शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

मोहाली की मदहोशी


निश्चित ही वह एक मतवाली रात थी। एक अखिल भारतीय मदहोशी की रात थी वह
भारत के अब तक के ज्ञात इतिहास में शायद ऐसा पहले कभी नहीं हुआ होगा, जब गुवाहाटी से गुजरात तक और चौराहे से चौपाल तक के लोगों ने एक साथ पटाखे छोड़े हों, क्योंकि दीपावली भी हर राज्य में नहीं मनायी जाती। एसएमएस से बधाई संदेश भेजने वाले मित्रों से मैंने जानना चाहा कि अगर यह जीत किसी अन्य देशों के खिलाफ मिली होती, तो भी क्या हम इतने ही खुश होते ! लगभग एक सूर में सभी ने कहा- नहीं। खुशी की मुख्य वजह भारत की जीत नहीं, बल्कि पाकिस्तान की हार है। मैंने पूछा कि अगर मैं कहूं कि यह पाकिस्तान नहीं पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की हार है, तो आप क्या कहेंगे ? उन्होंने कहा- कुछ भी हो हमने पाकिस्तान को हरा दिया है। यानी क्रिकेट यहां सिर्फ साधन था, साध्य तो श्रेष्ठता की पदवी हासिल करना है। शिक्के को उलटकर देखने से भी यही पहलू सामने आता है। पाकिस्तान से आने वाली खबरें बताती हैं कि 30 तारीख की रात पाकिस्तानियों के लिए कयामत की रात थी। जाने कितने पाकिस्तानियों ने टेलीविजन सेट तोड़ दिये। आत्महत्या की भी कुछ खबरें आयी हैं। पाकिस्तानी अवाम मायूसी के समंदर में डूब गये, मानो किसी ने उनकी अस्मिता लूट ली हो या उनसे कोई ऐतिहासिक पाप हो गया हो।
हालांकि यह सौ प्रतिशत सच है कि क्रिकेट के दम पर आज तक तो दुनिया में कोई श्रेष्ठ हुआ है और ही कभी
होगा। दशकों तक क्रिकेट के बादशाह कहलाने वाले कैरीबियन देशों की गिनती आज भी दलित-देशों के रूप में होती है। लगातार तीन बार विश्व कप जीतने के बावजूद ऑस्ट्रेलिया को कोई भद्र-देश नहीं कहता। बहुतेरे लोग इस द्वीप को आज भी चोरों-ठगों-अपराधियों के संतानों का देश भी कह डालते हैं।
बार-बार मन में यह सवाल कौंधता है कि आखिर जिस जीत से एक भी आम लोगों का भला नहीं हो सकता, उस पर
दिलो-जान लूटाने के क्या कारण हो सकते हैं? विशुद्ध कमोडिटी और व्यावसायिक उपक्रम हो चुके क्रिकेट को आखिर सवा सौ करोड़ की आबादी, राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक कैसे मान सकती है? जबकि सबको मालूम है कि देश भ्रष्टाचार और अन्याय की पराकाष्ठा पर जा पहुंचा है। करोड़ों लोग आज भी जीवन की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। ऊंचे बैठे लोगों के लिए राष्ट्रीयता महज एक प्रपंच है। विदेशी बैंकों में जमा अकूत काला धन इसका प्रमाण है। फिर भी हम क्रिकेट के जरिये सर्वश्रेष्ठ कहलाना चाहते हैं। कहीं यह अपनी असफलता का कूंठा तो नहीं ? तस्कीम के 63 वर्ष बाद भी अगर भारत और पाकिस्तान के लोग, एक-दूसरे से नफरत करते हैं, तो मतलब साफ है कि दोनों देश मानवीय विकास के मोर्चे पर पूरी तरह नाकाम है। घृणा का स्थायीपन, अशिक्षा और अंधेपन का प्रतीक ही नहीं, बल्कि असभ्यता की भी निशानी है। एक स्वस्थ्य और संजीदा इंसान लंबे समय तक किसी से घृणा नहीं कर सकता और प्रेम की अनुपस्थिति गैर-इंसानियत की ही निशानी है। लेकिन विडंबना यह कि भारत और पाकिस्तान दोनों मुल्कों में यह प्रवृत्ति हावी है। इसे खत्म करने के लिए बड़ा दिल चाहिए।

गुरुवार, 24 मार्च 2011

पिता नहीं पतियायेंगे

पिता नहीं पतियायेंगे
दादा पीठ पर खडांव तोड़ देंगे, शायद
दादा को हक है
जिसे पिता ने निभाया है
गोकि मिर्जे वाले दादा पुस्तैनी पंच थे, गांव के
विनोबा से होती थी उनकी चिट्ठी-पतरी
इसलिए पिता
अंग्रेजों के विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पढ़कर
ठेठ मैथिली में जीये
जंगल में रहे, जनतंत्र के लिए जीये

पिता, कैसे पतियायेंगे
कि मैं 2011 के सड़ांध में हूं
और 1947 में जो एक नदी फूटी थी दिल्ली से
वह आज बिल्ली से जा मिली है

मुश्किल है
पिता को समझाना
सत्रह साल 'शहर' में रहकर
ईमानदार को नमस्कार करना
गुणी-गरीब को भी आदर देना
और भ्रष्ट को दुत्कार कर भगा देना
(जो पिता के लिए बहुत आसान था)
पिता, हमें माफ करना

गुरुवार, 17 मार्च 2011

हिरोशिमा से फुकूशिमा


जब मारकर ससरा था
तब हिरोशिमा था
अब खाकर पसरा है
अब फुकूशिमा है

यूरेनियम अमेरिकी
एटम अमेरिकी
बम भी अमेरिकी था
बस, विकिरण जापानी है

मंगलवार, 8 मार्च 2011

उठता हुआ शोर


पुष्पराज

चर्चित पुस्तक "नंदीग्राम डायरी'' के युवा लेखक पुष्पराज लेखन के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर लगातार सक्रिय हैं। प्रस्तुत रचना बेहाल अवाम की बेचैनी को शब्द दे रही है, यह अलग बात है कि सत्तानशीनों को अब भी कुछ सुनाई नहीं दे रहा। बकौल पुष्पराज," भारत के गांवों से हजारों युवा सत्ता छोड़ ,सत्ता छोड़, सत्ता छोड़ ,सत्ता छोड़ ...... का शोर करते हुए लाल किला की प्राचीर से किसी को खीच कर समंदर में फेंकने के लिए आगे निकाल चुके हैं। ग्रामेर मानुषके ग्राम-गर्भ से यह स्वर उभर रहा है साथी ...''


सत्ता छोड़, सत्ता छोड़, सत्ता छोड़, सत्ता छोड़ ...

महंगाई जी सत्ता छोड़, जम्हाई जी सत्ता छोड़
बतपुतली जी सत्ता छोड़, कठपुतली जी सत्ता छोड़
सत्ता छोड़, सत्ता छोड़, सत्ता छोड़, सत्ता छोड़ ...
लोभन सिंह जी सत्ता छोड़, प्रलोभन सिंह जी सत्ता छोड़
भदमोहन सिंह सत्ता छोड़, पदमोहन सिंह सत्ता छोड़
सत्ता छोड़, सत्ता छोड़, सत्ता छोड़, सत्ता छोड़ ...
कठमोहन सिंह सत्ता छोड़, भट्ठमोहन सिंह सत्ता छोड़
ठगमोहन सिंह सत्ता छोड़, हठमोहन सिंह सत्ता छोड़
सत्ता छोड़, सत्ता छोड़, सत्ता छोड़, सत्ता छोड़ ...


मंगलवार, 1 मार्च 2011

फैज साहेब आपने ठीक कहा था- तख्त गिर रहे हैं, ताज भी उछल रहे हैं और हम देख भी पा रहे हैं। जय हो क्रांति कवि ! जन्मशती पर बार-बार नमन।

हम देखेंगे

जब जुल्मो-सितम के कोहे-गरां
...रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहले-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज़े-खुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहले-सफा मर्दूदे-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे

बस नाम रहेग अल्लाह का
जो गायब भी है, हाज़िर भी
जो मंज़र भी है, नाज़िर भी
उठ्ठेगा अनलहक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज़ करेगी खल्क़े-खुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो

शब्दार्थः
अहले-सफा pure people; अनलहक़ I am Truth, I am God. Sufi Mansoor was hanged for saying it; अज़ल eternity, beginning (opp abad); खल्क़ the people, mankind, creation; लौह a tablet, a board, a plank; महकूम a subject, a subordinate; मंज़र spectacle, a scene, a view; मर्दूद rejected, excluded, abandoned, outcast; नाज़िर spectator, reader

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

इस बसंत के बाद

चार कट्ठे का वह पीला खेत
सरसों के कुछेक पौधे
अब तक संभाल रखे हैं
बचे-खुचे बसंत को

इस बसंत में
शायद आधे हो गये हैं चाक
आधा कुम्हार
कोने में सिमट चुका है बीधहों में फैला खमहार
मेमनों की बेधड़क हलाली के बाद
शराफत लगभग समाप्त हो चली है

अकेला कवि
आधा कुम्हार
चार कट्टे का खेत
छोटे-छोटे मेमने
आखिर कब तक बचा पायेंगे
समूचे गांव का पूरा बसंत

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

यह ओलावृष्टि नहीं, गोलावृष्टि है


दहाये हुए देस का दर्द-71
इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज यानी आइपीसीसी ने पिछले साल अपनी एक रिपोर्ट में बहुत बड़ी बात कही थी। उसने कहा था कि जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों का पहाड़ सबसे ज्यादा उनके ऊपर टूटेगा, जिनका पर्यावरण को बिगाड़ने में सबसे कम योगदान है। वैसे आइपीसीसी का यह सचोद्‌घाटन रइसों को रास नहीं आयी थी। इसके बाद अमीरों ने वही किया जैसा वे ऐसे मामलों में हमेशा से करते आ रहे हैं। इससे पहले कि गरीबों के हक में कहा गया यह दूरगामी सच आम लोगों तक तक पहुंच पाता, अमीरों ने घिनौनी चाल चल दी। उन्होंने आइपीसीसी की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया। अमीर देशों के अगुवा और विश्व के स्वयं-भू नेता अमेरिका और उसके पिछलग्गुओं ने आइपीसीसी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। उनका षड्‌यंत्र रंग लाया जिसके परिणामस्वरूप दुनिया के बहुसंख्यक गरीबों के भविष्य को बचाने का एक प्रयास, सतह पर आने से पहले ही ओझल हो गया। लेकिन हाल के कुछ प्राकृतिक आपदाओं ने आइपीसीसी की रिपोर्ट पर अपनी मुहर जरूर लगा दी है।
कल पूर्वोत्तर बिहार के कोशी अंचल में बिन मौसम भारी ओलावृष्टि हुई। जी नहीं, इसे गोलावृष्टि कहना मुनासिब होगा, क्योंकि ओलों के वजन पांच से दस किलो तक थे। सूचना है कि आसमान से गोले की शक्ल में बरसे ओले ने एक दर्जन लोगों को मौके पर ही खेत कर दिया और करीब चार दर्जन लोगों को मरनासन्न अवस्था में पहुंचा दिया। सैकड़ों घर टूटे और भारी संख्या में मवेशियों के मरने और बड़ी मात्रा में रबी फसलों की तबाही की भी सूचना है। टीन की छत(कोशी इलाके में टीन की छत वाले घर काफी प्रचलित हैं) चलनी में बदल गये। उनमें बड़े-बड़े छेद हो गये। फूस से बने गरीबों के घर तो इन गोलों को दस मिनट भी बर्दाश्त नहीं कर सके।
इन दिनों गेहूं और अन्य शीतकालीन फसलों की सिंचाई-निराई चल रही है, सो किसान अपने-अपने खेतों में थे। शाम का समय था। पहले आसमान का रंग बदला। फिर पश्चिम की ओर से आये बादलों ने इलाके को घेर लिया और मूसलाधार बारिश होने लगी। यहां तक सब कुछ ठीक था, किसानों ने सोचा कि चलो पटवन के डीजल-पेट्रोल से कुछ राहत मिली। वे आसमान के खौफनाक इरादों से पूरी तरह अनभिज्ञ थे। उन्हें कहां मालूम था कि चंद ही मिनटों के बाद आसमान, बर्फ बरसाने वाले तोप में बदल जायेगा। बर्फों के गोले बरसने लगे, जो भाग सके वे बच गये। बांकी या तो अस्पताल या अश्मशान घाट पहुंच गये। किशनगंज में दो बच्चों समेत सुपौल और पूर्णिया में एक-एक महिला और मधेपुरा और अररिया में चार लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। घायलों के बारे में ठोस सूचना प्रशासन के पास नहीं है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि हर गांव को डॉक्टरी मदद की जरूरत है। लगभग हर गांव में दस-बीस लोग घायल हैं।
जी हां, यह जलवायु परिवर्तन का ही दुष्परिणाम है। लेकिन इसमें कोशी इलाके के लोगों का कोई योगदान नहीं। कार्बनडाइआक्साइड उत्सर्जन के मामले में यह इलाका दुनिया में सबसे न्यूनतम पायदान पर है। लेकिन जब पर्यावरण बिगड़ेगा, तो भौगोलिक सीमाओं का ख्याल नहीं करेगा। आइपीसीसी ने भी अपनी रिपोर्ट में यही बात कही थी। उसने कहा था कि पर्यावरण के मामले में करेगा कोई और भरेगा कोई और। आइपीसीसी ने कहा था कि अमीर मुल्क और अमीर लोग पैसे और संसाधन के बल पर पर्यावरण असंतुलन से होने वाले आपदाओं से बहुत हद तक बच जायेंगे, लेकिन गरीब मरने के लिए बाध्य होगा। कल की ओलावारी इसी का एक छोटा उदाहरण है।

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

मेरी पसंद : महान कप्तानों की महान पारियां

आज तक ताज़ा , वे १६ चौके और छक्का: जिम्बाबे के विरुद्ध कपिल का नवाद १७५
सौरव की आतिशबाजी : श्रीलंका के खिलाफ १८३ रनों की अद्भुत कप्तानी पारी


इन दिनों क्रिकेट विश्व कप की ऐतिहासिक पारियों की खूब चर्चा हो रही है। इनमें ऐतिहासिक कप्तानी पारी भी शामिल की जा रही है। दो भारतीय कप्तानों की दो ऐतिहासिक पारी मुझे भी याद आ रही है। सन्‌ 1983 के विश्व कप में कपिल द्वारा विपरीत परिस्थिति में जिम्बाब्बे के खिलाफ खेली गयी 175 रन की नाबाद पारी मेरी पहली पसंद है। दूसरी पसंद है- सौरव गांगुली की सिक्सरमय 183। यह अलग बात है कि सौरव के साथ-साथ उनकी इस सनसनाती पारी को भी लगभग भूला दिया गया है। सन्‌ 2003 के विश्व कप में सौरव ने यह लाजवाब पारी खेली थी। दोनों ही बार भारत को जीत मिली और दोनों बार भारतीय टीम फाइनल तक पहुंचने में कामयाब रही। वैसे कपिल और गांगुली के अलावा भी देश में कई नामचीन कप्तान हुये, लेकिन उनके बल्ले से ऐसी पारी कभी नहीं निकल सकी।

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

बाजार के हवाले खेत, भूख के हवाले पेट

सभी संकेत यही बता रहे हैं कि देश की कृषि तेजी से कॉरपोरेट हाथों में जा रही है। इससे जहां एक ओर बेरोजगारीबढ़ेगी तो वहीं दूसरी ओर खाद्यान की आत्मनिर्भरता भी गंभीर संकट में फंस जायेगी , लेकिन अपनी नीतियों के हाथ की कठपुतली हो चुकी सरकार को ये खतरे समझ में नहीं रहे हैं कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा ने नई दुनिया में इस विषय पर एक गंभीर आलेख लिखा है। आप भी खेत और खलिहानों पर मंडराते बाजार के इस मकड़जाल को समझने की कोशिश कीजिये,ताकि समय रहते हम जाग जायें। रंजीत

देवेंद्र शर्मा

इक्कीसवीं स
दी का पहला दशक इतिहास में थोड़ा धुंधला सा गया है। समय की सुई एक बार फिर वापस घुम रही है अंतर्राष्ट्रीय खाद्य मूल्य एक बार फिर अपने चरम पर है और वैश्विक मूल्य सारे रिकार्ड तोड़ते हुए एक बार फिर उसी स्तर पर पहुंच गये हैं जो वर्ष 2008 में थे। अगला दशक भी संभवत: ऐसा ही होगा।
जनवरी के प्रथम साप्ताह में अल्जीरिया पहले ही खाद्य पदार्थों को लेकर दंगे से गुजर चुका है। उधर संयुक्त राष्ट्र को डर सता रहा है कि 2011 में कहीं 2008 जैसी स्थिति फिर से न आ जाये, जब दुनिया के 37 देशों ने भूख के लिए दंगों का सामना किया था। मुझे डर है कि कहीं अगले दशक में भारत सहित विकासशील देशों के अन्य गुटों को खाद्य पदार्थ आयात न करना पड़े। भारत में कृषि के क्षेत्र में तेजी से बढ़ती कार्पोरेट संस्कृति और पानी, जंगल व कृषि भूमियों के निजीकरण देश को एक बार फिर तेजी से गुलामी के पुराने दिनों में पहुंचा रही है। देश को अपने लाखों भूखे पेटों को भरने के लिए खाद्य पदार्थ का आयात करना पड़ रहा है। नीति निर्माता और योजना बनाने वाले इस दिशा में काफी काम कर रहे हैं कि किसान अपनी खेती की जमीन को छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर जायें।
उत्तरप्रदेश का उदाहरण लें। यह देश का सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला प्रदेश है और साथ ही यह देश का सबसे ज्यादा आनाज उत्पादन करने वाला भी प्रदेश है। उत्तर प्रदेश का पश्चिमी भाग जिसमें गंगा से लगे मैदानी इलाकों की उपजाऊ जमीन भी शामिल है, हरित क्रांति का बेल्ट कहलाता है। यहां हर साल 410 लाख टन अनाज पैदा होता है। इसके अलावा यह प्रदेश 1.30 करोड़ टन गन्ना तथा 1.05 करोड़ टन आलू का भी उत्पादन करता है।
लेकिन यह सब जल्द ही बदलने की संभावना है और इसी बात का मुझे डर सता रहा है। इस रूट पर आठ हाईवे और टाउनशिप प्रस्तावित हैं। साथ ही उद्योग, रियल एस्टेट व इन्वेस्टमेंट प्रोजेक्ट के लिए अधिकांश जमीनों पर कब्जा होने लगा है। इसके दायरे में 23 हजार गांव आ रहे हैं। एक मोटे आंकड़े के अनुसार 66 लाख हेक्टेयर कृषि की जमीन पर खतरा पर मंडरा रहा है। इसका सीधा असर 140 लाख टन अनाज के पैदावार पर पड़ेगा। दूसरे शब्दों में कहे हैं तो उत्तरप्रदेश आने वाले सालों में अनाज की भीषण कमी से जूझेगा। उत्तरप्रदेश की यह कहानी दरअसल पूरे देश की है।
भारत में हरित क्रांति के दौरान कृषि में जो विकास हुआ था उसका सबसे बड़ा नुकसान पर्यावरण को उठाना पड़ा, क्योंकि इस दौरान रासायनिक खाद्य का बेतरतीब तरीके से उपयोग किया गया। वैज्ञानिक शब्दावली में इसे दूसरी पीढ़ी का पर्यावरणीय प्रभाव माना गया । कृषि वैज्ञानिकों की नजर में यह क्रांति प्राकृतिक संसाधन के लिए नुकसानदेह थी।
टेक्नोलॉजी के विफल होने का संयुक्त प्रभाव कृषि उपज पर पड़ा और इसमें भारी गिरावट देखी गई। सन्‌ 1990 के बाद से भारत में कृषि की पैदावार में लगातार गिरावट बनी हुई है। हरित क्रांति के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि कृषि की विकास दर जनसंख्या वृद्धि दर से प्रभावित हुई। उसके बाद इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं देखा गया। यह प्रक्रिया कई सारी सामाजिक-आर्थिक समस्याएं भी लेकर आई। हरित क्रांति टेक्नोलॉजी की विफलता भी किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या की एक बड़ी वजह बनी।
पर इनसे भी भारत ने कुछ नहीं सीखा। भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ कृषि के क्षेत्र में ज्यादा कुछ नहीं कर सका। भारत ने आयात दर कम कर दी या फिर हटा ही दी। यह विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) को खुश करने से ज्यादा कुछ नहीं था। सबसे ज्यादा चिंता की बात क्या है ? कृषि में लगातार आ रही गिरावट से कुछ नहीं सीखना या फिर यूपीए सरकार द्वारा दूसरी हरित क्रांति को फास्ट ट्रैक पर लाने की तैयारी करना जो किसानों को खेती से दूर करने का काम कर रही है।
किसानों को कृषि से पूरी तरह अलग रखने की तैयारी की जा रही है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार विकास के लिए इससे अलग कोई दूसरा रास्ता नहीं है। लेकिन कोई यह नहीं बता रहा कि आखिर ये किसान जाएंगे कहां ? अमेरिका सहित ऐसा कौन सा देश है जो आज 10 मिलियन लोगों को रोजगार देने की स्थिति में है ? कौन- सी कंपनी या उद्योग एक मिलियन लोगों को आज रोजगार देने का वायदा करने की स्थिति में है ?
भूमि किराया नीतियों जिन्होंने भूमि अधिग्रहण, विशेष आर्थिक क्षेत्रों आदि को बढ़ावा दिया है और साथ ही कृषि के बढ़ती कारपोरेट संस्कृति जिसकी वजह से बढ़ती हुई कांटेक्ट फार्मिंग और कमोडिटी ट्रेडिंग है, की वजह से भारत दूसरी हरित क्रांति की स्थिति में प्रवेश कर रहा है जो कि अंतत: कृषि से किसानों को बाहर फेंक देगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी समय-समय पर ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर जनसंख्या के स्थानांतरण की जरूरत पर बल दिया है।
अगले दशक में हम देखेंगे की कृषि पूरी तरह से कारपोरेट के चंगुल में आ गई है। बीज तकनीक वाली कंपनियों के साथ ही कुछ प्रमुख बड़ी कंपनियां भारत में अपनी दुकानें खोलने जा रही हैं। यह एक तरह से रिटेल के क्षेत्र में मल्टी ब्रांड बन चुकी है। हाल ही में जो कीमतों में वृद्धि हुई है वे भारत में बड़े रिटेल बाजार के प्रवेश को साफ दर्शा रही है।
अब जबकि खाद्य पदार्थों का आयात बढ़ता जा रहा है और कृषि क्षेत्र से किसान बाहर होते जा रहे हैं, भारत बहुत तेजी से उस स्थिति की ओर बढ़ रहा है जहां से उसने शुरूआत की थी। पिछले साठ वर्षों में देश ने उन नीतियों को उलट दिया है जो खाद्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर ले गई थी। अगले दशक में आर्थिक वृद्धि के नाम पर खाद्य आत्मनिर्भरता की बलि दी जा सकती है।
कृषि की आधारभूत संरचना को जानबूझकर पहुँचाई गई क्षति के परिणामस्वरूप सामने आई सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक स्थितियों को समझना अत्यंत ही मुश्किल है।

(देवेंद्र शर्मा कृषि मामलों के विशेषज्ञ हैं। आलेख नई दुनिया से साभार)

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

हम कैंसर को उद्योग कैसे कह दें



हर किसी को मालूम है कि बिहार औद्योगिक रूप से पिछड़ा प्रदेश है। इस बात से भी किसी को एतराज नहीं हो सकता कि बिहार को आर्थिक रूप से अव्वल बनाने के लिए उद्यम-उद्योग की व्यापक आवश्यकता है। लेकिन यह बात भी सच है कि भूख कितनी ही जोर की क्यों न लग जाये, खाना दोनों हाथ से नहीं खाया जा सकता। लेकिन बिहार सरकार "उद्योग' की तीव्र भूख को शांत करने के लिए हाथ क्या, पैरों से भी खाने के लिए तैयार है। मुजफ्फरपुर के विवादित एस्बेस्टस सीमेंट फैक्ट्री के मामले में उसने अभी तक जो स्टैंड लिया है, उससे तो यही साबित होता है। सरकार हर हाल में इस परियोजना को पूरी करना चाहती है, जबकि स्थानीय जनता इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। स्थानीय जनता कह रही है कि "आपने हमसे जमीन ली थी कृषि उद्योग के नाम पर और लगा रहे हैं जानलेवा एस्बेस्टस-आधारित सीमेंट फैक्ट्री। हमें उद्योग चाहिए, बीमारी की परियोजना नहीं चाहिए।' यही बात विश्व प्रसिद्ध पर्यावरण विशेषज्ञ बैरी कैसलमैन ने भी कहा है। मेधा पाटेकर, सुनीता नारायण, गोपाल कृष्ण, सच्चिदानंद सिन्हा जैसे देश-विदेश के नामी पर्यावरण विशेषज्ञ भी कह चुके हैं। लेकिन सरकार कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं है।
दरअसल, मुजफ्फरपुर स्थित मरवां प्रखंड के विशुनपुर-चयनपुर गांवों में चल रहे सरकार बनाम आम आदमी के इस टकराव को समझने के पहले हमें कुछ और बातों को समझना पड़ेगा। आखिर क्या कारण है कि प्रो-पीपुल होने का दावा करने वाली नीतीश सरकार इस प्रोजेक्ट को लेकर आमिल पी हुई है। क्या कारण है कि सुशासन और न्याय का दम भरने वाली एक सरकार एक कंपनी की मास-धोखाधड़ी को नेरअंदाज कर रही है। सरकार कंपनी से यह बात क्यों नहीं पूछ रही कि आपने जनता को अंधेरे में रखकर जमीन अधिग्रहीत की है, आपका चरित्र संदिग्ध है।
सवाल उठता है कि क्या यह सच में यह औद्योगिक भूख ही है कि सरकार एक अदद फैक्ट्री के लिए कंपनी की तमाम अपराध को माफ करने के लिए तैयार है। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है। अब तक यह बात साफ हो चुकी है कि चयनपुर-विशुनपुर की प्रोजेक्ट में राज्य के एक आला नेता की व्यक्तिगत दिलचस्पी है। उसने कंपनी से वादा कर रखा है कि चाहे कुछ भी हो जाये, आपकी सीमेंट फैक्ट्री जरूर खुलेगी। वैसे अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि यह गठबंधन की सरकार चला रहे नीतीश कुमार की राजनीतिक मजबूरी है या कुछ और कि वे भी अब तक इस मुद्दे पर जनता का साथ छोड़ने के लिए तैयार है। लोग पूछ रहे हैं कि बच्चों की टेक्सट बुक में लिखी बात (कि एस्बेस्टस के कण जानलेवा होते हैं) क्या गलत है? मुख्यमंत्री जवाब दें। लेकिन मुख्यमंत्री खामोश हैं। ठीक रूपम पाठक कांड की ही तरह। मतलब साफ है। अगर प्रचंड बहुमत वाले सरकार के मुखिया
लोगों के सहज सवाल का जवाब नहीं दे सकते, तो कैसे मान लिया जाये कि उनकी मंशा साफ है।
बहरहाल, मुजफ्फरपुर के शांति-प्रिय किसान आंदोलित हैं। सरकार ने 50 एकड़ की विवादित जमीन पर धारा 144 लगा दी है, जिसका अर्थ यह हुआ कि वहां पर फिलहाल कोई गतिविधियां नहीं चलायी जा सकतीं। लेकिन सरकार ने अभी तक विवादित बिंदुओं के समाधान की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। हालांकि इसे लेकर कई बार फैक्ट्री का विरोध कर रहे "खेत बचाओ जीवन बचाओ संघर्ष कमेटी'' संगठन के साथ बातचीत का स्वांग जरूर रचा गया है। लेकिन तमाम अवसरों पर सरकार की करनी और कथनी में कोई सामंजस्य नहीं था। प्रकरण में सरकार और स्थानीय प्रशासन का रूख अब तक एंटी-पीपुल्स ही रहा है, जिसके कारण अब लोगों का धैर्य जवाब दे रहा है। पिछले दिनों जिला प्रशासन के खिलाफ हजारों लोगों की गोलबंदी इसका सबूत है। संक्षेप में कहें तो एग्रेसिव पूंजीवाद बनाम रूरल इंडिया की टकराहट अब अपने दूसरे दौर में पहुंच गया है। पश्चिम बंगाल और ओड़िशा में इसका हस्र दुनिया देख चुकी है। अब इसके कदम बिहार की धरती पर पड़ रहे हैं। इतिहास गवाह है कि बिहार की आंदोलन-गर्भा धरती इसे बर्दाश्त नहीं करेगी। बिहार के लोग अगर अड़ गये, तो परिणाम भीषण होंगे। उम्मीद है आक्रामक पूंजी के नेतृत्वकर्ता इस बात और इसमें निहित खतरे को समझेंगे। क्या बिहार सरकार लगभग पूरी दुनिया में प्रतिबंधित हो चुके कारसीजेनिक (कैंसर पैदा करने वाला) एस्बेस्टस के पक्ष में रहेगी या फिर अपनी जनता की सेहत का ख्याल करेगी ?

सोमवार, 31 जनवरी 2011

ओह, आखिरी उघन भी टूट गया

दहाये हुए देस का दर्द -70
एक के बाद एक दो मातृशोक ! पहले लतिका और अब शशिकांता। दोनों चली गयीं। अगर रेणु का रचना-संसार अच्छिंजल (कुएं का पवित्र जल) है, तो लतिका हमारे लिए एक उघन (कुआं से पानी निकालने वाली रस्सी, जिसे कोशी अंचल में उघन कहा जाता है) थी। लेकिन वे पिछले दिनों हमसे सदा के लिए जुदा हो गयीं। लतिका जी के जाने से एक विरॉट शून्य पैदा हो गया और मेरे जैसे लोगों की बहुत-सारी जिज्ञाशाएं भी सदा के लिए दफ्न हो गयीं। लतिका जी, रेणु के लेखन की गवाह ही नहीं, बल्कि रचना-प्रक्रिया की हिस्सा भी थी। रेणु जी की लेखन-प्रेरणा के मर्म तक जाने के लिए लतिका जी सबसे बड़ा उघन थी। यह हमारी नाबालकी है कि हम कभी-कभी माटी की देह पर जरूरत से ज्यादा भरोसा कर लेते हैं। देह को जाना ही है, चाहे वह रेणु की हो या फिर लतिका की । लो दोनों चली गयीं।
पर यह क्या ? शशिकांता जी भी नहीं रहीं!
अभी लतिकाशोक से कोशी के लोग उबरे भी नहीं थे कि उन्हें दोहरा आघात लगा है। खबर मिली है कि परसों कोशी के दूसरे सबसे बड़े कलमकार राजकमल चौधरी की धर्मपत्नी शशिकांता जी का भी देहावसान हो गया । शनिवार की सुबह गाजियाबाद में शशिकांता जी ने हम सबको अलविदा कह दिया।
लतिका जी और शशिकांता जी की मौत अस्वाभाविक नहीं है। दोनों भरा-पूरा परिवार छोड़ गयी है। लतिका ने 86 वर्ष तक देह का धर्म निभाया, जबकि शशिकांता जी 80 की हो चली थी। बावजूद इसके मन इन खबरों को स्वीकार करना नहीं चाहता। मन कहता है, अभी वे नहीं मर सकतीं। उन्हें अभी हमारे बहुत-सारे सवालों का जवाब देना है। आखिर लतिका ही तो बतायेगी कि रेणु जी को "डॉक्टर प्रशांत' कहां मिले थे। उन्होंने परती की परिकथा में "जीतेंद्र' को कैसे खोजा था। उन्हें बताना था, कई सारी आदिम रात्रि की महक। और "मछली मरी हुई' के बारे में शशिकांता से बेहतर कौन बता सकता था, हमें ? कोई नहीं ? अब इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलेंगे। इन जवाबों तक पहुंचने का आखिरी रास्ता शून्य में गुम हो गया है। संतोष यह कि इन दोनों माताओं ने अपने-अपने पति के साथ मिलकर कोशी की पीड़ा को हरने में हमेशा उनका साथ दिया। लतिका नहीं होती, तो "तीसरी कसम' भी न होती और शशिकांता के बिना "राज का कमल' कभी नहीं खिलता। कोशी की इन महान मांओं को शत-शत प्रणाम। नश्वरते कौन ?

रविवार, 30 जनवरी 2011

गवाह

हां !
मैं गवाह हूं
मेरे ही युग में
भ्रष्टाचार भारत से बड़ा हो गया है

हां !!
मैं गवाह हूं
मेरे सामने ही हुआ है
आदमी का आत्म-पलायन
और
मुद्दों का मास मास माइग्रेशन

हां !!!
मैं इस बात का भी गवाह हूं
कि मैंने अभी-अभी एक झूठी गवाही दी है

हां !!!!
मै इस बात का भी गवाह हूं
कि मैं आदमी नहीं
आदमी और अंधकार के बीच का कुछ हूं

बुधवार, 19 जनवरी 2011

शेष बस अवशेष


कक्ष के अंदर
कुछ पक्ष में थे, कुछ विपक्ष में
शेष, बस अवशेष की तरह थे

कक्ष के बाहर
न पक्ष था, न विपक्ष
चोट और कचोट के घाव ही थे
नमक और तेल भी दवा के भाव थे
पक्ष मार रहा था
विपक्ष मरवा रहा था
हत्या
आत्महत्या कहलाने लगा था
उनको नंगई की आदत पड़ गयी थी
और जवाना भी बेशर्म हो चला था

इधर
गांव -जयवार में
शहर-बाजार में
समाज में, मिजाज में
देश और भीड़ का फर्क मिट रहा था
संविधान के सारे मुहावरे
लगभग चीख रहे थे
उधर
भीड़ से भगाया हुआ एक कवि
हाशिये पर हांफ रहा था
लगभग भांट की तरह
शायद बांच रहा था
" गर महंगाई से मारेंगे
तो बक्शीश क्या दोगे जी ?''

सोमवार, 10 जनवरी 2011

मेरी बेटी ने एक राक्षस का वध किया है- कुमुद

सीबीआइ रूपम पाठक के आरोपों की जांच नहीं करेगी। राज्य सरकार ने सीबीआइ से कहा है कि वह केसरी हत्याकांड की जांच करें। इसका क्या अर्थ हुआ? क्या बिना जांच के ही मान लिया गया है कि रूपम पाठक के आरोप गलत थे। तो फिर केसरी हत्याकांड की जांच की क्या आवश्यकता? रूपम ने तो दर्जनों लोगों के सामने विधायक की हत्या की थी और वह खुद अपना गुनाह कबूल भी रही है। इस मामले में जो बात लोग जानना चाहते हैं, वह है रूपम के आरोप की असलियत कि आखिर क्या मजबूरी थी कि एक शिक्षिका को हत्यारन बनना पड़ा। लेकिन सरकार इस सवाल पर मिट्टी डालना चाहती है। यानी प्रपंच का प्रहसन अभी जारी है। शायद यही बात रूपम की मां कुमुद मिश्र भी कहना चाहती है। एक बेटी की पीड़ा को उसकी मां से ज्यादा कोई दूसरा महसूस नहीं कर सकता है ? कुमुद मिश्रा कुछ सवाल कर रही है, सरकार से भी और समाज से भी ? लेकिन शायद हमारे पास उनके सवालों के जवाब नहीं हैं या फिर समाज गूंगा-अंधा हो गया है। कुमुद मिश्र की जुबानी ही सुनिये एक मां का दर्द। -रंजीत

'' देवी दुर्गा ने राक्षस महिषासुर का वध किया तो वे पूज्य हैं। हम उन्हें देवी कहते हैं। मेरी बेटी ने भी मर्यादा की रक्षा के लिए एक राक्षस का वध किया है, फिर उसे जेल में क्यों रखा गया है ? रूपम ताकतवर लोगों के शोषण की शिकार हर महिला के लिए आदर्श है। हमारी बेटी को इस हालात में पहुंचाने वाला विपिन खुलेआम घूम रहा है। यदि विपिन मिल जाये तो मैं उसका खून पी जाऊंगी। जिस समय रूपम ने यौन शोषण का मामला दर्ज कराया था, मैं भी उसके साथ थी। जिस व्यक्ति ने रूपम का एफआइआर लिखा था, वही उसकी कॉपी लेकर उसकी आंखों के सामने विधायक के पास गया था। उसी समय उसने कहा था कि पूरा सिस्टम बिका हुआ है, कोई तुम्हारी मदद नहीं करेगा। कुमुद आगे कहती है मैं अपनी बेटी को लेने आइ हूं और मुझे उम्मीद है कि पूर्णिया के लोग हमारा साथ जरूर देंगे। रूपम को जब तक पटना इलाज के लिए नहीं भेजा जाता, तब-तक मैं यहां से नहीं हिलूंगी। ''

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

IOC Set Up 44,000-Ton LPG Plant at Muzaffarpur

Researched by Industrial Info Resources (Delhi, India)--Indian Oil Corporation Limited (BSE:530965) (IOC) (New Delhi) plans to expand its liquefied petroleum gas (LPG) bottling capacity under its trade name Indane. The company is setting up a plant in Muzaffarpur and another in Baroda.
The demand for packed LPG in Bihar is being met by two Indane LPG bottling plants in Patna and Barauni, which have a combined capacity of 132,000 tons per year. The company fulfills the state's total LPG requirement of 196,000 tons per year, meeting the shortfall of 64,000 tons per year from neighboring states.
The proposed bottling plant in Muzaffarpur will ensure uninterrupted LPG supplies to North Bihar, as this area is vulnerable to supply disruptions due to periodic floods and road blocks. The plant will benefit the people in Bihar and Jharkhand, and signals more growth for these states and IOC.
"The Indane bottling plant at Muzaffarpur will be built at an estimated cost of $8.2 million and will be commissioned on March 21, 2011," said G.C. Daga, the director of marketing for IOC. "Built over 13.3 acres of land, the plant has a capacity of 44,000 tons per year and will be equipped with modern bays, mounded storage, cylinder-shed facilities for installing electronic carousels, and other allied facilities.'' Daga added that Indian Oil Corporation Limited is seeking alliances to enhance non-fuel business at its retail points by converting them into one-stop convenience points. There is an ensuing plan to introduce items of daily needs for the customers through Indane networks for distributors and petrol/diesel stations.
IOCL supplies nearly half of India's petroleum consumption, delivering petroleum products to millions of people every day through the countrywide network of about 35,600 sales points (55% of the industry). The company has 140 bulk storage terminals and depots, 99 aviation fuel stations and 89 Indane LPG bottling plants. The corporation's LPG bottling capacity now stands at 4.07 million tons per year. It delivers Indane cooking gas to the doorsteps of 56 million households. In 2009-10, IOC sold 69 million tons of petroleum products, registering 4.1% growth over previous year.
IOC is India's largest company by sales, with a turnover of $60.2 billion and a profit of $2.27 billion.
Industrial Info Resources (IIR) is the leading provider of global market intelligence specializing in the industrial process, heavy manufacturing and energy markets. IIR's quality-assurance philosophy, the Living Forward Reporting Principle™, provides up-to-the-minute intelligence on what's happening now, while constantly keeping track of future opportunities.

बुधवार, 5 जनवरी 2011

मोदी नहीं समझ सकते रूपम को

पूर्णिया के विधायक राजकिशोर केसरी मामले पर बिहार में राजनीति शुरू हो गयी है। बिहार भाजपा के क्षत्रप सुशील मोदी तो अपने विधायक के बचाव में खुलकर सामने आ गये हैं। मोदी ने आरोपी महिला रूपम पाठक को हत्यारिन, ब्लैकमेलर तक करार दिया है। संक्षेप में कहें, तो मोदी ने इस प्रकरण की सभी गुत्थी खोल दी है। हास्यास्पद बात यह कि वर्षों से विधायक केसरी और रूपम पाठक को जानने वाले स्थानीय लोग भी अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाये हैं। इसमें वे लोग भी शामिल हैं, जिनका रूपम पाठक और विधायक से आग-पानी का रिश्ता रहा है। लेकिन कोशी और कोशी की संस्कृति के बारे में "एबीसी' भी नहीं जानने वाले मोदी ने बहुत आसानी से नतीजा निकाल दिया है। यह तो वही बात हो गयी कि "ग्वाला के ठट्‌ठा और पड़ोसी के गर्भिन' वाली बात हो गयी।
शायद मोदी को नहीं मालूम कि इस तरह के वाकये को समझने के लिए राजनीतिक दिमाग नहीं, बल्कि आम आदमी के दिल की जरूरत होती है। प्रथम द्रष्टया यह व्यवस्था से निराश होकर इमोशन में उठाया गया मामला लगता है, जिसे राजनीतिक नजरिये से कभी नहीं समझा जा सकता। इसे मोदी जैसे सत्तानसीं शायद कभी नहीं समझ सकेंगे।
क्या यह बात गले के नीचे उतर सकती है कि आज के दौर में सत्ताधारी पार्टी के किसी विधायक को कोई अदना महिला ब्लैकमेल कर सकती है। वह भी तीन-चार साल तक। ब्लैकमेलर की हत्या की बात तो सबने सुनी होगी, लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि ब्लैमेलर ने किसी की हत्या की हो। लेकिन मोदी उसे बेधड़क ब्लैकमेलर हत्यारन कह रहे हैं। मोदी का कुतर्क देखिये, वे कहते हैं कि महिला स्वभाव से लड़ाकिन है, क्योंकि उसने अपने श्वसुर पर भी मुकदमा किया था। इसका क्या अर्थ हुआ ? क्या अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोग पागल होते हैं ? इसका यह अर्थ भी तो हो सकता है कि रूपम पाठक में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत थी।
हालांकि मैं रूपम पाठक को क्लीन चीट नहीं दे रहा और न ही मैं उसके अपराध की तारीफ कर रहा हूं। यह अन्वेषण का विषय है। भले ही पुलिस कभी भी सच को सामने नहीं ला पाये, लेकिन यकीन मानिये पूर्णिया के स्थानीय लोगों से सच्चाई बहुत दिनों तक छिपी नहीं रहेगी। कोशी के स्थायी बाशिंदे होने के नाते मैं एक बात तो पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं। वह यह कि कोशी की महिला स्वभाव से स्वाभिमानी और विद्रोही होती है। कोशी की महिला हर जुल्म को सह सकती है, लेकिन बलात्कार और यौन शोषण या चरित्र हनन को कभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकती। ऐसी परिस्थिति में वह भूल जाती है कि सामने कौन है। चारित्रिक हनन की स्थिति में वह साक्षात काली का रूप धारण कर लेती है। तब वह परवाह नहीं करती कि जिसके खिलाफ वह आवाज उठा रही है वह कितना ताकतवर है।
बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि 10-12 वर्ष पहले भी कोशी में इस तरह का एक हादसा हुआ था। लेकिन तब विधायक बच गया था। बलात्कार के प्रयास कर रहे छातापुर के तत्कालीन विधायक योगेंद्र सरदार को भुक्तभोगी महिला ने बुरी तरह घायल कर दिया था। आज वह महिला पुलिस में कांस्टेबल है। मोदी जैसे लोगों को इस पुलिस कांस्टेबल से जरूर मिलना चाहिए। रूपम पाठक में प्रथम द्रष्टया मुझे कोशी की चरित्र-संवेदी विद्रोही महिला की ही छवि दिखाई दे रही है। मोदी जैसे लोग शायद इस बात को कभी नहीं समझेंगे। और जो समझने वाले लोग हैं, उन्हें किसी की दलील की जरूरत नहीं। वे सब कुछ समझ रहे हैं, क्योंकि पब्लिक सब जानती है।

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

चीन के इशारे पर नाचता नेपाल

(प्रायोजित काररवाई: तिब्बती शरणार्थी पर जुल्म ढाती नेपाली पुलिस )

मुझे याद है कि पिछले साल जब मैं बदलते नेपाल के राजनीतिक-सामाजिक हालात पर रिपोर्टिंग करने के क्रम में नेपाल के लोगों से चीन के बारे में पूछता था, तो उनमें से अधिकतर भड़क उठते थे। कुछ लोग तो यह आरोप भी लगाते थे कि यह भारतीय लोगों की औपनिवेशिक मानसिकता है कि वह नेपाल-चीन के सामान्य रिश्ते को भी शक के नजरिये से देखते हैं। हालांकि, मुझे
पक्की जानकारी थी कि नेपाल पिछले पांच-दस वर्षों से चीन के इशारे पर नाच रहा है। अमेरिका में रहने वाले एक नेपाली महोदय ने तो मेरी भर्त्सना तक की। वैसे मैं नेपाल-चीन के संदिग्ध गठजोड़ पर सवाल उठाता रहा
माओवादी नेताओं के भारत विरोध अभियान के बाद, तो शक यकीन में बदलता प्रतीत हो रहा था। कई अवसरों पर माओवादी नेताओं ने अपनी हरकतों से इस बात के संकेत दिये थे कि वे चीन के इशारे पर भारत के खिलाफ साजिश रच रहे हैं। वे योजनाबद्ध ढंग से भारत के खिलाफ षडयंत्र रचने में निरंतर सक्रिय हैं। लेकिन नेपाल के पत्रकार और बुद्धिजीवी कभी भी इस आरोप को सच मानने के लिए तैयार नहीं हुये। इस विषय पर लिखने के कारण नेपाल के कुछ बुद्धिजीवियों ने मेरी जबर्दस्त आलोचना भी की थी। लेकिन अब विकीलिक्स ने सारे रहस्यों पर से पर्दा उठा दिया है। उसने नेपाल-चीन के नापाक गठजोड़ का भंडा फोड़ दिया है।
विकीलिक्स ने एक दस्तावेज जारी किया है, जिसके अनुसार नेपाल में चीन के विरोध में होने वाले तिब्बतियों के प्रदर्शन को कुचलने के लिए चीन वहां की सरकार पर धन की बारिश करता है। तिब्बती प्रदर्शनकारियों को कुचलने के लिए नेपाल सरकार पर दबाव बनाने के साथ चीन ने वहां की पुलिस को पैसे बांटकर कई तिब्बतियों को गिरफ्तार भी करवाया है। विकीलीक्स की ओर से जारी किए गए अमेरिकी विदेश मंत्रालय के गोपनीय संदेशों में यह बात सामने आयी है कि चीन की सरकार नेपाल के पुलिस अधिकारियों को नकद ईनाम देती है जो चीन छोड़कर भागने की कोशिश कर रहे तिब्बतियों को गिरफ्तार कर उन्हें चीन के हवाले कर देते हैं। दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास से 22 फरवरी 2010 को अमेरिकी प्रशासन को भेजे गये इस गोपनीय संदेश में अज्ञात सूत्र का हवाला देते हुए कहा गया है कि चीन के दबाव में नेपाल निर्वासित शरणार्थियों पर नियंत्रण कस रहा है। दिल्ली डायरी नाम से भेजे गये इस संदेश को गोपनीय संदेश की सूची में रखा गया है।
संदेश में नेपाल के एक अखबार के हवाले से कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत में प्रवेश करने वाले तिब्बतियों की संख्या में कमी आयी है। बीजिंग ने काठमांडू से नेपाल की सीमा पर चौकसी बढ़ाने के लिए कहा है जिससे तिब्बतियों के लिए नेपाल में घुसना मुश्किल हो इसमें कहा गया है कि मार्च 2008 के बाद भारत में प्रवेश करने वाले तिब्बतियों की संख्या कम हुई है।
गौरतलब है कि नेपाल में करीब 20,000 तिब्बती शरणार्थी हैं और ल्हासा में 2008 में हुई हिंसा के बाद काठमांडू में चीन विरोधी प्रदर्शन होते रहते हैं। पश्चिमी देशों की ओर से नेपाल पर दबाव है, फिर भी नेपाल मानता है कि तिब्बत चीन का अभिन्न हिस्सा है। मुझे नहीं पता कि इस खुलासे के बाद भारत विरोधी नेपाली बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया क्या होगी, लेकिन अब भारत को जरूर चौकन्ना हो जाना चाहिए, क्योंकि नेपाल में चीन का बढ़ता हस्तक्षेप भारत के लिए बहुत बुरा संकेत है।

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

एक गाथा का समापन

आज समाजवादी धारा का एक निर्झर सोता सदा के लिएसूख गया। प्रसिद्ध समाजवादी नेता, विचारक और चिंतकसुरेंद्र मोहन हमारे बीच नहीं रहे। सुरेंद्र मोहन भारत के उनगिने-चुने नेताओं में थे, जो राजनीति को गुरु सामाजिक जिम्मेदारी मानते थे। वे समकालीन सत्तापिपाशु राजनीति के दौर के दुर्लभ नेता थे। मोह राष्ट्रीय आंदोलन के दौर मेंसमाजवादी आंदोलन से जुड़े थे और आजीवन इसके लिएकाम करते रहे। माजवाद में उनका विश्वास उतना हीअटूट था, जितना जड़ को जमीन पर विश्वास होता है। आज के दौर में जब समूचा राजनीतिक तंत्र भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है , तो राजनीति की इस काल कोठरी में सुरेंद्र मोहन किसी अपवाद पुरुष की तरह खड़े रहे और हमेशा बेदाग रहे।
सन्‌ 1948 में कांग्रेस में शामिल समाजवादी दल के नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया तो सुरेंद्र मोहन अंबाला में पार्टी के जिला सचिव बने। पार्टी ने उनकी लगन और विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को देखते हुए 1960 में उन्हें युवा संचालक बनाया और बाद में वह पार्टी के सह-सचिव बनाये गये। सन्‌ 1977 में जब कांग्रेस, भारतीय लोकदल, भारतीय जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टी को मिलाकर मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी का गठन किया गया, तो सुरेंद्र मोहन लाल कृष्ण आडवाणी के साथ नवगठित जनता पार्टी के महामंत्री बने। आपातकाल के बाद हुये चुनाव में जनता पार्टी को भारी बहुमत मिला और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में केंद्ग में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। सुरेंद्र मोहन को केंद्र सरकार में मंत्री बनाए जाने का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन उन्होंने बड़ी विनम्रता से इसे ठुकरा दिया। एक साल बाद 1978 में वह बहुत मनाने के बाद राज्यसभा सदस्य बनने को तैयार हुये। 1979 में जनता पार्टी के विघटन होने के बाद मोहन चंद्रशेखर की अध्यक्षता वाली जनता पार्टी के महासचिव बने । सन्‌ 1988 में जनता पार्टी का जनता दल में विलय हो जाने के बाद वे जनता दल से जुड़े।सन्‌ 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मोहन को पहले बिहार का राज्यपाल और बाद में राज्यसभा सदस्य मनोनीत करने का प्रस्ताव किया, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया। 84 वर्ष की उम्र में भी वे आंदोलनधर्मी बने रहे। जनता के पक्ष में आखिरी सांस तक लड़ने वाला यह योद्धा आजीवन अपराजित रहा। वे न तो सत्ता से डरे, न ही सत्ता की वासना ही उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर सकी। 17 दिसंबर को भी वे जंतर-मंतर पर एक धरने पर जाकर बैठे थे।
सुरेंद्ग मोहन के देहावसान के साथ ही भारत में समाजवादी विचारधारा की एक गाथा का समापन हो गया है। वे प्रेम भसीन, राजनारायण, मधुलिमये, मधु दंडवते, कर्पूरी ठाकुर, जॉर्ज फर्नांडिस (!) और रामसेवक यादव की समाजवादी श्रृंखला की अंतिम कड़ी थे। यह कड़ी आज हमसे अलग हो गयी। जब दुनिया समकालीन बाजारवाद से घुटन महसूस करने लगेगी, तो समाजवाद का पुनर्जन्म होगा। तब शायद सुरेंद्र मोहन की विरासत की पूरी दुनिया खोज करेगी। समाजवाद के इस योद्धा को नमन।