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| बिहार के सीमांत जिले अररिया, किशनगंज, कटिहार और पूर्णिया में पोरस बॉर्डर से होकर जो समस्याएं प्रवेश कर रही हैं, उनके दूरगामी परिणाम घातक होंगे। सतत घुसपैठ ने जहां इन इलाकों को मानव से लेकर मवेशी तस्करों का पसंदीदा ठिकाना बना दिया है, वहीं गरीबी, जनसंख्या विस्फोट, धार्मिक आडंबर आदि भी बढ़ते जा रहे हैं । आलम यह है कि पशु तस्करों ने इलाके के सांड़ और सार्वजनिक भैंसा तक को नहीं बख्शा है। अररिया, सुपौल, किशनगंज जिले से अचानक सांड़ और भैंसा लापता हो रहे हैं। द पब्लिक एजेंडा की कवर स्टोरी में मैंने इस पर अलग से रिपोर्ट लिखी है। |
सोमवार, 30 जून 2014
बॉर्डर और बिहार
शनिवार, 2 नवंबर 2013
कर्पूरी से मोदी वाया सिमराही
दहाये हुए देस का दर्द-87
कोशी के कछार पर स्थित मेरा गांव सिमराही बाजार,
जिला- सुपौल, बिहार आज राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है। आज यहां
नरेंद्र मोदी के कदम पड़ने वाले हैं,जो पटना विस्फोट में मारे गये भरत रजक
के परिजनों से मिलने उनके घर पहुंच रहे हैं। गांव से आने वाले
मित्रों-परिचितों के फोन बता रहे हैं कि पिछले तीन दिनों से यहां बच्चों से
लेकर बूढ़ों तक हर जुबान पर मोदी-भाजपा का ही नाम है। यह
सुनकर मुझे 27-28 साल पुरानी एक बात याद आ रही है। तब इसी सिमराही बाजार
के माध्यमिक स्कूल में एक शाम कर्पूरी ठाकुर आये थे। ठीक से याद नहीं,
लेकिन यह शायद 1985 या 86 के अगस्त-सितंबर का महीना रहा होगा। पिता जी के
साथ मैं भी चला गया था ठाकुर जी की बैठक में। मैं सात-आठ साल का रहा होगा।
ठाकुर जी इलाके के तमाम वरिष्ठ समाजवादी नेताओं के साथ विचार-विमर्श कर रहे
थे। सारी बात तो याद नहीं, लेकिन एक बात आज भी मुझे याद है। कर्पूरी ठाकुर
ने उस शाम स्थानीय समाजवादी नेताओं से कहा था- मैं कोशी के लोगों के
भाइचारे, सीधापन और सहिष्णुता का मुरीद हूं। सामाजिक सौहार्दता क्या होती
है, यह बात पूरा देश कोशी से सीख सकता है। विभाजन से लेकर अयोध्या तक,
आजादी के पहले से लेकर वर्षों बाद तक देश में कई बबाल हुए, लेकिन कोशी का
सामाजिक सौहार्द हमेशा कायम रहा। अपने चरमोत्कर्ष के दौर में भी भाजपा को
यहां कमल उठानेवाले नहीं मिले।
लेकिन इस बात को पहले कांग्रेस फिर राजद और जद(यू) ने कोई मोल नहीं दिया, जिन्होंने यहां के लोगों के वोट से लंबे समय तक शासन किया। कोशी की समस्या यथावत बनी रही, दुनिया कहां से कहां चली गयी लेकिन कोशी के लोग अठारहवीं सदी का जीवन जीने के लिए मजबूर रहे। सरकारी उपेक्षा की यह कहानी बहुत लंबी है, जिस पर मैंने अपने ब्लाग में कई रिपोर्ट लिखी है। सरकार और विभिन्न दलों ने कोशी के लोगों को बंधुआ मजदूर समझा। अक्सर वे कहते थे- जायेगा कहां ? उनके सीधेपन की कोई कदर नहीं हुई। दूसरी ओर पूरब में बांग्लादेश से बेशुमार घुसपैठियों की आवाजाही होती रही और उन्हें अवैध संरक्षण मिलता रहा। इसके कारण किशनगंज, अररिया, कटिहार के लोगों को असुरक्षा महसूस होने लगी, तो बात पश्चिम की ओर यानी सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया तक फैलती चली गयी। और अब आलम यह है कि यहां भाजपा एक शक्ति हो चुकी है।
लेकिन इस बात को पहले कांग्रेस फिर राजद और जद(यू) ने कोई मोल नहीं दिया, जिन्होंने यहां के लोगों के वोट से लंबे समय तक शासन किया। कोशी की समस्या यथावत बनी रही, दुनिया कहां से कहां चली गयी लेकिन कोशी के लोग अठारहवीं सदी का जीवन जीने के लिए मजबूर रहे। सरकारी उपेक्षा की यह कहानी बहुत लंबी है, जिस पर मैंने अपने ब्लाग में कई रिपोर्ट लिखी है। सरकार और विभिन्न दलों ने कोशी के लोगों को बंधुआ मजदूर समझा। अक्सर वे कहते थे- जायेगा कहां ? उनके सीधेपन की कोई कदर नहीं हुई। दूसरी ओर पूरब में बांग्लादेश से बेशुमार घुसपैठियों की आवाजाही होती रही और उन्हें अवैध संरक्षण मिलता रहा। इसके कारण किशनगंज, अररिया, कटिहार के लोगों को असुरक्षा महसूस होने लगी, तो बात पश्चिम की ओर यानी सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया तक फैलती चली गयी। और अब आलम यह है कि यहां भाजपा एक शक्ति हो चुकी है।
गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013
माटी के पूत
शनिवार, 7 सितंबर 2013
तब हम गड्ढे वाले भी गाते
समंदर !
अगर रास्ता आगे से बंद न किया गया होता
अगर दिल्ली इस कदर बिल्ली न हुई होती
और बहती हुई हवा रोकी न गयी होती
और निकले हुए आंसू, पोंछे गये होते,
सच कहते हैं समंदर
तब तेरी शान में हम गड्ढे वाले भी गाते
पूनम की रात, ज्वार-भाटे के गीत
अगर रास्ता आगे से बंद न किया गया होता
अगर दिल्ली इस कदर बिल्ली न हुई होती
और बहती हुई हवा रोकी न गयी होती
और निकले हुए आंसू, पोंछे गये होते,
सच कहते हैं समंदर
तब तेरी शान में हम गड्ढे वाले भी गाते
पूनम की रात, ज्वार-भाटे के गीत
शनिवार, 8 जून 2013
हम
बच्चा कोई भी हो
बीच खेल से
बांह पकड़कर खींच लाओ,तो रोता है
कुछ चॉकलेट लेकर चुप हो जाता है
कुछ चॉकलेट फेंककर भी चुप नहीं होता
मगर हम नहीं समझते
शायद इसलिए
कि हम चॉकलेट देने और बांह मरोड़ने के आगे
सोच ही नहीं पाते
बीच खेल से
बांह पकड़कर खींच लाओ,तो रोता है
कुछ चॉकलेट लेकर चुप हो जाता है
कुछ चॉकलेट फेंककर भी चुप नहीं होता
मगर हम नहीं समझते
शायद इसलिए
कि हम चॉकलेट देने और बांह मरोड़ने के आगे
सोच ही नहीं पाते
शनिवार, 25 मई 2013
बगुला
वह पानी का जीव कभी नहीं था
पर पानी के पास ही रहता आया, सदियों से
पानी के बिल्कुल पास, मगर लहरों से बहुत दूर
हालांकि युगों के साथ उसके रंग बदलते रहे
लेकिन उसके मुंह का गंध कभी नहीं बदला
रत्ती भर भोथरा नहीं हुआ उसकी चोंच का नोक
तमाम नारे
और तमाम अकाल के बाद भी
वह बगुला ही रहा
पर पानी के पास ही रहता आया, सदियों से
पानी के बिल्कुल पास, मगर लहरों से बहुत दूर
हालांकि युगों के साथ उसके रंग बदलते रहे
लेकिन उसके मुंह का गंध कभी नहीं बदला
रत्ती भर भोथरा नहीं हुआ उसकी चोंच का नोक
तमाम नारे
और तमाम अकाल के बाद भी
वह बगुला ही रहा
बुधवार, 1 मई 2013
पलायन के दौर में मजदूर दिवस
केंद्र सरकार का मनरेगा और राज्य सरकार का विकास का मोहक नारा के बीच बिहार में मजदूर दिवस के क्या मायने हैं। रोजी-रोटी के लिए परदेस की यात्रा और पलायन की पीड़ा। यही बिहार के कामगारों की गाथा है। पहले भी थी और आज भी है। हिंदी दैनिक राष्ट्रीय सहारा के पटना संस्करण में प्रकाशित यह रिपोर्ट भले ही आपको दाल-भात में मूसलचंद लगे, लेकिन सच्चाई यही है।- रंजीत
दीपिका झा/एसएनबी पटना। कोशी की धार हर साल सैकड़ों गांव और असबाब ही अपने साथ बहाकर नहीं ले जाती बल्कि ले जाती है वो हजारों हाथ जो बिहार को आकार देते हैं। वर्ष 2011 के अंत में सामाजिक कार्यकर्ता मधु चंद्रा ने अपने अध्ययन में पाया कि पिछले पांच साल में इन राज्यों से पलायन पांच गुना बढ़ा है। उनके मुताबिक उत्तर-पूर्वी राज्यों से अगले पांच साल में पचास लाख मजदूर अन्य राज्यों की ओर पलायन कर सकते हैं। महानिर्वाण कलकत्ता रिसर्च ग्रुप ने अपने अध्ययन में बताया है कि सहरसा, मधेपुरा और सुपौल सर्वाधिक पलायन करने वाले जिलों में हैं। इनमें भी दलित और महादलितों का पलायन ज्यादा है। 2003 में किये गये एक सव्रे के मुताबिक राज्य में पलायन 28 फीसद से बढ़कर 49 फीसद तक पहुंच गया था। सरकारी दावा : पलायन में 30 फीसद कमी हालांकि राज्य सरकार की सितम्बर 2011 में आई एक रिपोर्ट में बताया गया कि बिहार से अन्य प्रदेशों में पलायन करने वाले मजदूरों की संख्या में 30 फीसद तक की कमी आई है। काम की तलाश में दिल्ली और अन्य राज्यों में जाने वाले जिलों सहरसा, कटिहार, पूर्णिया और
बिहार-यूपी से एक मिलियन बच्चों का पलायन, इनमें 5-14 वर्ष के 3 बच्चे बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के मुताबिक दो करो ड़ बिहारी हैं अप्रवासी मजदूर 1834 में राज्य से शुरू हुआ पलायन का दौर अब भी जारी है 1980 तक पंजाब व हरियाणा बिहारी श्रमिकों के लिए सबसे माकूल स्थान 1990 के बाद दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में होने लगा पलायन महाराष्ट्र , पंजाब, असम और गोवा जैसे राज्यों में हुए बिहारियों पर अत्याचार पिछले दस साल में बिहारी अप्रवासी श्रमिकों में एचआईवी का प्रसार ज्यादा कानून में जगह पलायन करने वाले मजदूरों के हित के लिए देश में अंतरराज्यीय अप्रवासी कामगार एक्ट, 1979 लागू राज्य सरकार के बीस सूत्री कार्यक्रम में अप्रवासी मजदूरों के लिए कल्याण योजना को दी गई जगह हर 49 महिलाओं वाले निर्माण स्थलों पर बच्चों की देखभाल के लिए क्रेश की सुविधा अनिवार्य है काम के दौरान घायल होने पर अप्रवासी कामगार को एक लाख का अनुदान देने की सरकार की घोषणा बिहार और झारखंड सरकार ने अप्रवासी मजदूरों को स्मार्ट कार्ड देने की योजना पर करार किया है
शिवसागर रामगुलाम को कौन नहीं जानता। रोजगार के लिए बिहार से पलायन कर सुदूर देश जाने वाले इस मजदूर ने अपने जैसे हजारों कामगारों की मदद से जो मुकाम हासिल किया उसे हम मॉरीशस के नाम से जानते हैं। 1961 से 1982 तक इस देश के प्रधानमंत्री रहे रामगुलाम आज बिहार के गौरव हैं तो मॉरीशस बिहारियों का बनाया हुआ स्वर्ग। लेकिन पलायन की यह सुनहरी कहानी आज बदरंग हो गई है। पलायन अब हर पल की यातना बन चुकी है। हमारा राज्य उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के उस क्लब में शामिल हो गया है जहां से सबसे ज्यादा मजदूर दूसरे प्रदेशों में काम के लिए पलायन करते हैं और जो सबसे ज्यादा दुश्कर तथा अपमानजनक परिस्थितियों में गुजारा करते हैं।
शेख ने कहा, ैएीइस तरह की अपुष्ट खबरें हैं कि चिकित्सकों ने सरबजीत को दिमागी तौर पर मृत घोषित कर दिया है और दलबीर कौर का भारत लौटना इसी से जुड़ा हो सकता है।ैए"
मधुबनी से लिए गए आंकड़ों के आधार पर श्रम विभाग, एएन सिन्हा इंस्टीच्यूट और कुछ एनजीओ द्वारा कराये गये सव्रे में बताया गया है कि बिहार से बाहर जाने वाले मजदूरों की संख्या में उल्लेखनीय कमी होने के कारण लुधियाना की साइकिल फैक्टरियों में उत्पादन पर जबर्दस्त असर पड़ा है। लुधियाना में साइकिल बनाने की 5000 से ज्यादा छोटी-बड़ी कंपनियां हैं जिनमें पचास फीसद से ज्यादा बिहारी कामगार काम करते हैं। अध्ययन में बताया गया कि बिहार में काम करने की बेहतर परिस्थितियों और सड़क एवं अन्य निर्माण कायरे में तेजी आने के कारण अब लोग काम की तलाश में बाहरी राज्यों में जाने को तरजीह नहीं देते। खासकर मनरेगा के कारण मजदूरों को काम की गारंटी मिलने के कारण पलायन में कमी आई है। मंत्रालय नहीं मानता दावे को लेकिन यह राज्य सरकार का दावा है। केंद्रीय मंत्रालय और खुद पंजाब सरकार ऐसा नहीं मानती। जून, 2012 में केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने माना कि मनरेगा का पंजाब और लुधियाना में बिहारियों के पलायन पर कोई खास असर नहीं पड़ा और न ही इन राज्यों में आप्रवासी मजदूरों की संख्या में कमी आई है। हालांकि पंजाब सरकार के पास अप्रवासियों का कोई आंकड़ा नहीं है लेकिन चंडीगढ़ का सेंटर ऑफ रिसर्च फॉर रूरल एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट में अर्थशास्त्री रंजीत सिंह गुमान के मुताबिक 2012 में भी राज्य में आठ लाख से ज्यादा अप्रवासी मजदूर आए। इसका मतलब है बिहार से पलायन में कोई खास कमी नहीं आई है। इसका कारण मनरेगा के तहत औसतन केवल 38 दिन काम मिलना है जबकि प्रावधान के मुताबिक मजदूरों को 100 दिन रोजगार की गारंटी दी गई है। ऐसे में बाकी दिनों के लिए दूसरे राज्यों की ओर रुख करना मजबूरी है। मुसलमानों में अधिक है दर इसके अलावा आद्री और बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग के एक अध्ययन में पाया गया कि राज्य के गया, औरंगाबाद, वैशाली और दरभंगा में मुसलमानों का पलायन अधिक है। अध्ययन के मुताबिक हर तीन मुस्लिम परिवारों में दो सदस्य बेहतर रोजगार के लिए बाहर के प्रदेशों में हैं। इनमें भी सीवान और गोपालगंज के 40 फीसद लोग खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं। ज्यादा काम, कम आराम अपने लोगों को छोड़ कर अनजान लोगों के बीच जाकर काम करना कितना मुश्किल होता है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि निर्माण कायरे में लगे दंपतियों के 78 फीसद बच्चों को पहले छह महीने तक मां का दूध नहीं मिल पाता है जबकि 70 फीसद बच्चों का जरूरी पोषण और नियमित टीकाकरण नहीं हो पाता। इस काम में लगी संस्था ैएीडिस्टेंस माइग्रेशनैए" ने कहा है कि कम पैसा, ज्यादा काम और कम आराम के बीच अपनी जिंदगी किसी तरह काटने वाले इन लोगों को अत्यंत सीमित साधनों और अपमानजनक हालातों से गुजरना पड़ता है। महिलाओं और बच्चियों को तस्करी और यौन शोषण से गुजरना पड़ता है तो वहीं पुरुष अक्सर एचआईवी जैसे जानलेवा रोगों की चपेट में आ जाते हैं। एक बड़ी अफसोसजनक बात यह है कि नाबालिग और छोटे बच्चों के पलायन का ट्रेंड बढ़ा है। अपने परिवार के लिए ज्यादा पैसा जुटाने की ललक में बच्चों को घर-बार छुड़ाकर बड़े शहरों में भेजा जाता है जहां कुपोषण और शोषण उनके लिए तैयार रहते हैं। हालांकि कई शहरों में मोबाइल क्रेश की शुरुआत की गई है लेकिन मजदूरों की इतनी बड़ी संख्या के सामने ये क्रेश नाकाफी हैं। कंस्ट्रक्शन कंपनियों की दादागिरी दो साल पहले बेंगलुरू से भाग कर आये छत्तीसगढ़ के मजदूरों ने जो दास्तान सुनाई वो निर्माण कंपनियों की दादागिरी दिखाने के लिए काफी है। मजदूरों को हर दिन 157 रुपये मजदूरी देने के वादे के साथ काम पर लगाया गया था लेकिन उन्हें मिलते थे हफ्ते में केवल 50 रुपये। प्रताड़ना और शोषण की ये कहानी सुनकर कानूनगारों के होश उड़ गये। देश का कानून विभिन्न श्रम कानूनों के तहत आप्रवासी मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करता है। 1979 के एक्ट के मुताबिक हर निर्माण कंपनी को किसी अप्रवासी मजदूर को काम पर रखने के लिए लाइसेंस लेना जरूरी होता है। साथ ही पांच से अधिक राज्यों के मजदूरों को काम पर रखने के लिए कानून के तहत पंजीकरण करवाना भी अनिवार्य है। मगर दिसंबर 2011 की स्टैंडिंग कमेटी की 23वीं रिपोर्ट के मुताबिक देश में केवल 285 लाइसेंसी और 240 पंजीकृत कंपनियां हैं। जाहिर है मजदूरों को सर्वाधिक रोजगार देने वाले निर्माण क्षेत्र का यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है। क्या कहता है कानून देश में अंतरराज्यीय अप्रवासी कामगार एक्ट 1979 लागू है लेकिन उसका पालन भी रामभरोसे ही है। कानून कहता है कि जहां भी 49 से ज्यादा महिला कामगार कार्यरत होंगी वहां नियोक्ता को क्रेश की व्यवस्था करनी होगी लेकिन इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़कर कहीं क्रेश नहीं दिखाई देता। राज्य में नीतीश सरकार ने अपने बीस सूत्री कार्यक्रम में आप्रवासी मजदूरों के कल्याण को भी शामिल किया है लेकिन इसका अभी तक पूरी तरह से क्रियान्वयन नहीं किया जा सका है। राज्य में एक लाभ जो ऐसे श्रमिकों को मिला है वो है काम के दौरान घायल होने पर एक लाख का मुआवजा। बाकी के प्रावधान कंपनियां और सरकारें कब तक लागू करती हैं यह देखना होगा।
(साभार- राष्ट्रीय सहारा)
मंगलवार, 30 अप्रैल 2013
सब खेल है लकीरों का !
दहाये हुए देस का दर्द - 86
पूजा, कबूला और चढ़ावा ! फसल में दाना नहीं आया, तो ग्राम देवता को कबूला। रोग नहीं छूट रहा, तो सिंघेश्वर भगवान को कबूला। बेटा नहीं जनम रहा, तो बाबा वैद्यनाथ को कांवर भरकर जल चढ़ाने का कबूला। बारिश के लिए टोटका, तो बाढ़ नहीं आने के लिए भी टोना-टोटका। चढ़ावा की तो पूछिये ही नहीं, हर भय, हर दहशत, हर शोषण, हर अभिशाप, हर मजबूरी, हर विडंबना के समाधान के लिए तरह-तरह के देवी-देवताओं, पीर, साधु, बाबाओं को चढ़ावा। यह पांच-दस दशक पहले की नहीं, मोबाइल और टेलीविजन क्रांति के दौर की कहानी है। हालांकि यह प्रवृत्ति देश के लगभग सभी हिस्सों में है, लेकिन कोशी का मेहनतकश मासूम समाज आज भी पूरी तरह कबूला-चढ़ावा-टोटका के सहारे ही जीवन की परेशानियों को ढो रहा हैं। आज भी वे वंचना की विडंबनाओं को हाथ की लकीर में खोजने के लिए विवश हैं। रामेश्वर भगत के गांव में अब तक बिजली नहीं पहुंची है, वे कहते हैं,"हमारे गांव विशनपुर की तकदीर ही खराब है। नसीब वाले हैं दहापट्टी (पड़ोस के गांव) के लोग। उनके गांव में तार लग गये हैं और तार में बिजली भी दौड़ रही है। रात में जब दहापट्टीवाले उजर-उजर बॉल बारते हैं, तो पूरे गांव में दूध जैसा इजोत छितर जाता है।'' हालांकि भगत को मालूम है कि दहापट्टी वालों ने 1000 रुपये हर घर से चंदा जमा कर दो लाख रुपये राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के ठेकेदार को दिया। उसके बाद ही दहापट्टी में पोल गिरी और तार लगे। फिर भी भगत अपने गांव के अंधेरा को नसीब का खेल मानते हैं।
जिन्होंने दो-तीन दशक पहले के कोशी अंचल को देखा है, वे आज की कोशी को देख चमत्कृत हो जायेंगे। गांवों से गुजरते हुए ऐसा लगता है जैसे इलाके में कोई बड़ी धार्मिक-आध्यात्मिक क्रांति हो गयी हो। बीते वर्षों में इलाके में जमकर मंदिर-मस्जिद बने हैं। यहां तक की गांवों में सड़कें नहीं हैं, बिजली नहीं है, लेकिन मंदिर-मस्जिद जरूर हैं। लोगों के घर आज भी भले ही बांस-फूस के ही हैं, लेकिन मंदिर-मस्जिद की छत पक्की है। दीवार रंगीन और खिड़कियां जालीदार। शाम होते ही गांव धार्मिक अनुष्ठानों के शोर में गांव डूब जाते हैं। बड़े-बड़े लाउड स्पीकर से रामयण पाठ, अष्टयाम,अजान, संकीर्त्तण के स्वर उभरते रहते हैं। इतना ही नहीं, पहले से मौजूद देवी-देवता मानो कम पड़ गये हों, इसलिए कुछ नये देवताओं/पंथ के भी आविष्कार हुए हैं। यह "आध्यात्मिक क्रांति'' हमें अचरज में डालती है। ऐसा लगता है जैसे यहां का समाज फिर से भक्ति युग में प्रवेश कर गया हो। मन में सवाल उठता है कि कहीं लोग वैरागी तो नहीं हो रहे? लेकिन भ्रम तब टूट जाता है जब गांव के किसी बुजुर्ग से मिलते हैं। सौ में 90 बुजुर्ग संतान की उपेक्षा से पीड़ित है। बेटे-बहु, पोतों के होते हुए भी 80 साल की वृद्ध महिला अपना चूल्हा खुद सुलगाने के लिए विवश है। हाथ झरका कर बुढिया खाना पकाये या भूखे मरे । संतानों को कोई फर्क नहीं । नयी आध्यात्मिक क्रांति के को तार वृद्धों से नहीं जुटते। लेकिन एक इंच मेड के लिए लाशें गिर जाती हैं। जो कमजोर और मुंहदुब्बर है, वह अकेला है। हर अवसर पर कमजोर और मुंहदुब्बर का हक सबसे पहले मारा जाता है। न्याय की परंपरागत अवधारणा लगभग दम तोड़ चुकी है। लोग अन्याय के काफिले में शामिल होने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहते। हां, शाम को मंदिर में घड़ीघंट बजाना कोई नहीं भूलता। शराब और दारू जरूरी पेय हो गया है। कुछ लोग दारू पीकर भजन मंडली में शामिल होते हैं। पूछने पर कहते हैं," अलबत्त आदमी हैं आप जी, पहले भंग पीकर हरि बोल कहते थे न, अब दारू पीकर जय-जय शिवशंकर गा रहे हैं। कौन पाप हो गया !'
बड़ा मनमोहक लगता है, जब राष्ट्रीय स्तर के नेता कहते हैं कि पिछले दो-तीन दशकों में देश बहुत बदल गया है। रोटी-रोजगार से शिक्षा के क्षेत्र में देश ने काफी तरक्की की है। सूचना क्रांति गांवों तक पहुंच गयी है। बिहार के नेता एक कदम आगे जाकर कहते हैं, बिहार अब जाग गया है और विकास की पटरी पर सरपट दौड़ रहा है। इन दावों की पोल खोलने वाली रिपोर्ट की कमी नहीं है। जहां राष्ट्रीय नेताओं के पास इस बात के जवाब नहीं है कि बीते दशकों में दस लाख से ज्यादा किसानों ने किस "तरक्की के गम' में आत्महत्या की, वहीं बिहार के सियासतदानों के पास बढ़ते पलायन का जवाब नहीं है। आज भी दूसरे राज्यों की ओर जाने वाली गाड़ी मजदूरों के खेप लगा रही है। पंजाब-दिल्ली-हरियाणा-गुजरात-महाराष्ट्र की ओर जाने वाली गाड़ियों की सीटें कभी खाली नहीं रहतीं।
कोशी के लोग आज भी रोजी-रोटी के लिए पलायन कर रहे हैं। खिचड़ी खाकर बेटा बीमार पड़ता है, तो मोबाइल पर पंजाब-दिल्ली-लुधियाना से फोन आता है,"काली माय के जोड़ा छागर कबूल दो। आसिन (आश्विन) में आयेंगे तें माय को जोड़ा छागर चढ़ायेंगे आउर टोल भर में प्रसाद बांटेंगे।' इंदिरा आवास से लेकर मटिया तेल में कमीशन खाने वाले मुखिया जी, इलेक्शन नजदीक आने पर टोले में मंदिर-मस्जिद की जमीन खोजने लगते हैं। कहते हैं, "एहि बेर जीता दीजिए, आपके टोल में भी भगवान शिव का भव्य मंदिर बनेगा।' बगल में बैठी एक महिला घूंघट से कहती है,"बाढ़ि में हमरा एको नजा पैसा नहीं मिला था, मुखिया जी ?' मुखिया जी जवाब देते हैं,"हे मुनमा के माई, सिघेंश्वर महाराज के शपथ, आब अगर कोशी बांध टूटा तें पूरे टोल में सबसे पहिले तोरे रिलीफ का पैसा मिलेगा। एक बोरा के पूछे, दो बोरा गहुम अगर तुम्हारे द्वार पर नहीं गिराये, तो हमारा नाम बदल दीजियेगा। ई कप्लेशर यादव की जुबान है।''
"काहे नहीं जीतियेगा- जीतवे कीजिएगा। गांव में एतना काम आज तक कभियो नहीं हुआ। हरदम बरगद के तर में थे ग्राम देवता, आप के परताप से हूआं भी मंदिर बन गिया। शिवघरा में भी काशी के घड़ीघंट तो आप ही ने लगाये। आउर तो आउर, अब तो आपके परताप से हर पंद्रहिया को गाम में लाउड स्पीकर के साथ अष्टजाम भी होने लगा है।''
शनिवार, 23 मार्च 2013
नियति नहीं यह अवसाद है
अवाम होने के मजाक में
मुंह मूंदकर रोते जाना
आंख खोलकर सोये रहना
हमारी नियति नहीं, अवसाद है
बगुल-ध्यान में है "मसीहा''
बायें हाथ में जाल, दायें में हथियार है
हमेशा आस्तीन में छिपा था जवाब
आज भी दर-दर भटक रहा मूल सवाल है
सोमवार, 11 मार्च 2013
दूसरी पीढ़ी भी जवान होगी
एक पीढ़ी तैयार होगी
लूटे हुए पैसों के पालने में झूलती हुई
घोटाले के उड़नखटोले में उड़ती हुई
बेईमानी की छत के नीचे सोती हुई
हर फिक्र को हवा में उ़डाती हुई
पीढ़ी जवान होगी
शायद अनजान ही रहेगी इतिहास से
उसी समय एक दूसरी पीढ़ी भी रहेगी
लूटे हुए खेतों में रोती हुई
छीने हुए घरों को तलाशती हुई
उड़ते उड़नखटोले को निहारती हुई
पेट की भूख को दिमाग में महसूसती हुई
यह पीढ़ी भी जवान जरूर होगी
और इतिहास का निशान इसके ललाट पर होगा
जो कहते हैं कहें
मैं कैसे कह दूं, साथी
सब कुछ अच्छा होगा
बेईमानी की छत के नीचे सोती हुई
हर फिक्र को हवा में उ़डाती हुई
पीढ़ी जवान होगी
शायद अनजान ही रहेगी इतिहास से
उसी समय एक दूसरी पीढ़ी भी रहेगी
लूटे हुए खेतों में रोती हुई
छीने हुए घरों को तलाशती हुई
उड़ते उड़नखटोले को निहारती हुई
पेट की भूख को दिमाग में महसूसती हुई
यह पीढ़ी भी जवान जरूर होगी
और इतिहास का निशान इसके ललाट पर होगा
जो कहते हैं कहें
मैं कैसे कह दूं, साथी
सब कुछ अच्छा होगा
शुक्रवार, 16 नवंबर 2012
आप का ताप
आप
और आपे का ताप
तपने से क्या होता है
हमने लोहे को चटकते देखा है।
चैत्य की दूब से पूछो
सावनी अहंकार के बारे में
हां,
रोशनी पकाता और परोसता है सूरज
प्रकाश खाने वालों को ब्लैकहोल कहते हैं ।
और आपे का ताप
तपने से क्या होता है
हमने लोहे को चटकते देखा है।
चैत्य की दूब से पूछो
सावनी अहंकार के बारे में
हां,
रोशनी पकाता और परोसता है सूरज
प्रकाश खाने वालों को ब्लैकहोल कहते हैं ।
शुक्रवार, 2 नवंबर 2012
नयी आदत
ताले जितने थे
सबके सब तोड़े जा चुके
और हम अब भी चाबी संभाल रहे
जवाब नहीं हमारा
पहले खाते हम थे
मेमियाता था मेमना
अब हम खाते भी हैं, मेमियाते भी हैं
पहले खाते हम थे
मेमियाता था मेमना
अब हम खाते भी हैं, मेमियाते भी हैं
मंगलवार, 25 सितंबर 2012
भरोसा
अपने वजूद की पतंग में
अक्सर भरोसे की डोरी बांधता हूं
और
उस मैदान का आंसू पोंछता हूं
जिसका धावक दौड़ हार गया है
भरोसा जरूरी है
आदमी के लिए
मैं भटकी नदी को समुद्र का पता बताता हूं
बछड़ा जरूर कूदेगा
मैं उख़ड़े खूंटे गाड़ रहा हूं
अक्सर भरोसे की डोरी बांधता हूं
और
उस मैदान का आंसू पोंछता हूं
जिसका धावक दौड़ हार गया है
भरोसा जरूरी है
आदमी के लिए
मैं भटकी नदी को समुद्र का पता बताता हूं
बछड़ा जरूर कूदेगा
मैं उख़ड़े खूंटे गाड़ रहा हूं
सोमवार, 24 सितंबर 2012
पेट और प्रजातंत्र
पड़ोसी पेटजरूआ न कहे
पानी पीकर डकारते रहे बाप
कई-कई रात
कई-कई साल
पेट को कोई कितना परतारे
पानी पीकर कब तक कोई डकारता रहे
पानी पीकर डकारते रहे बाप
कई-कई रात
कई-कई साल
पेट को कोई कितना परतारे
पानी पीकर कब तक कोई डकारता रहे
अब आती है भूख, तो चलते हैं हाथ
जलता है दिमाग
जलता है दिमाग
आप कह सकते हो मुझे द्रोही
राजनीतिक विरोधी
या बहका हुआ कोई अलोकतांत्रिक
नहीं, मुझे नहीं है विश्वास
मैं प्रजातंत्र को कान में नहीं
हाथ में महसूसना चाहता हूं
राजनीतिक विरोधी
या बहका हुआ कोई अलोकतांत्रिक
नहीं, मुझे नहीं है विश्वास
मैं प्रजातंत्र को कान में नहीं
हाथ में महसूसना चाहता हूं
रविवार, 23 सितंबर 2012
बढ़ता भोग उजड़ते मठ
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बिहार की धरती दर्शन और अध्यात्म के लिए सदियों से प्रसिद्ध रही है। आदि काल में बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, गार्गी, मैत्रयी और याज्ञवलक्य ने बिहार का मान बढ़ाया तो प्राचीन काल में चाणक्य ने अपने तत्व ज्ञान से दुनिया को चकित किया। आधुनिक काल में महिर्षी मेंही ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। यही कारण है कि बिहार में संन्यासियों और मठों की संस्कृति हमेशा से रही है। लेकिन अब मठ अध्यात्म और साधना नहीं, बल्कि भोग, व्यभिचार, यहां तक कि हिंसा के केंद्र बन रहे हैं। भागलपुर का साध्वी कांड इसकी ताजा नजीर है। इस मुद्दे पर द पब्लिक एजेंडा ने पिछले अंक में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। ऊपर की तस्वीर क्लिक कर इसे आप पढ़ सकते हैं। मैग्जीन की वेबसाइट पर भी रिपोर्ट उपलब्ध है। - रंजीत
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शनिवार, 8 सितंबर 2012
कहीं किस्सा न बन जाये जूट
दहाये हुए देस का दर्द-85
बिहार के कोशी अंचल को जूट की खेती के लिए भी जाना जाता है। उत्पादन के लिहाज से यह इलाका पश्चिम बंगाल और असम के बाद देश का तीसरा सबसे बड़ा जूट उत्पादन केंद्र रहा है। कोशी अंचल के पूर्णिया, कटिहार,मधेपुरा,सुपौल,अररिया और किशनगंज के लाखों किसानों के लिए जूट नकदी आमदनी का प्रमुख स्रोत रहा है। सच तो यह है कि कोशी के किसानों के लिए जूट (जिसे स्थानीय लोग पटुआ या पाट कहते हैं) महज एक फसल ही नहीं, बल्कि जिंदगी और संस्कृति का हिस्सा है। यहां पटुओं की दर्जनों कहावत और अनगिनत किस्से प्रचलित हैं। एक कहावत का उल्लेख प्रासंगिक होगा,"ज उपजतो पाट तें देखिअ ठाठ अर्थात जब जूट की अच्छी पैदावार होगी, तो आनंद देखने वाला होगा।' यही कारण है कि तमाम मुश्किलात और विपरीत हालात के बावजूद इलाके के लाखों खेतिहर आज भी जूट की खेती जारी रखे हुए हैं।
लेकिन विडंबना यह है कि पिछले कुछ सालों से स्थितियां लगातार जूट खेती के प्रतिकूल होती जा रही हैं। अगर हालात ऐसे ही रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब जूट की खेती भी मड़ुआ, जौ,काउन,अल्हुआ, भदई धान (कभी कोशी अंचल में इन फसलों का खूब उत्पादन होता था) की तरह कोशी का किस्सा बन जायेगी। इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण सरकार की जूट नीति है, जिसने धीरे-धीरे किसानों की रीढ़ तोड़ दी । हाल में ही केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने कहा कि उन्हें महंगाई से खुशी है, क्योंकि इससे किसानों को फसलों के ज्यादा दाम मिल रहे हैं। वैसे तो वर्मा का यह बयान दर्शाता है कि हमारे मंत्री जमीनी हकीकत से पूरी तरह नावाकिफ हैं। लेकिन जूट के मूल्यों के हालिया इतिहास के मद्देनजर देखें तो वर्मा का बयान किसी जहर-सिक्त तीर की तरह चूभता है। सन् 1984 में देश में जूट के मूल्य 1400 रुपये क्विंटल था। आज 2012 में यानी 28 वर्षों के बाद यह घटकर 1200 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गया है। पिछले 28 वर्षों में रुपये में हुए अवमूल्यन को ध्यान में लेते हुए कोई भी व्यक्ति जूट उत्पादक किसानों के दर्द का अंदाजा लगा सकता है और जूट की मूर्छित खेती का मर्ज आसानी से समझ सकता है।
जुल्मो-सितम की यह नीम-तीर कहानी समर्थन मूल्य नामक मिसाइल की मार तक ही सीमित नहीं है। सच तो यह है कि पिछले चार दशक में जूट उत्पादकों को तरह-तरह के हथियारों से पीटा गया है। सबसे घातक वार था, बेलगाम प्लास्टिक नीति। गौरतलब है कि जूट के किसानों को बचाने के लिए एक जमाने में सरकार के पास संरक्षण नीति थी। तब चीनी, चावल, सीमेंट समेत तमाम फैक्ट्रियों के लिए कम-से-कम तीस प्रतिशत जूट की बोरी का इस्तेमाल अनिवार्य था। लेकिन उदारीकरण की आंधी में ये नीतियां तिनकों की तरह उड़ गयीं और किसी को चीख तक नहीं सुनाई दी । प्लास्टिक बोरियां सस्ती थीं (अभी भी हैं), इसलिए उत्पादकों ने जूट बोरी का इस्तेमाल बंद कर दिया। इसके कारण देसी बाजार में जूट की मांग कम होती गयी। तकनीक के बल पर वस्त्र उद्योग इतना आगे निकल गया कि जूट से बने मोटे कपड़े को पिछड़ेपन का प्रतीक मान लिया गया और पहनावे से जूट से सदा के लिए समाप्त हो गया। यह बात और है कि अब ये प्लास्टिक धरती पर भी भारी पड़ने लगी है। कहने की जरूरत नहीं कि प्लास्टिक के बेइंतिहा इस्तेमाल ने पर्यावरण और पारिस्थितिकी को गंभीर रूप से बिगाड़ दिया है, जिसे पर्यावरण-प्रिय जूट ही ठीक कर सकता है। जूट की खेती को तीसरी मार जूट रिसर्च इंस्टिट्यूटों से पड़ी, जो जानलेवा साबित हुआ। इन संस्थाओं ने पुरानी नस्ल को खत्म किया और उन्नत नस्ल के नाम पर जो बीज तैयार किया उससे पैदावार बढ़ने की बजाय घटती चली गयी।
जलवायु परिवर्तन भी जूट की खेती पर कहर बरपा रहा है। गौरतलब है कि जूट मौसम के प्रति अत्याधिक संवेदनशील पौधा है। मौसम की थोड़ी-सी प्रतिकूलता पौधे को चौपट कर देती है। लेकिन हाल के कुछ वर्षों से मौसम चक्र लगातार असंतुलित हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप जूट की पैदावार मारी जा रही है। जलाशयों की कमी भी जूट की खेती को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। जूट से रेशे निकालने के लिए इसे स्थिर पानी में सड़ाना पड़ता है, लेकिन स्थिर पानी के परंपरागत स्रोत मसलन झील, ताल,चौर, पोखर आदि तेजी से कम और खत्म हो रहे हैं।
संक्षेप में कहें, तो आज जूट की खेती सिर्फ किसानों की जिद और देसी उपयोगिता के बल पर जिंदा है। वह युग बीत गया जब किसान इसे "हरा नोट'' कहते थे। उस दौर में जूट कोशी अंचल के किसानों के लिए दुर्गापूजा, दीपावली, मुहर्रम का सौगात लेकर आता था। सितंबर में इसके रेशे तैयार होत थे। हर किसान को त्योहारों के लिए अच्छी-खासी नकदी मिल जाती थी। अब तो लोग जूट के डंठल (सोंठी) और रस्सी के लिए जूट बोते हैं। कोशी इलाके के लोग आज भी जूट के डंठल से ही घरों के टाट बनाते हैं। सोंठी यहां के लोगों के लिए जलावन का महत्वपूर्ण स्रोत भी है।
शनिवार, 1 सितंबर 2012
दहशत का दियारा
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बिहार के विभिन्न दियारा और टाल क्षेत्रों में मध्य बिहार से भी ज्यादा खून बहे हैं, लेकिन इस पर बहस नहीं होती । शायद सरकारों ने दियारा को अलग दुनिया मान रखी है। दियारा की हिंसा पर "द पब्लिक एजेंडा'' के हालिया अंक में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। ऊपर की तस्वीर डाउनलोड कर यह रिपोर्ट पढ़ी जा सकती है। मैग्जीन की वेबसाइट पर भी रिपोर्ट उपलब्ध है, क्लिक करें। - रंजीत
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मंगलवार, 28 अगस्त 2012
काला कोयला, उजला धुआं
जलना कोयले की नियति है। यह बात दीगर है कि जलने की कहानी हमेशा एक जैसी नहीं होती। बाहर जलने पर यह काला धुआं देता है, लेकिन बंद खदानों में जले तो धुएं का रंग झक-झक सफेद हो जाता है। झारखंड की आगग्रस्त झरिया, कुजू आदि कोलियरी के विशाल भू-भाग में कोयले की यह लीला आज भी जारी है। सफेद धुओं के घने मेघ के साथ हजारों टन कोयले हर दिन भभक-भभककर जल रहे हैं और इलाके को जहरीली सफेद गैसों की टरबाइन में बदल रहे हैं। वैसे झारखंड कोयलांचल के लाखों लोग कोयले के इन काले और सफेद धुओं के साथ जीने-मरने को अभिशप्त हैं। लेकिन किसे पता था कि एक दिन देश की सियासत भी कोयले की राह पर चल पड़ेगी और उसके सफेद धुएं में समूचे देश का दम घुटने लगेगा।
इन दिनों देश में कोल ब्लॉक आवंटन को लेकर सियासी बवंडर मचा हुआ है। कांग्रेस कोल ब्लॉक के आवंटन को सही बताकर सीएजी की रिपोर्ट को ठेंगा दिखा रही है, जबकि भाजपा ने इस घोटाले के विरोध में जमीन-आसमान को सिर पर उठा लिया है। कांग्रेस का कहना है कि आवंटन में कोई अनियमितता नहीं हुई, जबकि भाजपा के नेता सीएजी की रिपोर्ट को सच ठहराते हुए भारी घोटाले का आरोप लगा रहे हैं। लेकिन सच कुछ और है, जिसके बारे में न तो कांग्रेस के नेता बोल रहे हैं और न ही भाजपा के । सच यह है कि दोनों पार्टियां आम लोग को दिग्भ्रमित कर रही हैं।
यह सियासत के बंद खदानों की आग है। अजीब संयोग यह कि इससे उठने वाले धुएं का रंग भी सफेद है। अगर ऐसा नहीं होता तो हंगामा पिछले साल ही बरपा होता जब सरकार ने "खान और खनिज (विकास और नियमन) विधेयक-10' को मंजूरकर नये कानून बनाये थे। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि यह कानून खनिज और खनन प्रक्षेत्र में में निर्बाध निजीकरण के लिए ही बनाये गये थे । कुछ विशेषज्ञों ने उस समय कहा था कि यह कानून खनिज व खनन प्रक्षेत्र को निजीकरण के नये दौर में लेकर जायेगा, जिससे सरकार की भूमिका में व्यापक बदलाव होंगे। निर्बाध निजीकरण के नये कानूनों से खनिजों के उत्पादन, प्रसंस्करण, वैल्यू एडिशन और विपणन में सरकार की भूमिका कम होती जायेगी और वह धीरे-धीरे नियंत्रक और नियामक की भूमिका में सीमित होती जायेगी। यही हो भी रहा है। अब सरकार प्राकृतिक संसाधनों के सर्वाधिकारी की भूमिका में नहीं, बल्कि नियंत्रक और नियामक की भूमिका में आ चुकी है। स्वाभाविक रूप से मंत्रालय में बैठे लोग लोगीदार हो गये हैं और उनकी जेब खूब गरम हो रही है, लेकिन देश की प्राकृतिक संपदाएं दोनों हाथों से लूटी जा रही हैं।
ऐसा नहीं है कि 2010 का खनन कानून एक झटके में बन गया। यह सब 2008 की नयी खजिन नीति के ही विस्तार थे, जिसके जरिये देश की खनिज संपदा को निजी हाथों में सौंपने के लिए व्यापक रास्ते तैयार किये गये थे। लेकिन भाजपा ने कभी भी इन नीतियों और विधेयकों का कड़ा विरोध नहीं किया। यह जानते हुए कि निर्बाध निजीकरण की नीतियां देश को भ्रष्टाचार के समंदर में डूबो देंगी, भाजपा समेत अधिकांश विपक्षी दल चुप ही रहे। कहने की जरूरत नहीं कि "मधु कोड़ा', "रेड्डी बंधु',"टू-जी' हो या "कोल-गेट' आदि महाघोटाले प्राकृतिक संसाधनों को निजी हाथों में सौंपने की नीतियों के कारण ही संभव हो सके। भाजपा प्रधानमंत्री से इस्तीफा तो मांग रही है, लेकिन निर्बाध निजीकरण की नीतियों पर खामोश है।
बात फिर घुमकर कोयले की आग पर आती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि झरिया, कुजू,रानीगंज कोलियरी के सैंकड़ों एकड़ में लगी भूमिगत आग के लिए "स्लाउटर माइनिंग'' अर्थात अवैज्ञानिक खनन जिम्मेदार है। स्लाउटर माइनिंग ऐसे खनन को कहते हैं, जिसमें खनन की बुनियादी तकनीक का पालन नहीं किया जाता। अतिरिक्त कोयला निकालकर पैसे बनाने की चाहत में अभियंता, अधिकारी खदान को आग के मुहाने पर ले जाकर छोड़ देते हैं। जब आग लग जाती है, तो उसे बुझाने के नाम पर करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा होता है। इसलिए अगर खनन अभियंत्रण की शब्दावली में कहें, तो कोल ब्लॉक का आवंटन ही नहीं, बल्कि इस पर मचा सियासी घमासान भी "स्लाउटर'' ही है।
शुक्रवार, 17 अगस्त 2012
कोख चुराते डॉक्टर
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धन अर्जित करना अब चाहत नहीं, बल्कि हवश हो गयी है। इसके लिए लोग हर हद को पार कर रहे हैं। डॉक्टर को धरती का भगवान कहा जाता है। लेकिन बिहार में धरती के इन भगवानों ने पैसों के लिए हजारों महिलाओं के गर्भाशय बेवजह निकाल डाले। द पब्लिक एजेंडा ने अपने हालिया अंक में इस हैरतअंगेज घोटाले पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। आप ऊपर की तस्वीर डाउनलोड कर यह रिपोर्ट पढ़ सकते हैं। मैग्जीन की वेबसाइट पर भी यह रिपोर्ट पढ़ी जा सकती है।- रंजीत
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गुरुवार, 16 अगस्त 2012
थोड़ी स्त्री होकर
1
विश्व का नक्शा बहुत पेचीदा है
आड़ी-तिरछी रेखाओं की "ओझरी" है दुनिया
एटलस पर छड़ी रखकर
बताया था विद्यालय के "मास्साब" ने
यह अमेरिका और यहां रहा सीरिया
कांगो, सोमालिया,वाशिंगटन,जेनेवा से वियतनाम तक
देश-देश, दरिया-दरिया
समंदर से ज्वालामुखी तक
घूमती थी ''मास्साब'' की छड़ी
पर हर बार छूट जाती थी धरती
धरती का नमक
आड़ी-तिरछी रेखाओं की "ओझरी" है दुनिया
एटलस पर छड़ी रखकर
बताया था विद्यालय के "मास्साब" ने
यह अमेरिका और यहां रहा सीरिया
कांगो, सोमालिया,वाशिंगटन,जेनेवा से वियतनाम तक
देश-देश, दरिया-दरिया
समंदर से ज्वालामुखी तक
घूमती थी ''मास्साब'' की छड़ी
पर हर बार छूट जाती थी धरती
धरती का नमक
धरती की गमक
जीवन
राग-द्वेष और क्रंदन
हालांकि पिघलती बर्फ
उजड़ते अफ्रीका
सूखती दरिया
उसर होती जमीन
धूसर होते रंग
और बढ़ते क्रंदन के बावजूद
धरती अब तक बची हुई थी
बूढ़ी, बीमार, उपेक्षित मां की तरह
2
राग-द्वेष और क्रंदन
हालांकि पिघलती बर्फ
उजड़ते अफ्रीका
सूखती दरिया
उसर होती जमीन
धूसर होते रंग
और बढ़ते क्रंदन के बावजूद
धरती अब तक बची हुई थी
बूढ़ी, बीमार, उपेक्षित मां की तरह
2
ग्लोब पर कान लगाओ
कान फट जायेगा
''एक्स-एक्स'' की चीख से
दिल दहल जायेगा
कान फट जायेगा
''एक्स-एक्स'' की चीख से
दिल दहल जायेगा
अजन्में भ्रूणों की मृत्यु-कराह
वियतनाम से वेंकूवर तक फैली हुई है
स्त्री-लिंगी कोंपलें कट रही हैं
वियतनाम से वेंकूवर तक फैली हुई है
स्त्री-लिंगी कोंपलें कट रही हैं
''बांसों'' में बहस है
लेकिन स्त्री-कोंपलों की कटाई पर मौन सहमति है
3
कविता की आंख से देखो
तो कलई खुल जाती है
विश्व की
विश्व महिला दिवस की
जिसे मनाने के लिए
जेबी में एक पुड़िया "महिला-रंग" ही काफी है
संपादकों की सूची तैयार है
"महिला-पुरुषार्थों" की कुछ गाथाएं
प्रकाशित होंगी, ऐन महिला दिवस पर
वे महिलाएं जो सफल होकर "पुरुष" हो गयीं
सबको बतायी जायेंगी
सबको दिखायी जायेंगी
सरकारें और संस्थाएं घोषणाएं करेंगी
महिला दिवस पर
और ग्लोब मारे गये महिला-भ्रूणों से भर जायेगा
4
महिला दिवस मनाने के लिए
एक चुटकी "महिला-रंग" की जरूरत न पड़े
इसलिए मैंने खुद को थोड़ी स्त्री की
स्त्री होकर देखा
दिखाई दी धरती
जो जनना छोड़ रही है
दिखाई दिया बीज
जो अंकुरना भूल रहा है
दिखाई दी बेटियां
जो जवान होना नहीं चाहतीं
याद आये ''मास्साब''
और ''मास्साब'' की छड़ी
एक दीवार
दीवार पर लगे निर्जीव एटलस
और एटलस पर टंगे देश
पीली बांस की तरह निष्प्राण और आर्कषण-हीन
ताकि अनिद्रा न हो
मैंने स्मरण की ग्लोब छोड़ चुकी दादी को
भूली हुई लोरियों को
और इस तरह
मैंने बचा ली एक कविता
और
लेकिन स्त्री-कोंपलों की कटाई पर मौन सहमति है
3
कविता की आंख से देखो
तो कलई खुल जाती है
विश्व की
विश्व महिला दिवस की
जिसे मनाने के लिए
जेबी में एक पुड़िया "महिला-रंग" ही काफी है
संपादकों की सूची तैयार है
"महिला-पुरुषार्थों" की कुछ गाथाएं
प्रकाशित होंगी, ऐन महिला दिवस पर
वे महिलाएं जो सफल होकर "पुरुष" हो गयीं
सबको बतायी जायेंगी
सबको दिखायी जायेंगी
सरकारें और संस्थाएं घोषणाएं करेंगी
महिला दिवस पर
और ग्लोब मारे गये महिला-भ्रूणों से भर जायेगा
4
महिला दिवस मनाने के लिए
एक चुटकी "महिला-रंग" की जरूरत न पड़े
इसलिए मैंने खुद को थोड़ी स्त्री की
स्त्री होकर देखा
दिखाई दी धरती
जो जनना छोड़ रही है
दिखाई दिया बीज
जो अंकुरना भूल रहा है
दिखाई दी बेटियां
जो जवान होना नहीं चाहतीं
याद आये ''मास्साब''
और ''मास्साब'' की छड़ी
एक दीवार
दीवार पर लगे निर्जीव एटलस
और एटलस पर टंगे देश
पीली बांस की तरह निष्प्राण और आर्कषण-हीन
ताकि अनिद्रा न हो
मैंने स्मरण की ग्लोब छोड़ चुकी दादी को
भूली हुई लोरियों को
और इस तरह
मैंने बचा ली एक कविता
और
मानस की महिला
थोड़ा-सा दिवस
कुछ परियां
थोड़ा-सा दिवस
कुछ परियां
परियों की कहानियां
और
थोड़ी-सी दुनिया
और
थोड़ी-सी दुनिया
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