मंगलवार, 30 मार्च 2010

सब्सिडी से जुड़ा एक सवाल

बात बहुत पुरानी नहीं है। सत्तर-अस्सी के दशक में देश की सरकारी तेल कंपनियां सरकार को औसतन 15 से 20 हजार करोड़ रुपये का सालाना लाभ देती थीं। आज सरकार इन कंपनियों को हर वर्ष 50-60 हजार करोड़ रुपये चुकाती है और हर साल इसका आकार बढ़ रहा है। जी हां, मैं पेट्रोलियम सब्सिडी की बात कर रहा हूं। हमारी सरकार पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस पर आज भी भारी सब्सिडी दे रही है। एक सर्वेक्षण रिपोर्ट है कि आज लगभग 60 प्रतिशत घरेलू गैस उपभोक्ता आर्थिक तौर पर इतने समृद्ध हैं कि उन्हें सब्सिडीयुक्त रसोई-गैस की आवश्यकता नहीं है। यह उपभोक्ता-वर्ग चाहता है कि उन्हें समय पर सिलिंडर की आपूर्ति की गारंटी मिले, तो वे हंसी-खुशी सिलिंडर की पूरी कीमत (जो आज की तारीख में लगभग 600 रुपये प्रति सिलिंडर पड़ेगा) चुका देगा। आधिकारिक जांच-पड़ताल में भले ही इस सर्वेक्षण के आंकड़े थोड़े आगे-पीछे खिसक जायें, लेकिन यह सच्चाई से परे नहीं है। और इस पर सहज विश्वास किया जा सकता है। वह इसलिए कि आज भी देश की 95 प्रतिशत आबादी तक रसोई-गैस के कनेक्शन नहीं पहुंचे हैं। और मुझे लगता है कि आम ग्रामीणों तक यह सुविधा कभी पहुंचेगी भी नहीं। यह संभावना भी प्रबल है कि हमारी आने वाली पीढ़ियां जब गैस और सिलिंडर का इतिहास पढ़ेंगी तो वे यह भी पढ़ेंगी कि जब भारत में लोकतंत्र का बागीचा पूरे शबाब पर था तो यहां भी रसोई-गैसों का आगमन हुआ। लेकिन यह सुविधा आयी, लोकप्रिय हुई और खत्म भी हो गयी, लेकिन देश की बहुसंख्यक ग्रामीण आबादी इससे सदा वंचित ही रही। कहने की जरूरत नहीं कि पेट्रालियम गैस की कहानी 2040-50 तक खत्म होनी है। इस कहानी को खत्म होने से कोई नहीं रोक सकता। जो भी हो, भारत का अब तक का इतिहास तो भेदभाव की दास्तानों से पिरिपूर्ण रहा है। अगर इसमें गैस भेदभाव का यह रोमांचक सच भी जुड़ जायेगा, तो कौन-सा आसमान टूटेगा।

यहां सवाल उठता है कि विशुद्ध अर्थशास्त्र के आधार पर सरकार चलाने का दावा करने वाले यूपीए के विद्वान नेताओं को यह बात मगज में क्यों नहीं घूसती। सरकार इन 60 प्रतिशत उपभोक्ताओं को सब्सिडी से वंचित क्यों नहीं करती? अगर ऐसा कर दिया जाये तो सरकार को भारी सब्सिडी के बोझ से भी मुक्ति मिलेगी और सब्सिडी का लाभ उन्हें मिलेगा जो वास्तव में इसके हकदार हैं और आर्थिक रूप से पीछे छूटते चले जा रहे हैं? अब जबकि राज्य की सरकारें सिलिंडर की सब्सिडी को खत्म कर रही है, तो निम्न मध्यमवर्ग की एक बड़ी आबादी का हलक सूख रहा है। यह वो आबादी है जो महंगाई की मार से पूरी तरह टूट चुकी है और जो अपने तमाम कष्टों को आइपीएल मैचों में भूला देने को ही समझदारी मानती है।

बुधवार, 17 मार्च 2010

विनाश काले विपरीत बुद्धि

(कब उठेगा यह लाल पर्दा ? स्थान- प्रतापगंज, जिला- सुपौल )

दहाये हुए देस का दर्द -62

19 महीने में धरती सूर्य का डेढ़ बार चक्कर लगा लेती है। इतनी अवधि में ब्रह्मांड में बहुत-से तारे, ग्रह और नक्षत्र एक छोर से दूसरे छोर पर पहुंच जाते हैं। बड़े-बड़े युद्ध अपने अंजाम को प्राप्त हो जाते हैं। 19 महीने में एक भारतीय नागरिक पांव-पैदल देश की चौहदी माप सकता है। लेकिन 19 महीने में सात किलोमीटर की क्षतिग्रस्त रेलवे पटरी को दुरुस्त नहीं किया जा सकता ! यह दुनिया के शीर्ष रेलवे नेटवर्क में शुमार किए जाने वाले भारतीय रेल की असलियत है।

आपको याद होगा कि 18 अगस्त 2008 को जब कोशी ने पूर्वी बिहार में तांडव नृत्य किया था, तो उसने जहां-तहां रेल पटरियों को तोड़-मरोड़ दिया था। तब उसका कहर बिहार के सुपौल, सहरसा, अररिया और मधेपुरा जिले की लाइफ लाइन कही जाने वाली सहरसा-फारबिसगंज रेल लाइन भी पर जमकर बरपा था। बाढ़ की चपेट में आकर जहां-तहां रेल-सड़क और बिजली के खंभे ध्वस्त हो गये थे। हालांकि पानी हटने के बाद पता चला कि सौभाग्य से बाढ़ में रेल-पटरी और स्टेशनों को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है और कुल मिलाकर छह-सात किलोमीटर की पटरी ही बुरी तरह प्रभावित हुई है। पानी के बावजूद प्रतापगंज, छातापुर और ललितग्राम स्टेशन तब सुरक्षित बच गये थे। हां, इस प्रलयंकारी बाढ़ में सात-आठ छोटे पुल जरूर पूरी तरह ध्वस्त हो गये थे। पानी हटने के बाद तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद ने इलाके के लोगों को आश्वस्त किया था कि जल्द ही इस लाइन की रेल सेवा को दोबारा बहाल कर दिया जायेगा। लेकिन महीना-दर-महीना बीतता रहा, पर सहरसा-फारबिसगंज रेल सेवा चालू नहीं हुई। इसे लेकर कई बार स्थानीय लोगों ने आंदोलन तक किया, लेकिन रेल महकमा कान में रूई और तेल लेकर सोता रहा। रेल के किसी भी आला अधिकारी ने क्षतिग्रस्त पटरियों और पुलों के पुनर्निमाण में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। परिणामस्वरूप मरम्मत का काम बीरबल की खिचड़ी की कहावत को चरितार्थ करती रही।इस बीच कुसहा में कोशी के टूटे तटबंध को बांध भी दिया गया। इसके बाद तो रेल अधिकारी के पास यह बहाना भी नहीं बचा कि पानी के कारण मरम्मत के काम में बाधा उपस्थित हो रही है। आज भी रेलवे के कोई अधिकारी यह बताने की स्थिति में नहीं है कि इस लाइन पर दोबारा कब रेल के इंजन और डिब्बे का दर्शन हो सकेगा।

यहां एक साथ कई सवाल उठते हैं। सबसे पहला सवाल यह कि क्या अगर सहरसा-फारबिसगंज रेल लाइन महाराष्ट्र, पंजाब, बंगाल, गुजरात, दिल्ली या दक्षिण के राज्यों में होती, तो रेलवे का ऐसा ही सलूक होता ? उत्तर बिहार में अगर बाढ़ के कारण रेल लाइन क्षतिग्रस्त होती है तो तटीय राज्यों में समुद्री तूफानों के कारण आये दिन रेल,सड़क, बिजली आदि की लाइनें क्षतिग्रस्त होती रहतीं हैं। तब भारतीय रेल पूरी तत्परता से आगे आता है और क्षतिग्रस्त पटरी को दुरुस्त भी कर लेता है। लेकिन पूर्वोत्तर बिहार के साथ उसने इतना भद्दा मजाक क्यों किया है ? इसलिए कि इस इलाका का उल्लेख पूंजीपतियों की डायरी में नहीं है और यहां के लोग बात-बात पर हथियार नहीं उठाते हैं ? भले ही रेल मंत्री या शीर्ष रेल अधिकारी ऐसे सवालों का जवाब देना जरूरी नहीं समझे, लेकिन हकीकत यही है। हकीकत यह है कि दिल्ली में बैठे देश के नीति-नियंता अब बाजार, हिंसा और वोट बैंक को छोड़ दूसरी कोई भी भाषा नहीं समझते। इसे बिडंबना नहीं तो क्या कहा जाये। वैसे भी अपने यहां एक प्राचीन कहावत काफी प्रचलित है- विनाश काले विपरीत बुद्धि !

रविवार, 14 मार्च 2010

शोर मचाओ, शोर मचाओ

शोर मचाओ, शोर मचाओ

जोर-जोर से सब चिल्लाओ

गला फाड़ो, माइक उठाओ

लेख-आलेख- कविता लिखो

बहस-मुबाहिसे जारी रखो

बहनें खुश हैं !

माएं खुश हैं !

दादी-नानी-मौसी खुश हैं !

नर्सरी की नैंसी खुश है !

काठ की कठपुतली खुश है !

कूड़ा चुनती कुसिया खुश हैं !

दिल्ली से हम देख रहे हैं

अस्मत खोयी बेवा खुश है

"दुमकावाली'' मुर्दा खुश है

लकड़ी चुनती बुढ़िया खुश हैं !

भूखनगर की भूतिया खुश हैं !

तैंतीस प्रतिशत

जिंदावाद

तैंतीस प्रतिशत

मुर्दावाद

प्रतिशत में प्रतिशत

जिंदावाद

भूख लगी है ?

शोर मचाओ ...

बिन दाना के मां मरी है ??

मुखर्ता है शोक मनाना

शोर मचाओ, शोर मचाओ ...

शंख बाजे

काल भागे

घंट बाजे

पिशाच भागे

शोर बाजे

भूख भागे

शोर बाजे

महगी भागे

इसलिए

शोर मचाओ, शोर मचाओ

जोर-जोर से शोर मचाओ

 

 

गुरुवार, 4 मार्च 2010

जल नीति के मसौदे पर सुझाव आमंत्रित

बिहार जल संपदा से परिपूर्ण राज्य है किंतु फिर भी यहां जल उपलब्धता कम रहती है। भौगोलिक परिस्थितियों एवं अन्य कारणों से जल के विभिन्न उपयोगों जैसे सिंचाई, पीने और घरेलू उपयोग, औद्योगिक, तापीय और जल विद्युत आदि के लिये बढ़ती हुई मांगों को पूरा करने के लिये जल का समुचित प्रबंधन आवश्यक हो गया है। भौगोलिक स्थिति और वर्षा के असमान वितरण के कारण बिहार का उत्तरी भाग बाढ़ की चपेट में रहता है तो दक्षिणी भाग सूखे की मार झेलता है। राज्य में कुल जल उपलब्धता तो अधिक है लेकिन उपयोग योग्य जल कम है।राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 94।163 लाख हेक्टेयर है जिसमें से 56.68 लाख हेक्टेयर पर ही खेती होती है 9.44 लाख हेक्टेयर अन्य परती जमीन है जिसे प्रोत्साहन देकर कृषि योग्य बनाया जा सकता है। राज्य की वर्तमान आबादी 8.288 करोड़ है जबकि 2025 तक 13.13 करोड़ तक अनुमानित है। वर्तमान में सिंचाई एवं अन्य कृषि निवेशों से 1.675 टन प्रति हेक्टेयर की उत्पादकता का स्तर प्राप्त हुआ है जो अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम है। भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये 3.5 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादकता का लक्ष्य प्राप्त करना होगा। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये जल संसाधनों के प्रबंधन में सुधार लाना आवश्यक हो गया है।इन परिस्थितियों में राज्य जल नीति को नए सिरे से सूत्रीकृत करने की आवश्यकता महसूस की गई और मुख्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये राज्य जल नीति 2009 प्रतिपादित की जा रही है।राज्य जल नीति, 2009 का जलसंसाधन विभाग, बिहार द्वारा प्रारूप तैयार किया गया है। इस मसौदे को http://wrd.bih.nic.in और www.prdbihar.org पर देखा जा सकता है।राज्य जल नीति के इस प्रारूप पर आम जनता की राय, सुझाव और मंतव्य आमंत्रित हैं।
यदि आप कोई सुझाव या राय देना चाहते हैं तो इंडिया वाटर पोर्टल या water।community@gmail.com पर एक माह के भीतर भेज सकते हैं । आप अपने सुझाव सीधे wrd-bih@bih.nic.in पर भी भेज सकते हैं। आप अपने सुझाव यहां कमेंट के रूप में भी डाल सकते हैं जिन्हें हम नीति निर्माताओं तक पहुंचाएंगे ।

यदि इस संदर्भ में कोई विशेष जानकारी चाहिए तो आप मगध जल जमात के संयोजक श्री रविन्द्र पाठक जी से बात कर सकते हैं। उनका मो- 09431476562 है।

(इंडिया वाटर पोर्टल से साभार )

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

गिरोहों के बीच

बासी मांड़ और बासी भात खाकर
पूरब की पहली किरण के साथ
सालों तक बैलों के संग जुतते रहने के बाद
और चढ़े सूरज के नीचे
उसने
गरमाये मुराठे को उतारा
और झुलसायी चमड़ी पर मिट्टी का लेप लगाकर
उसने
बगुले की चोंच में ढपाढप समाते केंचुए को देखा
और जाना
कि इस देश में उसकी औकात
'जौ-तील-कुस' से बेसी नहीं है
जिसे अंतत स्वाहा हो जाना है
'इहागच्छत, इहतिष्ठित' जैसे मंत्रों के साथ,
जानते-जानते उसने यह भी जाना
कि पांचवीं वर्षी के बाद प्रेत पितर बन जाता है
और पिण्ड दान के साथ ही इतिहास खत्म हो जाता है
लेकिन दुनिया चलती ही रहती है
जंगली और शहरी गिरोहों के साथ
लिखित-अलिखित कानूनो के साथ
लाइसेंसी या गैरलाइसेंसी बंदूकों के साथ
++
मुंबई की पिटाई
और गुवाहटी के चीरहरण के बाद
उसने चिल्लाकर कहा कि
देश
संसद में 273 कुर्सियों के इंतजाम का ही दूसरा नाम है
और संविधान
बुढ़िया की टांगों पर चढ़े पलस्तर से ज्यादा कुछ नहीं
और
'हम भारत के लोग'
हैं भी क्या
एक वोट के सिवा
'भारत को'
देंगे भी क्या
एक वोट के सिवा

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

तस्कर बनते मेहनतकश







(भारत-नेपाल सीमाः नेपाल की लकड़ी और भारत का खाद)
दहाये हुए देस का दर्द-61
रोटी तो सभी खाते हैं, लेकिन सब की रोटी एक-जैसी नहीं होती। कोई हलाल की रोटी खाते हैं, तो कोई हराम की। किसी की रोटी पसीने से आती है, तो किसी की फरमाइश से। रोटी-रोटी में फर्क का यह अन्यायी सिलसिला न जाने कब से चलते आ रहा है। हालांकि रोटी से खेलने वाले इसओर कभी ध्यान नहीं देते और उनकी नजरों में सभी रोटियां अंततः अनाज की ही होती हैं। रोटी से खेलने वाले कभी नहीं स्वीकारते कि "रोटी'' और "इज्जत'' में किसी भी तरह की कोई रिश्तेदारी हो सकती है। लेकिन मेहनतकशों को पसीने की रोटी पर हमेशा नाज रहा है। किसान और मजदूरों के बीच रहने वाले लोग इस सच से निश्चित तौर पर अवगत होंगे। भूख और उसूल के दोहरे भार से दबे मेहनतकशों से पूछिए, उनका जवाब होगा- "हम गरीब जरूर हैं, लेकिन इज्जत की रोटी खाते हैं।'' कौन होगा जो ऐसे ईमानदार व मासूम आत्म-गौरव पर रीझ-पसीज न जाये। कवियों ने इसे विरॉट मानवीय सौंदर्य माना है और लेखकों ने इससे प्रेरणा लेकर दर्जनों ऐतिहासिक रचना की है। फणीश्वनाथ रेणु का संपूर्ण साहित्य श्रमशील सर्वहारा के निश्चल प्रेम और उच्च मानवीय मूल्य की ही बात करता है। लेकिन लगता है कि अब मेहनतकशों को भी "इज्जत की रोटी और पसीने की कमाई '' जैसी मुहावरों से चिढ़ होने लगी है।
बिहार का कोशी अंचल भी बुनियादी तौर पर मेहनतकश किसान-मजदूरों का इलाका है। प्रकृति और शासकों के निष्करूण प्रहारों को सदियों तक झेलते रहने के बाद भी इस समाज ने मानवीय मूल्यों से कभी भी समझौता नहीं किया। मेहनत और मजूरी पर नाज करने की संस्कृति यहां प्राचीन काल से ही रही है। लेकिन कुछ वर्षों से इस संस्कृति में तेजी से एरोजन हो रहा है। मेहनतकश बाप-दादाओं के पोते अब खेत में बैलों के साथ बहने से जी चुराने लगे हैं। उनके अरमानों को बाजारवाद का पंख लग गया है। उन्हें भी घूमने के लिए बाइक चाहिए और पहनने के लिए आधुनिक जिंस और बात करने के लिए महंगे मोबाइल। जाहिर है खेतों में पसीना बहाकर उपभोग की ये सामग्रीयां उन्हें एक जनम में तो कभी भी नसीब नहीं होने वाली, इसलिए वे तमाम तरह के अपराधों में शामिल हो रहे हैं। कोई आइएसआइ का एजेंट बन रहा है, तो कोई लश्कर-तैइबा का हमदर्द। हालांकि इस तरह के हाइप्रोफाइाल अपराध में अभी बहुत कम युवक ही शामिल हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय तस्करी तो इस इलाके में एक पेशा का रूप ले चुका है।
पिछले कुछ दिनों में कोशी अंचल से सटे नेपाल और बांग्लादेश की सीमाओं पर भारी तादाद में ऐसे युवकों की गिरफ्तारी हुई है, जिनकी पृष्ठभूमि मेहनतकशों की रही है। जिनके बाप-दादा ये कहते हुए गुजर गये कि '' आधे पेट खाया, लेकिन पराये खेत की ओर कभी नहीं झाँका । आज अररिया, किशनगंज और सुपौल जिले के सीमावर्ती इलाके के कई गांव तस्करों के गढ़ बन चुके हैं। यहां तक कि इन युवकों की सांठगांठ अब पूर्वोत्तर राज्यों के बड़े तस्कर समेत विदेशी तस्करों तक से हो चुकी है। हालांकि ज्यादातर स्थानीय तस्करों की भूमिका अभी भी कैरियर (समान को सीमा के पार पहुंचाने वाला)की ही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पुलिस और प्रशासन इन्हें रोकने के बदले बढ़ावा ही दे रहे हैं। क्योंकि इस गोरखधंधे में उनकी जेबें भी गरम हो रही हैं।
दरअसल, अररिया, किशनगंज और सुपौल जिले से नेपाल की लगभग साढ़े तीन सौ किलोमीटर की सीमा लगती है, जो पूरी तरह से खुली हुई है। अकेले अररिया जिले में नेपाल के साथ लगभग 110 किलोमीटर की सीमा-रेखा है। अररिया के बेला बसमतिया से सिकटी से होकर लहसुन, सुपाड़ी, चीनी , धान, उर्वरक, पेट्रोलियम, चरस, गांजा, हेराईन, ब्राउन सुगर, नकली भारतीय करेंसी व विस्फोटक हथियारों तक की तस्करी होती है। इतना ही नहीं, तस्करों ने अररिया और किशनगंज के सीमाई इलाके में सदियों से मौजूद बांस के जंगल को साफ कर दिया है। महज दस वर्ष पहले तक यहां बांस के घने जंगल होते थे, जिनमें सैकड़ों किस्म के हजारों वन्य प्राणी रहते थे। लेकिन आज यह जंगल साफ हो चुका है और वन्य प्राणी तो खोजने से भी नहीं मिलते।
हाल की कुछ प्रमुख तस्करी घटना पर गौर करें तो सितंबर 2009 से अब तक अररिया के कुआड़ी ओपी क्षेत्र में करीब दो करोड़ से अधिक कीमत की चंदन की लकड़ी पकड़ी गयी। इससे कुछ समय पहले कुर्साकाटा के मरातीपुर में पुलिस ने चरस के साथ एक तस्कर को गिरफ्तार किया था, जिसने पुलिस को बताया था कि हर महीने नेपाल से अकेले कुर्साकाटा में तीन से चार क्विंटल तक चरस की तस्करी होती है। गौरतलब है कि कुछ वर्ष पहले अररिया के फारबिसगंज के डीएसपी ने थाइलैंड निर्मित हेरोइन के साथ कुछ विदेशी तस्करों को गिरफ्तार किया था।
लेकिन ये खुलासे और गिरफ्तारियां तो महज दिखावा है। सच्चाई तो यह कि 90 प्रतिशत से ज्यादा मामले या तो पुलिस के पकड़ से दूर रहते हैं या फिर पुलिस की सहमति से खुलेआम चलते रहते हैं। हाल यह है कि कोशी इलाके के छोटे-छोटे हाट-बाजारों में भी भारी मात्रा में गांजे उपलब्ध रहते हैं। गौरतलब है कि नेपाल में गांजें की खुलेआम खेती होती है, जिन्हें तस्करी के जरिये बिहार और भारत के अन्य हिस्सों में खपाया जाता है।
संक्षेप में कहें तो तस्करी ने कोशी इलाके के सामाजिक सौंदर्य को निगल लिया है। गरीबी में भी ईमानदार बने रहना कोशी इलाके का सामाजिक सौंदर्य है। पसीने की रोटी खाने वाले लोगों का यह 'यू टर्न' हमें हैरत में डालता ही है , साथ ही इस तथ्य को भी साबित करता है कि भूख और उसूल की लड़ाई में उसूल अंततः हार ही जाता है। लेकिन उन्हें कौन समझाये कि उसूल की हार, भूख से भी ज्यादा खतरनाक है। क्या बाजारवाद ने विरोध और बदलावों के रास्ते भी बंद कर दिए हैं ? लगता तो ऐसा ही है। अगर यह सच नहीं होता, तो ये युवक आज तस्कर नहीं विद्रोही होते।
 
 

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

सियार कोतवाल

कौन-सा हाल
किसका हाल
कैसा समाचार
किसका समाचार,
जोंकों का राज
और सियार कोतवाल ।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

घिनौनी हरकत पर उतरे नेपाली माओवादी

भारत का अंधविरोध नेपाली माओवादियों का जन्मजात शगल है। यह उनकी तंगदिल सोच और प्रदूषित रणनीति का हिस्सा है। इसलिए नेपाल के माओवादी नेता रह-रहकर भारत के खिलाफ विषवमन करते रहते हैं। वे कभी भारत को विस्तारवादी की संज्ञा देते हैं, तो कभी नेपाल की राजनीतिक-सामाजिक अस्थिरता के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। हालांकि उनकी हरकतों के कारण नेपाली जनमानस में भारत के प्रति शंकालु दृष्टि जरूर उत्पन्न हुई है, लेकिन सौभाग्यवश अभी भी नेपाल की आम जनता भारत को अपना दुश्मन नहीं मानती। हालांकि नफरत का जहर फैलाने के लिए माओवादी ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा है। चाहे वह भारत-नेपाल की मैत्री संधि हो या फिर कोसी परियोजना संधि, माओवादी हमेशा इन संधियों का मुखालफत करते हैं और नेपाली लोगों के मन में भारत के खिलाफ जहर भरते रहते हैं। वैसे माओवादियों के तमाम दुष्प्रचार के बावजूद आज भी बड़ी संख्या में नेपाली लोग भारत को अपना शुभचिंतक मानते हैं। ये बात माओवादियों को हजम नहीं हो रही । यही कारण है कि अब नेपाली माओवादी बौखला गये हैं और घिनौनी हरकतों पर उतर आये हैं। भारत और नेपाल के बीच वैमनस्यता फैलाने में लगे नेपाली माओवादी ने पिछले दिनों जो घिनौनी करतूत की, उसकी अपेक्षा किसी को नहीं थी। इस कारण बिहार के अररिया और किशनगंज जिले के सीमाई इलाके के सरहदी वाशिंदे सकते में हैं। पिछले दिनों नेपाली माओवादियों ने भारत-नेपाल सीमा पर अवस्थित गांवों में भारत के राष्ट्रीय ध्वज का जमकर अपमान किया। उन्होंने तिरंगे के जूते बनाकर सीमाई चेक पोस्टों पर लटका दिया। कुछ जगहों पर उन्होंने अश्लील और अपमानजक पोस्टर चिपकाये, जिनमें राष्ट्रध्वज का अपमान किया गया है। पोस्टरों में भारत के राष्ट्रीय ध्वज और अशोक स्तंभ के साथ भद्दे मजाक किये गये हैं। कहीं अशोक स्तंभ में जूते टांग दिए गये तो कहीं ध्वज को कुचलते दिखाया गया।
हालांकि भारत सरकार हमेशा नेपाली माओवादियों की घृणित चाल को नजरअंदाज करती रही है। लेकिन माओवादियों की इन घृणित हरकतों ने सीमाई भारतीय वाशिंदों के सब्र को तोड़ दिया। हजारों लोग नेपाली माओवादियों के विरोध में सड़क पर उतर आये। सीमावर्ती क्षेत्रों में लगातार तीन दिनों तक नेपाली माओवादियों के खिलाफ प्रदर्शन होते रहे। आक्रोशित लोगों ने जगह- जगह सीमा पर बैरियर और अवरोध लगाकर आवागमन को अवरुद्ध कर दिया माओवादियों के विरोध में नारे लगाये। कई जगहों पर माओवादी नेता प्रचंड का पुतला भी फूंका गया। जोगबनी (अररिया) में तो लोग उग्र हो गये और नेपाली प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग तक करने लगे।
हालांकि प्रशासन की मध्यस्ता के बाद लोगों का आक्रोश कम जरूर हुआ है, लेकिन सरहदी वाशिंदे के मन में नेपाली माओवादियों के खिलाफ स्थायी घृणा फैल गयी है। इसके कारण नेपाल के सरहदी वाशिंदों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। गौरतलब है कि सीमाई क्षेत्र के हजारों नेपाली का गुजारा भारत से ही होता है। वे भारत में मजदूरी और अन्य रोजगार करने आते हैं। लेकिन तनाव के चलते पिछले कुछ दिनों से वे अपने घरों से नहीं निकल रहे हैं। इसके अलावा सीमाई इलाके के लोग अपने रिश्तेदारों को लेकर भी चिंतित हैं। उल्लेखनीय है कि सरहदी इलाकों के लोगों के बीच सदियों से बेटी-रोटी का संबंध है।
इस बीच भारत के दौरे पर आयी नेपाल की रक्षा मंत्री विद्या भंडारी ने आश्वासन दिया कि उनकी सरकार ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करेगी। लेकिन नेपाल के राजनीतिक हालात को देखकर लगता नहीं है कि नेपाल की सरकार माओवादियों की नापाक हरकतों पर अंकुश लगाने में सक्षम हैं। अगर ऐसा होता, तो राजधानी काठमांडू में भारत के खिलाफ आपत्तिजनक नारे नहीं लगाये जाते। चीन की नीतियों को जिस प्रकार वर्तमान नेपाल सरकार अमलीजामा पहना रही है, उससे लगता है कि वे भी पर्दा के पीछे से भारत विरोध की रणनीति को समर्थन दे रही है। हाल के दिनों में सीमावर्ती नेपाल में कई चीनी स्टडी सेंटरों खोले गये हैं। हालांकि कहने के लिए तो ये अध्ययन केंद्र हैं, लेकिन वास्तव में ये केंद्र भारत के खिलाफ चीन की जासूसी सेंटर का काम कर रहा है। जाहिर है, नेपाल सरकार भी इस बात से अनभिज्ञ नहीं है। इसके अलावा हाल के दिनों में चीन ने नेपाल के साथ कई रणनीतिक समझौते भी किए है। इनमें चीन-नेपाल के बीच सीधा सड़क मार्ग खोलना और नेपाली सैनिकों को चीन से प्रशिक्षण दिलवाना शामिल है। यह अलग बात है कि सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस और एमाले खुले तौर पर इस बात को स्वीकार नहीं करती।
दरअसल, नेपाली माओवादी पार्टी सत्ता से दूर होने के बाद पूरी तरह से विचलित हो गयी है। चूंकि नेपाल के मधेशियों को विश्वास में लिए बगैर कोई भी नेपाली पार्टी सत्ता में नहीं आ सकती, इसलिए माओवादी चाहते हैं कि वह भारत विरोध के नाम पर गैर मधेशियों को गोलबंद कर, बहुमत का वोट-बैंक जुटा लें। इसके अलावा चीन से सैन्य व आर्थिक मदद पाने के लिए वे भारत का विरोध करते हैं। हालांकि अभी तक इसका परिणाम माओवादियों के खिलाफ ही गया है। भारत विरोधी प्रदर्शनों के कारण मधेशी इलाके में माओवादी पार्टियों का रहा-सहा जनाधार भी कमजोर पड़ते जा रहा है। कुछ महीने पहले ही उनके एक धाकड़ मधेशी नेता मात्रिका प्रसाद यादव ने पार्टी छोड़कर नयी पार्टी बना ली। कई अन्य माओवादी नेता मधेशी जनाधिकार फोरम में चले गये हैं। लेकिन इन सबके बावजूद नेपाली माओवादी सबक नहीं ले रहे हैं।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

कहां पाऊं वो वनफूल

जैसे उकन्न (विलुप्त) गये पंझाली, लालसर, सिंगारा, पेरवापांखि जैसे धानों की दर्जनों सनातन प्रजातियां, कुछ-कुछ उसी तरह सनै-सनै लुप्त हो रहे हैं गांवों के गांवपन। गांवों से गुम हो रही हैं देसी लोकोक्तियां, अपनत्व-ममत्व से भरे संबोधन, माटी के बरतन, अनुरागों से सिक्त मन । अब तो गांवों की गलियों में भी सुनाई देते हैं- फिकर नॉट, फिकर नॉट के फिकरे। न जाने कहां-कहां की जुबान गांवों में प्रवेश कर गयी हैं । राह चलते हाल पूछना गांव का सनतान संस्कार है। शायद इसलिए एक दिन राह चलते नोनिया टोले के किशुनदेव से यूं ही पूछ लिया, "कि हो किशुन, गौना ठीक-ठाक से हो गेलअ न ?' किशुनदेव बोला- "किशुन नहीं, किशन कहिए ब्रदर, सब मस्त रहा। हजार टका भाड़ा देकर मारूति लाये थे, सकिंड मैरिज के लिए।' गांव इतने बदल गये हैं कि आंगन के प्रवेश द्वार पर अगर खांस दिए, तो बस्ती के छोकरे महीनों तक आपका मजाक उड़ाते रहेंगे। दातून से दांत साफ करने वालों को अब गांव में पिछड़ा समझा जाने लगा है। जिसे शादी में दहेज की मोटी राशि नहीं मिलती, वो खुद को अभागा मानता है। अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता है। बला यह कि दहेज लेना और देना स्टेटस सिंबल बन गया है। इसलिए लोग पचास हजार लेते हैं, तो दो लाख बताते हैं और दो लाख देते हैं , तो पांच लाख गिनने का प्रचार करते हैं।
नब्बे के दशक के बाद से गांवों में अजीबोगरीब धाराएं बहने लगी हैं । उपभोक्तावाद की मादक-लहरें शहरों की अट्टालिकाओं से टकराकर गांवों की झोपड़ियों तक में लहरा रही हैं। चौके से चौपाल तक बाजारवाद का उत्स फैल गया है। धनोपार्जन के बदले धन-लिप्सा की मानसिकता जन-जन को अपने आगोश में ले रही है। उपभोग और विलासिता सबसे बड़े आदर्श बनने लगे हैं। कर्म तंत्र से मीलों आगे है पहुंच गया है- धन तंत्र। जिसके पास धन नहीं, मानो वह जन नहीं।
वे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते, लेकिन बाजार से मोबाइलों के अद्यतन मॉडल खरीद लाते हैं। बगैर काम किए, सब कुछ हासिल कर लेना चाहते हैं। नरेगा के फर्जीबाड़े में दिल खोल कर हिस्सा लेते हैं। सरकारी योजनाओं की खबर रखते हैं, लेकिन सिर्फ और सिर्फ निजी स्वार्थ के लिए। जो मुंहदुब्बर हो उनकी आवाज दवा दो, उनका हक छिन लो। रुपये लेकर मुखिया, प्रमुख के हर गलत कामों को सही ठहराते दो। इंदिरा आवास के लिए मिले रुपये से जमीन खरीद लो । अगर अधिकारी जांच करने पहुंचे तो उन्हें खस्सी-मुर्गी खिला दो। दो-चार किलो देसी घी उनकी गाड़ी की डिक्की में रख दो।
चुनाव के दरम्यान तो गांवों का नजारा चमत्कृत कर देता है। सभी उम्मीदवारों से पैसे लेते हैं, लेकिन वोट गिराने नहीं जाते। मुंहदुब्बरों के मत का सौदा करते हैं और उन्हें मतदान से वंचित कर देते हैं। मुंहदुब्बरों का साधने के लिए वे तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। कभी हुक्का-पानी बंद कर देते हैं, तो कभी राह चलते पीट देते हैं।
गांवों में सामूहिक प्रेम, सामूहिक दायित्व की भावना दम तोड़ रही है। प्रेम, निश्छलता, करुणा, भलमनसाहत अब गांवों में भी दुर्लभ हो गये हैं। बूढ़े बाप-मां बेटे-बहू के लिए बोझ बनते जा रहे हैं। बेटे को सुबह में पता चलता है कि ओसारे पर सोये बाप ने रात के किसी पहर में अकेले दम तोड़ दिया।
किसी ने कहा था कि अंततः प्रेम इस दुनिया को बर्बाद होने से बचा लेगा और भारत को भारत के गांव बचा लेंगे। बाजारवाद की आंधी में लगातार गुमराह होते समाज से व्यथित लोगों को यह वाक्य एक ढांढस बंधाता है। लेकिन अब तो गांव के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लग गया है। जब बांस ही नहीं रहेगा तो बंशी कहां से बजेगी। गांव नहीं रहेगा, तो भारत का डूबना निश्चित है। जब हम ऐसा कह रहे हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम गांवों के विकास की आलोचना कह रहे हैं। मेरा आशय गांवों की लुप्त होती जिजीविषा, गांवों की परंपरा, गांवों के संस्कार और गांवों की अस्मिता से है। यह सच है कि हमारे यहां गांव और गरीबी को पर्यायवाची मान लिया गया है, लेकिन भारत के गांव महज एक सुदूर गरीब इलाके के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये एक व्यापक जीवन-दर्शन के प्रतिनिधि और वाहक भी हैं। हमारे गांव इंसानी संवेदनाओं, मानवीय करुणा , भाइचारे, सहअस्तित्व, प्रेम और ममत्व का सनातन प्रतिनिधि है। शहरों में यह बहुत पहले खत्म हो चुका है।
बाजारवाद और उपभोक्तावाद का फलसफा है कि यह इंसान को इंसान से अलग कर देता है । यह मनुष्य को मानवीय संवेदनाओं से काटता है। प्रेम और भाइचारे को अप्रासंगिक बना देता है। भंवरे क्या करे ? सौरभ की तलाश में जंगल पहुंचे भंवरे को नहीं मालूम कि जंगल ने वनफूलों से तौबा कर लिया है।
पर यह एपेक्स नहीं है। क्लाइमेक्स अभी बाकी है। बाजारवाद जब क्लाइमेक्स पर पहुंचेगा, तो इंसान के पास कुछ नहीं होगा सिवाय धन के। और धनविहीन इंसान किसी अपराधी से कम नहीं होगा। जिसके पास धन नहीं होगा उसे सांस लेने के लिए हवा नहीं मिलेगी, चलने के लिए रास्ते नहीं दिए जायेंगे, न तो जन्म लेने के लिए कोख मिलेगी और न ही मौत के लिए दो गज जमीन। आंख होंगी पर दृष्टि के लिए अनुमति लेनी होगी। जिसके पास बैलेंस नहीं होगा, वह आंखों का उपयोग नहीं कर सकेगा। इंसान के पास जुबान होगी पर बोलने के लिए हर शब्द की कीमत चुकानी होगी। आकाश, पताल, पहाड़, हवा, पानी, रोशनी, शब्द, भाषा, पहनावा आदि निजी मिल्कियत होगी। इसके उपयोग के लिए भाड़े चुकाने होंगे। कविता और कवि एक तो होंगे नहीं अगर होंगे तो उन्हें शैतान घोषित कर दिया जायेगा।
 
 

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

बाजार में मरीज

बेशक
आदमी की आस और आदमी की जान
बड़ी हैं
गांव और शहर के बीच की दूरी से
वरना
"वह कौन-सी बीमारी है
जो झाड़ने-फूंकने से ठीक नहीं होती''
लेकिन
सात दिन पहले ही हुआ था सतना का गौना
और आठवें दिन
सुबह से ही उसे खून की उल्टी आ रही थी
शायद इसलिए
गांव के सभी "ओझा'' गायब हो गये
शायद उन्हें दया आ गयी थी
सतना पर
या फिर सात दिन के गौने पर
++
बड़े "इस्पीताल'' में किसी बड़े "डागडर'' की तलाश में
बारह घंटे बाद शहर पहुंचा था, बेहोश सतना
और एक नामचीन क्लिनीक के
बाहरी गेट के थोड़ा-सा बाहर
निजी सुरक्षा गार्डों से गुजारिश करता रहा
सतना का लाचार बाप
उसकी लाचार बीवी
मगर
गेट नहीं खुले
(-------)
एक गरीब बाप
एक लाचार बीवी
और एक बेहोश आदमी क्या है
डॉक्टरों की माने तो
वे मरीज नहीं
''किसी सफाईवाले का ठेला है''
(माफ़ करें डॉक्टर साहेब , जिनका यह बयान है )
जो धोखे से दूकान को अस्पतलाल समझ बैठा है
उन्हें नहीं मालूम
कि एटीएम के जवाने में
गुजारिश बेवकूफी है
फटी धोती, झुकी कमर और बटुए की रेजगारी
बाजार की सबसे बड़ी गाली है
++
हाय !
बाजार के बीचो-बीच खड़े उस बेजार बाप को
सीथ की सिंदूर से मुठभेड़ करती उस नवयौवना को
कोई तो बता दे
उस "इस्पीताल'' का पता
जहां "डागडर बाबू'' बैठते हैं

रविवार, 17 जनवरी 2010

सूर्य ग्रहण की दो तस्वीर

कुदरत के अद्भुत कारनामे को निहारती एक जोड़ी
धीरे -धीरे घटता सूरज

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

एक लाख की नौकरी

बेरोजगारी,गरीबी,असमानता जैसे अभिशापों से घिरे देश में "नौकरी' से ज्यादा जन-मोहक शब्द कुछ नहीं हो सकता। और अगर बात झारखंड की हो, तो फिर "नौकरी' एक शब्द भर कहां रह जाता है। यहां यह शब्द राजनीतिक रामबाण बन जाता है। अगर झारखंड पठारों का राज्य है, तो बेरोजगारी , गरीबी और आर्थिक असमानता इन पठारों की डरावनी खाइयां हैं। इन खाइयों की हकीकत बहुत कड़वी है, इसलिए कोई भी सरकार कभी भी इनमें उतरने की कोशिश नहीं करती। अगर वे इन खाइयों के पास खड़े होकर देखते, तो उन्हें साठ साल के तमाम तथाकथित पराक्रम की असलियत भी मालूम हो जाती। यकीनन सभी स्वतांत्रयोत्तर पराक्रम बौने साबित हो जाते। झारखंड के राजनीतिक दल इस सच को बखूबी जानते हैं। इसलिए वे कभी भी इन खाइयों में उतरने की कोशिश नहीं करते। हां , इन खाइयों के दोहन में वे माहिर हैं।
झारखंड के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने विश्वास मत प्राप्त करने के बाद एक लाख लोगों को नौकरी देने का शिगूफा छोड़ दिया है। राज्य विधानसभा में गुरुवार को विश्र्वास प्रस्ताव पर चर्चा के बाद सरकार की ओर से जवाब दे रहे शिबू सोरेन ने कहा कि उनकी सरकार आने वाले समय में एक लाख बेरोजगारों को नौकरी देगी। इसके अलावा उन्होंने ग्रामीण जनता की त्रासदियों की भी खूब चर्चा की। अकाल, भुखमरी, कुपोषण से लेकर पलायन तक पर शिबू अपने निपट देसी अंदाज में बोले, जिसे सुनकर सहानुभूति होती है और साथ-साथ हंसी भी छूट जाती है। शिबू इतने भोले तो नहीं कि इस जन्नत की हकीकत उन्हें नहीं मालूम।
इसमें कोई दो राय नहीं कि शिबू सोरेन ने झारखंड की गरीब जनता की जिन त्रासदियों की बात की, वे सोलह आने सच है। लेकिन क्या शिबू सोरेन के पास इससे निपटने की कोई ठोस योजना है ? अगर शिबू सोरेन के राजनीतिक रोड-मैप और पिछले रिकॉडों पर गौर करें, तो इस सवाल का जवाब बहुत आसानी से मिल जाता है। शिबू सोरेन अब तक तीन बार राज्य की मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके हैं। इससे पहले वे लगभग चार साल तक झारखंड स्वायत्त परिषद के अध्यक्ष के पद को भी सुशोभित कर चुके हैं । लेकिन आज तक उन्होंने राज्य की गरीबी, आर्थिक असमानता, पलायन, विस्थापन, अकाल और बीमारियों की समस्याओं से लड़ने के लिए एक भी कदम नहीं बढ़ाया। वे राज्य की सत्तर प्रतिशत वंचित आबादी को न्याय दिलाने की बात तो करते हैं, लेकिन जब उनसे पूछा जाता है कि इसके लिए उन्होंने क्या नीति बनाई है , तो वे कोई जवाब नहीं दे पाते। सच तो यह है कि शिबू सोरेन की दिलचस्पी गरीबी, असमानता, अन्याय आदि की चर्चा करने तक सीमित है। इन अभिशापों से निजात पाने की उनकी मंशा नहीं है। तमाम अनुभव यही बताते हैं। अगर सहज भाषा में कहें तो शिबू की राजनीति अब धीरे-धीरे लालू प्रसाद की नब्बे दशक की राजनीतिक शैली की ओर बढ़ रही है। गौरतलब है कि पहली बार सत्ता में आने पर लालू यादव ने भी बिहार के एक लाख लोगों को सरकारी नौकरी देने का शिगूफा छोड़ा था, जिसे कभी पूरा नहीं किया गया। लाख की बात तो छोड़िये लालू प्रसाद के शासन में बिहार में नियमित नियुक्तियां भी प्रायः बंद हो गयी थीं।
पता नहीं शिबू सोरेन को राज्य के संसाधन, स्रोत, जरूरत, प्रशासनिक क्षमता-दक्षता, ब्यूरोक्रेटिक-इंडस्ट्रियलिस्ट कॉकस आदि का कितना ज्ञान है (क्योंकि उनकी प्रशासनिक समझ संदेहास्पद है), लेकिन जिनको इसकी सच्चाई मालूम है, वे शिबू सोरेन की घोषणाओं की चर्चा करने पर चौअन्नी मुस्कान बिखेर देते हैं। इसका मतलब साफ है। राज्य की प्रशासनिक दक्षता लगभग खत्म हो चुकी है, क्योंकि यहां काबिल अधिकारियों के टोटे हैं। पूरे आइएएस कैडर में दक्ष और निपुण अधिकारियों की संख्या पांच-छह ही रह गयी है। कार्य-संस्कृति दरीद्र हो चुकी है। भ्रष्टाचार, लापरवाही, दलाली आदि सरकारी तंत्र के अंग-अंग में व्याप्त है। असलियत तो यह है कि मौजूदा प्रशासनिक तंत्र से शिबू सोरेन की सरकार नियमित दैनिक कार्यों का निष्पादन भी नहीं करा सकते। खनन्‌ नीतियों को बदलने, सत्ताई कॉकस, आर्थिक असमानता और गरीबी को दूर करना तो दिवास्वप्न है। एक लाख लोगों को नौकरी देने के लिए शिबू को शायद एक हजार कार्यालयों का कई हजार बार औचक निरीक्षण और निगरानी करना होगा और कई अधिकारियों-कर्मचारियों को निलंबित करना होगा । और यह भी तब संभव हो सकेगा जब वे बचे-खुचे ईमानदार अधिकारियों की सही-सही पहचान कर ले। जाहिर है शिबू सोरेन की न तो इतनी इच्छा शक्ति है और न ही उनके पास इतनी राजनीतिक शक्ति है। वे भाजपा और आजसू की अवसरवादी राजनीति के कारण बेमेल गठबंधन से सत्ता तक पहुंचे हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी उनका इष्ट है, जो उन्हें मिल चुकी है। फिर भी मुगालते में जीना, जनता की नियति है शिबू "सत्ता-सत्ता ' जप रहे हैं और जनता को "नौकरी-नौकरी' सुनाई दे रही है। बस।

रविवार, 3 जनवरी 2010

हाय, हल्लो से बाहर भी है नव वर्ष

समकालीन हिन्दी साहित्य के दिग्गज साहित्यकार राजेंद्र यादव ने कल एक जबर्दस्त बात कही । राजेंद्र यादव ने कहा कि आज साहित्य से भविष्य का सपना गायब हो रहा है। राजेंद्र यादव का यह बयान अपने आप में बहुत बड़ी खबर है। भले ही कुछ लोग इसे साहित्य की खबर माने या फिर कुछ लोग इसे बुद्धिजीवियों की तत्व-विमर्श कह कर टाल दें, लेकिन मेरे विचार से राजेंद्र यादव के कथन को सिर्फ साहित्यक परिधि में नहीं देखना चाहिए। यह महज साहित्यिक दुर्घटना नहीं है कि उससे भविष्य के सपने गायब हो रहे हैं। मेरे खयाल से यह एक भीषण सामाजिक दुर्घटना है, जिसकी परछाई साहित्यक वृत्त तक जा पहुंची है। लेकिन यह अनायास नहीं हुआ है। आज हमारा समाज जिस लीक पर चल रहा है, उसका फलसफा ऐसा ही कुछ होने वाला है। उसे इसी मंजिल पर पहुंचना था।
सच है कि आज समाज के जीवन-दर्शन, जीवन-मूल्य, जीवन-मकसदों में क्रांतिकारी परिवर्तन आ चुका है। समाज स्वकेंद्रित और क्षणजीवि हो चला है। किसी को किसी बात से तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता है , जब तक वह बात उसके हित-अहित से सीधे तौर पर जुड़ न जाती हो। ऐसा तभी हो सकता है, जब इंसान भविष्य के बारे में, चल रहे क्रिया-कलाप, संस्कृति-प्रवृत्ति के दूरगामी प्रभाव के बारे में विचार करना (सपना देखना) छोड़ दे। इसलिए आज जो कोई भी अन्याय, असमानता, स्वकेंद्रित जीवन शैली आदि सामाजिक विघटन के बारे में सोच रहे हैं, इन दुष्प्रवितियों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, वे वंदनीय हैं। क्षणजीवि सभ्यता भले इस सच्चाई से मुंह मोड़ ले, लेकिन आगामी पीढ़ियां इसका हिसाब-किताब जरूर लगायेगी।
बहरहाल, नये वर्ष के उपलक्ष्य में यहां ऐसे ही एक सख्श की कलाकृति लगा रहा हूं, जो सपने देखता है और समकालीन समस्याओं और दुष्प्रवृत्तियों के खिलाफ आवाज उठाने में भी विश्वास रखता है। इनका नाम है- पिनाकी राय। पिनाकी ने इस बार नव वर्ष-2010 के उपलक्ष्य में देश में कम होते वोटिंग परसेंट को अपने कार्ड में उकेरा है। पिनाकी पिछले 15 वर्षों से लगातार राष्ट्रीय एकता के लिए ग्रीटिंग कार्ड बना रहे हैं। आप भी इस पर गौर फरमाएं।

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

जाती हुईं तारीखों की याद

तारीखें जिंदगी की तरह होती हैं। गुजरने के बाद दोबारा कभी नहीं आतीं। लेकिन उनकी याद हमेशा आती है। वर्ष 2009 जा रहा है। जाते हुए वर्ष ने दुनिया को क्या-क्या दिया ? क्या- क्या लिया ? वही रक्तों से सनी खबरें और बाजारवाद की जानलेवा सबकें। स्वार्थ सिद्धि की नापाक राजनीति, वर्चस्व के लिए टकराव और प्राणों की आहूति और छल-प्रपंच-साजिशों के अनगिनत प्रहसन। खोल बदले पर जानवर नहीं बदला। बुश की जगह ओबामा और अफगानिस्तान की जगह पाकिस्तान आ गया। जरूरत पड़ी तो वाशिंगटन-बीजिंग की भी भाषा एक हो गयी और गरज हुआ तो भारत के स्लमडॉग को भी ऑस्कर पहना दिया गया। उधर तुवालू , किरीबाती और मालदीव जैसे द्वीपीय देश समुद्र-समाधि से बचने के लिए एसओएस का अलार्म बजाते रहे और इधर अमेरिका के नेतृत्व में जलवायु परिवर्तन के बाघ को गरीब देशों की ओर खदेड़ दिया गया। गरीबी और गृह युद्ध से त्रस्त सोमालियाइयों ने पेट के लिए समुद्र में डाका डालना शुरू कर दिया और पश्चिमी देशों ने सोमालियाई सागर को कबाड़खाने में तब्दील कर दिया। कांगो, सूडान, नाइजीरिया और नौरू के शरणार्थी शिविरों में बाल यौन-शोषण से लेकर मानवीय उत्पीड़न के नये-नये अध्याय लिखे जाते रहे। दो जून की रोटी के लिए मानवता शर्मसार होती रही। दूसरी ओर बाजारवादी दुनिया के समनायक अपनी मगरमच्छी ध्यान में ध्यानस्थ रहे। वे 2009 को याद रखना नहीं चाहते। उनकी नजर 2010 और उससे आगे है कि इस वर्ष भारत में दस करोड़ नये लोगों को वे अपने-अपने उपभोक्ता बना पायेंगे। वैसे मंदी को भूलने और टालने की उनकी कवायदें अभी भी जारी हैं और आने वाले सालों में भी जारी रहेंगी। मुमकीन है वे इसमें कामयाब होंगे। उनकी आबादी आज भी बहुत कम है और दुनिया भर के संसाधनों पर उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती जा रही है। उनके लंगर के ग्रीप से कुछ नहीं छूट सकता। चाहे तरल तेल हो या फिर ठोस कोयला, उनके लंगर की पकड़ से कोई मुक्त नहीं। खाने से लेकर फरमाने तक वही हैं, वही रहेंगे। और इस बिना पर वे ऐसी कई महामंदियों को धूल चटा देंगे हैं। सरकार से लेकर मीडिया तक अब उनके कब्जे में आ चुके हैं। जो ताकतें प्रतिरोध में खड़ी हो सकती थीं वे या तो खंड-खंड विभाजित हैं या फिर खुद बाजारवादी जमात में जा मिली हैं। चीन ने अपनी जनता की जुबान पर दुनिया का सबसे बड़ा ताला जड़ दिया है और अब वे अमेरिकी बाजारवाद से टक्कर लेने के लिए पूंजी को अमोध अस्त्र मान चुका है। नेपाली माओवादियों की सारी शक्ति सत्ता पाने में खर्च हुए जा रही है।
लेकिन सवा सौ करोड़ वाले भारत ने 2009 में क्या-क्या भोगा। कितना सीखा और कितना बदला। वर्ष 2009 की विदाई की वेला में सवा सौ करोड़ में से सौ करोड़ लोगों के सामने ये सवाल जरूर उठ रहे होंगे। लेकिन महंगाई और मक्कारी राजनीति की दोहरी मार के घावों को लेकर 2010 में प्रवेश करती भारत की यह आबादी शाम होते-होते इतना थक जाती है कि उन्हें सुबह का सबक भी याद नहीं रहता,तो पूरे साल को कैसे याद रखे। इन्हें याद करना उनके लिए लगभग असंभव और अप्रसांगिक है। वे उपभोक्तावाद के हर रस को पी जाने के लिए बेताब हैं और देश-काल-समाज के पचड़े में पड़कर अपने दिन को बोझिल करना नहीं चाहते। कृत्रिम दुनिया के कृत्रिम चित्रों से सजे टीवी चैनलों के सीरियल और हर अनरियल शो को रियल मानकर वे मनोरंजित हैं। फिर भी कुछ लोग है जो तमाम परेशानियों के बावजूद बीते हुए साल को याद करेंगेऔर अकेले में बार-बार खुद से प्रश्न करेंगे कि क्या मनुष्य जाति इतनी लापरवाह और खुदगर्ज भी हो सकती है ? कि एक नेता हजारों करोड़ रुपये को घोटाला कर फिर से निर्वाचित हो सकता है और जनता के बीच सीना तानकर खड़ा हो सकता है। कि वाम-वाम के झांव-झांव में वाम और दहिन का फर्क खत्म हो सकता है और गरीब और गरीब और गरीबों को मारकर और कम वाम को पछाड़ कर अति वाम दस - बीस जान लेकर , झोले में कंडोम और कंधे पर बन्दुक लटकाकर लाल क्रांति ला सकता है। कि सौ करोड़ लोगों के करोड़पति रहनुमा संसद में जनता के पैसे से खुद 5 रुपये में लजीज व्यंजन खायेंगे और जनता की थाली से रोटी-आलू -प्याज़ तक गायब हो जायेंगे । कि गरीब देश की संसद अमीरों का अखाड़ा बन जायेगी । 2009 में ऐसा ही हुआ। चौदहवीं संसद में चार सौ से ज्यादा सांसद करोड़पति हैं और कई दर्जन अरबपति भी हैं।
दरअसल, 2009 को इसलिए भी याद रखा जायेगा कि इस वर्ष देश की राजनीति ने साफ तौर पर बाजारवाद के दरबे में खुद को प्रतिस्थापित करा लिया। 2009 में यह भी साबित हो गया कि भ्रष्टाचार और ईमानदारी में अब कोई अंतर नहीं रह गया है। अगर अंतर होता तो भ्रष्टाचार के स्पष्ट आरोप के बाद दागी न्यायधीशों के खिलाफ एकमत से महाभियोग लाया जाता। मधु कोड़ा जैसे लोग चुनाव नहीं जीतते। बाजार की आड़े आने वाली तमाम बाधाएं रेत की तरह भरभराकर नहीं गिरतीं और आम जन को सहारा देने वाली प्रजातंत्र की तमाम संस्थाएं इस कदर कमजोर दमा ग्रस्त नहीं हो जातीं। क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद और संप्रदायवाद में जनता इतनी बंट चुकी हैं कि उनकी प्रजातांत्रिक हथियार कुंद पड़ गये है। प्रजातंत्र में जनता में एकता होना जरूरी है, लेकिन क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद और संप्रदायवाद ने उन्हें जर्रे-जर्रे में विभाजित कर दिया है। 2009 में विभाजन का यह सिलसिला और तेजी से बढ़ा, जिसका फायदा उठाकर ऐसी शक्तियां दोवारा सत्ता पर काबिज हो गयीं, जिनकी वरीयता में आम जन का कल्याण कभी कोई एजेंडा या सपना नहीं रहा। हां, बाजीगरी के लिए वे कभी दलितों के यहां खा और सो लेंगे, किसी मुस्लिम विश्वविद्यालय में मुस्लिम के प्रधानमंत्री बन जाने की बात करेंगे, लेकिन जब मुंबई की सड़कों पर अपने ही देश के लोगों को अपने ही देश के गुंडे भेड़-बकरी की तरह दौड़ायेंेगे, तो खौफनाक चुप्पी साध लेंगे। और अगले दिन कॉरपोरेट घराने के मुखिया के साथ बैठकर डिनर करेंगे। बिहार की बाढ़ हो या कश्मीर का आतंकवाद, वे चुप्पी साधे रहेंगे।
इन्हीं अनुभवों के साथ हम 2010 में जा रहे हैं। तमाम संकेत यही बताते हैं कि 2010 में हम बाजारवाद के मोह को अपने वाहुपाश में पायेंगे। बिल्कुल तिस्नगी की तरह। और गांवों से किसान आत्महत्या की खबरें एक तो आयेंगी नहीं अगर आयेंगी तो उसे कुछ इस तरह पढ़-सुन लेंगे मानो ये खबरें किसी दूसरी दुनिया से आयी हों। बिल्कुल, बॉस की तरह। बहरहाल, शुभकामना संप्रेषण के साधन और विकसित करेंगे ताकि कोई यह नहीं कहे कि बाजारवाद ने आदमी को आदमी से दूर कर दिया है। हमने हमारे को हैल्लो बोला, विश किया। बसहमारी जिम्मेदारी पूरी हुई। हैप्पी न्यू इयर टू यू...
 

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

सात समुद्र पार भी कोशी की चिंता

( जमीन से भारी जिन्दगी : स्थान - सनपताह, सुपौल , बिहार - जुलाई २००९ )
दहाये हुए देस का दर्द-60
विपत्ति और दरीद्रता कोशी अंचल की सदियों पुरानी नियति है। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह कि इस इलाके पर कोशी नदी एक तलवार की तरह लटक रही है, जिसके कारण इसका भविष्य खतरे में है। सरकार की क्रोनिक उपेक्षा के कारण यह अंचल आज देश के सबसे उपेक्षित इलाके में से एक है। हालांकि आज भी यहां के आम लोग शांति प्रिय और देशभक्त हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रहेगी क्योंकि इस इलाके के मद्देनजर सरकार की नीति यथास्थितिवादी है और दुनिया तेजी से बदल रही है। अगर कोशी अंचल की समस्याओं को योजनाबद्ध ढंग से नहीं निपटाया गया, तो यह इलाका आने वाले समय में बड़े आंदोलन और अलगाव की ओर बढ़ सकता है। "दो पाटन के बीच' कोशी के जमीनी हालात को समझने और समझाने का एक प्रयास है। पिछले लगभग दो साल से मैं इसके जरिये कोशी नदी और कोशी अंचल की समस्याओं को सामने लाने की कोशिश कर रहा हूं। इस क्रम में मुझे कई लोगों के पत्र मिले हैं। कुछ ने इस प्रयास की तारीफ की है, तो कुछ लोगों को यह निजी हित का मामला भी लगता है। लेकिन मैं बता देना चाहता हूं कि शुद्ध मन से बदलाव के आकांक्षी लोगों का निजी हित कुछ नहीं होता। सामूहिक हित ही में वे निजी हित का सुख पा लेते हैं। जिन्होंने जिंदगी में कभी कोई मुहिम चलायी हो वे इस सच को जानते हैं और जिनकी सोच की सुई कभी स्वार्थ से ऊपर उठी ही नहीं, उन्हें यह बात कभी भी समझ नहीं आयेगी। इसलिए इस विषय पर कोई दलील देना, जस्टिफिकेशन देना या तकरीर करना व्यर्थ है।
बहरहाल, यहां मैं सात समुद्र पार अमेरिका से आये एक मर्मस्पर्शी पत्र को रख रहा हूं। कैलिफार्निया, अमेरिका में रह रहे मणिकांत ठाकुर जी का यह पत्र हमें सोचने के लिए बाध्य करता है।
- रंजीत

प्रियवर श्री रंजीत बाबू
कोशी के अभिशाप को वरदान में बदलने की संभावना रहते हुए भी किसी की इच्छा -शक्ति उस ओर उन्मुख नहीं है। नेतृत्व के लिए व्यक्ति स्वयं को प्रस्तुत करता है। लोग उसे ही नेता बनाना चाहते हैं जो बन जाना चाहते हैं। हमारी मिट्टी में उर्वरता तो है पर तेज और दिशा नहीं है, ऐसा लगता है। बाहर जाकर और अपने चारों ओर प्रखरता देखकर हम अपने को ढाल तो लेते हैं पर मिथिलांचल या बिहार के किसी हिस्से में रहते हुए अगले कदम की ओर रूझान नहीं होता। संभवतः कोई स्थानीय स्वाभाविक प्रतियोगिता नहीं है। खैर, इन बातों का विश्लेषण कई और तरीकों से हो सकता है। लेकिन कोशी क्षेत्र में एक सक्षम नेता या जवाबदेह समूह का अभाव है, जो नयी बात नहीं है। अगर लालू प्रसाद यादव जी जैसे नेता इस मुद्दे से जुड़ते तो इसकी व्यापकता हो सकती थी। ग्रासरूट से शुरू करके दिल्ली तक जाना एक लंबी दूरी है। दिल्ली की व्यवस्था को, चाहे वह जिस किसी तरह भी हो, कोशी से रू-ब-रू कराना कारगर हो सकता था। और कुछ नहीं तो एक योजना कम-से-कम कागज पर बन जाती जिसके बहाने आवाज उठायी जा सकती थी।
कोशी एक सोई हुयी बाघिन है। यह एक तरल ज्वालामुखी है। इसके लिए जितनी अग्रिम तैयारी हो वो थोड़ी है। लगता है जिस प्रजातंत्र की साख हम बताते रहते हैं वो अभी भी व्यवहारिक परिभाषा के लिए चुनौती ही बनी हुई है। मैं एक वर्ष के लिए चीन में था। उनकी आर्थिक व्यवस्था, साफ-सफाई, योजनाओं की तत्पर व्यवस्था सभी सराहनीय लगी। पर व्यक्ति और समाज तक आते-आते जो अधोगति दृष्टिगोचर होती है उससे उनकी प्रगति की कीमत समझ में आती है। खुली वेश्यावृति, एक-दूसरे से निरंतर डर , सरकारी कर्मचारियों से लोगों का भय, स्नेह और सामाजिक-भावना का स्पष्ट अभाव आदि उनकी समस्या है। पर बाहर से आये लोग ही इस कमी को समझ पाते हैं।
कोशी क्षेत्र के लोगों का आसानी से अपनी विपत्ति अपनी नियति समझ बैठना एक विडंबना है जिसमें सरकार और जनता दोनों सहभाग है। एक बहरी है जबकि दूसरी मूक। लालू ही एक ऐसे बोलने वाले व्यक्ति थे जिनमें माइलेज के लिए (भले ही राजनीतिक फायदे के लिए ही) कुछ भी कर गुजरने का जज्वा था। अब उनके साथ कोशी के लोगों का कुछ भी सध नहीं सकता। पर इस मुद्दे और समस्या को एक बार उनके साथ शेयर करना लाजिमी था, जो नहीं हो सका। छोटी रेल लाइन्स का कोशी के तटबंधों तक विस्तार, बांधों की सुरक्षा और अन्य योजनाओं के लिए लालू एक अच्छा प्रारंभ कर सकते थे। अगर लालू जी सार्वजनिक रूप से भी इन योजनाओं को स्वीकार कर लेते, तो यह एक माइलस्टोन हो सकता था।
शायद एक नये सिरे से इसे अभी भी शुरू किया जा सकता है। पर करना आवश्यक है। चाहे करने वाले कहीं भी हो, वे इसमें अपना योगदान दे सकते हैं। इन अभियानों को चलाने का अच्छा समय अभी ही है जब कोशी क्षेत्र की समस्याओं के विभिन्न आयामों को संबोधित किया जा सकता है। ममता बनर्जी और बिहार को एक-दूसरे से एलर्जी है। इसलिए उनसे कोई उम्मीद करना ही व्यर्थ है। लेकिन विश्व बैंक भी ऐसी योजनाओं के लिए मदद देती है। जरूरी है योजनाओं को शुरू करने की।
आपकी लेखनी की सुलझी हुई भाषा से विषय और भाषा का अंतर मिट जाता है और दोनों एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। आप जैसे(सपूतों) की सेवा ही मूक जनता की आशाओं को प्रश्रय दे सकती है। कृपया अपनी उमंगों को अपनी प्रभावी लेखनी से चलते रहने दें।
सादर
कृपाकांक्षी
मणिकांत ठाकुर
कैलिफोर्निया (संयुक्त राज्य अमेरिका
)
(नोट- पत्र में व्यक्तिगत अर्थ के कुछ अंश हटा दिए गए हैं और उन्हीं बातों को रखा गया है जो सार्वजनिक महत्व के हैं।)

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

ऐसे अंत की अपेक्षा तो नहीं थी

ओबामा : धरती से ज्यादा अमेरिका की चिंता
मीनाक्षी अरोरा
जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन वार्ता का दुःखद अंत हो चुका है। डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन के बेला सेंन्टर में चले 12 दिन की लंबी बातचीत दुनिया के आशाओं पर बेनतीजा ही रही। कोपेनहेगन सम्मेलन में बातचीत के लिए जुटे 192 देशों के नेताओं के तौर-तरीकों से यह कतई नहीं लगा कि वे पृथ्वी के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। दुनियाँ के कई बड़े नेताओं ने बेशर्मी के साथ घोषणा की कि ‘यह प्रक्रिया की शुरुआत है, न की अंत’। 192 देशों के नेता किसी सामुहिक नतीजे पर नहीं पहुँच सके, झूठी सदिच्छाओं के गुब्बारे के गुब्बार तो बनाए गए, पर किसी ठोस कदम की बात कहीं नहीं आई। कोपेनहेगन सम्मेलन मात्र एक गर्मागर्म बहस बनकर खत्म हो चुकी है।कोपेनहेगन की शुरुआत ही जिन बिन्दुओं पर होनी थी, वह विकसित देशों के अनुकूल नहीं थी। कार्बन उत्सर्जन में कानूनी रूप से अधिक कटौती का वचनबद्धता, कार्बन उत्सर्जन के प्रभावी रोकथाम के लिए एक निश्चित समय सीमा की प्रतिबद्धता, कार्बन उत्सर्जन में 1990 के स्तर से औसत 5 प्रतिशत तक कटौती आदि ऐसे मुद्दे थे जिनपर विकसित देश किसी भी स्थिती में तैयार नहीं होने वाले थे।कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन के मसले पर ‘सार्थक समझौते’ की निरर्थकता इसी बात से साबित हो जाती है कि सार्थक समझौते में गिनती के 28-30 देश ही शामिल हैं। बाकी देश इसे पूरी तरह खारिज कर चुके हैं। 18 दिसंबर को ही कोपेनहेगन की असफलता साफ नजर आ गयी थी, जब एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरु हुआ। दुनिया भर से आईं वरिष्ठ हस्तियां एक दूसरे पर दोषारोपण कर रही थीं। 130 विकासशील देशों के समूह जी77 ने ओबामा पर आरोप लगाया कि, “ओबामा ने अमरीका के लिए कार्बन उत्सर्जन को कम करने की बात से इंकार करके गरीब देशों को हमेशा के लिए गरीबी में ढकेल दिया है।” एक प्रवक्ता ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोपेनहेगन की असफलता जलवायु परिवर्तन के इतिहास में सबसे बुरी घटना है।कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन के मसले पर ‘सार्थक समझौते’ की निरर्थकता इसी बात से साबित हो जाती है कि सार्थक समझौते में गिनती के 28-30 देश ही शामिल हैं। बाकी देश इसे पूरी तरह खारिज कर चुके हैं। 18 दिसंबर को ही कोपेनहेगन की असफलता साफ नजर आ गयी थी, जब एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरु हुआ। दुनिया भर से आईं वरिष्ठ हस्तियां एक दूसरे पर दोषारोपण कर रही थीं। पाबलो सोलोन, संयुक्त राष्ट्र के बोलिवियन राजदूत ने मेजबान डेनमार्क पर आरोप लगाते हुए कहा कि ‘उंहोंने दुनिया के नेताओं के आगे मसौदा रखने से पहले मात्र कुछ देशों के समूह को ही तैयार करने के लिए दे दिया। यह कैसे हो सकता है कि 190 देशों को दर किनार करके मात्र 25-30 देश अपनी ही खिचड़ी पकाकर बाकी देशों को परोस दें। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।‘लेकिन दूसरी ओर अमीर देशों ने अपने पक्ष को मजबूत करते हुआ कहा कि विकासशील देशों ने एक ठोस बातचीत की बजाय प्रकिया पर ज्यादा वक्त जाया किया है। वार्ता के तुरंत बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ब्राउन ने कहा, कि यह तो बस एक पहला कदम है, इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने से पहले बहुत से कार्य किए जाने हैं। एक सवाल का जवाब देते हुए उंहोंने इसे ऐतिहासिक कॉन्फ्रेंस मानने से भी इंकार कर दिया। ओबामा भी विश्व नेताओं के सामने काफी विचलित से दिख रहे थे। हालांकि अमरीका से हिलेरी क्लिंटन ने घोषणा की थी कि अमरीका विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए 100 बिलियन डॉलर की मदद करेगा लेकिन ओबामा ने गरीब देशों को सहायता मुहैया कराने और कार्बन उत्सर्जन में कमीं करने का कोई दावा नही किया। अपनी बातचीत में ओबामा ने यह तो कहा कि अमरीका क्लीन एजेंडा अपनाएगा। लेकिन विकासशील देश इस बात से निराश थे कि ये सब कहने के लिए हैं लिखित रूप से कोई भी दावा नहीं किया गया। इतना ही नहीं, जिस जलवायु परिवर्तन संबंधी कानून के लिए पर्यावरणीय संगठन कईं महीनों से मांग कर रहे थे उंहोंने सीनेट को कोई कानून बनाने के लिए दबाव नहीं डाला। मसौदे में यह सदिच्छा तो है कि ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री की सीमा पर ले आना चाहिए लेकिन इसमें कोई कानूनी बाध्यता नहीं रखी गई। मसौदे को तैयार करने वाले ब्राउन सहित सभी 28 देशों ने आज सवेरे वार्ता को अगले साल दिसम्बर 2010 तक के लिए स्थगित करने का प्रस्ताव रखा जब तक संयुक्त राष्ट्र की मेक्सिको में जलवायु परिवर्तन पर अगली बैठक नहीं हो जाती।लेकिन कोपेनहेगन से जो मसौदा सामने आया है वह न केवल दुनिया में शक्ति संतुलन सुनिश्चित कर सकता था बल्कि भावी पीढ़ियों का भविष्य भी निर्धारित कर सकता था। लेकिन यह समझौता बिना किसी ठोस निष्कर्ष के फ्लॉप हो गया। कोपेनहेगन वार्ता निम्न बिंदुओं पर फ्लॉप हो गईःतापमान : "ग्लोबल तापमान में वृद्धि 2 डिग्री से कम होनी चाहिए।"इससे 100 से भी ज्यादा देश निराश हो गए जो तापमान में अधिकतम 1.5 डिग्री की कमीं चाहते थे, इसमें वे सभी छोटे-छोटे द्वीपीय देश भी शामिल हैं जो इस बात से भयभीत हैं कि इस लेवेल पर भी उनके घर डूब ही जाएंगे।कार्बन उत्सर्जन के लिए समय सीमा"हमें वैश्विक और राष्ट्रीय उत्सर्जन की सीमा को जल्द से जल्द पाने के लिए के लिए सहयोग करना चाहिए, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि विकासशील देशों में यह समय ज्यादा लग सकता है…" इस वक्तव्य से वे देश निराश हो गए जो कार्बन उत्सर्जन के लिए एक तिथि निर्धारित करना चाहते थे। "सभी पक्ष इस बात का वादा करते हैं कि वे व्यक्तिगत रूप से या मिलकर 2020 तक तार्किक रूप से कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य में कटौती करेंगे। "इस तथ्य के अनुसार विकसित देशों को अपने मध्यकालीन लक्ष्य तक तुरंत पहुंचने के लिए अभी से काम शुरु करना होगा। अमरीका को 2005 के स्तर पर 14-17फीसदी कमीं करनी होगी, यूरोपीय संघ को 1990 के स्तर पर 20-30फीसदी, जापान को 25 और रूस को 15-25फीसदी की कटौती करनी होगी। "वनों की कटाई को रोकने, अनुकूलन, प्रौद्योगिकी विकास और हस्तांतरण और क्षमता के लिए पर्याप्त वित्त का मामला"यह बहुत ही जटिल है क्योंकि 15 फीसदी से भी ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के लिए पेड़ों के कटाव को जिम्मेदार माना गया है। वार्ता में शामिल समूहों का मानना है कि इस तर्क में सुरक्षा मानकों की कमीं है।पूंजी: "विकसित देशों ने एक साथ मिलकर यह वादा किया है कि 2010-12 तक 30 बिलियन तक की कीमत वाले नए और अतिरिक्त संसाधनों को मुहैया कराएंगे.... विकसित देशों ने लक्ष्य निर्धारित किया है कि विकासशील देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए वे सब मिलकर 2020 तक प्रतिवर्ष 100 बिलियन डॉलर इकट्ठा करेंगे।"हालांकि अमीर देशों नें विकासशील देशों के प्रयासों के लिए शीघ्र आर्थिक सहयोग देने की बात कही है। दीर्घकाल में, बड़ा फंड कोपेनहेगन ग्रीन क्लाइमेट फंड में जाएगा। लेकिन समझौते में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि यह फंड कहां से आएगा, और इसका इस्तेमाल कैसे होगा।
वार्ता में दरकिनार किए गए पूर्व मसौदे के मुख्य तत्व: वार्ता में क्योटो को परिवर्तित करने का प्रयास किया गया है। क्योटो का साफ कहना था कि "हमारा दृढ़ निश्चय है जलवायु परिवर्तन पर एक या अधिक नए कानूनी साधनों को अपनाना होगा…"। दरअसल यह प्रस्तावना ही अमार देशों के वार्ताकारों के सामने सबसे बड़ी बाधा थी। इससे यह सवाल खड़ा हुआ कि क्योटो प्रक्रिया को बरकरार रखा जाए या नहीं। सब जानते हैं कि संधि के लिए डेडलाइन की बात का काफी गंभीर मतलब है, लेकिन मसौदे के अंतिम रूप में इस तय समय सीमा को छोड़ दिया गया और कहा गया कि यह अगले साल होगा।हसरतों को पंख मिलने के उम्मीद में लोग कोपेनहेगन सम्मेलन को होपेनहेगन नाम से बुला रहे थे, पर अब लोग बहुत बूरी तरह गुस्से में और दुखी हैं। जब कई देशों के नेता कोपेनहेगन से रवाना हो रहे थे, तो ब्रिटेन के ग्रीनपीस के कार्यकारी निदेशक जॉन सॉवेन ने बीबीसी से कहा कि कोपेनहेगन एक ऐसी अपराधभूमि की तरह लग रहा है जहाँ से अपराधी स्त्री-पुरुष एयरपोर्ट की ओर रवाना हो रहे हैं। (इंडिया वाटर पोर्टल हिन्दी)

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

इब्दिता से पहले तय था अंजाम (कोपेनहेगन-15)

कोपेनहेगन-15 ! बहुत आस थी, लेकिन अंजाम तय था । वार्ता खात्मे की ओर है। लेकिन कुछ भी कांक्रिट समझौता नहीं हुआ।पर्यावरण प्रेमी निराश होकर डेनमार्क छोड़ रहे हैं, तो कुछ इसे पिकनिक विजिट की तरह भी ले रहे हैं। विश्वास नहीं हो, तो देखिये उपरोक्त तस्वीर।


पैसे से जीत लेंगे जग ! पर्यावरण संकट के मुद्दे पर भी अमेरिका का अहं सामने आ गया। अमेरिका के विदेश मंत्री ने कहा कि गरीब देश कार्बन उत्सर्जन घटाये हम उन्हें प्रति वर्ष एक सौ बिलियन डॉलर देंगे। लेकिन खुद अपनी राजशी ठाठ में कमी नहीं लायेंगे और कार्बन की रफ्तार जारी रखेंगे। लेकिन जिन्हें पैसे देंगे उसकी थानेदारी भी करेंगे कि वह कार्बन उत्सर्जन घटा रहा है कि नहीं।

क्या यही बाकी निशा होगा ! डेनमार्क के समुद्र तट पर पर्यावरण संकट और मानव जाति के भविष्य को लेकर चिंतित मानव-बूत !

अब क्या करेंगे द्वीपीय देश ! सलाह बेमुनासिब नहीं है।

नक्कारखाने में तूती की आवाज ! किसी ने नहीं सुनी पर्यावरण प्रेमियों की अपील।अब क्या करेंगे





सोमवार, 14 दिसंबर 2009

घोघो रानी कितना पानी

बचपन में दादी कहानी सुनाती थीं, घोघो रानी की। कहानी एक भोली-भाली लड़की घोघो रानी और एक निर्मम राजा की है। नदी में उतरने के लिए विवश घोघो पूछती रही- अब कते दूर ? राजा वहलाता रहा- थोड़ी दूर और ... घोघो आगे बढ़ती गयी, पानी भी बढ़ता गया । घोघो पूछती रही- भर कमर पानी में पहुंचे हो राजा, अब कते दूर ? ... बस थोड़ी ही दूर और ... भर नाक पानी में पहुंचे हो राजा, और कते दूर ? थोड़ी ही दूर... अंततः रानी डूब गयी...
भ्रष्टाचार के विषबेल से आच्छादित देश को देख घोघो रानी की वह प्राणांतक कहानी याद आ जाती है। भ्रष्टाचार की नदी में समाजरूपी घोघो डूब रहा है, लेकिन समाज के नियंता फुसलाते ही जा रहे हैं- थोड़ी दूर और ... खबर आयी है कि देश के उपराष्ट्रपति की पत्नी से भी अधिकारियों ने रिश्वत की मांग ली। नहीं मिली तो उनके आवेदन को डस्ट बीन में डाल दिया। खबर के अनुसार, उपराष्ट्रपति डॉ. हामिद अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी ने कहा है कि रिश्वत नहीं देने के कारण उनके स्कूल को अनुदान की राशि आवंटित नहीं की गयी। पांच साल बीत गये पर अलीगढ़ में गरीबों के लिए संचालित उनके स्कूलों को फंड नहीं मिला। कई बार स्कूल के स्टाफ से फंड रिलीज करने की एवज में रिश्र्वत मांगी गयी।
खबर के अनुसार, अलीगढ़ में अलनूर चैरिटेबिल सोसायटी संस्था द्वारा चाचा नेहरू व अलनूर मदरसे के अलावा एक स्कूल संचालित किया जाता है, जिसमें 1800 गरीब बच्चे पढ़ते हैं। संस्था वित्तीय संकट से गुजर रही है। वित्तीय मदद के लिए सलमा अंसारी ने केन्द्र सरकार से अनुरोध की थी, जिस पर राज्य सरकार से अनापत्ति प्रमाण पत्र आवश्यक था। पांच साल बीत गये पर राज्य के अधिकारियों ने प्रमाण पत्र निर्गत नहीं किया। अधिकारियों ने 5 से 25 हजार रुपए की रिश्वत मांगी। मांग पूरी नहीं हुई, तो फंड भी रिलीज नहीं हुआ।
यह घटना साबित करती है कि देश में भ्रष्टाचार का आलम क्या है। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि भ्रष्टाचार अब विषाणु ही नहीं रहा, जो चोरी-छिपे समाज को अपनी गिरफ्त में ले रहा है, बल्कि यह बेखौफ राक्षस हो चुका है । इस वाकये से स्पष्ट है कि भ्रष्टाचारियों को अब किसी का भय नहीं रहा। और यही बात सबसे ज्यादा खौफ पैदा करती है। भ्रष्टाचार और बेखौफ भ्रष्टाचार में बहुत बड़ा अंतर है। भ्रष्टाचार कहीं भी और किसी भी समाज-व्यवस्था में हो सकता है, लेकिन बेखौफ भ्रष्टाचार उसी सामाजिक व्यवस्था में रह सकता है जो व्यवहारिक तौर पर अप्रसांगिक हो चुकी हो। कहने की आवश्कता नहीं कि अप्रसांगिक सामाजिक व्यवस्था में कोई भी अनर्थ संभव है। अप्रसांगिक सामाजिक व्यवस्था उस छतरी की तरह है जिसमें हजारों छेद हो, लेकिन जो बारिश से बचाने का भ्रम तो पैदा कर सके, लेकिन बारिश में कोई राहत नहीं दे।
लोग चुप हैं। कोई इसे सामाजिक शिष्टाचार कह रहा है, तो कोई आधुनिक जीवन की शैली। इसलिए हमारी शिक्षा प्रणाली पर भी संदेह पैदा होता है। हमारे यहां साक्षरता का ग्राफ बढ़ रहा है, लेकिन समाज का बौद्धिक स्तर शायद गिर रहा है। हम शिक्षित हो रहे हैं, शायद जागरूक नहीं हो रहे। समझ में नहीं आता कि बढ़ती साक्षरता के बाद भी समाज यह कैसे मान ले रहा है कि भ्रष्टाचार सामाजिक शिष्टाचार हो सकता है। यह तो कुछ एैसी ही बात हो गयी कि कोई कहे कि एड्‌स के विषाणु शरीर के अंग हो गये हैं। भ्रष्टाचार, न सिर्फ समाज के चरित्र को कमजोर करता है, बल्कि उसके भविष्य को भी निगल जाता है। भ्रष्ट समाज की संप्रभुता कभी भी सुरक्षित नहीं रह सकती। भ्रष्ट समाज में सामूहिक सौहार्द नहीं आ सकता। वहां स्थायी शांति कभी नहीं आ सकती।
 

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

और अब खड़मांचल राज्य की मांग (व्यंग्य)

आम तौर पर घुंघरू दादा खड़मटोली मोहल्ले की किच-किच, खीच -खीच में कोई रूचि नहीं रखते। उनका मानना है कि मोहल्ला है, तो रगड़-झगड़, चोरी-नुक्की, छेड़-छाड़, गाली-गलौज और ओल-झोल-आफत आदि तो होंगे ही। मोहल्ले की बिजली समस्या पर उनकी टिप्पणी होती है, "बिजली किसी की घरवाली नहीं कि सात जनम तक साथ रहे । आये तो जाये नहीं।' एक दिन मोहल्ले के स्कूल के सामने वाली सड़क के खुले मेन होल में एक स्कूली बच्चा गिर गया और लोगों ने सड़क जाम कर दी। घुंघरू दादा का कहना था कि मोहल्ले के लोग पगला गये हैंं। अपने बच्चे को तो संभाल नहीं पाते, चले हैं नगर निगम को दुरूस्त करने। बुड़बक कहीं के..
घुंघरू दादा के दिन की शुरुआत हड़िया-भरे लोटा से होती है जो देर रात के गांजे की सोंट के साथ ही मुकम्मल होता है। शहर में गांजे की कमी होने पर घुंघरू दादा आपे से बाहर आ जाते हैं, सारा दिन बीड़ी फूंकते रहते हैं और सामने से गुजरने वाले हर शख्स को गलियाते रहते हैं। यहां तक कि कभी-कभी हवा, धूप, पेड़-पौधे तक को अपनी देसी-मार्के गालियों से रगेद देते हैं। "इ पुरवा हवा को ससुरा यही मोहल्ला भेंटाया था, चौबीसों घंटे सर्र-सर्राने के लिए...।
मोहल्ले के चौक के पीछे हाउसिंग बोर्ड के खंडहरनुमा घर के उत्तरवरिया कोने में मंगरा की चाय दूकान, उनका पसंदीदा बैठकखाना है। मंगरा को कभी-कभी गांव जाना पड़ता है। तब घुंघरू दादा ही दूकान के कर्ता-धर्ता की भूमिका में आ जाते हैं। हालांकि मंगरा की घरवाली हमेशा इसका विरोध करती है और कहती है, " मंगरा की अनुपस्थिति में दूकान का चारज उसके हाथ में होना चाहिए। घुंघरूआ दस के बेचकर पांच का हिसाब देता है और बाकी हड़िया-गांजे के लिए हड़प लेता है।'
लेकिन इधर तीन-चार दिनों से घुंघरू दादा के ऊपर एक नया सनक सवार हो गया है। बीच चौक में उन्होंने आमरन अनशन ठान दिया है। हड़िया और गांजा भी त्याग दिए हैं। कहते हैं, इस मोहल्ले को अलग करो। इसे राज्य का दर्जा दो। जब तक इस मोहल्ले को अलग राज्य नहीं बनाया जायेगा, हम अनशन नहीं तोड़ेंगे। घुंघरू दादा के इस आंदोलनकारी भेष को देखकर समूचा खड़मटोली सकते में है। लोग पूछ रहे हैं कि अचानक घुंघरू दादा पर अलग राज्य का भूत कहां से सवार हो गया ? उत्सुकता जब हद पार कर गयी, तो लोगों ने जाकर पूछ ही लिया, "दादा आप खड़मटोली को राज्य क्यों बनाना चाहते हैं, भला मोहल्ला भी राज्य बन सकता है क्या ? दादा कहने लगे,"प्रेस वालों को बुलाओ, फोटोग्राफरों को बुलाओ। कैमरे के सामने ही यह राज खोलेंगे। तुम्हें क्या मालूम कि यह खड़मटोली स्वतंत्रता से पहले से ही राज्य बनने की हैसियत रखता है। इस मोहल्ले के लोगों की जुबान दूसरे मोहल्ले के लोगों से अलग है। यहां के लोग मां की गाली से पहले बाप की गाली देते हैं। हड़िया बनाने में इस मोहल्ले का जवाब नहीं। इसे तो बहुत पहले अलग राज्य बना दिया जाना चाहिए था। अबे, मोहल्ला राज्य क्यों नहीं बन सकता ? हमारे मोहल्ले की आबादी, कई देशों से ज्यादा है। समूचे कामतापुर से ज्यादा लोग रहते हैं खड़मटोली में । सुन लो सब कोई, अगर अलग राज्य नहीं मिला तो मैं अनशन करके जान दे दूंगा।' लोगों ने कहा, "ठीक है दादा, प्रेस वाले आ जायेंगे, लेकिन पहले आप हमलोगों को तो बता दीजिए कि अलग राज्य बनाकर हमें मिलेगा क्या ? ' लोगों की जिज्ञाशा देखकर दादा भावुक हो गये। बोले, "अलग राज्य बनेगा, तो अपना शासन होगा। दूसरे मोहल्ले के लोगों के शोषण से मुक्ति मिलेगी। मैं इस राज्य का सीएम बनूंगा। खड़मटोली को को स्वर्ग बना दूंगा। ' लोगों ने पूछा,"लेकिन आप सीएम ही क्यों बनना चाहते हैं।' दादा बोले, "सीएम बनूंगा और सीएम ही बनूंगा। मोहल्ले के सबसे बड़े घर को मुख्यमंत्री आवास बनाऊंगा। देश-विदेश का दौरा करूंगा। दुनिया के सारे बैंकों में खाते खुलबाऊंगा। पत्नी, बेटे-बेटी के नाम से कई प्लॉट खरीदूंगा।' लोगों ने पूछा, "पर इससे मोहल्लेवालों को क्या फायदा होगा ?' दादा बोले, "फायदा होगा कैसे नहीं, सीएम बनते ही मैं हड़िया को राज्यकीय पेय घोषित कर दूंगा। गांजा की बिक्री खुलेआम होगी। मोहल्ले के सभी बेरोजगारों को सचिवालय में नौकरी दिला दूंगा। इस राज्य में कोई भी बेरोजगार नहीं रहेगा। जिसे नौकरी नहीं मिलेगी उसे बैठे-बिठाये पेंशन मिलेगा। सैर करने के लिए दोपहिया मोटर साइकल, बात करने के लिए मोबाइल और जेब खर्चे के लिए मासिक भत्ते मिलेेंगे। खड़मटोली में कोयले-लोहे की जितनी भी खदाने हैं, उन्हें मोहल्ले वालों के नाम लिख दूंगा।'
फिर क्या था, मोहल्लेवासियों में गजब की जोश आ गयी । दादा की जय-जयकार होने लगी । नारे गुंजने लगे, "हमारी मांग पूरी करो।' ... खड़मटोली को खड़मांचल बनाओ। घुंघरू दादा ! जिंदावाद !! '

बुधवार, 9 दिसंबर 2009

बेपर्द होने लगे विकसित देशों के गुप्त मसौदे


मीनाक्षी अरोरा, कोपेनहेगन में
कोपेनेहेगेन जलवायु वार्ता जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे आशा और उम्मीदों के दिये कमजोर पड़ते जा रहे हैं। धरती गरम होती जा रही है, दुनिया के सैकड़ों द्वीप डूबने के कगार पर हैं, भारत के सुंदरवन के ही चार से ज्यादा द्वीप डूब चुके हैं। इन सबके बावजूद विकसित देश कोपेनेहेगेन जलवायु वार्ता में भी असल मुद्दे को छोड़कर अपनी चालबाजियों को अंजाम देने पर ही ज्यादा आमादा हैं। अब उनके कई गुप्त एजेंडे ओट से बाहर आने शुरू हो गये हैं।
7-18 दिसंबर तक चलने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सभा (यूएनएफसीसी) के कोपेनहेगन सम्मेलन के बीच की कई अंदरूनी जानकारियां अब बाहर आ रही हैं। इन जानकारियों के मद्देनजर कोप15 से कोई होप नजर नहीं आ रही है। ऐसा लगता है कि कोप 15 सचमुच विकासशील देशों को कोप में रखने का अखाड़ा बनता जा रहा है और विकसित देश फिर अपने विनाशकारी उपभोग की जीवनशैली को हर कीमत पर सुरक्षित रखते हुए विकासशील और गरीब देशों को इसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार करने में भीड़ गये हैं।
जलवायु वार्ता उस समय अमीर-गरीब वार्ता मे बदल गई जब विकासशील देशों ने एक गुप्त दस्तावेज लीक होने के बाद नाराजगी और विरोध जाहिर किया है। लीक हुए दस्तावेज से यह साफ हो गया कि अगले सप्ताह दुनिया के नेताओं को एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जाएगा जिससे न केवल अमीर देशों की शक्तियां बढ़ेंगीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका भी सीमित हो जाएगी। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर किसी संभावित समझौते के मामले में अमीर और विकासशील देशों के बीच मतभेद गहरा गया है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सम्मलेन के दूसरे दिन ही मेज़बान देश डेनमार्क का मसौदा लीक हो गया है। इसे अमीर देशों की ओर से तैयार किया गया है। इस रहस्यमयी तथा-कथित समझौते पर मात्र कुछ लोगों द्वारा काम किया गया है, जिसे सर्किल ऑफ कमिटमेंट का नाम दिया गया है- हैरानी की बात तो यह है कि जिस समझौते पर दुनिया के नेता हस्ताक्षर करने वाले हैं और इसी सप्ताह उसे अंतिम रूप दिया जाना है उसे ब्रिटेन, अमेरिका और डेनमार्क सहित कुछ मुट्ठीभर देशों को ही दिखाया गया है।
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, पर्यावरणविदों के मुताबिक़ यह मसौदा अमीर देशों के प्रति बहुत नरम है। विकासशील देशों का मानना है कि इस दस्तावेज में सन्‌ 2050 तक प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन में भी विकसित और विकासशील देशों के बीच बनाई गई समय-सीमा में भी असमानता है। यानी कि अब अमीर देशों को दोगुना कार्बन उत्सर्जन करने की भी इजाजत मिल जाएगी। इतना ही नहीं इसमें विकासशील देशों को पर्याप्त धन देने का भी सुझाव नहीं है ताकि वे बढ़ते तापमान का मुकाबला करने के उपाय लागू कर सकने में सक्षम हों।
पर्यावरणविदों का तो यहां तक कहना है कि कोपेनहेगेन सम्मेलन का एक तात्कालिक उद्देश्य यह भी है कि क्योतो जलवायु संधि के बाद की संिध पर सहमति बने। क्योंकि क्योतो संधि की अवधि वर्ष 2012 में ख़त्म हो रही है ,लेकिन यह मसौदा क्योतो प्रोटोकाल को भी नकार रहा है जिसमें अमीर देशों को ही सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार मानकर एक बाध्यकारी समझौता करने के लिए कहा गया था।
दुनिया की लगभग 15 प्रतिशत आबादी का नेतृत्व करने वाले दुनिया के लगभग 85 प्रतिशत संसाधनों का उपभोग कर रहे विकसित देश किसी कीमत पर अपनी राजशी छोड़ना नहीं चाहते। 1992 में रियो द जेनिरो (ब्राजील) में हुए पहले पृथ्वी सम्मेलन में जब किसी ने यह कह दिया कि पृथ्वी ग्रह के विनाश के लिए अन्य कारणों के साथ-साथ पश्चिम के लोगों का अति उपभोग भी जिम्मेदार है तो वहां उपस्थित तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश (सीनियर) तपाक से बोल पड़े- हमारी जीवनशैली पर कोई बहस नहीं हो सकती है। कहीं कोपेनेहेगेन में चल रहे गुप्त मसौदे के पीछे भी यही मंशा तो नहीं है?
संयुक्तराष्ट्र को किनारे करने की कोशिश
चूंकि यह मसौदा गुप्त रूप से तैयार किया गया है इसलिए इसके पीछे की मंशा साफ जाहिर हो रही है कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा वार्ता में पहुंचे और पूरी पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी हो तो सभी नेता उनके एक इशारे पर चुपचाप इस रहस्यमयी समझौते पर हस्ताक्षर कर दें। एक कूटनीतिज्ञ के अनुसार, ये सब इसलिए किया जा रहा है ताकि संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ता प्रक्रिया का पूरी तरह अंत हो जाये। संयुक्तराष्ट्र को दरकिनार करके जलवायु परिवर्तन की बातचीत में विश्व बैंक की भूमिका का मसौदा गुप्त रूप से बना रहा है। क्योंकि विश्व बैंक में लोकतंत्र नहीं है। वन कंट्री , वन वोट के सिद्धान्त पर चलने वाला संयुक्तराष्ट्र अमेरिका के लिए असुविधा पैदा करता है। जितनी पूंजी, उतने वोट के सिद्धान्त पर चलने वाला विश्व बैंक अमेरिका के लिए ज्यादा काम का है।
विश्व बैंक की भूमिका
ऑक्सफैम इंटरनेशनल के क्लाइमेट सलाहकार एंटोनियो हिल के अनुसार, इस मसौदे में एक ग्रीन फंड का भी प्रस्ताव है जिसका प्रबंधन करने के लिए एक बोर्ड होगा, लेकिन उसका सबसे खतरनाक पहलू ये हैं कि यह सब विश्व बैंक और ग्लोबल इनवायरनमेंट फैसिलिटी के हाथ में रहेगा। ग्लोबल इनवायरनमेंट फैसिलिटी 10 एजेंसियों का एक साझा समूह है जिसमें विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम शामिल हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र शामिल नहीं है। इस तरह यह मसौदा फिर से विकासशील देशों की बातचीत में बाधा डालने की अनुमति अमीर देशों को दे रहा है।
यह मसौदा डेनमार्क और दूसरे अमीर देशों ने एक कार्यकारी एजेंडे के तौर पर तैयार किया है, जिसे सभी देश अगले सप्ताह स्वीकार करेंगें। ऊपरी तौर पर अच्छा लगने वाला यह मसौदा वास्तव में बहुत खतरनाक साबित होगा क्योंकि इसमें संयुक्त राष्ट्र की वार्ता प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया गया है और अमीर देशों की तानाशाही स्थापित की गई है।
एंटोनियो हिल ने स्पष्ट तौर पर कहा भी है कि हालांकि यह एक मसौदा है लेकिन इसमें खतरा साफ दिखाई दे रहा है, जब-जब अमीर देश हाथ मिलाते हैं और एक होते हैं तो गरीब देशों की आवाज को दबा देते हैं। मसौदे मे बहुत सी खामियां हैं, इनमें ऐसा कुछ भी नहीं कहा गया है कि कार्बन उत्सर्जन में 40 फीसद कटौती होनी चाहिए, जैसा कि विज्ञान के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से निपटने के लिए जरूरी है।
हालांकि इसमें ये वादा किया गया है कि दुनिया भर के देश जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे तापमान में बढ़ोत्तरी को दो फ़ीसदी से भी कम रखेंगे और तापमान में बढ़ोत्तरी को दो सेंटीग्रेट से कम रखने की बात हैं, लेकिन यह नहीं बताया गया है कि अमीर देश इस पर किस तरह अमल करेंगे। यह बहुत ही ख़तरनाक है। पर्यावरण से जुडी संस्था फ्रेंड्‌स ऑफ़ अर्थ के कार्यकारी निदेशक एंडी एटकिन्स का कहना है कि यह मसौदा पहली नज़र में बहुत अच्छा दिखता है, पर है बहुत ख़तरनाक। इसमें क्योटो प्रोटोकोल की अनदेखी की जा रही है।
बीबीसी की एक जानकारी के अनुसार क्योटो में वर्ष 1997 में हुई संधि की सबसे मुख्य मुद्दा औद्योगीकृत देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तर से क़रीब सवा पॉंच प्रतिशत कम करने का था। क्योतो संधि बाध्यकारी नहीं थी और अमेरिका ने इस पर हस्ताक्षर भी नहीं किए थे। इसलिए इससे ज़्यादा उम्मीदें लगाई भी नहीं गई थीं। कोपेनहेगेन के जलवायु पिरवर्तन सम्मेलन में कोशिश, क्योतो संधि से कहीं ज़्यादा महत्वाकांक्षी संधि पर सहमति बनाने की है जो कि क़ानूनन बाध्यकारी भी हो। लेकिन असलियत में यह किसके लिए बाध्यकारी होगा, यह बताने की शायद अब जरूरत जरूरत नहीं रह गयी है।
फिलहाल तो पर्यावरण के सुधरने की संभावना कम ही नजर आ रही है। उपभोगवादी जीवनशैली, अंधाधुंध औद्योगीकरण, कंक्रीट के बढ़ते जंगल, खेती का नाश, जल-जंगल-जमीन पर पूजीपतियों का कब्जा, नदियों, तालाबों और समुद्र को जहरीला होने से नहीं रोका गया, तो कोपेनहेगन जैसे सम्मेलन भी बेनतीजा ही रहेंगे।
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