शनिवार, 16 जून 2012

सींग पकड़कर मरखा बनाने की फितरत


दहाये हुए देस का दर्द-82
गांव के बड़े-बुजुर्ग कहते हैं- "अगर सींग पकड़कर बार-बार छेड़ोगे तो धीमड़(शांत और सुस्त) बैल भी मरखा (मारने वाला यानी आक्रामक) हो जायेगा।'' बैलों के संदर्भ में कही जाने वाली यह कहावत इंसान पर भी हू-ब-हू लागू होता है। बिहार के कोशी अंचल का समाज मौलिक तौर पर शांत और अमनपसंद है। इतिहास साक्षी है कि हिंसा-उपद्रव यहां के समाज की फितरत नहीं है। लगातार असहिष्णु होती दुनिया में कोशी अंचल एक अपवाद है, जो विपरीत हालात और तमाम मुश्किलात के बावजूद सहनशीलता में विश्वास रखता है। लेकिन सहने की भी एक सीमा होती है। यह संयोग नहीं है कि पिछले कुछ समय से कोशी अंचल में भी उपद्रव की घटना बढ़ती जा रही है। पिछले एक-दो  साल से पुलिस और आम लोगों के बीच लगातार भिडंत हो रही है। फारबिसगंज में जो कुछ हुआ उसके बारे में अब कुछ कहने की जरूरत नहीं है। इस गोलीकांड के घाव को भरने में मुद्दत लग जायेंगे।
कुछ महीने पहले सहरसा में आम लोग और पुलिस के बीच हुए टकराव के घाव अभी भरे भी नहीं थे कि बीते दिनों सुपौल जिले के चुन्नी गांव में पुलिस और ग्रामीणों के बीच हिंसक भिड़ंत हो गयी। तीन दिन बाद ही सहरसा रेलवे स्टेशन पर यात्रियों और रेलकर्मियों के बीच हिंसक टकराव हो गया। यात्रियों की शिकायत थी कि बुकिंग क्लर्क अतिरिक्त पैसा लेकर यात्रियों को ट्रेन में जगह दिला रहे थे, जिसके कारण आम यात्रियों को भारी परेशानी उठानी पड़ी। हमेशा की तरह उस दिन भी सहरसा से अमृतसर जाने वाली जनसेवा एक्सप्रेस में पांव रखने की जगह नहीं थी। यह ट्रेन हर दिन औसतन चार हजार मजदूरों को ढोकर पंजाब ले जाती है। उस दिन भी स्टेशन पर पांच हजार से ज्यादा मजदूर गाड़ी के इंतजार में खड़े थे। यात्रियों की तुलना में जगह कम पड़ने लगी। रेलकर्मियों को लोगों की इस परेशानी में कमाई का जरिया नजर आया और उसने अपना गोरखधंधा शुरू कर दिया। बवाल मचना था, जमकर मचा। कई कंप्यूटर तोड़ डाले गये। स्टेशन परिसर में खड़ी गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया। लेकिन उन कर्मियों के खिलाफ न तो कोई शिकायत दर्ज हुई और न ही कोई कार्रवाई हुई।
यह सच है कि किसी भी समाज की प्रकृति रातों-रात नहीं बदलती। कोशी के लोग भी रातों-रात नहीं बदले हैं। इलाके की अधिकांश आबादी गरीब और मेहनतकश है। साबिक जमाने से ही वे गरीबी, अशिक्षा, बदहाली से अपनी तरह से लड़ते रहे हैं। बेरोजगारी ने उन्हें पंजाब-हरियाण, दिल्ली, मुंबई, सूरत के रास्ते दिखाये। यह सिलसिला अस्सी के दशक में शुरू हुआ और अब तो इलाके की आर्थिक व्यवस्था पलायन के अर्थशास्त्र पर आश्रित हो चली है।
लेकिन पिछले पांच-दस साल में एक बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि अब सरकार की मशीनरी गांवों तक में प्रवेश कर गयी है। एक जमाना था जब लोग गरीबी के बावजूद स्वतंत्र थे। वे भूखे पेट रहते थे, लेकिन निश्ंिचत होकर सोते थे। गांवों में नेता, बिचौलिया, ठेकेदार, पुलिस, अधिकारियों का आगमन नहीं होता था। लेकिन जब से सरकार ने कल्याण, विकास योजनाओं के नाम पर प्रखंडों-गांवों में रुपये भेजने शुरू किये हंै, इन तत्वों का हस्तक्षेप बढ़ता गया है। लोग मूक दर्शक बने हुए हैं। नेता, अधिकारी, दलाल उनकी नजरों के सामने लाखों रुपये का  वारा-न्यारा कर रहे हैं। आम लोगों को लूट की इस प्रहसन से कुछ हासिल तो नहीं हो रहा है, लेकिन उनकी परेशानी बढ़ रही है। उनके काज-रोजगार, जीवन-यापन में सरकारी मशीनरी अनावाश्यक रूप से हस्तक्षेप कर रही है। टकराव लाजिमी है।
यह जानकर अचरज होता है कि मीडिया-क्रांति के इस युग में भी शासक वर्ग का मनोविज्ञान अठारहवीं सदी जैसा है। सरकार का मतलब सिर्फ शासन करना नहीं होता, बल्कि लोगों के प्रति उसकी जिम्मेदारी भी बनती है। चंद लोगों के लिए लूट का अवसर तैयार करने का नाम विकास नहीं होता है। लूट के आयोजन पर जनता का नाम चस्पा कर देने से वह जन-योजना नहीं हो जाता। अगर शासक वर्ग को लगता है कि सतत उपेक्षा के बावजूद कोई हमेशा शांत बना रहेगा, तो यह उसकी नासमझी है। बगल का नेपाल इसका उदाहरण है। सन्‌ 1990 तक नेपाल की गिनती दुनिया के सबसे शांत देशों होती थी। वहां के राजा को इसका गुमान हो गया था। वक्त ने ऐसी पलटी मारी कि सन्‌ 2000 आते-आते नेपाल दुनिया के सबसे अशांत देशों में शुमार होने लगा और 2006 में राजा को गद्दी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

गुरुवार, 14 जून 2012

सोने के बाद कोई नहीं आया : एक लघु कथा



उस साल बहुत बारिश हुई थी। नदी-खेत एकारनल हो गये थे। कोशी के कछार में बनैया सूअरों का प्रकोप कुछ ज्यादा ही हो गया था। रात में सूअर के झूंड आते और मकई की फसल उजाड़ देते । किसानों को मचान बनाकर रात भर पहरा देना पड़ता था। उस किसान के घर में दो ही समांग थे- बाप और बेटा। शाम से रात 12 बजे तक बेटा खेत पर पहरा देता और उसके बाद अगली सुबह तक बाप। सदा की तरह रात के 12 बजे किसान बेटे का खाना लेकर खेत पहुंचा। उसने पूछा- "कोई सूअर तो नहीं आया था, बेटा ? '' बेटे ने कहा,"बाबू जी, जब तक मैं जगा रहा , चार-पांच आये थे। मैंने सबको दूर खदेड़ दिया। लेकिन सोने के बाद एक भी नहीं आया।'' किसान ने माथा पिट लिया।

शुक्रवार, 1 जून 2012

छूटना


गांव में था
गाड़ी छूट जाती थी
गाड़ी में हूं
गांव छूट गया है
पर  सांसें अब तक फुल रही हैं
गांव हो या गुड़गांव

'छूटहों'  के लिए
दोनों समानार्थक होते हैं

निरर्थकता का एहसास !
जैसे पटरी जमीन पर नहीं
देह पर बिछी  हो
हजारों सफर के बाद
जिन्हें पड़े रहना है
नहीं !
यह बिछुड़न नहीं 
विरह के गीत भी नहीं
छूटना
लुप्त होना है
फोन मां को लगाओ
बात मैने से होगी
बेटा परदेश में
बाड़ी के आम कौए खा रहे
कोंटी की लीची, 'खरुवान'
छूटना !!
अंततः दुखना है
कहा था, पेड़ों ने
जिन्हें शाखाविहीन कर दिया था
ज्येष्ठ की आंधी 

लाल-लाल लस्से निकल आये थे
पेड़ की देह पर
लस्से का सच कौन बताये 

इस तूफानी समय में
सब कुछ लस्सा है

जो छूट गये हैं, जड़ से
लस्से उनकी देह में भी हैं
पेड़ों की तरह बेजुबान
और अव्यक्त


(शब्दार्थ- छूटहा- जो पीछे छूट गये हो। खरुवान- आवारा बच्चों की टोली )

रविवार, 27 मई 2012

एक और पूर्वोत्तर की आहट

कंधार विमान अपहरण कांड और नेपाली-भारतीय माओवादियों के बीच तथाकथित गठजोड़ की खुफिया-रिपोर्टों के बाद रक्षा मंत्रालय ने मई 2001 में 1800 किलोमीटर लंबी भारत-नेपाल सीमा पर सुरक्षा बल तैनात करने का फैसला लिया था। हमेशा की तरह सरकार ने फैसला लेने से पहले स्थानीय लोगों की राय लेने की जरूरत महसूस नहीं की। तब कहा गया था कि सुरक्षा बल नेपाल के जरिये होने वाली हथियार, जाली नोट, उर्वरक, खाद्यान्न आदि की तस्करी और आइएसआइ की आतंकी गतिविधियों पर नजर रखेगा और इस पर रोक लगायेगा। शुरुआत में जोगबनी, बीरपुर, कुनौली, राजनगर, बैरगनिया, गौर, रक्सौल, बाल्मिकीनगर जैसे संवेदनशील चेक पोस्टों पर अर्धसैनिक बल-  स्पेशल सर्विस ब्यूरो (एसएसबी जिसे अब सशस्त्र सीमा बल कहा जाता है) की तैनाती की गयी थी। बीते ग्यारह साल में पश्चिम बंगाल के पानी टंकी से लेकर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ के बीच सैकड़ों चेक पोस्ट और दर्जनों बैरक बनाये गये और जवानों की तादाद बढ़ाकर लगभग 50 हजार कर दी गयी।
पिछले ग्यारह साल में एसएसबी के हजारों जवान खुली सीमा से होने वाली अवैध गतिविधियों पर काबू पाने में कितना सफल हुए हैं, इसकी कोई आधिकारिक रिपोर्ट सरकार आज तक पेश नहीं कर सकी। वैसे सीमाई इलाके के लोगों का कहना है कि "एसएसबी की प्रतिनियुक्ति के एक-दो साल तक सब कुछ बेहतर था। लेकिन अब स्थिति बेहद खराब हो गयी है। तस्करी बेलगाम हो गयी है।' सच तो यह है कि खेती के मौसम में कोई भी पर्यवेक्षक तस्करी का ' खुला खेल फर्रुखावादी ' का नजारा आराम से देख सकता है। दिन की रोशनी में सैकड़ों की तादाद में साइकिलें सब्सिडीयुक्त उर्वरक की बोरियां लेकर सीमा-पार जाती रहती हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि "जवानों को बोरी के हिसाब से रिश्वत पहुंचा दी जाती है।''
जहां तक आतंकी गतिविधियों की बात है, तो पिछले पांच साल में अररिया, मधुबनी, दरभंगा, किशनगंज से लगभग 17 लोग आतंकवादी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार हुए हैं। इसे आश्चर्य ही कजा जायेगा कि किसी भी गिरफ्तारी में एसएसबी की कोई भूमिका नहीं रही। जाली नोटों और मवेशियों, मानव तस्करी की घटनाएं भी बीते सालों में बढ़ती गयी हैं। विभिन्न मौके पर स्थानीय जिला प्रशासन के कई अधिकारियों ने इस पंक्ति के लेखक को अपना दुखड़ा सुनाते कहा कि एसएसबी उन्हें सूचना मुहैया नहीं कराते।
सीमा की निगरानी में एसएसबी भले ही फिसड्डी साबित हो रहा हो, लेकिन बदनामी बटोरने में पीछे नहीं है। सीतामढ़ी का बैरगनिया गोली कांड इसका ताजा उदाहरण है। सीतामढ़ी जिले के बैरगनिया के हजारों लोगों ने पिछले दिनों एसएसबी के कैंप पर हमला बोल दिया। लोगों का कहना था कि जवान उनकी बहू-बेटियों के साथ अक्सर छेड़खानी करते रहते हैं। जवानों के कारण बहू-बेटियों का सड़क पर चलना मुश्किल हो गया है। दरअसल, 25 मई को बैरगनिया बैरके के दो जवानों ने स्कूल से घर लौटती दो छात्राओं के साथ बीच सड़क पर बदतमीजी कर डाली। जब लड़कियों ने विरोध किया, तो वे जोर-जबर्दस्ती पर उतर आये।  इसे देखकर आसपास के लोगों का दबा गुस्सा फूट पड़ा। हजारों लोग बैरक के सामने जमा हो गये और पत्थरबाजी करने लगे। इसके बावजूद जवानों ने स्थानीय प्रशासन को खबर नहीं दी और आक्रोशित लोगों पर गोलियां बरसानी शुरू कर दी। इसमें नीरस पासवान नामक एक दलित युवक की मौत हो गयी और दो महिला समेत तीन अन्य लोग बुरी तरह घायल हो गये। 
 बैरगनिया की घटना कोई अपवाद नहीं है, बल्कि सच तो यह है कि समूचे  सीमाई उत्तर बिहार की स्थिति कमोबेश बैरगनिया जैसी ही है। डेढ़ साल पहले अररिया जिले के कुरसाकाटा में भी बैरगानिया जैसी घटना घटी थी, जिसमें जवानों की गोली से चार ग्रामीणों की मौत हो गयी थी। यहां भी जवानों पर महिलाओं के साथ छेड़खानी करने के आरोप लगे थे। । कुछ समय पहले इस पंक्ति के लेखक ने रिपोर्टिंग के सिलसिले में रक्सौल से जोगबनी तक की यात्रा की थी। अमूमन हर जगह के लोगों ने एसएसबी के जवानों के व्यवहार के प्रति गहरे रंजो-गम का इजहार किया था। सुपौल, अररिया, किशनगंज में पिछले 11 साल में एसएसबी और स्थानीय लोगों के बीच लगभग 20 बार हिंसक टकराव हुआ है।
सीमाई इलाकों के बाशिंदे दबी जुबान से "कमीशनखोरी' की दास्तान भी सुनाते हैं। लोगों का आरोप है कि शादी-विवाह के मौके पर जवान बेवजह बारात-गाड़ियों को रोक देते हैं और भारी रकम वसूल कर ही जाने की इजाजत देते हैं।  सच तो यह है कि जवान चेक पोस्ट और बैरक में कम और सीविलियन एरिया में ज्यादा समय व्यतीत करते हैं।  कभी वे ट्रॉफिक पुलिस की भूमिका में दिखते हैं, तो कभी पंच बनकर लोगों के आपसी मामले में टांग अड़ाते हैं। जिला प्रशासन को ठेंगा पर रखते हैं। उनके कामों में जबर्दस्ती हस्तक्षेप करते हैं। सिविलयन क्षेत्र में गैर-जरूरी आवाजाही करते हैं। संक्षेप में कहें, तो वैरगनिया की घटना एक पूर्व चेतावनी है। संदेह नहीं कि अगर सरकार ने समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं कि तो उत्तर बिहार के सीमाई इलाके में भी हालात पूर्वोत्तर जैसे हो जायेंगे।

बुधवार, 16 मई 2012

'' कोशी की उपेक्षा नहीं ''


दहाये हुए देस का दर्द-81
बिहार के कानून मंत्री नरेंद्र नारायण यादव जमीनी नेता हैं। वे ग्रास रूट की राजनीति से बिहार विधानसभा और कैबिनेट तक पहुंचे हैं। पिछले दिनों अपनी पत्रिका "द पब्लिक एजेंडा'' के लिए उनसे इंटरव्यू करने का मौका मिला।  नरसंहारों  की सुनवाई में हो रही देरी और बथानी टोला मामले में आये फैसले पर उनसे लंबी बातचीत हुई। यह इंटरव्यू "द पब्लिक एजेंडा'' के ताजा अंक में प्रकाशित हुआ है। लेकिन इसी मुलाकात के दौरान मैंने उनसे कोशी के मुद्दे पर भी बातचीत की। उनसे कई जमीनी सवाल पूछे। कोशी मुद्दे पर उनके विचारों और जवाबों को यहां आपके सामने रख रहा हूं। - रंजीत
सवाल- पिछले कुछ सालों से मैं कोशी अंचल की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर लगातार अनुसंधान कर रहा हूं। मैं तथ्यों के साथ कह सकता हूं कि जिस तरह केंद्र सरकार ने बिहार की उपेक्षा की, ठीक वही व्यवहार बिहार की विभिन्न सरकारों ने कोशी के साथ किया, जबकि इस इलाके से कई बड़े राजनेता उभरे। राजेंद्र मिश्र, ललित नारायण मिश्र, जगन्नाथ मिश्र, अनूप लाल यादव, विनायक प्रसाद यादव, भूपेंद्र मंडल, तारिक अनवर, बीएन मंडल, रमेश झा, लहटन चौधरी, शंकर टेकरीवाल, शरद यादव, विजेंद्र यादव जैसे बड़े नेताओं के रहते कोशी की ऐसी उपेक्षा क्यों हुई ?
नरेंद्र ना यादव - नहीं, मुझे नहीं लगता कि कोशी के साथ उपेक्षा हुई है। मेरी सरकार ने कोशी के विकास के लिए हर संभव प्रयास किया है। कुसहा त्रासदी के बाद युद्ध स्तर पर राहत और पुनर्वास के कार्यक्रम चलाये गये। हम लोग आगे भी प्रयासरत हैं। हमने कोशी के लिए केंद्र सरकार से मदद मांगी थी, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद हमारी सरकार ने विश्व बैंक की मदद से इलाके के लिए कई योजना बनायी है। यह कई करोड़ रुपये का पैकेज है। इसके तहत इलाके में लगभग 125 पुल-पुलिये बनाये जायेंगे। कुछ के टेंडर भी हो चुके हैं। गांवों की सड़कें पक्की की जायेंगी। बाढ़ के समय राहत के लिए हर पंचायत में ऊंचा टीला बनाया जायेगा। तटबंधों को मजबूत किया जायेगा। अगले वर्षों में लगभग 400 करोड़ रुपये कोशी इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण पर खर्च किये जायेंगे।
 सवाल- लंबे समय से कोशी की जीवन-रेखा डुमरी पुल क्षतिग्रस्त है, लेकिन अब तक सरकार इसकी मरम्मत नहीं करा सकी। क्या अगर यही समस्या अन्य हिस्से में होती, तो आपकी सरकार का रवैया ऐसा होता ?
नरेंद्र ना यादव-  सन्‌ 2014 तक वहां तीन पुल होंगे। एक पुल बीहपुर और नौगछिया के बीच होगा। डुमरी पुल के बगल में ही बनाये गये आइरन ब्रीज को भी ऐसा मजबूत बना दिया जायेगा कि लंबे समय तक उससे हल्की गाड़ियां पास करेंगी। डुमरी पुल की मरम्मत के लिए भी सरकार ने विशेषज्ञों से राय ली है। विशेषज्ञों ने कहा है कि इसके डिजाइन में हल्का परिवर्तन लाकर ठीक किया जा सकता है। कुछ उसी तरह जैसे हावड़ा ब्रीज है। दो साल के बाद आप देखेंगे कि डुमरी के सामांतर तीन पुल होंगे।
सवाल- ऐसा हो जाये, तो क्या कहना ! क्या ऐसा हो पायेगा ? हमने तो कुसहा हादसा के समय भी ऐसी बातें सुनी थीं, लेकिन हुआ क्या ? जिनके घर दहाये, खेत बंजर हुये, परिजन मरे, उन्हें तो कुछ खास नहीं मिला। लेकिन अधिकारियों, नेताओं,दलालों की चांदी हो गयी। मुआवजा राशि में जमकर लूट-पाट हुआ। छातापुर में एक बीडीओ धराये भी। लेकिन अंततः समय के साथ सब कुछ शांत हो गया। लोगों के दिन नहीं फिरे। वे आज भी पंजाब-दिल्ली के भरोसे ही हैं।
नरेंद्र ना यादव-  इन सब सवालों के जवाब हैं। कार्रवाई हुई है। हम आपको बाद में इसका विस्तृत ब्यौरा उपलब्ध करा देंगे।
सवाल- आप गांव से आते हैं। खेत-खेतिहरों की तकलीफ समझते हैं। आप लोग कोशी के लिए कुछ करते क्यों नहीं ?
नरेंद्र ना यादव- (लंबी खामोशी। सवाल का जवाब नहीं मिला)
सवाल- ऐसा कोई सेक्टर बतायें जहां कोशी अंचल को प्राथमिकता में रखा गया हो। यहां सबसे बाद में विश्वविद्यालय खुले। सबसे बाद में मेडिकल कॉलेज खुला, वह भी निजी। इंजीनियरिंग कॉलेज तक आज तक खुल ही नहीं सका। देश में अब कहीं भी छोटी रेल-लाइन नहीं है, लेकिन कोशी में अब तक मौजूद है। हर इलाके में रेलवे का विद्युतीकरण हो गया है, लेकिन कोशी में अभी तक नहीं हुआ है ? उद्योग-धंधा लगाने की तो चर्चा करना ही बेकार है।
नरेंद्र ना यादव- इन सब सवालों पर बात करने के लिए हमें आराम से बैठना होगा। इस पर बहस होनी चाहिए।
सवाल- क्या ऐसा इलिए तो नहीं हुआ क्योंकि यहां के लोग साधारणतया अमन पसंद और मासूम हैं ?
नरेंद्र ना यादव- (जवाब में चुप्पी)

मंगलवार, 27 मार्च 2012

मन न रंगाये जोगी, रंग लेयो कपड़ा



असल बात तो सरकार ही जाने, लेकिन दरबार आने-जाने वाले विश्वस्त दरबारियों का अनुमान है कि बिहार की सौवीं सालगिरह पर यही कोई 15-16 करोड़ रुपये खर्च किये गये हैं। मास भर पहले भी इसी तरह के एक पंच सितरिया भोज-भात पर 4-5 करोड़ रुपये खर्चे गये थे। उसे बिहार ग्लोबल मीट का नाम दिया गया था। सरकारी "माई-बापों'' का कहना है कि यह सब बिहार की खोयी हुई अस्मिता को फिर से प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है- टू रीगेन द लॉस्ट प्राइडऑफ बिहार ।
वे "माई-बाप' हैं, देश-दुनिया घूमते-विचरते हैं। बड़े लोगों के साथ खाते-पीते, उठते-बैठते हैं, झूठ थोड़े ही बोलेंगे।  बिहारी अस्मिता प्राप्त करके ही दम लेंगे। भूमि-पूत्रों को छोड़कर देश के तमाम स्वनामधन्य लेखक, संगीतज्ञ, मर्मज्ञों को सम्मानित करेंगे। वे तारीफ करेंगे। प्लेन की दोनों पीठ का मासूल लेंगे और लौट जायेंगे। अपनी अस्मिता दौड़ी चली आयेगी। जो थोड़ी बहुत अस्मिता बची रहेगी, उसे लाने के लिए दिल्ली जायेंगे, बंगलुरु, मॉरीशस, त्रिनिदाद जायेंगे। रोजी-रोटी के लिए जन्म-भूमि छोड़ने वालों से मिलेंगे और कहेंगे अगर आप काम करना बंद कर दें, तो इस शहर/देश का भट्टा बैठ जायेगा। बस, अस्मिता दौड़ी चली आयेगी।
मैं मजाक नहीं कर रहा। अजी, सौवें बरस में कोई मजाक क्या करेगा। मैं रंग में भंग भी नहीं करूंगा। जन्म दिन का मौका है, इसलिए उत्सवी होना हम सब का धर्म है। वैसे मैं नहीं मानता कि हमारा बिहार महज सौ साल का ही है। हम तो मगध से हिसाब लगाने के आदि हैं और अंधेरे में भी नालंदा, विक्रमशीला, पाटलिपुत्र, वैशाली, अशोक, चाणक्य, भिखारी ठाकुर, कुंवर सिंह आदि को देख लेते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि मेरे जैसे लोग पटना से गांव को नहीं देख पाते। गांव से पटना देखने की कोशिश करते रहते हैं। क्योंकि ऊपर से नीचे देखने पर चीजें मनभावन ही लगती हैं। गांव नीचे है, पटना ऊपर।
हमारे जैसे लोगों की सबसे खराब आदत यह है कि हम भोजघरा में भी भनसा घर की युक्ति लगाते हैं। हम गीतहार के सम्मान को लेकर हमेशा चौकन्ने रहते हैं। दुल्हा तो दूसरे गांव से आ जायेगा, लेकिन गीतहारि तो गांव की ही होगी। उसके मान-सम्मान की उपेक्षा हमारी माटी में नहीं है। लेकिन सरकारी उत्सव की फितरत ही कुछ और है। राज्य गीत को एक नहीं पांच बार पढ़ गया। दस-बारह बार सुन गया। मन प्रसन्न हुआ,लेकिन कुछ कमी-सी महसूस हुई। ऐसा लगा जैसे परिवार का कोई महत्वपूर्ण सदस्य अनुपस्थित है। ये क्या ? कोशी-मिथिला निपता। न गौरव गान में, न ही प्रार्थना में, कहीं भी शामिल नहीं किया गया। बड़ा आश्चर्य हुआ कि लोग बिना कोशी और बिन मिथिला के भी बिहार की सांस्कृतिक तस्वीर बनाने की कोशिश कर लेते हैं। न रेणु, न राजकल, न नागार्जुन, न विद्यापति,  न दीना, न भदरी, न कारू खिरहर, न मंडन, न अयाची, न सलहेस। न कोशी, न बागमती। न नवाण्य, न सिरूआ।
अब इन्हें कौन बताये कि कोशी-मिथिलांचल बिहार का गहना है। बिहार की छाती अगर मगध है, तो भोजपुर, कोशी, मिथिलांचल, अंग उसके पैर-हाथ, दिल-दिमाग हैं। कोशी की बाढ़ में जो जिजीविषा सदियों से जिंदा है, उसको आप विदर्भ तो नहीं कहेंगे न ? क्योंकि जीवटता और जिंदादिली का ही दूसरा नाम तो बिहार है। जो गरीबी में भी इंसानियत को बचा ले जाये, जो सदियों के सौतेले व्यवहार के बाद भी फूटानी न झाड़े, उसी तासीर को तो लोग बिहार कहते हैं। वरना बिहार और कांगो-सोमालिया में अंतर ही क्या है? सर्वे देखें, अगर बिहार को एक देश मान लिया जाये, तो यह दुनिया का तीसरा सबसे निर्धन 'देश' होगा।
अचरज है! कोशी-मिथिला को सभी ने हाशिये पर रखा। अब यहां की लगभग दो करोड़ आबादी को बेहद चालाकी से कारागार में डाला जा रहा है। एक ऐसे कारागार में जहां, रोशनदान भी न हो। दावा यह कि अस्मिता जरूर आयेगी। हकारने से अस्मिता आती, तो कब के आ गयी होती । ऐसे ही अवसर पर किसी ने कभी कहा होगा, "मन न रंगाये जोगी रंग लेयो कपड़ा।''
 

राज्य गीत


मेरे भारत के कंठहार

तुझको शत-शत वंदन बिहार

तू वाल्मीकि की रामायण

तू वैशाली का लोकतंत्र

तू बोधिसत्व की करूणा है

तू महावीर का शांतिमंत्र

तू नालंदा का ज्ञानदीप

तू हीं अक्षत चंदन बिहार

तू है अशोक की धर्मध्वजा

तू गुरूगोविंद की वाणी है

तू आर्यभट्ट तू शेरशाह

तू कुंवर सिंह बलिदानी है

तू बापू की है कर्मभूमि

धरती का नंदन वन बिहार

तेरी गौरव गाथा अपूर्व

तू विश्व शांति का अग्रदूत

लौटेगा खोया स्वाभिमान

अब जाग चुके तेरे सपूत

अब तू माथे का विजय तिलक

तू आँखों का अंजन बिहार

तुझको शत-शत वंदन बिहार

मेरे भारत के कंठहार

प्रार्थना


मेरी रफ्तार पे सूरज की किरण नाज करे

ऐसी परवाज दे मालिक कि गगन नाज करे

वो नजर दे कि करूँ कद्र हरेक मजहब की

वो मुहब्बत दे मुझे अमनो अमन नाज करे

मेरी खुशबू से महक जाये ये दुनिया मालिक

मुझको वो फूल बना सारा चमन नाज करे

इल्म कुछ ऐसा दे मैं काम सबों के आऊँ

हौसला ऐसा हीं दे गंग जमन नाज करे

आधे रस्ते पे न रूक जाये मुसाफिर के कदम

शौक मंजिल का हो इतना कि थकन नाज करे

दीप से दीप जलायें कि चमक उठे बिहार

ऐसी खूबी दे ऐ मालिक कि वतन नाज करे

जय बिहार जय बिहार जय जय जय जय बिहार

शनिवार, 3 मार्च 2012

अब तक बहती फगुनाहि


हर भैंसवार जानता है कि तीन तरिया जब पश्चिम में डूब रही होती है, तो "पसर'' का वक्त होता है। पसर यानी सूर्योदय से पहले के धुंधलके में भैंस को चराने के लिए मैदान ले जाने की परंपरा। कोशी अंचल में यह परंपरा सदियों पुरानी है। ठंड हो या बरसात, पसर खोलना ही पड़ेगा। पसर नहीं खोलना , अपशकुन ही नहीं अप्रतिष्ठा का संकेत है। सुबह-सुबह भैंस बथान पर बंधे रह जाने का बहुत उदास अर्थ है। ऐसा तब होता है, जब घर से किसी की अर्थी उठी हो। बावजूद इसके फागुन मास में ऐसा हो जाता। बेचारा भैंसवार भी क्या करे? फागुनाहि हवा होती ही है रसिया। आमों के मंजरियों से निकला मधु रस सांसों में कुछ इस कदर समा जाता है कि आठ बजे दिन तक नींद ही नहीं खुलती। पसर के बेर ससर जाता है, बुढ़िया पूरे घर को सिर पर उठा लेती है । "बज्रखसौना (बज्रपात करने वाला) रे, महींस (भैंस) बथान पर खूंटा तोड़ रही है और तू फोंफ काट रहा है ! ई लो... '' समूची बाल्टी पानी छौड़ा के सिर पर छपाक !!
हालांकि फगुनाहि हवा अब भी चलती है, लेकिन अब ऐसे दृश्य नहीं दिखते। जिसे जितना मन करे, अलसा ले। जब तक मन करे सोते रहे, कोई बुढ़िया सिर पर पानी नहीं उड़ेलेगी। कोई भावी कहने नहीं आयेगी कि "जितना मन करे अलसा लो, होली में हुलिया बदल दूंगी।'' एक जमाना था जब गांव की हर नवकनिया, देवर के रिश्ते में आने वाले नवयुवकों को ऐसी धमकी होली के मास भर पहले से देती रहती थी।
दरअसल, समय ने करवट ले लिया है। हर कुछ एक अजीब किस्म के आलस्य की गिरफ्त में है। देह ही नहीं, रिश्तों के बीच भी आलस्य आ गया है। लोग मजाक करने में अलसा जाते हैं। हाल-चाल पूछने में अलसा जाते हैं। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने में अलसा जाते हैं। जीवन का मतलब इंस्टैंट हो गया है। जिस बात में निजी हित न हो, वह घोर आलस्य की बात है। इसलिए भर "फागुन बुढ़वा देवर लागे' जैसे संबोधन लगभग लुप्त हो चले हैं।
बावजूद इसके कोशी की होली का मजा ही कुछ और है। दिन भर जोगी रा सरररर, जोगी रा सरररररर। रंग, कीचड़, गोबर फेंकने की बाजी चलती रहती है। किसी को नहीं बख्शा जाता। अनजान राहगीर भी बंधु बन जाते हैं। शाम से ही भंग का दौर शुरू हो जाता है। ढोल-पिपही-हारमोनियम की आवाज अब भी उसी शिद्यत के साथ उभरती है। होली के वे गीत, जो आज तक डाक्यूमेंटेड नहीं हो सके हैं, सुनाई देते हैं। वही संदेश, वही कशिश। प्रेम, सौंदर्य और उन्मुक्तता की प्रतीक। ये गीत कोशी की जिजीविषा, कोशी की ग्राम्य संस्कृति का बखान करते हैं। इन्हें सुनने के बाद मन हुलस जाता है। ये गीत लगातार रंगहीन होती जा रही इस दुनिया को एक दिन के लिए रंगीन बना जाते हैं। यह भी कुछ कम नहीं है। जोगी रा सररररर।

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

ये नये कपड़फोड़वे

दहाये हुए देस का दर्द-80
"आदमी चाहे कितना भी ताकवर क्यों न हो, लेकिन  कपार (कपाल) पर लाठी नहीं झेल सकता। कपार पर मारोगे तो एक संगदो काज होगा। दुश्मन तो धाराशायी होगा ही, गांव-जवार में तुम कपड़फोड़वा (कपाल फोड़ने वाला) के नाम से प्रसिद्व हो जाओगे।''
पिछले दिनों बिहार के अररिया जिले की कपड़फोड़ा पंचायत में हुई घटना के बाद बचपन में सुने ये सामंती सूत्र-वाक्य एक बार फिर मेरे जेहन में कौंध गये। ब्रिटिश हुकूमत के समय हसेरी (हमला) करने से पहले सामंतवादी शक्तियों के पहलवानों को प्रोत्साहित करने के लिए उनके प्रशिक्षकयह उक्ति जरूर उच्चारते थे। आजादी के बाद बदलाव के हसीन सपने  के बावजूद इन वाक्यों का बोलबाला कायम रहा। जमीन, जाति, सत्ता संरक्षण और लठैतों के बल पर गांव के मालिक कहलाने वाले लोग अपने नौकर-चाकर को बात-बात पर इसी वाक्य के सहारे साधते रहे। अगर उन्हें किसी एक को डराना होता तो कहते, "मारो साले के बीच माथ एक लाठी।'  अगर एक से ज्यादा को धमकाना होता, तो कहते," अगर सोझ नहीं होगे, तो कपड़-फोड़ी करा देंगे तुम्हारे टोल में। ' 
वैसे यह सही है कि अब लाठी-भाले-फरसे  का जमाना नहीं रहा, लेकिन "कपड़फोड़ा' जमात खत्म नहीं हुई है। उनके हथियार और चेहरे जरूर बदल गये हैं, लेकिन सोच यथावत हैं। आज भी गरीबों-वंचितों के ही कपाल फोड़े जाते हैं और वे कपड़फोड़वा के नाम से प्रसिद्ध भी हो रहे हैं। पंचायत हो या पार्लियामेंट, हर जगह अग्रिम पंक्ति की कुर्सियों पर कपड़फोड़वे विराजमान हैं।
खैर मुद्दे पर लौटते हैं। दरअसल, हुआ यह कि "कोई क्या कर लेगा' के मद में मस्त एक एनजीओ और एक डॉक्टर ने पिछले दिनों अररिया जिले के कुर्साकाटा प्रखंड स्थित कपड़फोड़ा पंचायत में धावा बोला। यह इलाका आजादी के छह दशकों के बाद भी विकास की रोशनी की प्रतीक्षा ही कर रहा है। यही कारण है कि इस इलाके की जनसंख्या वृद्धि दर चार से ऊपर है। यहां परिवार नियोजन के नाम पर खूब "खेल' होता है। उस दिन एनजीओ के कारिंदों ने गांव की महिलाओं को मुफ्त बंध्याकरण के लिए बुलाया। चूंकि उन्हें ज्यादा-सा-ज्यादा महिलाओं को जमा करने का आदेश था, इसलिए महज कुछ ही घंटों में गांव के सरकारी स्कूल में सौ महिलाओं को भेड़-बकरी की तरह हांक लाया गया। जितनी मुंडी उतनी ही राशि का फार्मूला काम कर रहा था। महिलाएं उनके लिए एक निर्जीव संख्या से ज्यादा कुछ नहीं थीं। स्कूल के बरामदे में टूटी-फूटी मेजों पर शाम को पांच बजे ऑपरेशन शुरू हुआ और आठ बजते-बजते 61 महिलाओं के गर्भाशय खोलकर बंद कर दिये गये। डॉक्टर शहर लौट गये और सुबह होते-होते दो दर्जन महिलाओं की हालत खराब हो गयी। आश्चर्य की बात यह कि ऑपरेशन-स्थल पर पत्रकार, शिक्षक, गांव के मुखिया समेत बहुत-से लोग मौजूद थे, लेकिन उन्हें इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगा।  जब मुझे सूचना मिली, तो मैं अचंभित हुआ। मैंने  जान-पहचान के डॉक्टरों को फोन लगाया और इस "चमत्कार' के बारे में सवाल किया, तो पता चला कि उक्त डॉक्टर ने "विश्व-रिकॉर्ड' बना डाला है।  मेरे संपादक मंगलेश डबराल जी ने जब मुझे इस घटना पर रिपोर्ट करने का निर्देश दिया, तो मैंने इसके एक-एक तार की पड़ताल शुरू की। पता चला कि इस "विश्व रिकॉर्ड' को  कायम करने वाले डॉक्टर और एनजीओ के कर्ताधर्ता घटना के डेढ़ महीने बाद तक पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। इतना ही नहीं, यह भी मालूम चला कि ऑपरेशन के बाद जो दवा दी गयी वे एक्सपायर्ड थी और एनजीओ ने सरकार द्वारा निर्धारित प्रोत्साहन राशि भी मार ली।
बहरहाल, ऑपरेशन कांड की कई भुक्तभोगी महिलाएं आज भी फारबिसगंज-अररिया-पूर्णिया में स्वास्थ्य के लिए संघर्ष कर रही हैं। लेकिन अखबार के सभी संस्करण बिहार ग्लोबल मीट की तस्वीरों से रंगे रहे। इस दरम्यान अखबारों के लोकल पन्ने भी ग्लोबल बातों से अटे पड़े रहे। यहां तक कि गांव-कस्बे के फोलियो के साथ प्रकाशित होने वाले पन्नों पर भी यह खबर जगह नहीं बना सकी। थोड़ी-सी खबर तब बनी जब स्वास्थ्य मंत्री ने इस प्रकरण पर अपनी जुबान खोली।
देश के अन्य पिछड़े इलाकों की तरह कोशी की भी यह सदियों पुरानी विडंबना है। यहां नेताओं के इशारे के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता। इस इलाके में नेता प्रतिनिधि ही नहीं, जनमत निर्माता (ओपिनियन मेकर) भी होते हैं। एक जमाने में कोशी तटबंध के कारण लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा था। लेकिन नेताओं ने उन्हें समझा दिया कि यह सरकार का आदेश है और सरकारी निर्णय का मतलब ईश्वर का निर्णय। विरोध का विचार भी पाप है, अनैतिक और अवैध है।  ब्रिटिश और मुगलिया हुकूमत केदौर में यह धारणा स्थापित की गयी थी, जिसे स्थानीय नेताओं ने आजादी के बाद भी जिंदा रखा। जगन्नाथ मिश्र से लेकर बीएन  मंडल तक सभी इस धारणा के प्रबल पैरोकार थे। अगर यह सच नहीं होता तो कोशी में नर्मदा से बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया होता। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि जिस कोशी महासेतु की चर्चा सर्वत्र हो रही है, उसका निर्माण भी सैकड़ों लोगों के विस्थापन की कीमत पर हुआ है। लेकिन पुल के विस्थापितों की आवाज भी उसी तरह दबा दी गयी जैसे साठ के दशक में तटबंध के विस्थापितों की आवाज बंद करा दी गयी थी।
किसी जमाने में अररिया के इस गांव में जमीन के लिए भीषण कपड़-फोड़ी हुई थी और लोगों ने इसका नाम कपड़फोड़ा रख दिया था। आज फिर वहां कपड़-फोड़ी हुई है।  इन वर्षों में कोशी में न जाने कितने पानी बह गये, लेकिन गरीबों और वंचितों के कपाल आज भी घायल हैं।  कहते हैं कि कपाल पर तकदीर लिखी होती है! 

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

दो बीघा खेत

 सच है
 कि दो बीघा खेत
 नाम नहीं देता
 पहचान नहीं देता
 मैंसन-सा कोई मकान नहीं देता
 लेकिन, दो बीघा खेत
 प्रोडक्ट नहीं बाजार का
 पहचानी हुई पुरानी आवाज है
 आधा हम सुनते हैं
 आधा वह सुनता है
 एक आदिम हमदर्द है
 पहले हम रोते हैं
 बाद में खेत रोता है
 टूटे हुए टाट के भरोसे को देखो
 दो बीघा खेत
 हमारे होने का एहसास है
 चूते खाट पर तनकर लेटने का साहस है

 जब थे दो बीघे खेत
 पंगत में एक पात अपना भी था
 पांव के नीचे गांव था, प्लेटफार्म नहीं

 जब होता है दो बीघा खेत
 कोढ़िया बैल भी प्यारे लगते हैं
 हवा-बसात, पहचानी लगती है
 सूरज में हमारी भी साझेदारी होती है
 रात में कोई निवेश नहीं होता
 सूर्योदय हमारे द्वार भी आता है

 दो बीघा खेत
 हमें खड़ा करता है
 कड़ा करता है
 कि आंच बढ़ती रहे
 हम चटकेंगे नहीं
 साक्षी है इतिहास
 गांधी और मार्क्स
 दो बीघा खेत के बूते
 हम बचा लेंगे देश
 और देश की घास
 जैसे मेमनों ने बचा रखी है शराफत
 लाजवंती ने लाज
 पंछियों ने आकाश

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

कोशी की करजैनी


दहाये हुए देस का दर्द-79
हर साल एक जनवरी को करजैनी की याद आ जाती है। करजैनी से क्या कुछ नहीं करते थे हम !  करजैनी के लिए क्या नहीं सहते थे हम ! सांप-बिच्छू की परवाह किये बगैर बांस-बेर-अमती-बबूल की सघन झाड़ियों में गिलहरी की तरह एक झटके में घुस जाते थे हम। हाथ-पांव झरबेर, जलेवी, अमती के कांटों से बुरी तरह घायल हो जाता था। कपड़े फट जाते थे, लेकिन करजैनी पाने का जुनून कुछ ऐसा था कि सारा नुछाड़ (कांटों के घाव) ठेंगे पर! सवाल करजैनी बनाने का था। करजैनी के दाने हमारे लिए किसी रत्न से कम नहीं थे। गिल्ली-डंडे, गोली-गोली  से लेकर तमाम खेलों में हम करजैनी को ही दांव पर लगाते। जिसके पास करजैनी होती, उसे किसी बात की चिंता नहीं। करजैनी दो और किसी भी टोली की सदस्यता पा लो। करजैनी है, तो तुम सेठ हो। हर द्वार तुम्हारे लिए हमेशा खुले हुये हैं। करजैनी नहीं तो फिर तो समझो कि दिन वाम हो गये। बच्चों की टोली में तुम्हारी कोई हैसियत नहीं रही। जिसके पास करजैनी है वह मातवर और जिसके पास नहीं, वह दरिद्र। एक जनवरी को  वनभोज के दिन जब हम शाम को तरह-तरह का खेल खेलते, तो जीतने वालों को करजैनी देनी पड़ती थी। जो नहीं दे पाता, उसकी खैर नहीं। उसे विद्यालय जाते-आते समय जबर्दस्त हूटिंग सहना पड़ता था।
 करजैनी कोशी इलाके की एक जंगली और लत्तीनुमा घास थी। जंगली झाड़ियों में यह अपने-आप उग आती थी। बरसात के बाद इसमें फूल लगते थे। नवंबर में फूल फल में बदल जाते और इन्हीं फलों के बीच होता था- करजैनी का मोतीनुमा बीज। इसी बीज के हम बच्चे दीवाने होते थे। ऐसे लगता था जैसे किसी सिद्ध कलाकार हाथ ने पत्थर की रंगीन मोती पर इत्मीनान से नक्काशी उकेर दिया हो।
गहन छानबीन के बावजूद मैं आज तक नहीं जान सका कि वनस्पति विज्ञान में इसे किस नाम से जाना जाता है। मैं यह भी नहीं जानता कि हिंदी में इसे क्या कहते हैं और कोशी के अलावा कहीं और यह घास उगती है या नहीं। कोशी में भी शायद अब इसका अस्तित्व नहीं है। हालांकि अब करजैनी को खोजने का बाल-जुनून नहीं रहा, लेकिन मैं इसकी खोज करता रहा हूं। जहां कोई झाड़ी (हालांकि अब जंगली झाड़ी कहीं नहीं मिलती) नजर आती है, वहां आंख अनायास करजैनी को खोजने लगती है। पूछने में शर्म आती है, लेकिन जब कभी किसी वृद्ध किसान से बात करने का अवसर मिलता है, करजैनी का अता-पता जरूर पूछ लेता हूं। लेकिन अब तक निराशा ही हाथ लगी है। मेरे सवाल से उन्हें हैरानी होती है, गोया मुझे करजैनी की क्या जरूरत ? गांव के बच्चों से भी पूछताछ की है। उनका जवाब होता है- "यह किसी खिलौने का नाम है क्या चचा जी ? गांव के हाट-बाजार में तो नहीं मिलते। शहर में जरूर मिलता होगा। एक मेरे लिए भी लेते आना न अगली बार! '
दरअसल, हाल के कुछ वर्षों से कोशी इलाके की जैव-विविधता तेजी से घटती जा रही है। कोशी द्वारा हिमालय के हजारों वर्ग किलोमीटर से लाकर लगायी गयीं वनस्पतियां अब इलाके से गायब हो चुकी हैं। यही हाल इलाके के जीवों का भी है। चिडिया, मेंढक, जंगली मछली, कीट-पतंगों की दर्जनों प्रजातियां इलाके से गुम हो चुकी हैं। 20-25 साल पहले जब हम पुराने मेड़ों को काटते-छांटते थे, तो बड़ी संख्या में मिट्टी में रहने वाले जीव मसलन, केंचुआ, केकड़ा, उचड़िन आदि देखने को मिलता था। लेकिन अब केकड़ों का दर्शन भी मुश्किल है। चिड़ियों की कई मनमोहक प्रजातियां गायब हो चुकी हैं। एक चिड़ियां होती थी- मछगिद्धी। यह उद-विलाव की तरह पानी में लंबे समय तक डुबकी लगाती थी और मछली पकड़कर फुर्र से उड़ जाती थी। हम बच्चे इसका तब तक पीछा करते जब तक यह हदे-निगाह से ओझल नहीं हो जाती। एक चिड़ियां होती थी- धोविया। इसकी अपनी विशेषता थी। वैसे तो नीली रंग की इस चिड़िया में सारे गुण पंछियों के ही थे, लेकिन इसका आवास और इसकी प्रजनन-प्रक्रिया अनूठी थी। यह मिट्टी के बड़े टीलों में बील बनाकर रहती और उसी में अंडे देती। बचपन में हमारे बीच इस बात की प्रतियोगिता होती कि कौन कितने धोविया- बील को खोज सकता है।  घोबिया बील के खोजकर्ता हमारी नजरों में किसी कोलंबस और बास्को-डि-गामा से कम नहीं होता।
मुझे नहीं मालूम कि कोशी की जैव-विविधता को लेकर किसी सरकार-संस्था  या एजेंसी ने कोई अनुसंधान किया है अथवा नहीं, लेकिन इस बात में मुझे कोई संदेह नहीं कि हाल के वर्षों में इस इलाके की समृद्ध जैव-विविधता अप्रत्याशित  रफ्तार से घटी है। ठीक उसी तरह जैसे हाल के वर्षों में इस इलाके की बांस-मिट्टी-जूट आधारित शिल्प-कला गुम होती चली जा रही है। जिन लोक-थातियों ने यहां हजारों-लाखों सालों में आकार ली, उनमें से अधिकतर महज कुछ दशकों में ही लुप्त हो गये। आलम यह है कि अगर आप आल्हा-उदल या राजा सलहेस की पूरी कहानी जानना चाहे, तो आपको न तो इसके वाचक मिलेंगे और न ही आपको कोई किताब मिलेगी, जो सटीक जानकारी दे सके। एक जनवरी को बचपन के एक मित्र से जब करजैनी की चर्चा की, तो उसने जवाब दिया,"अरे भाई, हम अगर यही बात किसी से पूछेंगे तो वह हमें बताह (पागल) घोषित कर देगा।''

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

मेड़ पर माथा-हाथ (डायरी अंश / 1.12.11)

 पेंटिंग डब्लूडब्लूडब्लू डाट गूगल डाट को डाट इन से साभार
इस तेज रफ्तार दुनिया में पंद्रह साल कोई छोटी अवधि नहीं है। पंद्रह साल में कितना कुछ बदल गया है। पंद्रह साल में धरती ने पंद्रह बार सूरज का  चक्कर लगा लिया  है, ना जाने कितने सितारे खाकसार हो गये हैं खतो-किताबत की संस्कृति खत्म हो चुकी है, न नायी की खुशामद न संवदिया की जरूरत, नता-पता से लेकर न्यौता तक का काम 'मुबाइल' कर देता है। दो महीने की नवकनियां घर-द्वार से लेकर हाट-बाजार तक कर लेती हैं। खेतों में मचान नहीं मोबाइल के टॉवर नजर आते हैं। फुरसत में लोग टीवी देखते हैं, मुरदग नहीं भांजते। मुहर्रम में रेडीमेड ताजिये से काम चला लिये जाते हैं। मुआ कौन जाये बांस काटने, रस्सी बाटने और बत्ती चीरने।
लोक लाज का भय और बड़ों का लिहाज किसे कहते हैं ? बाप-पित्ती के सामने गर्ल-फ्रेंड की बात करने में अब युवकों के चेहरे लाल और आंखें नीचे नहीं होतीं। वे खड़ा होकर पेशाब करते-करते दो-तीन मिस्ड कॉल मार देते हैं।
अजब लीला है कोशी अंचल की, इसकी संस्कृति की। अनोखा मिजाज है यहां के बाशिंदों का। मन इतना चंचल कि नटवरलाल को भी दिन में तीन बार टोपी पहना दे, दिल इतना कोमल कि चांडाल भी पिघल जाये।
बहुत कुछ बदल जाने के बावजूद बहुत कुछ आज भी बासी नहीं हुआ है, कोशी में। वे सब टटका मछली की तरह ताजा और मड़ुवा रोटी की तरह सोन्ह हैं। दुख और सुख के बहुत-से  बिम्ब  अब भी नहीं बदले हैं। आज भी मवेशियों से फसल उजाड़ दिये जाते हैं और किसान माथ पर हाथ धरकर मेड़ पर घंटों बैठा रह जाता है। टुकूर-टुकूर ताकता है। राह गुजरते लोगों को भैंसों के खूर दिखाता है। उसके बाद जी भर के गाली देता है। सहानुभूति का एक शब्द सुनते ही दहाड़ मारकर रोने लगता है। इस रुदन की भी अपनी खासियत है। यह महज आंख का पानी नहीं, यह रूदन-रिपोर्टिंग होती है। रोते-रोते किसान फसल में लगी पूंजी और मेहनत का पूरा आंकड़ा पेश कर देता है।
कॉरियर के लिए जब लोग कबर में पैर रखे बाप को छोड़ कनाडा जाने में जरा-सी देर नहीं लगाते, तो कोशी के गांव में आज भी श्रवणकुमारों का टोटा नहीं है। आज भी एमए, एमएससी, एमटेक पास युवक बुढ़े बाप की सेवा के लिए नौकरी छोड़ गांव में बैठ जाता है। संजीव ने भी यही किया।
पंद्रह साल बाद संजीव से भेंट हुई, तो पहचानना मुश्किल हो गया। पंद्रह साल पहले जिस संजीव को मैंने देखा था, वह एक तेज-तर्रार, महत्वाकांक्षी, खूबसूरत, बड़ी आंख वाला वाक-चातुर्य आधुनिक युवक था। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से एमएससी कर रहा था, संजीव। लेकिन आज का संजीव विशुद्ध किसान है। सीधा और सादा। उसके संदर्भ बदल चुके हैं। वनस्पति विज्ञान की दुनिया में नया क्या हुआ यह बताना तो दूर, संजीव के लिए अब बोटेनी और कारी झांप की घास में कोई फर्क नहीं है।  मानो दोनों बेकार की चीज है, जिसे बकरी भी नहीं सूंघती।
बोटेनी में एमएससी करने के बाद नौकरी के लिए दरभंगा से किसी महानगर चला गया था, संजीव।  उसने बताया कि बुढ़े बाप की सेवा-टहल के लिए उसने अपनी डिग्री भुला दी और नौकरी छोड़कर गांव आ गया। जैसे-जैसे पिता की सेहत  खराब होती गयी गयी, संजीव के लिए गांव छोड़ना कठिन से असंभव होते गया। जब तक पितृ ॠण से उबर सका, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डिग्री पर समय ने धूल की इतनी मोटी परत बिछा दी कि उसका कोई मतलब नहीं रह गया । पिता के गुजरने के बाद ही शहर में रहने वाले संजीव के उच्च अधिकारी भाई गांव आ धमके। संपत्ति बंटवारे को लेकर केस-मुकदमें हुए और संजीव को अपने हाथों से बनाये घर से बेघर होना पड़ा। वह तंबू में रहने के लिए मजबूर हो गया ।
बाबू ने कहा था,"कुछ भी हो जाये घर की बात को कोर्ट नहीं ले जाना। सो संजीव के हिस्से में कुछ नहीं आया। जो लोग पिता भक्ति के लिए उनके नाम की दुहाई देते थे, उन्होंने भी अब संजीव का मजाक बनाना शुरू कर दिया था।''
सहोदर भाई की निर्दयता, बेईमानी, खुदगर्जी की दास्तां ने उसे इतना तोड़ दिया है कि सहसा यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि यह आदमी पंद्रह साल पहले पीजी हॉस्टल का प्रीफेक्ट था। संयमित और रिजर्व। 
वह बोलता गया, मैं सुनता रहा। शाम के चार बजे जब हम होटल के कमरे से बाहर निकले तो पता चला कि इस दरम्यान हमने आठ प्याली चाय पी ली थी। खाना हमने नहीं खाया। पांच बजे हमें बारात के लिए विदा होना था। एक प्रोफेसर साहेब के बेटे की बारात में शामिल होने हम दरभंगा पहुंचे थे, जो हम दोनों के रिश्तेदार हैं।
बारात की गाड़ी पर सवार होने से पहले मैंने पूछा,"संजीव भाई, आप प्रोफेसर साहेब के बेटे की शादी में कैसे ? इनकी और आपके बड़े भाई की कहानी में ज्यादा फर्क नहीं है।''
संजीव चुप हो गया। कुछ देर के बाद उसने कहा," हम तो आ गये, लेकिन तुम कैसे आये ? यह बात सुबह से मैंने कई बार सोची है, लेकिन पूछ न सका ।''
मेरे पास सही जवाब नहीं था। मैंने कहा, ''आग्रह टाल नहीं पाता हूं, शायद इसलिए। हां, यह सच है कि पंद्रह साल पहले इसी प्रोफेसर साहेब के कारण मुझे इस शहर तक से नफरत हो गयी थी।''
रात को शादी में मैंने देखा। सब कुछ पश्चिमी अंदाज में था। प्रोफेसर साहेब के गांव-गिरांव से आये लोग किनारे में कुछ इस तरह खड़े थे, जैसे वे बारात में नहीं, कचहरी में हों। मुझे एक बार फिर प्रोफेसर साहेब से नफरत हुई। एक पोटरी मेरे हृदय में बंद हो गयी ।
अगले दिन जब बस में बैठा तो रास्ते भर संजीव की याद आती रही।  भीषण उत्पीड़न के बावजूद उसके दिल में बड़े भाई के लिए कोई कठोर भाव नहीं था। वह आज भी अपने भाई का शुभचिंतक है। यह सोचकर मुझे संजीव का कद खुद से कई गुना बड़ा लगा। इतना बड़ा दिल उसे अपनी मिट्टी ने दी है। सच में संजीव माटी का असल पुत है।

बुधवार, 16 नवंबर 2011

कवि तुम कब आओगे

बर्फ
सब
पिघल गयी
सांस भी
अब 
दवा हुई
देह ही है देश में
लोग बस  नारा है
भरोसा था जिस शोर पर
चौक पर
शराब हुई
शर्म
से बहुत आस थी
सुबह-सुबह
खतम हुई
कवि !
तुम कब आओगे

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

ना वो नगरी ना वो ठाम (ठांव)



दहाये हुए देस का दर्द-78
बोल बम, दशहरा, कोजगरा, दीवाली, शुकराती, भ्रातिद्वितीया के बाद छठ पूरा हुआ और प्रवास का चौमासा भी। शहर जाती रेलगाड़ियां फिर से ठसाठस है
ट्रेनों के डिब्बे कर्राटे के ट्रेनिंग कैंप में तब्दील होने लगे हैं। अंदर जा पाना जंग जीतने जैसा है। सब की छुट्टी खत्म हो चुकी हैऔर हर कोई सही समय पर दिल्ली, अमृतसर, सूरत,लुधियाणा, गुवाहटी आदि पहुंच जाना चाहते हैं। लोग ज्यादा हैं, डिब्बे कम।  इसके उलट गांवों में डिब्बे ज्यादा हैं,  लोग कम ।
वे प्रवासी चिड़ियों की तरह आये और प्रवास-उपवास-त्यौहार के बाद लौट गये। कुछ ने बकरे की बलि दी, कुछ ने सिहेंश्वर बाबा को जल चढ़ाया और कुछ ने मंदिर में घंटी बांधकर उस पर अपना नाम खुदवा लिया- " ... मैया मनोकामना पूरी करे, तो अगले साल जोड़ा छागर चढ़ावेंगे (काटेंगे)।''
अब अगले चौमासे में ही लौटेंगे ये । जब कभी उनकी जरूरत होगी,  मोबाइल फोन और बैंक के दस नंबरी खाते से काम चला लिया जायेगा। तभी तो उस दिन मुनाई मड़र की पत्नी चहककर रामाधीनमा से कह रही थी-"जमाना बदल गिया है। टाका टेम पर आ जाता है। हां, बैंक का नवका मनिजर जनी-जाति (महिलाओं) सब को तुरंत टाका नहीं देता। हियां-हुआं पचीस जगह अंगुरी के टीप लेता है, बजरखसोना (बज्रपात करने वाला) !''
रामाधीनमा बायें-दायें, आगे-पीछे देखता है, फिर जवाब देता है- "ऐं, तोरा संग तो ऐसा कभियो नहीं हुआ, हे  बनेलवाली भाउजी ? मनिजरवा तोरे खोपा (बाल) पर मेहरबान जे है, हें-हें-हें !''
"धूर्र जिन्नदहा (जिन्न के संग रहने वाला) !!''
बनेलवाली लजा जाती है । कनखी से रामाधीनमा की ओर देखती है और  फुसफुसाती है-"बजरखसुआ राकश, आइये राइत से देहेर (देहरी) पर घुड़दौड़ करने लगेगा !!''
मुझे साल भर पहले पटना के एक दार्शनिक लेखक और अंग्रेजी पत्रकार की कही बातें याद आयीं। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग के बगल की चाय दुकान पर कहा था- "... इट्‌स नेचुरल डिमांड ऑफ बॉडी यार।  डू यू नॉट वांट टू प्लीज्ड योर बॉडी? आइ एम राइटिंग अ बुक ऑवर लेबर माइग्रेशन बट माई थीम इज डिफरेंट। माइग्रेशन वर्सस हाइब्रिडेजाइशन ! यह  शीर्षक कैसा रहेगा ??? ''
मैंने तकरीर की । " दादा, अभी तो माइग्रेशन पर बहस होनी चाहिए। एक पत्रकार के नाते पहले आपको  इस समस्या के असल कारणों के बारे में दुनिया को बताना चाहिए, लेकिन आप तो दीपा मेहता बनने पर उतारू हैं। आठ घंटे खेत में काम करने के बाद जब घर लौटेंगे, पांच-छह बच्चे को संभालेंगे, बुढ़े सास-ससुर की सलगी-नुआ (विछावन और वस्त्र) सुखायेंगे, तो भूल जायेंगे कि बॉडी प्लीजर किसे कहते हैं ...  '' 
दादा गंभीर हो गये । बोले, " प्वाइंट। वैलिड प्वाइंट। गो अहेड... ''
खेतों में धान पकने लगे हैं। दस-पंद्रह दिनों में काटने योग्य हो जायेंगे। लेकिन फसल काटने के लिए लेबर की चिंता से किसान दुबले हो रहे हैं। अब सबकी नजरें, जनी-जन (महिला कामगार) पर हैं। लेकिन कोई जनी खाली नहीं। उन्हें पहले खुद की फसल काटनी है। उगहनी से लेकर दाउनी (ढोन  से लेकर फसल तैयार करने तक) भी महिलाओं को ही करनी पड़ेगी। घर के तमाम जवान पुरुष सदस्य पंजाब-लुधियान जा चुके हैं। चौपाल के मचान पर बैठे यमुना यादव कहते हैं, "अगले साल से हम भी खेती छोड़ देंगे बबुआ। अप्पन इलाका में खेती करना आब ककरो वश के बात नहीं रह गिया है। लाख जतन से रोपाई किये थे। चार बीगहा में गरमा (धान की एक संकर किस्म) है। खूब लगा है ऐहि बेर गरमा, लेकिन चारों टोल घुम आये,  कटनी के लिए एको ठो जन (मजदूर) नहीं मिला।''   
मैंने पूछा, "चचा आपको कटनी के लिए जन नहीं मिल रहा है। उधर मुखिया कहते हैं कि गांव में इस साल मनरेगा में 20 लाख रुपये का काम हुआ है।''

"धुर्र ! के ? जलेसरा मुखिया !  उ बेइमनमा ते बड़का-बड़का नेता के कान काट रहा है। सब फर्जी है। मशीन से काम होता है। जभ कार्ड (जॉब कार्ड) वाले को दस-बीस देकर टीप ले लेता है बही में । उ कि बात करेगा ?  जब से मुखिया हुआ है, खेती करता है उ ?  काहे नहीं पूछे किआप काहे खेती छोड़ दिये? बाप-दादा के अरजल (अर्जित) 40 बीघा  धनहर खेत तो ओकरो पास है !'
मैंने पूछा- "तो फिर गांव का क्या होगा चचा ? ''
"कुछो नहीं। सब पैंजाब-हरियाणा चला जावेगा। जे गाम (गांव) में रहेगा ओ नेता-दलाल बनकर ब्लॉक में घुमेगा। सांझ में बोतल पीकर सोयेगा, सुबह में झक उजर (उजला) कुर्ता पहनकर घुमेगा।  हमर जैसे बढ़ू कुकुर (कुत्ता) भगायेगा। हेंहेंहें !  जनी-जाति सब अभी तो सब सह रही है। एक दिन इहो सब विद्रोह कर देगी। छोड़ा सबके निशा (नशा) में जनी-जाति जभ्भ (हलाल) हो रही है।''
"उसके बाद ?''
"ओकर बाद ?  नै (ना) ओ नगरी नै ओ ठाम ! नै राम नै रहीम। नै छागर नै जल। सब सदावरत ! सदावरत !!  शुकर (शुक्र) है सिंहेश्वर बाबा कें कि ई सब देखे के लेल (लिए) हम लोग जिंदा नहीं रहेंगे। जे जीवेगा से देखेगा। ''

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

हजार साल पुराने गांव में

नवकी नेरू होती, तो पकड़कर बांध देते बथान में
उसे रोकना  नामुमकिन था
कोशिकी माय की तरह
अखबारी भाषा में वह पलायन था
गोबरधनियां की माय की जुबान में
उधार का वैधव्य
"बोंगमरना आठ महीना पैंजाब रहता है
आते ही कहता है -
 तोहर चाल-चलन ठीक नहीं , खोपा में गमकौवा तेल क्यों है !
 कपरजरूआ, गत्तर में जाबी क्यों न बांध जाता है ? ''

गांव हजार साल पुराना था
वैसे बांसुरी की जगह अब मोबाइल था
बिजली नहीं, खुट्टा पर तार तन आया था
हां, हजरबरसा वह गांव
पाखड़ के पेड़ पर लटके निस्पंद घोंसलों की  तरह था
दाना के लिए चिड़िया जिसे छोड़ गयी थी
चारा के लिए अजगर उसे निगल रहा था
 उसे हथियाने के लिए बंदर कतार में खड़ा था

राह-बाट पर लगे सरकारी बोर्ड, सबूत थे
कि गांव अब भी जिंदा था
खेत और मेड़ भी कायम थे
जैसे मुंडेरों पर रहते हैं घुन-खाये कुम्हड़
बाहर पुष्ट अंदर ठूठ
शायद इसलिए
सूरज उगने के साथ
जिन्हें होना था मेड़ पर
और सूरज डूबने के बाद
सोना था मकई के मचान पर
 वे उस दूकान पर थे
जिसे राजकीय भाषा में प्रखंड विकास कार्यालय कहा जाता है
जहां इंदिरा दीवार पर
और आवास दलालों की जेबों में बसते हैं
 जहां मनरेगा चास और मुखिया समार हैं
पंचायती राज हाइ यील्ड बीज की  तरह है
रिश्वत का खाद डालो
कट्ठा में बीस मन काट ले जाओ
2
अपने गांव में
सूरज सिर पर होने का एक मतलब है
मैंने सिटी भी सुनी
बरह-बज्जी रेलगाड़ी जा  चुकी  थी
बावजूद, हलवाहे नदारद थे
बारह बजे दिन में
खेत के सुनसान होने का भी एक मतलब है
इसलिए झलफल  शाम में
मैं गांव के सबसे पुराने पोखर पर था
मेरे पास महार पर
गांव के सबसे बूढ़े किसान की लाश थी
उसके माथे पर 20 लाख का बैंक-कर्ज था
लोटा लेकर मैदान जाता एक दूसरा बूढ़ा
मातमी शाम में भी प्राती गा रहा था
शाम में
प्राती गाने का भी एक मतलब है
क्योंकि वह बूढ़ा पागल नहीं था
उसकी मालिस से मरे मेमने भी मिमियाने लगते थे
जिस दिन वह कदवा करता
मेघ भी उसी दिन बरसता
उस बूढ़े ने कहा-
" एक फोन पंजाब-दिल्ली- सूरत से आवेगा
एक फोन कलेक्टर को जावेगा
फिर मुखिया का मुबाइल बजेगा
दारोगा रास्ते से लौट जायेगा ''
3
जो कोशी से लड़ते हुए जवान हुआ
अकाल में भी आठ बेटे का बाप बना रहा
वह फंसरी पर कैसे चढ़ा ?
हजार साल पुराने गांव में
इस सवाल का अब कोई मतलब नहीं है

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

विकास की वेदीः खेती की कुर्बानी

 कृषि प्रधान भारत में  खेत, खेती और खेतिहर अब सबसे उपेक्षित उपक्रम बन गया है। संक्षेप में कहें तो हमारी खेती संकटों के मकड़जाल में फंस चुकी है। सरकार की प्राथमिकताओं से तो खेत, खेतिहर अब गायब हो ही चुके हैं, लेकिन चौथे खंबे का भी इस ओर ध्यान नहीं है। यह बात अलग है कि खाद्यान्न असुरक्षा से बड़ी असुरक्षा कुछ नहीं हो सकती। राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका द पब्लि एजेंडा ने अपने नवीनतम अंक में खेत,खेती और खेतिहरों के वर्तमान और भविष्य पर आवरण कथा की है। ऊपर की तस्वीर पर क्लिक कर  मुख्य रिपोर्ट पढ़ी जा सकती है।- रंजीत

रविवार, 25 सितंबर 2011

जहर से प्यार


  विषधर कब नहीं थे
  विषधर आज भी हैं
  अंदर-बाहर हर जगह
  वे घर में है देवता की तरह
  बाहर विजेता की तरह
  विषधरों से हमारी आदिम संगति है
  विषधरों से डरना, हमारी नियति है
  हमें सिखाया गया है सांप के बारे में 
  सांप के जहर के बारे में
  जहर, जहर है-  मारता है
  जहर, आग है-  जलाता है
  लेकिन सांप हर रात सपने में आ जाता है
  काटता है
  दंश के चिह्न बनते हैं
  ज्यों-ज्यों जहर चढ़ता है
  चिह्न सुन्न पड़ते जाते हैं
  सांप हंसता है
  भाषण और प्रवचन देता है
  रोजाना ट्विट करता है
  बताता है
  जहर अगर बाहर हो, तो जहर है
  अंदर आते  ही, अमृत होता है

  तुम क्या जानो जहर की बात
  जब जबड़े में जन्मेगा जहर का गाछ
  तुम्हें भी हो जायेगा, जहर से प्यार

रविवार, 11 सितंबर 2011

पुल के पार

 
" सोहन जादव के ममहर (मां का गांव) भी ओही पार में था। बचहन (बचपन) में सोहना एक बेर गिया था अपन ममहर, जब ओकर नानी का नह-केस (श्राद्ध कर्म) था। लोग कहते हैं जिस साल सोहना की नानी मरी थी वोही साल कोशिकी मैया खिसक गयी थी। सब रास्ता-बाट बंद हो गिया और फेर केयो नै जान सका कि सोहना के मामा लोग कहां पड़ा गिये। हमर कका (पिता जी) कहते थे कि जब कोशिकी नहीं आयी थी, तो ई गांव के चैर आना (25 प्रतिशत) कथा-कुटमैत उधरे था, दैरभंगा (दरभंगा)जिला में। बान्ह टाढ़ होने के बाद तो पछवरिया मुलुक (पश्चिमी इलाका) से हम लोगों के आना जाना समझिये साफे बंद था। नेपाल होके आवत-जावत तो मातवरे लोग कर सकते हैं। आब पुल बइन जायेगा, तो फेर सें टुटलका नता-रिश्ता पुनैक जायेगा।''
 लगभग 70-72 साल के वृद्ध दुखमोचन मंडल जब यह सब कह रहे  थे, तो उनके चेहरे पर बच्चों जैसा उत्साह था और आंख में अजीब तरह की चमक थी। ऐसी चमक अब आम किसानों की आंखों से गायब हो गयी है। पहले दुखमोचन को विश्वास नहीं होता है, लेकिन अब उसे यकीन हो चला है कि कोसी पर महासेतु बनाया जा सकता है। हाल तक उसकी धारणा थी कि कोशी के दोनों किनारे  को जोड़ा नहीं जा सकता।
सुपौल जिले के सरायगढ़ स्टेशन से उतरने के बाद पश्चिम की ओर अगर निगाह डालें तो शायद आपको भी विश्वास होने लगेगा कि यहां कोई ऐतिहासिक निर्माण कार्य चल रहा है। कोशी के पूर्वी बांध पर पहुंचने के बाद महासेतु के महापाये साफ-साफ दिखने लगते हैं। अधिकारियों का कहना है कि जनवरी तक इससे आवाजाही शुरू हो जायेगी। इसके साथ ही केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी पश्चिम-पूर्वी कोरिडोर सड़क योजना का मिसिंग लिंक भी रीस्टोर हो जायेगा। द्वारका से गुवाहटी, दिल्ली से सिलीगुड़ी तक सीधी बस या ट्रेन सेवा हो सकेगी, बिना किसी घुमाव या मेकशिफ्ट के। सुपौल, अररिया, मधेपुरा, पूर्णिया, दरभंगा, मधुबनी में ऐसी बातें खूब सुनने को मिल रही हैं। नेता-अधिकारी  से लेकर हलवाहे-चरवाहे तक इन दिनों महासेतु का ही गुण गा रहा है। मन कहता है कि मैं भी उनकी हां-में-हां मिला दूं, लेकिन दिमाग रोक लेता है। कोशी के सीने पर अंगद के पांव की तरह जमाये गये लोहे-कांक्रिट के विशालकाय पाये भी मुझे भरोसा नहीं दिलाते। अभियंताओं का दावा है कि यह पुल कोशी के 15 लाख क्यूसेक पानी को बर्दाश्त कर सकता है। चूंकि पिछले 20-30 सालों में कोशी में इतना पानी कभी नहीं आया, इसलिए मान लेता हूं कि इस पुल को पानी से कोई समस्या नहीं होगी। कोशी लाख यत्न कर ले, पुल उसका दामन नहीं छोड़ेगा और टिके रहेगा। लेकिन जब मेरे जेहन में सवाल उठता है कि अगर कोशी ने ही पुल को छोड़ दिया, तो ? इस सवाल का जवाब अभियंताओं के पास नहीं है। हालांकि वे सुस्त स्वर में कहते हैं कि ऐसा नहीं होगा। लेकिन जिसने कुसहा के कटाव को देखा है, जिसने कोशी की तलहटी को मापा है, वे कहते हैं- "कोशी तो अब धारा बदल के रहेगी।'' वैसे हालत में पुल तो खड़े रहेंगे, लेकिन उसकी प्रासंगिकता नहीं बचेगी।मैंने पता लगाने की कोशिश की क्या कोशी महासेतु की पीपीआर या डीपीआर को तैयार करते समय महान अभियंताओं ने इस पहलू पर विचार किया था। जवाब नहीं मिला। दरअसल, पुल की डीटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने के दौरान इस पहलू को साफ तौर पर नजरअंदाज कर दिया गया कि नदी धारा बदल सकती है। गौरतलब है कि जब कोशी महापरियोजना को स्वीकृति मिली थी, तब किसी इंजीनियर या सलाहकार ने सरकार के सामने यह सवाल नहीं उठाया। अब जबकि पुल पर 400 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, तो भला कौन ऐसा अटपटा सवाल पूछेगा। वह भी तब जब इलाके का बच्चा भी पुल गान में मस्त है। पुल के साथ पूर्णिया से दरभंगा तक चार लेन सड़क और रेलवे ट्रैक के निर्माण में जो राशि खर्च हुई है या होने वाली है उन्हें अगर जोड़ लें तो बजट हजार करोड़ तक पहुंच जायेगा।
अच्छा तो यह होता कि योजना की डीपीआर में कोशी के धारा परिवर्तन पर भी विचार कर लिया जाता। यह काम नहीं हो सका। ऐसे में अब इस परियोजना की सार्थकता कोशी के रहमो-करम पर निर्भर करेगी। आइये हम सब मिलकर कोशी मइया से प्रार्थना  करें कि वह मान जाये। नैहर जाने की जिद छोड़ दे। साठ वर्षों से दो हिस्से में विभाजित मिथिलांचल को फिर से एक कर  दे ।   
(प्रिय पाठकगण, इस रिपोतार्ज का  मैथिली अनुवाद आप प्रसिद्ध ई-पत्रिका "इसमाद''  पर भी पढ़ सकते हैं, जिसे "इसमाद'' की संपादक कुमुद सिंह जी ने मेरी सहमति से मैथिली में प्रकाशित  किया है। इसके लिए मैं उनका कृतज्ञ हूं। )
रंजीत

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

ईमानदार एकांत

एकांत
ईमानदार एकांत
मिलता तो
एक कविता होती
पढ़ने की कोई किताब होती

एकांत !
एकांत की भीड़ में
आदमी से उमस नहीं लगती
एकांत की बहस में
बुद्धि पर बोध हावी नहीं होता
हम आदमी होते
आग्रह का उल्लू नहीं
हमें सीधी रेखा भी सुंदर लगती

एकांत अगर ऊपर होता
दूध का दूध और पानी का पानी होता
एकांत अगर नीचे होता
गांवों में आज भी किस्सा होता
जंगल अभी तक जिंदा होता

++
एकांत
अब लगभग दुर्लभ है
वह न घर में है न बाहर में
न दीन में न दुनिया में
न प्रेम में न आक्रोश में है

जहां हो सकता था एक विरॉट एकांत
वहां अब एजेंडा है
शायद इसलिए, एकांत को तलाशता आदमी
आज अकेला है

शनिवार, 16 जुलाई 2011

इस ओम में बहुत प्रकाश है

                             ग्रामीण प्रतिभा 
          आइआइटी प्रतियोगियों के साथ कक्षा में ओम प्रकाश

आइंस्टीन ने सापेक्षवाद का सिद्धांत बहुत बाद में प्रतिपादित किया, बिहारी गणितज्ञ नागार्जुन ने इसका उल्लेख  लगभग 22 सौ साल पहले किया था। यह बात और है कि आज दुनिया आइंस्टीन को सापेक्षवाद सिद्धांत का प्रतिपादक मानती हैं। वैसे बिहारी मिट्टी के महान गणितज्ञ आर्यभट्ट की उपलब्धि पर किसी को संदेह नहीं। आर्यभट्ट ने बिना किसी उन्नत उपकरण के पृथ्वी का व्यास पता कर लिया था। वह भी बिल्कुल सटीक। दरअसल, बिहार की जमीन गणित की विशिष्ट प्रतिभा के लिए हमेशा उर्वरा रही है। आज भी बिहार के गांव में पढ़ाई का दूसरा नाम है- गणित की दक्षता। गणित में बढ़िया छात्र को पूरा गांव नाम से जानता है। यह सिलसिला प्राचीन काल से लेकर अब तक अनवरत जारी है।
इसका हालिया उदाहरण है औरंगाबाद जिले का 11 वर्षीय छात्र ओम प्रकाश। ओमप्रकाश अभी पांचवीं कक्षा का छात्र है और देश की सबसे बड़ी दिमागी प्रतियोगिता- आइआइटी के स्तर के सवालों को बखूबी हल कर ले रहा है। विलक्षण प्रतिभा के स्वामी ओम प्रकाश इन दिनों पटना के कुम्हरार में रह कर आइआइटी की तैयारी कर रहा है। शिक्षक उसकी प्रतिभा के कायल हैं। स्थानीय बाजार समिति स्थित परमार क्लासेज के टारगेट बैच के इस छात्र को अपनी उम्र से कहीं अधिक उम्र के बच्चों के साथ पढ़ाई करता देख प्रेक्षक को हैरानी होती है। लेकिन जब ओम ब्लैकबोर्ड पर पूरे आत्मविश्वास के साथ गणित-भौतिक विज्ञान के कठिन सवालों को सुलझाने लगता है, तो लोगों को विश्वास हो जाता है कि यह छात्र भूलवश कक्षा में नहीं आया है।
सबसे बड़ी बात यह कि ओम प्रकाश किसी कान्वेंट स्कूल से नहीं आता है। उसने गांव के सरकारी स्कूल से ककहरा सीखा। साधारण कृषक परिवार का यह लड़का असाधारण प्रतिभा के कारण तुरंत ही चर्चा में आ गया।  औरंगाबाद के कुटुम्बा प्रखंड के चिल्हकी गांव के निवासी ओमप्रकाश के पिता जगदीश पाल भेड़ पालते हैं। मां भेड़ के बाल से धागे तैयार करती हैं। वह अपने चचेरे भाई अजीत और रंजीत के साथ आइआइटी एट्रेंस की तैयारी करने पटना आया है। 

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

फूस के घर : बनने और बहने की अकथ कहानी

दहाये हुए देस का दर्द- 77 
पानी में फंसा सुपौल जिला का परहावा गांवः  कोशी तटबंधों के बीच फूस के ही घर होते हैं। हर साल बनते हैं, हर साल बहते हैं। पानी के प्रवेश के साथ लोगों ने गांव खाली कर दिया है। घरें तन्हा खड़ें हैं। बरसात के बाद लोग लौंटेंगे।  तब तक छतें नदी में विलीन हो जायेंगी। कुछ खूंटे खड़े रहेंगे। लौटे हुए लोग इन खूंटों से लिपटकर पहले रोयेंगे फिर गुफ्तगू करेंगे। धीरे-धीरे उन खूंटों पर फिर से नयी छत बिछ जायेगी। हां,यह बाततटबंधों के बीच ही रहेगी। पचास साल से यही होता रहा है।