितियों में राज्य जल नीति को नए सिरे से सूत्रीकृत करने की आवश्यकता महसूस की गई और मुख्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये राज्य जल नीति 2009 प्रतिपादित की जा रही है।राज्य जल नीति, 2009 का जलसंसाधन विभाग, बिहार द्वारा प्रारूप तैयार किया गया है। इस मसौदे को http://wrd.bih.nic.in और www.prdbihar.org पर देखा जा सकता है।राज्य जल नीति के इस प्रारूप पर आम जनता की राय, सुझाव और मंतव्य आमंत्रित हैं।
यदि आप कोई सुझाव या राय देना चाहते हैं तो इंडिया वाटर पोर्टल या water।community@gmail.com पर एक माह के भीतर भेज सकते हैं । आप अपने सुझाव सीधे wrd-bih@bih.nic.in पर भी भेज सकते हैं। आप अपने सुझाव यहां कमेंट के रूप में भी डाल सकते हैं जिन्हें हम नीति निर्माताओं तक पहुंचाएंगे ।

यदि इस संदर्भ में कोई विशेष जानकारी चाहिए तो आप मगध जल जमात के संयोजक श्री रविन्द्र पाठक जी से बात कर सकते हैं। उनका मो- 09431476562 है।

(इंडिया वाटर पोर्टल से साभार )

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

गिरोहों के बीच

बासी मांड़ और बासी भात खाकर
पूरब की पहली किरण के साथ
सालों तक बैलों के संग जुतते रहने के बाद
और चढ़े सूरज के नीचे
उसने
गरमाये मुराठे को उतारा
और झुलसायी चमड़ी पर मिट्टी का लेप लगाकर
उसने
बगुले की चोंच में ढपाढप समाते केंचुए को देखा
और जाना
कि इस देश में उसकी औकात
'जौ-तील-कुस' से बेसी नहीं है
जिसे अंतत स्वाहा हो जाना है
'इहागच्छत, इहतिष्ठित' जैसे मंत्रों के साथ,
जानते-जानते उसने यह भी जाना
कि पांचवीं वर्षी के बाद प्रेत पितर बन जाता है
और पिण्ड दान के साथ ही इतिहास खत्म हो जाता है
लेकिन दुनिया चलती ही रहती है
जंगली और शहरी गिरोहों के साथ
लिखित-अलिखित कानूनो के साथ
लाइसेंसी या गैरलाइसेंसी बंदूकों के साथ
++
मुंबई की पिटाई
और गुवाहटी के चीरहरण के बाद
उसने चिल्लाकर कहा कि
देश
संसद में 273 कुर्सियों के इंतजाम का ही दूसरा नाम है
और संविधान
बुढ़िया की टांगों पर चढ़े पलस्तर से ज्यादा कुछ नहीं
और
'हम भारत के लोग'
हैं भी क्या
एक वोट के सिवा
'भारत को'
देंगे भी क्या
एक वोट के सिवा

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

तस्कर बनते मेहनतकश







(भारत-नेपाल सीमाः नेपाल की लकड़ी और भारत का खाद)
दहाये हुए देस का दर्द-61
रोटी तो सभी खाते हैं, लेकिन सब की रोटी एक-जैसी नहीं होती। कोई हलाल की रोटी खाते हैं, तो कोई हराम की। किसी की रोटी पसीने से आती है, तो किसी की फरमाइश से। रोटी-रोटी में फर्क का यह अन्यायी सिलसिला न जाने कब से चलते आ रहा है। हालांकि रोटी से खेलने वाले इसओर कभी ध्यान नहीं देते और उनकी नजरों में सभी रोटियां अंततः अनाज की ही होती हैं। रोटी से खेलने वाले कभी नहीं स्वीकारते कि "रोटी'' और "इज्जत'' में किसी भी तरह की कोई रिश्तेदारी हो सकती है। लेकिन मेहनतकशों को पसीने की रोटी पर हमेशा नाज रहा है। किसान और मजदूरों के बीच रहने वाले लोग इस सच से निश्चित तौर पर अवगत होंगे। भूख और उसूल के दोहरे भार से दबे मेहनतकशों से पूछिए, उनका जवाब होगा- "हम गरीब जरूर हैं, लेकिन इज्जत की रोटी खाते हैं।'' कौन होगा जो ऐसे ईमानदार व मासूम आत्म-गौरव पर रीझ-पसीज न जाये। कवियों ने इसे विरॉट मानवीय सौंदर्य माना है और लेखकों ने इससे प्रेरणा लेकर दर्जनों ऐतिहासिक रचना की है। फणीश्वनाथ रेणु का संपूर्ण साहित्य श्रमशील सर्वहारा के निश्चल प्रेम और उच्च मानवीय मूल्य की ही बात करता है। लेकिन लगता है कि अब मेहनतकशों को भी "इज्जत की रोटी और पसीने की कमाई '' जैसी मुहावरों से चिढ़ होने लगी है।
बिहार का कोशी अंचल भी बुनियादी तौर पर मेहनतकश किसान-मजदूरों का इलाका है। प्रकृति और शासकों के निष्करूण प्रहारों को सदियों तक झेलते रहने के बाद भी इस समाज ने मानवीय मूल्यों से कभी भी समझौता नहीं किया। मेहनत और मजूरी पर नाज करने की संस्कृति यहां प्राचीन काल से ही रही है। लेकिन कुछ वर्षों से इस संस्कृति में तेजी से एरोजन हो रहा है। मेहनतकश बाप-दादाओं के पोते अब खेत में बैलों के साथ बहने से जी चुराने लगे हैं। उनके अरमानों को बाजारवाद का पंख लग गया है। उन्हें भी घूमने के लिए बाइक चाहिए और पहनने के लिए आधुनिक जिंस और बात करने के लिए महंगे मोबाइल। जाहिर है खेतों में पसीना बहाकर उपभोग की ये सामग्रीयां उन्हें एक जनम में तो कभी भी नसीब नहीं होने वाली, इसलिए वे तमाम तरह के अपराधों में शामिल हो रहे हैं। कोई आइएसआइ का एजेंट बन रहा है, तो कोई लश्कर-तैइबा का हमदर्द। हालांकि इस तरह के हाइप्रोफाइाल अपराध में अभी बहुत कम युवक ही शामिल हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय तस्करी तो इस इलाके में एक पेशा का रूप ले चुका है।
पिछले कुछ दिनों में कोशी अंचल से सटे नेपाल और बांग्लादेश की सीमाओं पर भारी तादाद में ऐसे युवकों की गिरफ्तारी हुई है, जिनकी पृष्ठभूमि मेहनतकशों की रही है। जिनके बाप-दादा ये कहते हुए गुजर गये कि '' आधे पेट खाया, लेकिन पराये खेत की ओर कभी नहीं झाँका । आज अररिया, किशनगंज और सुपौल जिले के सीमावर्ती इलाके के कई गांव तस्करों के गढ़ बन चुके हैं। यहां तक कि इन युवकों की सांठगांठ अब पूर्वोत्तर राज्यों के बड़े तस्कर समेत विदेशी तस्करों तक से हो चुकी है। हालांकि ज्यादातर स्थानीय तस्करों की भूमिका अभी भी कैरियर (समान को सीमा के पार पहुंचाने वाला)की ही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पुलिस और प्रशासन इन्हें रोकने के बदले बढ़ावा ही दे रहे हैं। क्योंकि इस गोरखधंधे में उनकी जेबें भी गरम हो रही हैं।
दरअसल, अररिया, किशनगंज और सुपौल जिले से नेपाल की लगभग साढ़े तीन सौ किलोमीटर की सीमा लगती है, जो पूरी तरह से खुली हुई है। अकेले अररिया जिले में नेपाल के साथ लगभग 110 किलोमीटर की सीमा-रेखा है। अररिया के बेला बसमतिया से सिकटी से होकर लहसुन, सुपाड़ी, चीनी , धान, उर्वरक, पेट्रोलियम, चरस, गांजा, हेराईन, ब्राउन सुगर, नकली भारतीय करेंसी व विस्फोटक हथियारों तक की तस्करी होती है। इतना ही नहीं, तस्करों ने अररिया और किशनगंज के सीमाई इलाके में सदियों से मौजूद बांस के जंगल को साफ कर दिया है। महज दस वर्ष पहले तक यहां बांस के घने जंगल होते थे, जिनमें सैकड़ों किस्म के हजारों वन्य प्राणी रहते थे। लेकिन आज यह जंगल साफ हो चुका है और वन्य प्राणी तो खोजने से भी नहीं मिलते।
हाल की कुछ प्रमुख तस्करी घटना पर गौर करें तो सितंबर 2009 से अब तक अररिया के कुआड़ी ओपी क्षेत्र में करीब दो करोड़ से अधिक कीमत की चंदन की लकड़ी पकड़ी गयी। इससे कुछ समय पहले कुर्साकाटा के मरातीपुर में पुलिस ने चरस के साथ एक तस्कर को गिरफ्तार किया था, जिसने पुलिस को बताया था कि हर महीने नेपाल से अकेले कुर्साकाटा में तीन से चार क्विंटल तक चरस की तस्करी होती है। गौरतलब है कि कुछ वर्ष पहले अररिया के फारबिसगंज के डीएसपी ने थाइलैंड निर्मित हेरोइन के साथ कुछ विदेशी तस्करों को गिरफ्तार किया था।
लेकिन ये खुलासे और गिरफ्तारियां तो महज दिखावा है। सच्चाई तो यह कि 90 प्रतिशत से ज्यादा मामले या तो पुलिस के पकड़ से दूर रहते हैं या फिर पुलिस की सहमति से खुलेआम चलते रहते हैं। हाल यह है कि कोशी इलाके के छोटे-छोटे हाट-बाजारों में भी भारी मात्रा में गांजे उपलब्ध रहते हैं। गौरतलब है कि नेपाल में गांजें की खुलेआम खेती होती है, जिन्हें तस्करी के जरिये बिहार और भारत के अन्य हिस्सों में खपाया जाता है।
संक्षेप में कहें तो तस्करी ने कोशी इलाके के सामाजिक सौंदर्य को निगल लिया है। गरीबी में भी ईमानदार बने रहना कोशी इलाके का सामाजिक सौंदर्य है। पसीने की रोटी खाने वाले लोगों का यह 'यू टर्न' हमें हैरत में डालता ही है , साथ ही इस तथ्य को भी साबित करता है कि भूख और उसूल की लड़ाई में उसूल अंततः हार ही जाता है। लेकिन उन्हें कौन समझाये कि उसूल की हार, भूख से भी ज्यादा खतरनाक है। क्या बाजारवाद ने विरोध और बदलावों के रास्ते भी बंद कर दिए हैं ? लगता तो ऐसा ही है। अगर यह सच नहीं होता, तो ये युवक आज तस्कर नहीं विद्रोही होते।
 
 

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

सियार कोतवाल

कौन-सा हाल
किसका हाल
कैसा समाचार
किसका समाचार,
जोंकों का राज
और सियार कोतवाल ।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

घिनौनी हरकत पर उतरे नेपाली माओवादी

भारत का अंधविरोध नेपाली माओवादियों का जन्मजात शगल है। यह उनकी तंगदिल सोच और प्रदूषित रणनीति का हिस्सा है। इसलिए नेपाल के माओवादी नेता रह-रहकर भारत के खिलाफ विषवमन करते रहते हैं। वे कभी भारत को विस्तारवादी की संज्ञा देते हैं, तो कभी नेपाल की राजनीतिक-सामाजिक अस्थिरता के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। हालांकि उनकी हरकतों के कारण नेपाली जनमानस में भारत के प्रति शंकालु दृष्टि जरूर उत्पन्न हुई है, लेकिन सौभाग्यवश अभी भी नेपाल की आम जनता भारत को अपना दुश्मन नहीं मानती। हालांकि नफरत का जहर फैलाने के लिए माओवादी ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा है। चाहे वह भारत-नेपाल की मैत्री संधि हो या फिर कोसी परियोजना संधि, माओवादी हमेशा इन संधियों का मुखालफत करते हैं और नेपाली लोगों के मन में भारत के खिलाफ जहर भरते रहते हैं। वैसे माओवादियों के तमाम दुष्प्रचार के बावजूद आज भी बड़ी संख्या में नेपाली लोग भारत को अपना शुभचिंतक मानते हैं। ये बात माओवादियों को हजम नहीं हो रही । यही कारण है कि अब नेपाली माओवादी बौखला गये हैं और घिनौनी हरकतों पर उतर आये हैं। भारत और नेपाल के बीच वैमनस्यता फैलाने में लगे नेपाली माओवादी ने पिछले दिनों जो घिनौनी करतूत की, उसकी अपेक्षा किसी को नहीं थी। इस कारण बिहार के अररिया और किशनगंज जिले के सीमाई इलाके के सरहदी वाशिंदे सकते में हैं। पिछले दिनों नेपाली माओवादियों ने भारत-नेपाल सीमा पर अवस्थित गांवों में भारत के राष्ट्रीय ध्वज का जमकर अपमान किया। उन्होंने तिरंगे के जूते बनाकर सीमाई चेक पोस्टों पर लटका दिया। कुछ जगहों पर उन्होंने अश्लील और अपमानजक पोस्टर चिपकाये, जिनमें राष्ट्रध्वज का अपमान किया गया है। पोस्टरों में भारत के राष्ट्रीय ध्वज और अशोक स्तंभ के साथ भद्दे मजाक किये गये हैं। कहीं अशोक स्तंभ में जूते टांग दिए गये तो कहीं ध्वज को कुचलते दिखाया गया।
हालांकि भारत सरकार हमेशा नेपाली माओवादियों की घृणित चाल को नजरअंदाज करती रही है। लेकिन माओवादियों की इन घृणित हरकतों ने सीमाई भारतीय वाशिंदों के सब्र को तोड़ दिया। हजारों लोग नेपाली माओवादियों के विरोध में सड़क पर उतर आये। सीमावर्ती क्षेत्रों में लगातार तीन दिनों तक नेपाली माओवादियों के खिलाफ प्रदर्शन होते रहे। आक्रोशित लोगों ने जगह- जगह सीमा पर बैरियर और अवरोध लगाकर आवागमन को अवरुद्ध कर दिया माओवादियों के विरोध में नारे लगाये। कई जगहों पर माओवादी नेता प्रचंड का पुतला भी फूंका गया। जोगबनी (अररिया) में तो लोग उग्र हो गये और नेपाली प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग तक करने लगे।
हालांकि प्रशासन की मध्यस्ता के बाद लोगों का आक्रोश कम जरूर हुआ है, लेकिन सरहदी वाशिंदे के मन में नेपाली माओवादियों के खिलाफ स्थायी घृणा फैल गयी है। इसके कारण नेपाल के सरहदी वाशिंदों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। गौरतलब है कि सीमाई क्षेत्र के हजारों नेपाली का गुजारा भारत से ही होता है। वे भारत में मजदूरी और अन्य रोजगार करने आते हैं। लेकिन तनाव के चलते पिछले कुछ दिनों से वे अपने घरों से नहीं निकल रहे हैं। इसके अलावा सीमाई इलाके के लोग अपने रिश्तेदारों को लेकर भी चिंतित हैं। उल्लेखनीय है कि सरहदी इलाकों के लोगों के बीच सदियों से बेटी-रोटी का संबंध है।
इस बीच भारत के दौरे पर आयी नेपाल की रक्षा मंत्री विद्या भंडारी ने आश्वासन दिया कि उनकी सरकार ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करेगी। लेकिन नेपाल के राजनीतिक हालात को देखकर लगता नहीं है कि नेपाल की सरकार माओवादियों की नापाक हरकतों पर अंकुश लगाने में सक्षम हैं। अगर ऐसा होता, तो राजधानी काठमांडू में भारत के खिलाफ आपत्तिजनक नारे नहीं लगाये जाते। चीन की नीतियों को जिस प्रकार वर्तमान नेपाल सरकार अमलीजामा पहना रही है, उससे लगता है कि वे भी पर्दा के पीछे से भारत विरोध की रणनीति को समर्थन दे रही है। हाल के दिनों में सीमावर्ती नेपाल में कई चीनी स्टडी सेंटरों खोले गये हैं। हालांकि कहने के लिए तो ये अध्ययन केंद्र हैं, लेकिन वास्तव में ये केंद्र भारत के खिलाफ चीन की जासूसी सेंटर का काम कर रहा है। जाहिर है, नेपाल सरकार भी इस बात से अनभिज्ञ नहीं है। इसके अलावा हाल के दिनों में चीन ने नेपाल के साथ कई रणनीतिक समझौते भी किए है। इनमें चीन-नेपाल के बीच सीधा सड़क मार्ग खोलना और नेपाली सैनिकों को चीन से प्रशिक्षण दिलवाना शामिल है। यह अलग बात है कि सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस और एमाले खुले तौर पर इस बात को स्वीकार नहीं करती।
दरअसल, नेपाली माओवादी पार्टी सत्ता से दूर होने के बाद पूरी तरह से विचलित हो गयी है। चूंकि नेपाल के मधेशियों को विश्वास में लिए बगैर कोई भी नेपाली पार्टी सत्ता में नहीं आ सकती, इसलिए माओवादी चाहते हैं कि वह भारत विरोध के नाम पर गैर मधेशियों को गोलबंद कर, बहुमत का वोट-बैंक जुटा लें। इसके अलावा चीन से सैन्य व आर्थिक मदद पाने के लिए वे भारत का विरोध करते हैं। हालांकि अभी तक इसका परिणाम माओवादियों के खिलाफ ही गया है। भारत विरोधी प्रदर्शनों के कारण मधेशी इलाके में माओवादी पार्टियों का रहा-सहा जनाधार भी कमजोर पड़ते जा रहा है। कुछ महीने पहले ही उनके एक धाकड़ मधेशी नेता मात्रिका प्रसाद यादव ने पार्टी छोड़कर नयी पार्टी बना ली। कई अन्य माओवादी नेता मधेशी जनाधिकार फोरम में चले गये हैं। लेकिन इन सबके बावजूद नेपाली माओवादी सबक नहीं ले रहे हैं।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

कहां पाऊं वो वनफूल

जैसे उकन्न (विलुप्त) गये पंझाली, लालसर, सिंगारा, पेरवापांखि जैसे धानों की दर्जनों सनातन प्रजातियां, कुछ-कुछ उसी तरह सनै-सनै लुप्त हो रहे हैं गांवों के गांवपन। गांवों से गुम हो रही हैं देसी लोकोक्तियां, अपनत्व-ममत्व से भरे संबोधन, माटी के बरतन, अनुरागों से सिक्त मन । अब तो गांवों की गलियों में भी सुनाई देते हैं- फिकर नॉट, फिकर नॉट के फिकरे। न जाने कहां-कहां की जुबान गांवों में प्रवेश कर गयी हैं । राह चलते हाल पूछना गांव का सनतान संस्कार है। शायद इसलिए एक दिन राह चलते नोनिया टोले के किशुनदेव से यूं ही पूछ लिया, "कि हो किशुन, गौना ठीक-ठाक से हो गेलअ न ?' किशुनदेव बोला- "किशुन नहीं, किशन कहिए ब्रदर, सब मस्त रहा। हजार टका भाड़ा देकर मारूति लाये थे, सकिंड मैरिज के लिए।' गांव इतने बदल गये हैं कि आंगन के प्रवेश द्वार पर अगर खांस दिए, तो बस्ती के छोकरे महीनों तक आपका मजाक उड़ाते रहेंगे। दातून से दांत साफ करने वालों को अब गांव में पिछड़ा समझा जाने लगा है। जिसे शादी में दहेज की मोटी राशि नहीं मिलती, वो खुद को अभागा मानता है। अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता है। बला यह कि दहेज लेना और देना स्टेटस सिंबल बन गया है। इसलिए लोग पचास हजार लेते हैं, तो दो लाख बताते हैं और दो लाख देते हैं , तो पांच लाख गिनने का प्रचार करते हैं।
नब्बे के दशक के बाद से गांवों में अजीबोगरीब धाराएं बहने लगी हैं । उपभोक्तावाद की मादक-लहरें शहरों की अट्टालिकाओं से टकराकर गांवों की झोपड़ियों तक में लहरा रही हैं। चौके से चौपाल तक बाजारवाद का उत्स फैल गया है। धनोपार्जन के बदले धन-लिप्सा की मानसिकता जन-जन को अपने आगोश में ले रही है। उपभोग और विलासिता सबसे बड़े आदर्श बनने लगे हैं। कर्म तंत्र से मीलों आगे है पहुंच गया है- धन तंत्र। जिसके पास धन नहीं, मानो वह जन नहीं।
वे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते, लेकिन बाजार से मोबाइलों के अद्यतन मॉडल खरीद लाते हैं। बगैर काम किए, सब कुछ हासिल कर लेना चाहते हैं। नरेगा के फर्जीबाड़े में दिल खोल कर हिस्सा लेते हैं। सरकारी योजनाओं की खबर रखते हैं, लेकिन सिर्फ और सिर्फ निजी स्वार्थ के लिए। जो मुंहदुब्बर हो उनकी आवाज दवा दो, उनका हक छिन लो। रुपये लेकर मुखिया, प्रमुख के हर गलत कामों को सही ठहराते दो। इंदिरा आवास के लिए मिले रुपये से जमीन खरीद लो । अगर अधिकारी जांच करने पहुंचे तो उन्हें खस्सी-मुर्गी खिला दो। दो-चार किलो देसी घी उनकी गाड़ी की डिक्की में रख दो।
चुनाव के दरम्यान तो गांवों का नजारा चमत्कृत कर देता है। सभी उम्मीदवारों से पैसे लेते हैं, लेकिन वोट गिराने नहीं जाते। मुंहदुब्बरों के मत का सौदा करते हैं और उन्हें मतदान से वंचित कर देते हैं। मुंहदुब्बरों का साधने के लिए वे तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। कभी हुक्का-पानी बंद कर देते हैं, तो कभी राह चलते पीट देते हैं।
गांवों में सामूहिक प्रेम, सामूहिक दायित्व की भावना दम तोड़ रही है। प्रेम, निश्छलता, करुणा, भलमनसाहत अब गांवों में भी दुर्लभ हो गये हैं। बूढ़े बाप-मां बेटे-बहू के लिए बोझ बनते जा रहे हैं। बेटे को सुबह में पता चलता है कि ओसारे पर सोये बाप ने रात के किसी पहर में अकेले दम तोड़ दिया।
किसी ने कहा था कि अंततः प्रेम इस दुनिया को बर्बाद होने से बचा लेगा और भारत को भारत के गांव बचा लेंगे। बाजारवाद की आंधी में लगातार गुमराह होते समाज से व्यथित लोगों को यह वाक्य एक ढांढस बंधाता है। लेकिन अब तो गांव के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लग गया है। जब बांस ही नहीं रहेगा तो बंशी कहां से बजेगी। गांव नहीं रहेगा, तो भारत का डूबना निश्चित है। जब हम ऐसा कह रहे हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम गांवों के विकास की आलोचना कह रहे हैं। मेरा आशय गांवों की लुप्त होती जिजीविषा, गांवों की परंपरा, गांवों के संस्कार और गांवों की अस्मिता से है। यह सच है कि हमारे यहां गांव और गरीबी को पर्यायवाची मान लिया गया है, लेकिन भारत के गांव महज एक सुदूर गरीब इलाके के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये एक व्यापक जीवन-दर्शन के प्रतिनिधि और वाहक भी हैं। हमारे गांव इंसानी संवेदनाओं, मानवीय करुणा , भाइचारे, सहअस्तित्व, प्रेम और ममत्व का सनातन प्रतिनिधि है। शहरों में यह बहुत पहले खत्म हो चुका है।
बाजारवाद और उपभोक्तावाद का फलसफा है कि यह इंसान को इंसान से अलग कर देता है । यह मनुष्य को मानवीय संवेदनाओं से काटता है। प्रेम और भाइचारे को अप्रासंगिक बना देता है। भंवरे क्या करे ? सौरभ की तलाश में जंगल पहुंचे भंवरे को नहीं मालूम कि जंगल ने वनफूलों से तौबा कर लिया है।
पर यह एपेक्स नहीं है। क्लाइमेक्स अभी बाकी है। बाजारवाद जब क्लाइमेक्स पर पहुंचेगा, तो इंसान के पास कुछ नहीं होगा सिवाय धन के। और धनविहीन इंसान किसी अपराधी से कम नहीं होगा। जिसके पास धन नहीं होगा उसे सांस लेने के लिए हवा नहीं मिलेगी, चलने के लिए रास्ते नहीं दिए जायेंगे, न तो जन्म लेने के लिए कोख मिलेगी और न ही मौत के लिए दो गज जमीन। आंख होंगी पर दृष्टि के लिए अनुमति लेनी होगी। जिसके पास बैलेंस नहीं होगा, वह आंखों का उपयोग नहीं कर सकेगा। इंसान के पास जुबान होगी पर बोलने के लिए हर शब्द की कीमत चुकानी होगी। आकाश, पताल, पहाड़, हवा, पानी, रोशनी, शब्द, भाषा, पहनावा आदि निजी मिल्कियत होगी। इसके उपयोग के लिए भाड़े चुकाने होंगे। कविता और कवि एक तो होंगे नहीं अगर होंगे तो उन्हें शैतान घोषित कर दिया जायेगा।
 
 

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

बाजार में मरीज

बेशक
आदमी की आस और आदमी की जान
बड़ी हैं
गांव और शहर के बीच की दूरी से
वरना
"वह कौन-सी बीमारी है
जो झाड़ने-फूंकने से ठीक नहीं होती''
लेकिन
सात दिन पहले ही हुआ था सतना का गौना
और आठवें दिन
सुबह से ही उसे खून की उल्टी आ रही थी
शायद इसलिए
गांव के सभी "ओझा'' गायब हो गये
शायद उन्हें दया आ गयी थी
सतना पर
या फिर सात दिन के गौने पर
++
बड़े "इस्पीताल'' में किसी बड़े "डागडर'' की तलाश में
बारह घंटे बाद शहर पहुंचा था, बेहोश सतना
और एक नामचीन क्लिनीक के
बाहरी गेट के थोड़ा-सा बाहर
निजी सुरक्षा गार्डों से गुजारिश करता रहा
सतना का लाचार बाप
उसकी लाचार बीवी
मगर
गेट नहीं खुले
(-------)
एक गरीब बाप
एक लाचार बीवी
और एक बेहोश आदमी क्या है
डॉक्टरों की माने तो
वे मरीज नहीं
''किसी सफाईवाले का ठेला है''
(माफ़ करें डॉक्टर साहेब , जिनका यह बयान है )
जो धोखे से दूकान को अस्पतलाल समझ बैठा है
उन्हें नहीं मालूम
कि एटीएम के जवाने में
गुजारिश बेवकूफी है
फटी धोती, झुकी कमर और बटुए की रेजगारी
बाजार की सबसे बड़ी गाली है
++
हाय !
बाजार के बीचो-बीच खड़े उस बेजार बाप को
सीथ की सिंदूर से मुठभेड़ करती उस नवयौवना को
कोई तो बता दे
उस "इस्पीताल'' का पता
जहां "डागडर बाबू'' बैठते हैं

रविवार, 17 जनवरी 2010

सूर्य ग्रहण की दो तस्वीर

कुदरत के अद्भुत कारनामे को निहारती एक जोड़ी
धीरे -धीरे घटता सूरज

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

एक लाख की नौकरी

बेरोजगारी,गरीबी,असमानता जैसे अभिशापों से घिरे देश में "नौकरी' से ज्यादा जन-मोहक शब्द कुछ नहीं हो सकता। और अगर बात झारखंड की हो, तो फिर "नौकरी' एक शब्द भर कहां रह जाता है। यहां यह शब्द राजनीतिक रामबाण बन जाता है। अगर झारखंड पठारों का राज्य है, तो बेरोजगारी , गरीबी और आर्थिक असमानता इन पठारों की डरावनी खाइयां हैं। इन खाइयों की हकीकत बहुत कड़वी है, इसलिए कोई भी सरकार कभी भी इनमें उतरने की कोशिश नहीं करती। अगर वे इन खाइयों के पास खड़े होकर देखते, तो उन्हें साठ साल के तमाम तथाकथित पराक्रम की असलियत भी मालूम हो जाती। यकीनन सभी स्वतांत्रयोत्तर पराक्रम बौने साबित हो जाते। झारखंड के राजनीतिक दल इस सच को बखूबी जानते हैं। इसलिए वे कभी भी इन खाइयों में उतरने की कोशिश नहीं करते। हां , इन खाइयों के दोहन में वे माहिर हैं।
झारखंड के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने विश्वास मत प्राप्त करने के बाद एक लाख लोगों को नौकरी देने का शिगूफा छोड़ दिया है। राज्य विधानसभा में गुरुवार को विश्र्वास प्रस्ताव पर चर्चा के बाद सरकार की ओर से जवाब दे रहे शिबू सोरेन ने कहा कि उनकी सरकार आने वाले समय में एक लाख बेरोजगारों को नौकरी देगी। इसके अलावा उन्होंने ग्रामीण जनता की त्रासदियों की भी खूब चर्चा की। अकाल, भुखमरी, कुपोषण से लेकर पलायन तक पर शिबू अपने निपट देसी अंदाज में बोले, जिसे सुनकर सहानुभूति होती है और साथ-साथ हंसी भी छूट जाती है। शिबू इतने भोले तो नहीं कि इस जन्नत की हकीकत उन्हें नहीं मालूम।
इसमें कोई दो राय नहीं कि शिबू सोरेन ने झारखंड की गरीब जनता की जिन त्रासदियों की बात की, वे सोलह आने सच है। लेकिन क्या शिबू सोरेन के पास इससे निपटने की कोई ठोस योजना है ? अगर शिबू सोरेन के राजनीतिक रोड-मैप और पिछले रिकॉडों पर गौर करें, तो इस सवाल का जवाब बहुत आसानी से मिल जाता है। शिबू सोरेन अब तक तीन बार राज्य की मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके हैं। इससे पहले वे लगभग चार साल तक झारखंड स्वायत्त परिषद के अध्यक्ष के पद को भी सुशोभित कर चुके हैं । लेकिन आज तक उन्होंने राज्य की गरीबी, आर्थिक असमानता, पलायन, विस्थापन, अकाल और बीमारियों की समस्याओं से लड़ने के लिए एक भी कदम नहीं बढ़ाया। वे राज्य की सत्तर प्रतिशत वंचित आबादी को न्याय दिलाने की बात तो करते हैं, लेकिन जब उनसे पूछा जाता है कि इसके लिए उन्होंने क्या नीति बनाई है , तो वे कोई जवाब नहीं दे पाते। सच तो यह है कि शिबू सोरेन की दिलचस्पी गरीबी, असमानता, अन्याय आदि की चर्चा करने तक सीमित है। इन अभिशापों से निजात पाने की उनकी मंशा नहीं है। तमाम अनुभव यही बताते हैं। अगर सहज भाषा में कहें तो शिबू की राजनीति अब धीरे-धीरे लालू प्रसाद की नब्बे दशक की राजनीतिक शैली की ओर बढ़ रही है। गौरतलब है कि पहली बार सत्ता में आने पर लालू यादव ने भी बिहार के एक लाख लोगों को सरकारी नौकरी देने का शिगूफा छोड़ा था, जिसे कभी पूरा नहीं किया गया। लाख की बात तो छोड़िये लालू प्रसाद के शासन में बिहार में नियमित नियुक्तियां भी प्रायः बंद हो गयी थीं।
पता नहीं शिबू सोरेन को राज्य के संसाधन, स्रोत, जरूरत, प्रशासनिक क्षमता-दक्षता, ब्यूरोक्रेटिक-इंडस्ट्रियलिस्ट कॉकस आदि का कितना ज्ञान है (क्योंकि उनकी प्रशासनिक समझ संदेहास्पद है), लेकिन जिनको इसकी सच्चाई मालूम है, वे शिबू सोरेन की घोषणाओं की चर्चा करने पर चौअन्नी मुस्कान बिखेर देते हैं। इसका मतलब साफ है। राज्य की प्रशासनिक दक्षता लगभग खत्म हो चुकी है, क्योंकि यहां काबिल अधिकारियों के टोटे हैं। पूरे आइएएस कैडर में दक्ष और निपुण अधिकारियों की संख्या पांच-छह ही रह गयी है। कार्य-संस्कृति दरीद्र हो चुकी है। भ्रष्टाचार, लापरवाही, दलाली आदि सरकारी तंत्र के अंग-अंग में व्याप्त है। असलियत तो यह है कि मौजूदा प्रशासनिक तंत्र से शिबू सोरेन की सरकार नियमित दैनिक कार्यों का निष्पादन भी नहीं करा सकते। खनन्‌ नीतियों को बदलने, सत्ताई कॉकस, आर्थिक असमानता और गरीबी को दूर करना तो दिवास्वप्न है। एक लाख लोगों को नौकरी देने के लिए शिबू को शायद एक हजार कार्यालयों का कई हजार बार औचक निरीक्षण और निगरानी करना होगा और कई अधिकारियों-कर्मचारियों को निलंबित करना होगा । और यह भी तब संभव हो सकेगा जब वे बचे-खुचे ईमानदार अधिकारियों की सही-सही पहचान कर ले। जाहिर है शिबू सोरेन की न तो इतनी इच्छा शक्ति है और न ही उनके पास इतनी राजनीतिक शक्ति है। वे भाजपा और आजसू की अवसरवादी राजनीति के कारण बेमेल गठबंधन से सत्ता तक पहुंचे हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी उनका इष्ट है, जो उन्हें मिल चुकी है। फिर भी मुगालते में जीना, जनता की नियति है शिबू "सत्ता-सत्ता ' जप रहे हैं और जनता को "नौकरी-नौकरी' सुनाई दे रही है। बस।

रविवार, 3 जनवरी 2010

हाय, हल्लो से बाहर भी है नव वर्ष

समकालीन हिन्दी साहित्य के दिग्गज साहित्यकार राजेंद्र यादव ने कल एक जबर्दस्त बात कही । राजेंद्र यादव ने कहा कि आज साहित्य से भविष्य का सपना गायब हो रहा है। राजेंद्र यादव का यह बयान अपने आप में बहुत बड़ी खबर है। भले ही कुछ लोग इसे साहित्य की खबर माने या फिर कुछ लोग इसे बुद्धिजीवियों की तत्व-विमर्श कह कर टाल दें, लेकिन मेरे विचार से राजेंद्र यादव के कथन को सिर्फ साहित्यक परिधि में नहीं देखना चाहिए। यह महज साहित्यिक दुर्घटना नहीं है कि उससे भविष्य के सपने गायब हो रहे हैं। मेरे खयाल से यह एक भीषण सामाजिक दुर्घटना है, जिसकी परछाई साहित्यक वृत्त तक जा पहुंची है। लेकिन यह अनायास नहीं हुआ है। आज हमारा समाज जिस लीक पर चल रहा है, उसका फलसफा ऐसा ही कुछ होने वाला है। उसे इसी मंजिल पर पहुंचना था।
सच है कि आज समाज के जीवन-दर्शन, जीवन-मूल्य, जीवन-मकसदों में क्रांतिकारी परिवर्तन आ चुका है। समाज स्वकेंद्रित और क्षणजीवि हो चला है। किसी को किसी बात से तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता है , जब तक वह बात उसके हित-अहित से सीधे तौर पर जुड़ न जाती हो। ऐसा तभी हो सकता है, जब इंसान भविष्य के बारे में, चल रहे क्रिया-कलाप, संस्कृति-प्रवृत्ति के दूरगामी प्रभाव के बारे में विचार करना (सपना देखना) छोड़ दे। इसलिए आज जो कोई भी अन्याय, असमानता, स्वकेंद्रित जीवन शैली आदि सामाजिक विघटन के बारे में सोच रहे हैं, इन दुष्प्रवितियों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, वे वंदनीय हैं। क्षणजीवि सभ्यता भले इस सच्चाई से मुंह मोड़ ले, लेकिन आगामी पीढ़ियां इसका हिसाब-किताब जरूर लगायेगी।
बहरहाल, नये वर्ष के उपलक्ष्य में यहां ऐसे ही एक सख्श की कलाकृति लगा रहा हूं, जो सपने देखता है और समकालीन समस्याओं और दुष्प्रवृत्तियों के खिलाफ आवाज उठाने में भी विश्वास रखता है। इनका नाम है- पिनाकी राय। पिनाकी ने इस बार नव वर्ष-2010 के उपलक्ष्य में देश में कम होते वोटिंग परसेंट को अपने कार्ड में उकेरा है। पिनाकी पिछले 15 वर्षों से लगातार राष्ट्रीय एकता के लिए ग्रीटिंग कार्ड बना रहे हैं। आप भी इस पर गौर फरमाएं।