मंगलवार, 7 अगस्त 2012

रिक्शे पर एक अमर प्रेम

हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां हर अच्छी और जरूरी बात महज एक स्लोगन है। यत्र नार्यस्तु पूज्यते के आदिम मंत्र से लेकर नारी सशक्तिकरण के आधुनिक सरकारी जुमले तक के सफर की उलटबांसी यह है कि साल-दर-साल देश में महिला उत्पीड़न की घटना बढ़ती जा रही है। आश्चर्य की बात यह कि आज भी महिलाओं का सर्वाधिक उत्पीड़न और शोषण घर-परिवार में ही होता है। ऐसे समय में सुरेंद्र यादव की  कहानी मन को कुछ सुकून देती है, जो कैंसरग्रस्त पत्नी की दवा के लिए रिक्शा kखींचता है। द पब्लिक एजेंडा ने अपने हालिया अंक में इस युवक की मिसाल पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। ऊपर की तस्वीर पर क्लिक कर यह रिपोर्ट पढ़ी जा सकती है। आप द पब्लिक एजेंडा वेबसाइट पर भी यह रिपोर्ट पढ़ सकते हैं- रंजीत


शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

गांव तक गैंग्रीन


" चुनाव जीतने के बाद, कोई काका-काकी-पड़ोसी नहीं। तुम मुखिया और लोग पब्लिक। पांव पकड़कर या आंख दिखाकर, जैसे भी हो चुनाव के वक्त वोट ले लो। इसके बाद सब कुछ भूल जाओ, तो कुछ कमा-धमा सकोगे वरना हाथ मलते रह जाओगे। पांच साल निकल जायेगा और तुम ठन-ठन गोपाल ! माल रहेगा तो फिर जीतोगे, नहीं तो झाल बजाना पड़ेगा। बेटा-बेटी और घरवाली जीवन भर ताना मारती रहेगी कि मुखिया बनकर भी कौन-सी तीर मार ली ?  वही  खप़ड़ैल मकान और टूटी हुई पंजाबी साइकिल। हाथ में ठेल्ला, पांव में बेमाई।'' 
यह किसी घाघ राजनेता का पुत्र-उपदेश नहीं है। आपको यह जानकार हैरत होगी कि जिस व्यक्ति ने मुझे यह सब सुनाया उसका जन्म किसी पुश्तैनी राजनीतिक खानदान में नहीं हुआ । उसकेपिता मेहनतकश किसान थे। हम बचपन में साथ पढ़ते थे और आज वह अपने गांव का मुखिया है। मैंने उसे मुखिया होने का कर्त्तव्य याद दिलाया, तो उसने मुझे दोस्त जानकर यह पाठ पढ़ा दिया। मैं हतप्रभ रह गया। पुराने दिन याद आ गये। इसी शख्स के साथ कभी हमने गांव के कमजोर और वंचितों के लिए शहीदी अंदाज में आंदोलन चलाया था। हमारा एक गुट था, जो बिना किसी स्वार्थ के गरीब और कमजोर के पक्ष में लाठी लेकर खड़ा रहता था। इसके लिए हमें घर में ताने और बाहर में धमकी सुनने-सहने पड़ते थे।  वह  शख्स मुखिया बनते ही इतना बदल गया है कि साथ उठने-बैठने वाले लोग उसे वोटर लगने लगा है। जिसे खाने के लिए दो रोटी नहीं है, उससे भी इंदिरा आवास के नाम पर पांच हजार रुपये अग्रिम रिश्वत की मांग करने में उसे कोई हिचकिचाहट नहीं होती।
दरअसल, पिछले 65 साल में हमारे राजनीतिक कर्णधारों ने जो राजनीतिक संस्कृति विकसित की है, वह अब विधानसभा और लोकसभा के ऊंचे पहाड़ों से उतर कर ग्राम सभा के मैदानों तक पहुंच गयी है। यह बात  इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बहुतेरे विद्वान और एक्टिविस्ट पंचायती राज से बहुत उम्मीद लगाए बैठे हैं। उन्हें शायद मालूम नहीं कि जिस सत्ता के विकेंद्रीकरण का नारा दिया गया था, वह बिखर चुका है। तर्क दिया जा सकता है कि अभी पंचायती राज की उम्र ही क्या हुई है? लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह कोई तर्क है। जिस संस्था की नींव में ही भ्रष्टाचार की अमरबेल रोप दी गयी हो, उससे छायादार बरगद नहीं जन्म ले सकता। सच तो यह है कि स्वार्थ की जो शर्महीन-असंवेदनशील राजनीति अब तक केंद्र और राज्य की सत्ता के लिए हो रही थी, वह पंचायती राज के द्वारा ग्रास रूट लेवल तक पहुंच गयी है। लेकिन इसके लिए गांवों को दोष नहीं दिया जा सकता। यह व्यवस्था ग्रामीणों ने तैयार नहीं की।  इसकी संरचना और नियमन, उन्हीं भ्रष्ट अधिकारी और नेताओं ने किया, जो राजनीति को धंधा समझते हैं। क्या कारण है कि आज भी पड़हा, पंच जैसे दर्जनों पारंपरिक व्यवस्था (अगर कहीं है तो) भ्रष्टाचार और राजनीतिक कुटीलताओं से बची हुई है ? 
ऐसा नहीं है कि सरकारें इस सब से अनजान हैं। अधूरी ही सही, लेकिन हर योजना की प्रगति रिपोर्ट सरकार को जाती है। मनरेगा को ही लें, तो यह बात केंद्र के अलावा तमाम राज्यों की सरकारें जानती हैं कि इसकी 60-70 प्रतिशत राशि पंचायती राज के प्रतिनिधि और प्रखंड-तहसील के अधिकारी लूट रहे हैं। मनरेगा ही नहीं, गांव तक जाने वाली तमाम योजनाओं का यही हाल है। हाल में ही झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, मध्य प्रदेश से हाल में ही बच्चादानी निकालने के हैरतअंगेज मामले सामने आये हैं। पता चला है कि पंचायत प्रतिनिधि, दलाल और डॉक्टरों का एक नेक्सस राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की राशि में भारी लूट मचाये हुए हैं।  इसके लिए वे अविवाहित महिलाओं के बच्चेदानी निकाल दे रहे हैं।
यह सच है कि मुखिया, पंचातय प्रमुख आदि  विधायकों, सांसदों, मंत्रियों की देखा-देखी कर रहे हैं। लेकिन यह कहना सही नहीं है कि पंचायतों-निकायों को लकवामार बनाने वाली यह  भ्रष्ट राजनीतिक संस्कृति गांवों की स्वाभाविक उपज है। अगर यह सच होता तो मुखिया अपने इलाके के विधायक और राजनीतिक पार्टियों के स्थानीय प्रमुखों के घर का त्रिपेक्षण करते नहीं दिखते। सच तो यह है कि पंचायती सत्ता को राजनीतिकदलों ने अपना स्थानीय एजेंट बना लिया है।  मुखिया पार्टी नेताओं को अपने गांव का वोट दिलवाता है, पार्टी फंड के नाम पर नेताओं को चंदा पहुंचाता है और बदले में खुल्लमखुल्ला लूट मचाता है। थाने के पास एक मौखिक सूची होती है कि किस मुखिया के खिलाफ होने वाली शिकायत को प्राथमिकी बनानी है और किसकी शिकायत को रद्दी की टोकरी में फेंक देनी है।
सवाल है कि क्या गांधी जी ने इसी ग्राम स्वराज का सपना देखा था?  भ्रष्टाचार के मुद्दे को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने के लिए अण्णा हजारे ग्राम सभा तक पहुंचने की बात करते हैं। शायद अण्णा और उनकी टीम को ग्राम सभा की असलियत नहीं मालूम। भष्ट और संवेदनाविहीन राजनीति का गैंग्रीन अब गांवों तक पहुंच चुका है। क्या कहा, दवा ! जी नहीं, गैंग्रीन की दवा नहीं, ऑपरेशन होता है।

बुधवार, 1 अगस्त 2012

देरी भी एक सबूत है, मी लार्ड (संदर्भ एलएन मिश्रा हत्याकांड )


दहाये हुए देस का दर्द- 84
आखिर किसने मारा ललित बाबू को ? करोड़ों लोग यह सवाल पिछले 37 साल से पूछ रहे हैं। एक पूरी पीढ़ी, जिसने ललित बाबू के पुरुषार्थ और इकबाल को देखा था, उनमें से अधिकतर बिना जवाब पाये ही इस दुनिया से विदा हो गये। मैं विभिन्न मौकों पर ऐसे दर्जनों वृद्धों से मिला हूं, जो अपने जीवन- काल में ललित बाबू के हत्यारों को फांसी पर चढ़ते देखने के इच्छुक थे। उनमें से अधिकतर अब इस दुनिया में नहीं हैं और वे अपनी अधूरी हसरत के साथ दुनिया से विदा हो चुके हैं। राजनीतिक हलकों में भले ही यह सवाल अब महत्वहीन हो चला है कि ललित बाबू की हत्या किसने की और क्यों की, लेकिन कोशी और मिथिलांचल के करोड़ों लोगों के जेहन में आज भी यह बात शिद्दत से उठती है। ठीक वैसे ही जैसे तीस-पैंतीस साल पहले उनके माता-पिता, दादा-दादियां व्यग्र होकर कहते थे- "माटी के पूत का खून क्यों किया ? जिसने ललित बाबू का खून किया, उसका सर्वनाश होगा।''
मुझे नहीं लगता कि भारत के ज्ञात इतिहास में किसी एक व्यक्ति की हत्या के बारे में किसी समाज ने कभी इतना सवाल किया होगा। जब हम बच्चे थे, तो अक्सर ललित बाबू के किस्से सुनते थे। हमारी उम्र की एक पीढ़ी "ललित कांड'' को सुनते-गुनते जवान हुई है। तब हम जहां जाते थे, "ललित-गान'' ही सुनते थे। उन दिनों खेत में हलवाहे, मेड़ पर घसवाहिनी, चौपाल पर बुजुर्ग, बाजार में व्यापारी और सफर में यात्री; हर कोई ललित बाबू की हत्या के बारे में बात करते थे। कुछ रोते थे, कुछ अफसोस जताते थे। कुछ शाप देते थे-" हड़हड़िया डाक, दोपहरिया ठनका खसेगा। भस्म हो जायेगा। जे जीवेगा से देखेगा, पूरा खानदान के सत्यानाश होगा। गरीबों का आह जरूर लगेगा। के नहीं जानता कि किसने मराया ललित बाबू को? अपनो कहां भोग हुआ!''
इन वाक्यों को सुनने के बाद साफ हो जाता था कि ललित बाबू के हत्यारे कौन रहे होंगे। हालांकि सबूत किसी के पास नहीं था, तर्कों का एक लंबा अनुक्रम है जिन्हें काटना अक्सर नामुमकिन होता है। तब गांव के लोग नाम लेकर शाप देते थे और हमारे जैसे बच्चे मन ही मन मान लेते थे कि लोग ठीक ही कह रहे होंगे। ''एक जुबान झूठी हो सकती है, दस जुबान एक साथ झूठी नहीं होती !'' इस मुहावरे में आज भी कोशी-मिथिलांचल के लोगों  को अकाट्‌य विश्वासस  हैं।
पत्रकारिता में आने के बाद मैंने इस हत्याकांड की जांच का हर संभव अध्ययन किया। जांच से जुड़े किसी अधिकारी से जब कभी मिलने का अवसर मिला, उनसे सवाल किये। लेकिन हर किसी ने इसे 'मर्डर मिस्ट्री' ही बताया। यह बात और है कि वे अधिकारी अब इतना जरूर कहते हैं कि जांच राजनीतिक हस्तक्षेप का शिकार हुई। अब जबकि देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआइ ने इस जांच को लेकर इतिहास ही रच दिया है, तो यह समझना और भी आसान है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। चार दशक के बाद भी सीबीआइ किसी को सजा दिलाने में नाकाम रहा। यही कारण है कि बीते दिनों इस ऐतिहासिक देरी को आधार बनाकर आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट से मुकदमा समाप्त करने की मांग कर डाली। आरोपियों ने कहा कि 37 साल से ट्रायल लंबित है। इससे उनके त्वरित न्याय पाने के मौलिक अधिकार का हनन हुआ है। इसलिए जांच और मुकदमे को निरस्त किया जाये।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे गंभीरता से लिया और इस पर सुनवाई भी पूरी हो गयी है।  अदालत ने कहा है कि वह फैसला कुछ समय बाद सुनायेगी । न्यायमूर्ति एच एल दत्तू और जस्टिस चंद्रमौलि कुमार प्रसाद की खंडपीठ ने हत्याकांड के आरोपी 65 वर्षीय वकील रंजन द्विवेदी की याचिका पर विस्तार से सुनवाई के बाद कहा कि फैसला बाद में सुनाया जायेगा। रंजन द्विवेदी का कहना है कि चूंकि 1975 में हुई इस हत्या के मुकदमे की सुनवाई में अभूतपूर्व विलंब हो चुका है,  इसलिए अदालत को सारी कार्रवाई निरस्त कर देनी चाहिए। गौरतलब है कि हत्याकांड के समय रंजन द्विवेदी 24 साल के नौजवान थे, जो अब बुजुर्ग हो गये हैं। लेकिन सीबीआइ ने द्विवेदी के दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि सुनवाई अंतिम चरण में है, इसलिए निचली अदालत को निष्कर्ष तक पहुंचने की अनुमति मिलनी चाहिए।  उल्लेखनीय है कि इस मामले में रंजन द्विवेदी के अलावा  सुदेवानंद अवधूत, संतोषानंद अवधूत  और गोपाल जी नामक शख्स अभियुक्त हैं।
गौरतलब है कि अपने जमाने के करिश्माई कांग्रेसी नेता और केंद्रीय मंत्रिमंडल में रेल और विदेश मंत्रालय संभालने वाले ललित नारायण मिश्र की तीन जनवरी, 1975 को समस्तीपुर जंक्शन पर बम विसफोट में हत्या कर दी गयी थी। जब उनकी हत्या हुई थी, वे संसद के अलावा समाज में भी लोकप्रियता के सातवें आसमान पर थे। आलम यह था कि दो तिहाई से ज्यादा सांसद पहले मिश्र से मशविरा करते थे, बाद में सात रेस कोर्स की ओर जाते थे। 

मिश्र कोशी अंचल और बिहार के सच्चे सपूत थे। वह बिहार के पहले नेता थे, जो हर जाति, हर समुदाय और संप्रदाय में समान रूप से लोकप्रिय थे। बढ़ती लोकप्रियता के कारण राजनीति में उनके बहुत सारे दुश्मन हो गये, लेकिन जनता में उनके आलोचक खोजे नहीं मिलते थे। कमिश्नरी मुख्यालय का निर्माण हो, रेलवे या कोशी पर तटबंध का निर्माण हो, मिश्र के प्रयास से कोशी अंचल के आम लोगों को इसके दर्शन हुए। उनसे पहले इलाके के अधिकांश लोग रेलवे के टिकट के बारे में सिर्फ सुनते थे कि वह कूट का होता है, जिस पर लिखी तारीख को पढ़ना सबके बस की बात नहीं। ललित मिश्र के कारण ही इलाके के हजारों बच्चों को उच्च शिक्षा नसीब हुई और कई लोगों को पहली बार ट्रेन पर बैठने का अवसर प्राप्त हुआ। मिश्र के निधन के बाद एक बार फिर यह इलाका उपेक्षा के अंधकार में डूब गया। उसके बाद इलाके से नेता तो बहुत हुए, लेकिन  मिश्र जैसा इकबाल किसी का न हो सका। बहुत कम लोग जानते हैं कि मौजूदा प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ललित नारायण मिश्र की ही खोज हैं।
बहरहाल,अदालत का फैसला जो भी हो। मुकदमा निरस्त हो या आरोपियों को सजा मिले या न्यायालय इसे नये सिरे से जांच करने का आदेश दे, लेकिन कोशी के लोगों का इसमें अब खास दिलचस्पी नहीं बची है, क्योंकि उनके लिए ललित नारायण मिश्र हत्याकांड कोई रहस्य नहीं है।खुला सच है
  वे कहते हैं, "ऊपर वाले का न्याय हो चुका है। अब बाकी क्या है होने को ?''

रविवार, 29 जुलाई 2012

अलौकिक और अदभुत

अदभुत  ! लंदन ओलंपिक के उद्‌घाटन समारोह को वर्षों तक याद रखा जायेगा। ओह ! रोशनियों की इन रंगीनियों के क्या कहने !! हालांकि दुनिया की असल तस्वीर ऐसी नहीं है। वह भीषण गरीबी, भयानक अन्याय, पाश्विक हिंसा से अटी पड़ी है, लेकिन इन तस्वीरों को देखकर दुनिया सच में बहुत सुंदर लगती है, क्योंकि इसमें भोपाल नहीं है। इराक नहीं है। अफगानिस्तान और तिब्बत भी नहीं है। पिघलते हिमनद,काले कार्बन,सूखती दरिया, सिमटते जंगल और लुप्त होते जीव भी नहीं हैं। वे  सब कुछ नहीं हैं, जो कटु सच है। यहां सब  कृत्रिम  है वही है, जो नहीं है। इन सबके बावजूद इन तस्वीरों को देखकर सुंदर की उम्मीद जरूर जगती है। आलम मनोरम लगने लगता है... 











शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

जाना एक आनंद का (अंतिम यात्रा की कुछ तस्वीरे)

पर्दे पर हमेशा आनंद परोसने वाला वह शख्स अभिनय की दुनिया का अवतार था। उनकी अभिनय यात्रा अमर प्रेम कथा की तरह है, जो जनता हवलदार  की यादों में हमेशा चलती रहेगी।

बुधवार, 18 जुलाई 2012

दर्द न मिले, तो दुखता है

  

  दर्द !
  अब न मिले
  तो दुखता है

  नहीं बंधु !!
  घाव नहीं है यह
  हथेली का ठेल्ला (गांठ) है
  कुदाली दो पारने को
  पत्थर दो तोड़ने  को
  बस यही एक दवा है

  नहीं !!!
  नहीं लगती चोट
  इस बात को लेकर
  जी अक्सर कचोटता है
  

सोमवार, 16 जुलाई 2012

... तो पैदल हो जायेंगे कोशीवासी

फनगो हाल्ट के पास कोशी का कटाव 
दहाये हुए देस का दर्द- 83
डुमरी पुल के बेकाम होने के बाद से सहरसा, खगड़िया, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया, अररिया जिलों के करीब 30-35 लाख लोगों को बाहर ले जाने का एक मात्र रास्ता सहरसा-मानसी रेल-लाइन है। यह एक लूप लाइन है, जिसकी उपेक्षा की अपनी अलग कहानी है। एक बार फिर इस लाइन पर कोशी मैया का कोप टूटा है। कोई छह गाड़ियां रद्द की जा चुकी हैं और अगर मैया नहीं मानी तो एक-दो दिनों में ही पटरी पर गाड़ी नहीं नदी की धारा चलेगी। मिली जानकारी के अनुसार, कोपरिया और धमारा स्टेशन के बीच फनगो हॉल्ट के समीप नदी की एक धारा राह भटक गयी है। वह अपने निर्धारित रास्ते से बहने से कतरा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि सिल्ट के कारण निर्धारित चैनल में शायद कोई बड़ा डेल्टा बन गया है, जो धारा को पार्श्व की ओर जाने के लिए मजबूर कर रही है। लेकिन पार्श्व में रेलवे लाइन अवरोधक बन रही है। इसलिए नदी इसे जोर-जोर से खुरच रही है। आलम यह है कि करीब 50 मीटर की लंबाई में नदी और पटरी के बीच मीटर-दो मीटर का फासला ही बचा है। रेलवे के इंजीनियर बोल्डर और क्रेटर के जरिये इसे रोकने का प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए भारी संख्या में मजदूर लगाये गये हैं। बावजूद इसके इंजीनियर साहेब लोग यह कहने में असक्षम हैं कि वे पटरी को बचा पायेंगे या नहीं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, छह  सवारी गाड़ियों का परिचालन रद्द किया जा चुका है। इनमें  सहरसा-मधेपुरा (55555/56), सहरसा-मानसी (55569/70) और सहरसा-समस्तीपुर सवारी गाड़ियां शामिल हैं। जनसेवा एक्सप्रेस, हाटे बजारे एक्सप्रेस, कोशी एक्सप्रेस तथा राज्यरानी एक्सप्रेस का परिचालन तो हो रहा है, लेकिन ये गाड़ियां तय समय से कई घंटे विलंब से चल रही हैं। अब जबकि रेलवे और राज्य सरकार के विशेषज्ञ इंजीनियर आगामी स्थिति को लेकर अनिश्चित हैं, तो मैंने अपने कोशी विशेषज्ञों से जानना चाहा कि आगे क्या संभावना बन सकती है। लगभग सभी ने कहा कि अगर चार-पांच दिनों तक पानी के स्तर में तेजी से बढ़ोतरी या घटोतरी नहीं हुई तो संभव है कि पटरी बच जाये। पानी अगर तेजी से कम या ज्यादा हुआ, तो बोल्डर और क्रेटर के पहाड़ भी रेल लाइन को नहीं बचा पायेंगे। पानी का लेवल गिरेगा तो नदी को मुख्य धारा में बने डेल्टा को पार करने में भारी दिक्कत होगी, लेकिन उसकी बहाव-शक्ति में इजाफा होगा। परिणामस्वरूप पटरी की ओर बहने का प्रयास कर रही धारा और जोर से कटाव करने लगेगी। अगर लंबे समय तक स्तर बरकरार रहा, तो संभव है कि नदी डेल्टा को तोड़कर मुख्य धारा में बहने लगे और पटरी को बख्श दे। समस्तीपुर मंडल कार्यालय के अनुसार, कटाव रोकने के लिए 109 बैगन बोल्डर उझला जा चुका है। 500 मजदूर दिन-रात कटाव निरोधक काम में लगे हैं। अभियंताओं की 15 टोली लगातार स्थिति का मुआयना कर रहे हैं।
गौरतलब है कि कुछ साल पहले ही सहरसा-मानसी के बीच पटरी का अपग्रेडेशन हुआ था। पुरानी छोटी लाइन से अलग हटकर बड़ी लाइन के लिए पुल बनाये गये थे। उस समय भी गैर-सरकारी नदी विशेषज्ञों ने पटरी और नदी के अलाइनमेंट को लेकर सवाल खड़े किये थे। लेकिन उनकी बातें नहीं सुनी गयीं। यही कारण है कि हर साल बरसात के मौसम में मानसी से लेकर सिमरी बख्तियारपुर तक भारी जल-जमाव होता है। कोशी और बागमती की विभिन्न धाराएं पटरी और पुलों की इस "रामसेतु' के बीच अटक सी जाती हैं। लेकिन ऐसी नौबत पिछले कुछ वर्षों में नहीं आयी थी। जब से कुसहा कटाव हुआ है, तब से कोशी की प्रकृति में विचित्र बदलाव देखने को मिल रहे हैं। कोशी महासेतु के कारण भी इसके प्रवाह डिस्टर्ब हुए हैं, क्योंकि इस पुल के कारण लिंक बांध बनाये गये हैं। कोशी महासेतु के बाद भी दो और पुल कोशी में बन रहे हैं। इसलिए यह कहना अब असंभव हो गया है कि कोशी की मौजूदा प्रकृति क्या है और उसकी मुख्य धारा कहां है। ऐसी परिस्थिति में आम लोगों के अलावा विशेषज्ञ भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं। शब्द भले भिन्न हों, लेकिन वे भी घोर अंधविश्वासी की तरह कहते हैं- "सब कुछ कोशी पर है। हम कुछ नहीं कह सकते।' कोई संदेह नहीं कि कोशी और अभियंताओं का यह द्वंद्व आगे नये-नये गुल खिलाते रहेंगे। पटरी टूटे या तटबंध, अभियंता मालामाल होंगे। कहर तो हमेशा आम लोगों पर ही बरपेगा।

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

सूअर बनकर खुश हूं, मत मारो (एक लघु कथा)

उस व्यक्ति को अचानक अपने अगले जन्म का दिवज्ञान हुआ। जब वह बूढ़ा हो चला और मौत की घड़ी नजदीक आयी, तो वह अचानक बहुत परेशान हो उठा। जोर-जोर से विलाप करने लगा। पिता को तड़पते देख बेटों को चिंता हुई। वे अस्पताल जाने की  तैयारी करने लगे। लेकिन बूढ़े ने मना कर दिया। बोला, मुझे कोई कष्ट नहीं है। बेटों ने पूछा, तो आप तड़प क्यों रहे हैं पिता जी ? तब बूढ़े ने पूरी कहानी विस्तार से सुनाई। कहा, बेटा मैं किसी व्याधि के दर्द से नहीं रो रहा हूं, बल्कि अगले जन्म की तस्वीर देख कर मुझे मरने की इच्छा नहीं होती। बेटों ने पूछा, अगले जन्म की ऐसी कौन बात है कि उसे लेकर आप अभी से खौफ खा रहे हैं ? बूढ़े ने कहा, बेटे, मैं देख रहा हूं कि मेरा अगला जन्म एक सूअर के वंश में होगा। मैं सूअर बनकर धरती पर आना नहीं चाहता, लेकिन इसे टाल भी नहीं सकता। पिता की बात सुन सभी बेटे गहरी चिंता में डूब गये। लंबे समय तक खामोशी पसरी रही। तब बूढ़े ने कहा, मैंने उपाय खोज लिया है। मैं तुम लोगों को उस सूअर मालिक का नाम और पता बताता हूं, जिसकी पालतू सूअरनी की  कोख से ठीक साल भर बाद आज के ही दिन मेरा जन्म होगा। तुम लोग कुछ समय बाद  वहां पहुंच जाना और सूअरपालक से मुझे खरीदकर मार डालना। बेटे ने कहा, आप चिंता नहीं करें पिताजी, हम ऐसा ही करेंगे।
कुछ दिन बाद बूढ़े ने प्राण त्याग दिये। जल्द ही वह दिन भी आ गया। गांव से दस मील दूर एक सूअरपालक के यहां बूढ़े का पुनर्जन्म हुआ। ठीक एक महीने बाद तीनों बेटे सूअरपालक के पास पहुंचे। पूछा कि कुछ दिन पहले आपकी सूअरनी ने जो बच्चा जना है, वह मुझे दे दीजिए। बदले में आप जो राशि चाहें, मांग ले। सूअरपालक खुश हुआ और उसने मुंहमांगी कीमत पर सूअर के बच्चे बेच दिये। जैसे ही सूअर के बच्चे को लेकर वे लोग एक सुनसान जगह पर पहुंचे और उसे मारने की कोशिश की, सूअर का बच्चा जोर-जोर से रोने लगा। प्राण बख्शने की गुहार करने लगा। बेटे को अचरज हुआ, कहा- आपने ही तो कहा था पिता जी कि मुझे मार देना। सूअर ने जवाब दिया- मैं गलत था। अब मेरा मन इस जीवन में ही रम गया है। मुझे साथी सूअरों के साथ गंदे कीचड़ों में नहाना, मल खाना, गंदगी में घूमना अच्छा लगने लगा है। मुझे बख्श दो, मैं मरना नहीं चाहता !!! तीनों बेटे ने सिर पीट लिया और वापस लौट गये।

बुधवार, 4 जुलाई 2012

एक लोकप्रिय सरकार की नोज डाइविंग



ज्ञानी अक्सर कहते हैं- अति आत्मविश्वास आत्मघाती होता है। लेकिन विधि का विधान यह कि अप्रत्याशित सफलता आदमी को अति आत्मविश्वासी बना ही देती  है। इससे बचना बहुत कठिन होता है।  अति विश्वास एक संक्रामक रोग की तरह है, जो पहले इंसान को अहंकारी और बाद में लापरवाह बनाकर निष्क्रिय कर देता है। जमीन पांव के नीचे से खिसक जाती है, लेकिन आत्म-श्लाधा के नशा में चूर व्यक्ति को कुछ दिखाई नहीं देता। शुभचिंतकों की सलाह उन्हें बेवकूफी और आलोचना दुस्साहस लगती है। जी हां, मैं बात बिहार की नीतीश सरकार का कर रहा हूं। यह सरकार तेजी से अलोकप्रिय हो रही है, लेकिन सरकार के मुखिया और सत्तारुढ़ दलों के नेताओं को शायद इसका कोई इल्म नहीं है। हाल के दिनों में मैंने मध्य बिहार और उत्तर बिहार के कई गांवों का दौरा किया है। मुझे माहौल बदले-बदले से लगे। 
महज डेढ़-दो साल पहले तक गांवों में नीतीश और उनकी सरकार का गुणगान होता था। क्या किसान, क्या मजदूर ! शिक्षित से लेकर अशिक्षितों तक, लगभग हर जाति-समुदाय में नीतीश के समर्थक मिल जाते थे। लेकिन अब नीतीश-समर्थक आसानी से नहीं मिलते। कुछ समय पहले तक नीतीश और उनकी सरकार की चर्चा लोगों के चेहरे पर सकारात्मक भाव पैदा कर देती थी, लेकिन अब स्थिति पलट चुकी है। अब लोगों के चेहरे शिकायती हो चले हैं। मुखिया, सरपंच, बिचौलिया, कर्मचारी, अधिकारी को छोड़ दें, तो सरकार की तारीफ के शब्द सुनने के लिए आपके कान तरस जायेंगे। 
सवाल उठता है कि लोकप्रियता के सातवें आसमान पर विराजमान एक सरकार, महज एक-डेढ़ साल में इतने नीचे क्यों आ गयी है ? विस्तृत परिप्रेक्ष्य में देखें, तो इसकी कोई एक वजह नहीं है। दरअसल, जिन कामों के बदौतल इस सरकार ने लोगों के दिलों में जगह बनायी थी, अब उसकी रिवर्स करेंट उठने लगी है। मजबूत कानून-व्यवस्था, इस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन अब कानून-व्यवस्था की स्थिति तेजी से लचर हो रही है। आलम यह है कि उत्तर बिहार के गांवों में लगभग तीन दशकों के बाद एक बार फिर लोग डकैतों के आतंक के साये में रतजग्गा कर रहे हैं। कोशी अंचल में हाल के महीनों में डकैती की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं, लेकिन पुलिस इसे रोकने में नाकामयाब है। सुपौल, अररिया, मधेपुरा जिलों में तो जिला परिषद और प्रखंड समिति के नेताओं तक के नाम डकैतों के संरक्षक के रूप में सामने आये हैं। जिस भ्रष्टाचार के टॉनिक के बल पर सरकार ने ग्रामीण इलाकों में खूब पैसे खर्च किये और कुछ काम कराने में सफलता हासिल की थी, वही भ्रष्टाचार अब सरकार की छवि को नेस्तनाबूद कर रही है। सरकारी योजनाओं में हो रही लूट जनता को साफ नजर आने लगी है। दफ्तरों में व्याप्त रिश्वतखोरी की संस्कृति इतनी मजबूत हो चली है कि दफ्तर जाने के नाम से आम आदमी के पसीने छूट जाते हैं। 
इन सब बातों के इतर सत्तारुढ़ दलों की हालिया राजनीति भी लोगों को हजम नहीं हो रही। राष्ट्रीय राजनीति में पैठ बनाने की महत्वाकांक्षा के कारण जद(यू) ने हाल के दिनों में जो करतब दिखाये हैं, लोगों को उसके मायने समझ में नहीं आ रहे। और जो मायने समझ में आ रहे हैं, उसका "न्याय के साथ विकास'' के नारे से कोई रिश्ता नहीं बनता। इस सब के अलावा आम लोगों की समस्याओं को लेकर सरकार की घटती दिलचस्पी ने भी लोगों का दिल तोड़ा है। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से प्रदेश भाजपा और जद(यू) के नेताओं ने खुद को जमीनी राजनीति से दूर कर लिया है। दोनों दल के कार्यकर्ता जनता से कटते जा रहे हैं। शुरू-शुरू में प्रशासनिक मशीनरी ने प्रो-पीपुल होने का संकेत दिया था। लेकिन अब प्रशासन का रुख पहले की तरह एंटी-पीपुल हो गया है। प्रशासन पर सरकार की पकड़ हाल के दिनों में लगातार ढिली होती गयी है। तीसरी और सबसे बड़ी वजह अधूरी घोषणाएं हैं। गौरतलब है कि बीते वर्षों में नीतीश सरकार ने प्रदेश में रोजगार, विकास आदि की घोषणाओं की बरसात कर दी थी। इसके कारण आम आदमी की अपेक्षा काफी बढ़ गयी थी। लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहे हैं, लोग खुद को ठगे महसूस कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि सरकार की अधिकांश घोषणाएं कागज पर ही दम तोड़ रही हैं। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि सत्ताधारी दल के नेता इन सबसे अनजान है। जनता ने इस सरकार को एक मजबूत राजनीतिक समीकरण दे रखा है। लेकिन राज्य के नेता किसी तीसरे समीकरण की खोज में मशगूल है। जनता को ऐसी अनावश्यक कसरतों के मायने भी समझ में नहीं आ रहे हैं। दिल्ली के लिए दुबले होते जा रहे नीतीश को शायद मालूम नहीं कि यहां पटना में ही उनकी जमीन धीरे-धीरे खिसक रही है। 

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

दर्द का अपरूप : एक कोशी, एक बह्मपुत्र

ब्रह्मपुत्र की पीड़ा कोशी ही समझ सकती है। दोनों नदियां धारा बदलती हैं। दोनों अब बाढ़ नहीं, सुनामी लाती हैं। दोनों ही दोषपूर्ण अभियंत्रण का शिकार है। इन दिनों ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों से असम में जो बाढ़ आयी हुई है, उसने नौ लाख से ज्यादा लोगों को बेघर कर दिया है। ये तस्वीरें मुझे 2008 की कुसहा त्रासदी की याद दिला गयीं। इसलिए यहां सबके साथ शेयर कर रहा हूं। कहते हैं कि बांटने से दर्द कम हो जाता है...

शनिवार, 16 जून 2012

सींग पकड़कर मरखा बनाने की फितरत


दहाये हुए देस का दर्द-82
गांव के बड़े-बुजुर्ग कहते हैं- "अगर सींग पकड़कर बार-बार छेड़ोगे तो धीमड़(शांत और सुस्त) बैल भी मरखा (मारने वाला यानी आक्रामक) हो जायेगा।'' बैलों के संदर्भ में कही जाने वाली यह कहावत इंसान पर भी हू-ब-हू लागू होता है। बिहार के कोशी अंचल का समाज मौलिक तौर पर शांत और अमनपसंद है। इतिहास साक्षी है कि हिंसा-उपद्रव यहां के समाज की फितरत नहीं है। लगातार असहिष्णु होती दुनिया में कोशी अंचल एक अपवाद है, जो विपरीत हालात और तमाम मुश्किलात के बावजूद सहनशीलता में विश्वास रखता है। लेकिन सहने की भी एक सीमा होती है। यह संयोग नहीं है कि पिछले कुछ समय से कोशी अंचल में भी उपद्रव की घटना बढ़ती जा रही है। पिछले एक-दो  साल से पुलिस और आम लोगों के बीच लगातार भिडंत हो रही है। फारबिसगंज में जो कुछ हुआ उसके बारे में अब कुछ कहने की जरूरत नहीं है। इस गोलीकांड के घाव को भरने में मुद्दत लग जायेंगे।
कुछ महीने पहले सहरसा में आम लोग और पुलिस के बीच हुए टकराव के घाव अभी भरे भी नहीं थे कि बीते दिनों सुपौल जिले के चुन्नी गांव में पुलिस और ग्रामीणों के बीच हिंसक भिड़ंत हो गयी। तीन दिन बाद ही सहरसा रेलवे स्टेशन पर यात्रियों और रेलकर्मियों के बीच हिंसक टकराव हो गया। यात्रियों की शिकायत थी कि बुकिंग क्लर्क अतिरिक्त पैसा लेकर यात्रियों को ट्रेन में जगह दिला रहे थे, जिसके कारण आम यात्रियों को भारी परेशानी उठानी पड़ी। हमेशा की तरह उस दिन भी सहरसा से अमृतसर जाने वाली जनसेवा एक्सप्रेस में पांव रखने की जगह नहीं थी। यह ट्रेन हर दिन औसतन चार हजार मजदूरों को ढोकर पंजाब ले जाती है। उस दिन भी स्टेशन पर पांच हजार से ज्यादा मजदूर गाड़ी के इंतजार में खड़े थे। यात्रियों की तुलना में जगह कम पड़ने लगी। रेलकर्मियों को लोगों की इस परेशानी में कमाई का जरिया नजर आया और उसने अपना गोरखधंधा शुरू कर दिया। बवाल मचना था, जमकर मचा। कई कंप्यूटर तोड़ डाले गये। स्टेशन परिसर में खड़ी गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया। लेकिन उन कर्मियों के खिलाफ न तो कोई शिकायत दर्ज हुई और न ही कोई कार्रवाई हुई।
यह सच है कि किसी भी समाज की प्रकृति रातों-रात नहीं बदलती। कोशी के लोग भी रातों-रात नहीं बदले हैं। इलाके की अधिकांश आबादी गरीब और मेहनतकश है। साबिक जमाने से ही वे गरीबी, अशिक्षा, बदहाली से अपनी तरह से लड़ते रहे हैं। बेरोजगारी ने उन्हें पंजाब-हरियाण, दिल्ली, मुंबई, सूरत के रास्ते दिखाये। यह सिलसिला अस्सी के दशक में शुरू हुआ और अब तो इलाके की आर्थिक व्यवस्था पलायन के अर्थशास्त्र पर आश्रित हो चली है।
लेकिन पिछले पांच-दस साल में एक बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि अब सरकार की मशीनरी गांवों तक में प्रवेश कर गयी है। एक जमाना था जब लोग गरीबी के बावजूद स्वतंत्र थे। वे भूखे पेट रहते थे, लेकिन निश्ंिचत होकर सोते थे। गांवों में नेता, बिचौलिया, ठेकेदार, पुलिस, अधिकारियों का आगमन नहीं होता था। लेकिन जब से सरकार ने कल्याण, विकास योजनाओं के नाम पर प्रखंडों-गांवों में रुपये भेजने शुरू किये हंै, इन तत्वों का हस्तक्षेप बढ़ता गया है। लोग मूक दर्शक बने हुए हैं। नेता, अधिकारी, दलाल उनकी नजरों के सामने लाखों रुपये का  वारा-न्यारा कर रहे हैं। आम लोगों को लूट की इस प्रहसन से कुछ हासिल तो नहीं हो रहा है, लेकिन उनकी परेशानी बढ़ रही है। उनके काज-रोजगार, जीवन-यापन में सरकारी मशीनरी अनावाश्यक रूप से हस्तक्षेप कर रही है। टकराव लाजिमी है।
यह जानकर अचरज होता है कि मीडिया-क्रांति के इस युग में भी शासक वर्ग का मनोविज्ञान अठारहवीं सदी जैसा है। सरकार का मतलब सिर्फ शासन करना नहीं होता, बल्कि लोगों के प्रति उसकी जिम्मेदारी भी बनती है। चंद लोगों के लिए लूट का अवसर तैयार करने का नाम विकास नहीं होता है। लूट के आयोजन पर जनता का नाम चस्पा कर देने से वह जन-योजना नहीं हो जाता। अगर शासक वर्ग को लगता है कि सतत उपेक्षा के बावजूद कोई हमेशा शांत बना रहेगा, तो यह उसकी नासमझी है। बगल का नेपाल इसका उदाहरण है। सन्‌ 1990 तक नेपाल की गिनती दुनिया के सबसे शांत देशों होती थी। वहां के राजा को इसका गुमान हो गया था। वक्त ने ऐसी पलटी मारी कि सन्‌ 2000 आते-आते नेपाल दुनिया के सबसे अशांत देशों में शुमार होने लगा और 2006 में राजा को गद्दी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

गुरुवार, 14 जून 2012

सोने के बाद कोई नहीं आया : एक लघु कथा



उस साल बहुत बारिश हुई थी। नदी-खेत एकारनल हो गये थे। कोशी के कछार में बनैया सूअरों का प्रकोप कुछ ज्यादा ही हो गया था। रात में सूअर के झूंड आते और मकई की फसल उजाड़ देते । किसानों को मचान बनाकर रात भर पहरा देना पड़ता था। उस किसान के घर में दो ही समांग थे- बाप और बेटा। शाम से रात 12 बजे तक बेटा खेत पर पहरा देता और उसके बाद अगली सुबह तक बाप। सदा की तरह रात के 12 बजे किसान बेटे का खाना लेकर खेत पहुंचा। उसने पूछा- "कोई सूअर तो नहीं आया था, बेटा ? '' बेटे ने कहा,"बाबू जी, जब तक मैं जगा रहा , चार-पांच आये थे। मैंने सबको दूर खदेड़ दिया। लेकिन सोने के बाद एक भी नहीं आया।'' किसान ने माथा पिट लिया।

शुक्रवार, 1 जून 2012

छूटना


गांव में था
गाड़ी छूट जाती थी
गाड़ी में हूं
गांव छूट गया है
पर  सांसें अब तक फुल रही हैं
गांव हो या गुड़गांव

'छूटहों'  के लिए
दोनों समानार्थक होते हैं

निरर्थकता का एहसास !
जैसे पटरी जमीन पर नहीं
देह पर बिछी  हो
हजारों सफर के बाद
जिन्हें पड़े रहना है
नहीं !
यह बिछुड़न नहीं 
विरह के गीत भी नहीं
छूटना
लुप्त होना है
फोन मां को लगाओ
बात मैने से होगी
बेटा परदेश में
बाड़ी के आम कौए खा रहे
कोंटी की लीची, 'खरुवान'
छूटना !!
अंततः दुखना है
कहा था, पेड़ों ने
जिन्हें शाखाविहीन कर दिया था
ज्येष्ठ की आंधी 

लाल-लाल लस्से निकल आये थे
पेड़ की देह पर
लस्से का सच कौन बताये 

इस तूफानी समय में
सब कुछ लस्सा है

जो छूट गये हैं, जड़ से
लस्से उनकी देह में भी हैं
पेड़ों की तरह बेजुबान
और अव्यक्त


(शब्दार्थ- छूटहा- जो पीछे छूट गये हो। खरुवान- आवारा बच्चों की टोली )

रविवार, 27 मई 2012

एक और पूर्वोत्तर की आहट

कंधार विमान अपहरण कांड और नेपाली-भारतीय माओवादियों के बीच तथाकथित गठजोड़ की खुफिया-रिपोर्टों के बाद रक्षा मंत्रालय ने मई 2001 में 1800 किलोमीटर लंबी भारत-नेपाल सीमा पर सुरक्षा बल तैनात करने का फैसला लिया था। हमेशा की तरह सरकार ने फैसला लेने से पहले स्थानीय लोगों की राय लेने की जरूरत महसूस नहीं की। तब कहा गया था कि सुरक्षा बल नेपाल के जरिये होने वाली हथियार, जाली नोट, उर्वरक, खाद्यान्न आदि की तस्करी और आइएसआइ की आतंकी गतिविधियों पर नजर रखेगा और इस पर रोक लगायेगा। शुरुआत में जोगबनी, बीरपुर, कुनौली, राजनगर, बैरगनिया, गौर, रक्सौल, बाल्मिकीनगर जैसे संवेदनशील चेक पोस्टों पर अर्धसैनिक बल-  स्पेशल सर्विस ब्यूरो (एसएसबी जिसे अब सशस्त्र सीमा बल कहा जाता है) की तैनाती की गयी थी। बीते ग्यारह साल में पश्चिम बंगाल के पानी टंकी से लेकर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ के बीच सैकड़ों चेक पोस्ट और दर्जनों बैरक बनाये गये और जवानों की तादाद बढ़ाकर लगभग 50 हजार कर दी गयी।
पिछले ग्यारह साल में एसएसबी के हजारों जवान खुली सीमा से होने वाली अवैध गतिविधियों पर काबू पाने में कितना सफल हुए हैं, इसकी कोई आधिकारिक रिपोर्ट सरकार आज तक पेश नहीं कर सकी। वैसे सीमाई इलाके के लोगों का कहना है कि "एसएसबी की प्रतिनियुक्ति के एक-दो साल तक सब कुछ बेहतर था। लेकिन अब स्थिति बेहद खराब हो गयी है। तस्करी बेलगाम हो गयी है।' सच तो यह है कि खेती के मौसम में कोई भी पर्यवेक्षक तस्करी का ' खुला खेल फर्रुखावादी ' का नजारा आराम से देख सकता है। दिन की रोशनी में सैकड़ों की तादाद में साइकिलें सब्सिडीयुक्त उर्वरक की बोरियां लेकर सीमा-पार जाती रहती हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि "जवानों को बोरी के हिसाब से रिश्वत पहुंचा दी जाती है।''
जहां तक आतंकी गतिविधियों की बात है, तो पिछले पांच साल में अररिया, मधुबनी, दरभंगा, किशनगंज से लगभग 17 लोग आतंकवादी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार हुए हैं। इसे आश्चर्य ही कजा जायेगा कि किसी भी गिरफ्तारी में एसएसबी की कोई भूमिका नहीं रही। जाली नोटों और मवेशियों, मानव तस्करी की घटनाएं भी बीते सालों में बढ़ती गयी हैं। विभिन्न मौके पर स्थानीय जिला प्रशासन के कई अधिकारियों ने इस पंक्ति के लेखक को अपना दुखड़ा सुनाते कहा कि एसएसबी उन्हें सूचना मुहैया नहीं कराते।
सीमा की निगरानी में एसएसबी भले ही फिसड्डी साबित हो रहा हो, लेकिन बदनामी बटोरने में पीछे नहीं है। सीतामढ़ी का बैरगनिया गोली कांड इसका ताजा उदाहरण है। सीतामढ़ी जिले के बैरगनिया के हजारों लोगों ने पिछले दिनों एसएसबी के कैंप पर हमला बोल दिया। लोगों का कहना था कि जवान उनकी बहू-बेटियों के साथ अक्सर छेड़खानी करते रहते हैं। जवानों के कारण बहू-बेटियों का सड़क पर चलना मुश्किल हो गया है। दरअसल, 25 मई को बैरगनिया बैरके के दो जवानों ने स्कूल से घर लौटती दो छात्राओं के साथ बीच सड़क पर बदतमीजी कर डाली। जब लड़कियों ने विरोध किया, तो वे जोर-जबर्दस्ती पर उतर आये।  इसे देखकर आसपास के लोगों का दबा गुस्सा फूट पड़ा। हजारों लोग बैरक के सामने जमा हो गये और पत्थरबाजी करने लगे। इसके बावजूद जवानों ने स्थानीय प्रशासन को खबर नहीं दी और आक्रोशित लोगों पर गोलियां बरसानी शुरू कर दी। इसमें नीरस पासवान नामक एक दलित युवक की मौत हो गयी और दो महिला समेत तीन अन्य लोग बुरी तरह घायल हो गये। 
 बैरगनिया की घटना कोई अपवाद नहीं है, बल्कि सच तो यह है कि समूचे  सीमाई उत्तर बिहार की स्थिति कमोबेश बैरगनिया जैसी ही है। डेढ़ साल पहले अररिया जिले के कुरसाकाटा में भी बैरगानिया जैसी घटना घटी थी, जिसमें जवानों की गोली से चार ग्रामीणों की मौत हो गयी थी। यहां भी जवानों पर महिलाओं के साथ छेड़खानी करने के आरोप लगे थे। । कुछ समय पहले इस पंक्ति के लेखक ने रिपोर्टिंग के सिलसिले में रक्सौल से जोगबनी तक की यात्रा की थी। अमूमन हर जगह के लोगों ने एसएसबी के जवानों के व्यवहार के प्रति गहरे रंजो-गम का इजहार किया था। सुपौल, अररिया, किशनगंज में पिछले 11 साल में एसएसबी और स्थानीय लोगों के बीच लगभग 20 बार हिंसक टकराव हुआ है।
सीमाई इलाकों के बाशिंदे दबी जुबान से "कमीशनखोरी' की दास्तान भी सुनाते हैं। लोगों का आरोप है कि शादी-विवाह के मौके पर जवान बेवजह बारात-गाड़ियों को रोक देते हैं और भारी रकम वसूल कर ही जाने की इजाजत देते हैं।  सच तो यह है कि जवान चेक पोस्ट और बैरक में कम और सीविलियन एरिया में ज्यादा समय व्यतीत करते हैं।  कभी वे ट्रॉफिक पुलिस की भूमिका में दिखते हैं, तो कभी पंच बनकर लोगों के आपसी मामले में टांग अड़ाते हैं। जिला प्रशासन को ठेंगा पर रखते हैं। उनके कामों में जबर्दस्ती हस्तक्षेप करते हैं। सिविलयन क्षेत्र में गैर-जरूरी आवाजाही करते हैं। संक्षेप में कहें, तो वैरगनिया की घटना एक पूर्व चेतावनी है। संदेह नहीं कि अगर सरकार ने समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं कि तो उत्तर बिहार के सीमाई इलाके में भी हालात पूर्वोत्तर जैसे हो जायेंगे।

बुधवार, 16 मई 2012

'' कोशी की उपेक्षा नहीं ''


दहाये हुए देस का दर्द-81
बिहार के कानून मंत्री नरेंद्र नारायण यादव जमीनी नेता हैं। वे ग्रास रूट की राजनीति से बिहार विधानसभा और कैबिनेट तक पहुंचे हैं। पिछले दिनों अपनी पत्रिका "द पब्लिक एजेंडा'' के लिए उनसे इंटरव्यू करने का मौका मिला।  नरसंहारों  की सुनवाई में हो रही देरी और बथानी टोला मामले में आये फैसले पर उनसे लंबी बातचीत हुई। यह इंटरव्यू "द पब्लिक एजेंडा'' के ताजा अंक में प्रकाशित हुआ है। लेकिन इसी मुलाकात के दौरान मैंने उनसे कोशी के मुद्दे पर भी बातचीत की। उनसे कई जमीनी सवाल पूछे। कोशी मुद्दे पर उनके विचारों और जवाबों को यहां आपके सामने रख रहा हूं। - रंजीत
सवाल- पिछले कुछ सालों से मैं कोशी अंचल की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर लगातार अनुसंधान कर रहा हूं। मैं तथ्यों के साथ कह सकता हूं कि जिस तरह केंद्र सरकार ने बिहार की उपेक्षा की, ठीक वही व्यवहार बिहार की विभिन्न सरकारों ने कोशी के साथ किया, जबकि इस इलाके से कई बड़े राजनेता उभरे। राजेंद्र मिश्र, ललित नारायण मिश्र, जगन्नाथ मिश्र, अनूप लाल यादव, विनायक प्रसाद यादव, भूपेंद्र मंडल, तारिक अनवर, बीएन मंडल, रमेश झा, लहटन चौधरी, शंकर टेकरीवाल, शरद यादव, विजेंद्र यादव जैसे बड़े नेताओं के रहते कोशी की ऐसी उपेक्षा क्यों हुई ?
नरेंद्र ना यादव - नहीं, मुझे नहीं लगता कि कोशी के साथ उपेक्षा हुई है। मेरी सरकार ने कोशी के विकास के लिए हर संभव प्रयास किया है। कुसहा त्रासदी के बाद युद्ध स्तर पर राहत और पुनर्वास के कार्यक्रम चलाये गये। हम लोग आगे भी प्रयासरत हैं। हमने कोशी के लिए केंद्र सरकार से मदद मांगी थी, जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद हमारी सरकार ने विश्व बैंक की मदद से इलाके के लिए कई योजना बनायी है। यह कई करोड़ रुपये का पैकेज है। इसके तहत इलाके में लगभग 125 पुल-पुलिये बनाये जायेंगे। कुछ के टेंडर भी हो चुके हैं। गांवों की सड़कें पक्की की जायेंगी। बाढ़ के समय राहत के लिए हर पंचायत में ऊंचा टीला बनाया जायेगा। तटबंधों को मजबूत किया जायेगा। अगले वर्षों में लगभग 400 करोड़ रुपये कोशी इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण पर खर्च किये जायेंगे।
 सवाल- लंबे समय से कोशी की जीवन-रेखा डुमरी पुल क्षतिग्रस्त है, लेकिन अब तक सरकार इसकी मरम्मत नहीं करा सकी। क्या अगर यही समस्या अन्य हिस्से में होती, तो आपकी सरकार का रवैया ऐसा होता ?
नरेंद्र ना यादव-  सन्‌ 2014 तक वहां तीन पुल होंगे। एक पुल बीहपुर और नौगछिया के बीच होगा। डुमरी पुल के बगल में ही बनाये गये आइरन ब्रीज को भी ऐसा मजबूत बना दिया जायेगा कि लंबे समय तक उससे हल्की गाड़ियां पास करेंगी। डुमरी पुल की मरम्मत के लिए भी सरकार ने विशेषज्ञों से राय ली है। विशेषज्ञों ने कहा है कि इसके डिजाइन में हल्का परिवर्तन लाकर ठीक किया जा सकता है। कुछ उसी तरह जैसे हावड़ा ब्रीज है। दो साल के बाद आप देखेंगे कि डुमरी के सामांतर तीन पुल होंगे।
सवाल- ऐसा हो जाये, तो क्या कहना ! क्या ऐसा हो पायेगा ? हमने तो कुसहा हादसा के समय भी ऐसी बातें सुनी थीं, लेकिन हुआ क्या ? जिनके घर दहाये, खेत बंजर हुये, परिजन मरे, उन्हें तो कुछ खास नहीं मिला। लेकिन अधिकारियों, नेताओं,दलालों की चांदी हो गयी। मुआवजा राशि में जमकर लूट-पाट हुआ। छातापुर में एक बीडीओ धराये भी। लेकिन अंततः समय के साथ सब कुछ शांत हो गया। लोगों के दिन नहीं फिरे। वे आज भी पंजाब-दिल्ली के भरोसे ही हैं।
नरेंद्र ना यादव-  इन सब सवालों के जवाब हैं। कार्रवाई हुई है। हम आपको बाद में इसका विस्तृत ब्यौरा उपलब्ध करा देंगे।
सवाल- आप गांव से आते हैं। खेत-खेतिहरों की तकलीफ समझते हैं। आप लोग कोशी के लिए कुछ करते क्यों नहीं ?
नरेंद्र ना यादव- (लंबी खामोशी। सवाल का जवाब नहीं मिला)
सवाल- ऐसा कोई सेक्टर बतायें जहां कोशी अंचल को प्राथमिकता में रखा गया हो। यहां सबसे बाद में विश्वविद्यालय खुले। सबसे बाद में मेडिकल कॉलेज खुला, वह भी निजी। इंजीनियरिंग कॉलेज तक आज तक खुल ही नहीं सका। देश में अब कहीं भी छोटी रेल-लाइन नहीं है, लेकिन कोशी में अब तक मौजूद है। हर इलाके में रेलवे का विद्युतीकरण हो गया है, लेकिन कोशी में अभी तक नहीं हुआ है ? उद्योग-धंधा लगाने की तो चर्चा करना ही बेकार है।
नरेंद्र ना यादव- इन सब सवालों पर बात करने के लिए हमें आराम से बैठना होगा। इस पर बहस होनी चाहिए।
सवाल- क्या ऐसा इलिए तो नहीं हुआ क्योंकि यहां के लोग साधारणतया अमन पसंद और मासूम हैं ?
नरेंद्र ना यादव- (जवाब में चुप्पी)

मंगलवार, 27 मार्च 2012

मन न रंगाये जोगी, रंग लेयो कपड़ा



असल बात तो सरकार ही जाने, लेकिन दरबार आने-जाने वाले विश्वस्त दरबारियों का अनुमान है कि बिहार की सौवीं सालगिरह पर यही कोई 15-16 करोड़ रुपये खर्च किये गये हैं। मास भर पहले भी इसी तरह के एक पंच सितरिया भोज-भात पर 4-5 करोड़ रुपये खर्चे गये थे। उसे बिहार ग्लोबल मीट का नाम दिया गया था। सरकारी "माई-बापों'' का कहना है कि यह सब बिहार की खोयी हुई अस्मिता को फिर से प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है- टू रीगेन द लॉस्ट प्राइडऑफ बिहार ।
वे "माई-बाप' हैं, देश-दुनिया घूमते-विचरते हैं। बड़े लोगों के साथ खाते-पीते, उठते-बैठते हैं, झूठ थोड़े ही बोलेंगे।  बिहारी अस्मिता प्राप्त करके ही दम लेंगे। भूमि-पूत्रों को छोड़कर देश के तमाम स्वनामधन्य लेखक, संगीतज्ञ, मर्मज्ञों को सम्मानित करेंगे। वे तारीफ करेंगे। प्लेन की दोनों पीठ का मासूल लेंगे और लौट जायेंगे। अपनी अस्मिता दौड़ी चली आयेगी। जो थोड़ी बहुत अस्मिता बची रहेगी, उसे लाने के लिए दिल्ली जायेंगे, बंगलुरु, मॉरीशस, त्रिनिदाद जायेंगे। रोजी-रोटी के लिए जन्म-भूमि छोड़ने वालों से मिलेंगे और कहेंगे अगर आप काम करना बंद कर दें, तो इस शहर/देश का भट्टा बैठ जायेगा। बस, अस्मिता दौड़ी चली आयेगी।
मैं मजाक नहीं कर रहा। अजी, सौवें बरस में कोई मजाक क्या करेगा। मैं रंग में भंग भी नहीं करूंगा। जन्म दिन का मौका है, इसलिए उत्सवी होना हम सब का धर्म है। वैसे मैं नहीं मानता कि हमारा बिहार महज सौ साल का ही है। हम तो मगध से हिसाब लगाने के आदि हैं और अंधेरे में भी नालंदा, विक्रमशीला, पाटलिपुत्र, वैशाली, अशोक, चाणक्य, भिखारी ठाकुर, कुंवर सिंह आदि को देख लेते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि मेरे जैसे लोग पटना से गांव को नहीं देख पाते। गांव से पटना देखने की कोशिश करते रहते हैं। क्योंकि ऊपर से नीचे देखने पर चीजें मनभावन ही लगती हैं। गांव नीचे है, पटना ऊपर।
हमारे जैसे लोगों की सबसे खराब आदत यह है कि हम भोजघरा में भी भनसा घर की युक्ति लगाते हैं। हम गीतहार के सम्मान को लेकर हमेशा चौकन्ने रहते हैं। दुल्हा तो दूसरे गांव से आ जायेगा, लेकिन गीतहारि तो गांव की ही होगी। उसके मान-सम्मान की उपेक्षा हमारी माटी में नहीं है। लेकिन सरकारी उत्सव की फितरत ही कुछ और है। राज्य गीत को एक नहीं पांच बार पढ़ गया। दस-बारह बार सुन गया। मन प्रसन्न हुआ,लेकिन कुछ कमी-सी महसूस हुई। ऐसा लगा जैसे परिवार का कोई महत्वपूर्ण सदस्य अनुपस्थित है। ये क्या ? कोशी-मिथिला निपता। न गौरव गान में, न ही प्रार्थना में, कहीं भी शामिल नहीं किया गया। बड़ा आश्चर्य हुआ कि लोग बिना कोशी और बिन मिथिला के भी बिहार की सांस्कृतिक तस्वीर बनाने की कोशिश कर लेते हैं। न रेणु, न राजकल, न नागार्जुन, न विद्यापति,  न दीना, न भदरी, न कारू खिरहर, न मंडन, न अयाची, न सलहेस। न कोशी, न बागमती। न नवाण्य, न सिरूआ।
अब इन्हें कौन बताये कि कोशी-मिथिलांचल बिहार का गहना है। बिहार की छाती अगर मगध है, तो भोजपुर, कोशी, मिथिलांचल, अंग उसके पैर-हाथ, दिल-दिमाग हैं। कोशी की बाढ़ में जो जिजीविषा सदियों से जिंदा है, उसको आप विदर्भ तो नहीं कहेंगे न ? क्योंकि जीवटता और जिंदादिली का ही दूसरा नाम तो बिहार है। जो गरीबी में भी इंसानियत को बचा ले जाये, जो सदियों के सौतेले व्यवहार के बाद भी फूटानी न झाड़े, उसी तासीर को तो लोग बिहार कहते हैं। वरना बिहार और कांगो-सोमालिया में अंतर ही क्या है? सर्वे देखें, अगर बिहार को एक देश मान लिया जाये, तो यह दुनिया का तीसरा सबसे निर्धन 'देश' होगा।
अचरज है! कोशी-मिथिला को सभी ने हाशिये पर रखा। अब यहां की लगभग दो करोड़ आबादी को बेहद चालाकी से कारागार में डाला जा रहा है। एक ऐसे कारागार में जहां, रोशनदान भी न हो। दावा यह कि अस्मिता जरूर आयेगी। हकारने से अस्मिता आती, तो कब के आ गयी होती । ऐसे ही अवसर पर किसी ने कभी कहा होगा, "मन न रंगाये जोगी रंग लेयो कपड़ा।''
 

राज्य गीत


मेरे भारत के कंठहार

तुझको शत-शत वंदन बिहार

तू वाल्मीकि की रामायण

तू वैशाली का लोकतंत्र

तू बोधिसत्व की करूणा है

तू महावीर का शांतिमंत्र

तू नालंदा का ज्ञानदीप

तू हीं अक्षत चंदन बिहार

तू है अशोक की धर्मध्वजा

तू गुरूगोविंद की वाणी है

तू आर्यभट्ट तू शेरशाह

तू कुंवर सिंह बलिदानी है

तू बापू की है कर्मभूमि

धरती का नंदन वन बिहार

तेरी गौरव गाथा अपूर्व

तू विश्व शांति का अग्रदूत

लौटेगा खोया स्वाभिमान

अब जाग चुके तेरे सपूत

अब तू माथे का विजय तिलक

तू आँखों का अंजन बिहार

तुझको शत-शत वंदन बिहार

मेरे भारत के कंठहार

प्रार्थना


मेरी रफ्तार पे सूरज की किरण नाज करे

ऐसी परवाज दे मालिक कि गगन नाज करे

वो नजर दे कि करूँ कद्र हरेक मजहब की

वो मुहब्बत दे मुझे अमनो अमन नाज करे

मेरी खुशबू से महक जाये ये दुनिया मालिक

मुझको वो फूल बना सारा चमन नाज करे

इल्म कुछ ऐसा दे मैं काम सबों के आऊँ

हौसला ऐसा हीं दे गंग जमन नाज करे

आधे रस्ते पे न रूक जाये मुसाफिर के कदम

शौक मंजिल का हो इतना कि थकन नाज करे

दीप से दीप जलायें कि चमक उठे बिहार

ऐसी खूबी दे ऐ मालिक कि वतन नाज करे

जय बिहार जय बिहार जय जय जय जय बिहार

शनिवार, 3 मार्च 2012

अब तक बहती फगुनाहि


हर भैंसवार जानता है कि तीन तरिया जब पश्चिम में डूब रही होती है, तो "पसर'' का वक्त होता है। पसर यानी सूर्योदय से पहले के धुंधलके में भैंस को चराने के लिए मैदान ले जाने की परंपरा। कोशी अंचल में यह परंपरा सदियों पुरानी है। ठंड हो या बरसात, पसर खोलना ही पड़ेगा। पसर नहीं खोलना , अपशकुन ही नहीं अप्रतिष्ठा का संकेत है। सुबह-सुबह भैंस बथान पर बंधे रह जाने का बहुत उदास अर्थ है। ऐसा तब होता है, जब घर से किसी की अर्थी उठी हो। बावजूद इसके फागुन मास में ऐसा हो जाता। बेचारा भैंसवार भी क्या करे? फागुनाहि हवा होती ही है रसिया। आमों के मंजरियों से निकला मधु रस सांसों में कुछ इस कदर समा जाता है कि आठ बजे दिन तक नींद ही नहीं खुलती। पसर के बेर ससर जाता है, बुढ़िया पूरे घर को सिर पर उठा लेती है । "बज्रखसौना (बज्रपात करने वाला) रे, महींस (भैंस) बथान पर खूंटा तोड़ रही है और तू फोंफ काट रहा है ! ई लो... '' समूची बाल्टी पानी छौड़ा के सिर पर छपाक !!
हालांकि फगुनाहि हवा अब भी चलती है, लेकिन अब ऐसे दृश्य नहीं दिखते। जिसे जितना मन करे, अलसा ले। जब तक मन करे सोते रहे, कोई बुढ़िया सिर पर पानी नहीं उड़ेलेगी। कोई भावी कहने नहीं आयेगी कि "जितना मन करे अलसा लो, होली में हुलिया बदल दूंगी।'' एक जमाना था जब गांव की हर नवकनिया, देवर के रिश्ते में आने वाले नवयुवकों को ऐसी धमकी होली के मास भर पहले से देती रहती थी।
दरअसल, समय ने करवट ले लिया है। हर कुछ एक अजीब किस्म के आलस्य की गिरफ्त में है। देह ही नहीं, रिश्तों के बीच भी आलस्य आ गया है। लोग मजाक करने में अलसा जाते हैं। हाल-चाल पूछने में अलसा जाते हैं। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने में अलसा जाते हैं। जीवन का मतलब इंस्टैंट हो गया है। जिस बात में निजी हित न हो, वह घोर आलस्य की बात है। इसलिए भर "फागुन बुढ़वा देवर लागे' जैसे संबोधन लगभग लुप्त हो चले हैं।
बावजूद इसके कोशी की होली का मजा ही कुछ और है। दिन भर जोगी रा सरररर, जोगी रा सरररररर। रंग, कीचड़, गोबर फेंकने की बाजी चलती रहती है। किसी को नहीं बख्शा जाता। अनजान राहगीर भी बंधु बन जाते हैं। शाम से ही भंग का दौर शुरू हो जाता है। ढोल-पिपही-हारमोनियम की आवाज अब भी उसी शिद्यत के साथ उभरती है। होली के वे गीत, जो आज तक डाक्यूमेंटेड नहीं हो सके हैं, सुनाई देते हैं। वही संदेश, वही कशिश। प्रेम, सौंदर्य और उन्मुक्तता की प्रतीक। ये गीत कोशी की जिजीविषा, कोशी की ग्राम्य संस्कृति का बखान करते हैं। इन्हें सुनने के बाद मन हुलस जाता है। ये गीत लगातार रंगहीन होती जा रही इस दुनिया को एक दिन के लिए रंगीन बना जाते हैं। यह भी कुछ कम नहीं है। जोगी रा सररररर।

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

ये नये कपड़फोड़वे

दहाये हुए देस का दर्द-80
"आदमी चाहे कितना भी ताकवर क्यों न हो, लेकिन  कपार (कपाल) पर लाठी नहीं झेल सकता। कपार पर मारोगे तो एक संगदो काज होगा। दुश्मन तो धाराशायी होगा ही, गांव-जवार में तुम कपड़फोड़वा (कपाल फोड़ने वाला) के नाम से प्रसिद्व हो जाओगे।''
पिछले दिनों बिहार के अररिया जिले की कपड़फोड़ा पंचायत में हुई घटना के बाद बचपन में सुने ये सामंती सूत्र-वाक्य एक बार फिर मेरे जेहन में कौंध गये। ब्रिटिश हुकूमत के समय हसेरी (हमला) करने से पहले सामंतवादी शक्तियों के पहलवानों को प्रोत्साहित करने के लिए उनके प्रशिक्षकयह उक्ति जरूर उच्चारते थे। आजादी के बाद बदलाव के हसीन सपने  के बावजूद इन वाक्यों का बोलबाला कायम रहा। जमीन, जाति, सत्ता संरक्षण और लठैतों के बल पर गांव के मालिक कहलाने वाले लोग अपने नौकर-चाकर को बात-बात पर इसी वाक्य के सहारे साधते रहे। अगर उन्हें किसी एक को डराना होता तो कहते, "मारो साले के बीच माथ एक लाठी।'  अगर एक से ज्यादा को धमकाना होता, तो कहते," अगर सोझ नहीं होगे, तो कपड़-फोड़ी करा देंगे तुम्हारे टोल में। ' 
वैसे यह सही है कि अब लाठी-भाले-फरसे  का जमाना नहीं रहा, लेकिन "कपड़फोड़ा' जमात खत्म नहीं हुई है। उनके हथियार और चेहरे जरूर बदल गये हैं, लेकिन सोच यथावत हैं। आज भी गरीबों-वंचितों के ही कपाल फोड़े जाते हैं और वे कपड़फोड़वा के नाम से प्रसिद्ध भी हो रहे हैं। पंचायत हो या पार्लियामेंट, हर जगह अग्रिम पंक्ति की कुर्सियों पर कपड़फोड़वे विराजमान हैं।
खैर मुद्दे पर लौटते हैं। दरअसल, हुआ यह कि "कोई क्या कर लेगा' के मद में मस्त एक एनजीओ और एक डॉक्टर ने पिछले दिनों अररिया जिले के कुर्साकाटा प्रखंड स्थित कपड़फोड़ा पंचायत में धावा बोला। यह इलाका आजादी के छह दशकों के बाद भी विकास की रोशनी की प्रतीक्षा ही कर रहा है। यही कारण है कि इस इलाके की जनसंख्या वृद्धि दर चार से ऊपर है। यहां परिवार नियोजन के नाम पर खूब "खेल' होता है। उस दिन एनजीओ के कारिंदों ने गांव की महिलाओं को मुफ्त बंध्याकरण के लिए बुलाया। चूंकि उन्हें ज्यादा-सा-ज्यादा महिलाओं को जमा करने का आदेश था, इसलिए महज कुछ ही घंटों में गांव के सरकारी स्कूल में सौ महिलाओं को भेड़-बकरी की तरह हांक लाया गया। जितनी मुंडी उतनी ही राशि का फार्मूला काम कर रहा था। महिलाएं उनके लिए एक निर्जीव संख्या से ज्यादा कुछ नहीं थीं। स्कूल के बरामदे में टूटी-फूटी मेजों पर शाम को पांच बजे ऑपरेशन शुरू हुआ और आठ बजते-बजते 61 महिलाओं के गर्भाशय खोलकर बंद कर दिये गये। डॉक्टर शहर लौट गये और सुबह होते-होते दो दर्जन महिलाओं की हालत खराब हो गयी। आश्चर्य की बात यह कि ऑपरेशन-स्थल पर पत्रकार, शिक्षक, गांव के मुखिया समेत बहुत-से लोग मौजूद थे, लेकिन उन्हें इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं लगा।  जब मुझे सूचना मिली, तो मैं अचंभित हुआ। मैंने  जान-पहचान के डॉक्टरों को फोन लगाया और इस "चमत्कार' के बारे में सवाल किया, तो पता चला कि उक्त डॉक्टर ने "विश्व-रिकॉर्ड' बना डाला है।  मेरे संपादक मंगलेश डबराल जी ने जब मुझे इस घटना पर रिपोर्ट करने का निर्देश दिया, तो मैंने इसके एक-एक तार की पड़ताल शुरू की। पता चला कि इस "विश्व रिकॉर्ड' को  कायम करने वाले डॉक्टर और एनजीओ के कर्ताधर्ता घटना के डेढ़ महीने बाद तक पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। इतना ही नहीं, यह भी मालूम चला कि ऑपरेशन के बाद जो दवा दी गयी वे एक्सपायर्ड थी और एनजीओ ने सरकार द्वारा निर्धारित प्रोत्साहन राशि भी मार ली।
बहरहाल, ऑपरेशन कांड की कई भुक्तभोगी महिलाएं आज भी फारबिसगंज-अररिया-पूर्णिया में स्वास्थ्य के लिए संघर्ष कर रही हैं। लेकिन अखबार के सभी संस्करण बिहार ग्लोबल मीट की तस्वीरों से रंगे रहे। इस दरम्यान अखबारों के लोकल पन्ने भी ग्लोबल बातों से अटे पड़े रहे। यहां तक कि गांव-कस्बे के फोलियो के साथ प्रकाशित होने वाले पन्नों पर भी यह खबर जगह नहीं बना सकी। थोड़ी-सी खबर तब बनी जब स्वास्थ्य मंत्री ने इस प्रकरण पर अपनी जुबान खोली।
देश के अन्य पिछड़े इलाकों की तरह कोशी की भी यह सदियों पुरानी विडंबना है। यहां नेताओं के इशारे के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता। इस इलाके में नेता प्रतिनिधि ही नहीं, जनमत निर्माता (ओपिनियन मेकर) भी होते हैं। एक जमाने में कोशी तटबंध के कारण लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा था। लेकिन नेताओं ने उन्हें समझा दिया कि यह सरकार का आदेश है और सरकारी निर्णय का मतलब ईश्वर का निर्णय। विरोध का विचार भी पाप है, अनैतिक और अवैध है।  ब्रिटिश और मुगलिया हुकूमत केदौर में यह धारणा स्थापित की गयी थी, जिसे स्थानीय नेताओं ने आजादी के बाद भी जिंदा रखा। जगन्नाथ मिश्र से लेकर बीएन  मंडल तक सभी इस धारणा के प्रबल पैरोकार थे। अगर यह सच नहीं होता तो कोशी में नर्मदा से बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया होता। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि जिस कोशी महासेतु की चर्चा सर्वत्र हो रही है, उसका निर्माण भी सैकड़ों लोगों के विस्थापन की कीमत पर हुआ है। लेकिन पुल के विस्थापितों की आवाज भी उसी तरह दबा दी गयी जैसे साठ के दशक में तटबंध के विस्थापितों की आवाज बंद करा दी गयी थी।
किसी जमाने में अररिया के इस गांव में जमीन के लिए भीषण कपड़-फोड़ी हुई थी और लोगों ने इसका नाम कपड़फोड़ा रख दिया था। आज फिर वहां कपड़-फोड़ी हुई है।  इन वर्षों में कोशी में न जाने कितने पानी बह गये, लेकिन गरीबों और वंचितों के कपाल आज भी घायल हैं।  कहते हैं कि कपाल पर तकदीर लिखी होती है! 

मंगलवार, 10 जनवरी 2012

दो बीघा खेत

 सच है
 कि दो बीघा खेत
 नाम नहीं देता
 पहचान नहीं देता
 मैंसन-सा कोई मकान नहीं देता
 लेकिन, दो बीघा खेत
 प्रोडक्ट नहीं बाजार का
 पहचानी हुई पुरानी आवाज है
 आधा हम सुनते हैं
 आधा वह सुनता है
 एक आदिम हमदर्द है
 पहले हम रोते हैं
 बाद में खेत रोता है
 टूटे हुए टाट के भरोसे को देखो
 दो बीघा खेत
 हमारे होने का एहसास है
 चूते खाट पर तनकर लेटने का साहस है

 जब थे दो बीघे खेत
 पंगत में एक पात अपना भी था
 पांव के नीचे गांव था, प्लेटफार्म नहीं

 जब होता है दो बीघा खेत
 कोढ़िया बैल भी प्यारे लगते हैं
 हवा-बसात, पहचानी लगती है
 सूरज में हमारी भी साझेदारी होती है
 रात में कोई निवेश नहीं होता
 सूर्योदय हमारे द्वार भी आता है

 दो बीघा खेत
 हमें खड़ा करता है
 कड़ा करता है
 कि आंच बढ़ती रहे
 हम चटकेंगे नहीं
 साक्षी है इतिहास
 गांधी और मार्क्स
 दो बीघा खेत के बूते
 हम बचा लेंगे देश
 और देश की घास
 जैसे मेमनों ने बचा रखी है शराफत
 लाजवंती ने लाज
 पंछियों ने आकाश

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

कोशी की करजैनी


दहाये हुए देस का दर्द-79
हर साल एक जनवरी को करजैनी की याद आ जाती है। करजैनी से क्या कुछ नहीं करते थे हम !  करजैनी के लिए क्या नहीं सहते थे हम ! सांप-बिच्छू की परवाह किये बगैर बांस-बेर-अमती-बबूल की सघन झाड़ियों में गिलहरी की तरह एक झटके में घुस जाते थे हम। हाथ-पांव झरबेर, जलेवी, अमती के कांटों से बुरी तरह घायल हो जाता था। कपड़े फट जाते थे, लेकिन करजैनी पाने का जुनून कुछ ऐसा था कि सारा नुछाड़ (कांटों के घाव) ठेंगे पर! सवाल करजैनी बनाने का था। करजैनी के दाने हमारे लिए किसी रत्न से कम नहीं थे। गिल्ली-डंडे, गोली-गोली  से लेकर तमाम खेलों में हम करजैनी को ही दांव पर लगाते। जिसके पास करजैनी होती, उसे किसी बात की चिंता नहीं। करजैनी दो और किसी भी टोली की सदस्यता पा लो। करजैनी है, तो तुम सेठ हो। हर द्वार तुम्हारे लिए हमेशा खुले हुये हैं। करजैनी नहीं तो फिर तो समझो कि दिन वाम हो गये। बच्चों की टोली में तुम्हारी कोई हैसियत नहीं रही। जिसके पास करजैनी है वह मातवर और जिसके पास नहीं, वह दरिद्र। एक जनवरी को  वनभोज के दिन जब हम शाम को तरह-तरह का खेल खेलते, तो जीतने वालों को करजैनी देनी पड़ती थी। जो नहीं दे पाता, उसकी खैर नहीं। उसे विद्यालय जाते-आते समय जबर्दस्त हूटिंग सहना पड़ता था।
 करजैनी कोशी इलाके की एक जंगली और लत्तीनुमा घास थी। जंगली झाड़ियों में यह अपने-आप उग आती थी। बरसात के बाद इसमें फूल लगते थे। नवंबर में फूल फल में बदल जाते और इन्हीं फलों के बीच होता था- करजैनी का मोतीनुमा बीज। इसी बीज के हम बच्चे दीवाने होते थे। ऐसे लगता था जैसे किसी सिद्ध कलाकार हाथ ने पत्थर की रंगीन मोती पर इत्मीनान से नक्काशी उकेर दिया हो।
गहन छानबीन के बावजूद मैं आज तक नहीं जान सका कि वनस्पति विज्ञान में इसे किस नाम से जाना जाता है। मैं यह भी नहीं जानता कि हिंदी में इसे क्या कहते हैं और कोशी के अलावा कहीं और यह घास उगती है या नहीं। कोशी में भी शायद अब इसका अस्तित्व नहीं है। हालांकि अब करजैनी को खोजने का बाल-जुनून नहीं रहा, लेकिन मैं इसकी खोज करता रहा हूं। जहां कोई झाड़ी (हालांकि अब जंगली झाड़ी कहीं नहीं मिलती) नजर आती है, वहां आंख अनायास करजैनी को खोजने लगती है। पूछने में शर्म आती है, लेकिन जब कभी किसी वृद्ध किसान से बात करने का अवसर मिलता है, करजैनी का अता-पता जरूर पूछ लेता हूं। लेकिन अब तक निराशा ही हाथ लगी है। मेरे सवाल से उन्हें हैरानी होती है, गोया मुझे करजैनी की क्या जरूरत ? गांव के बच्चों से भी पूछताछ की है। उनका जवाब होता है- "यह किसी खिलौने का नाम है क्या चचा जी ? गांव के हाट-बाजार में तो नहीं मिलते। शहर में जरूर मिलता होगा। एक मेरे लिए भी लेते आना न अगली बार! '
दरअसल, हाल के कुछ वर्षों से कोशी इलाके की जैव-विविधता तेजी से घटती जा रही है। कोशी द्वारा हिमालय के हजारों वर्ग किलोमीटर से लाकर लगायी गयीं वनस्पतियां अब इलाके से गायब हो चुकी हैं। यही हाल इलाके के जीवों का भी है। चिडिया, मेंढक, जंगली मछली, कीट-पतंगों की दर्जनों प्रजातियां इलाके से गुम हो चुकी हैं। 20-25 साल पहले जब हम पुराने मेड़ों को काटते-छांटते थे, तो बड़ी संख्या में मिट्टी में रहने वाले जीव मसलन, केंचुआ, केकड़ा, उचड़िन आदि देखने को मिलता था। लेकिन अब केकड़ों का दर्शन भी मुश्किल है। चिड़ियों की कई मनमोहक प्रजातियां गायब हो चुकी हैं। एक चिड़ियां होती थी- मछगिद्धी। यह उद-विलाव की तरह पानी में लंबे समय तक डुबकी लगाती थी और मछली पकड़कर फुर्र से उड़ जाती थी। हम बच्चे इसका तब तक पीछा करते जब तक यह हदे-निगाह से ओझल नहीं हो जाती। एक चिड़ियां होती थी- धोविया। इसकी अपनी विशेषता थी। वैसे तो नीली रंग की इस चिड़िया में सारे गुण पंछियों के ही थे, लेकिन इसका आवास और इसकी प्रजनन-प्रक्रिया अनूठी थी। यह मिट्टी के बड़े टीलों में बील बनाकर रहती और उसी में अंडे देती। बचपन में हमारे बीच इस बात की प्रतियोगिता होती कि कौन कितने धोविया- बील को खोज सकता है।  घोबिया बील के खोजकर्ता हमारी नजरों में किसी कोलंबस और बास्को-डि-गामा से कम नहीं होता।
मुझे नहीं मालूम कि कोशी की जैव-विविधता को लेकर किसी सरकार-संस्था  या एजेंसी ने कोई अनुसंधान किया है अथवा नहीं, लेकिन इस बात में मुझे कोई संदेह नहीं कि हाल के वर्षों में इस इलाके की समृद्ध जैव-विविधता अप्रत्याशित  रफ्तार से घटी है। ठीक उसी तरह जैसे हाल के वर्षों में इस इलाके की बांस-मिट्टी-जूट आधारित शिल्प-कला गुम होती चली जा रही है। जिन लोक-थातियों ने यहां हजारों-लाखों सालों में आकार ली, उनमें से अधिकतर महज कुछ दशकों में ही लुप्त हो गये। आलम यह है कि अगर आप आल्हा-उदल या राजा सलहेस की पूरी कहानी जानना चाहे, तो आपको न तो इसके वाचक मिलेंगे और न ही आपको कोई किताब मिलेगी, जो सटीक जानकारी दे सके। एक जनवरी को बचपन के एक मित्र से जब करजैनी की चर्चा की, तो उसने जवाब दिया,"अरे भाई, हम अगर यही बात किसी से पूछेंगे तो वह हमें बताह (पागल) घोषित कर देगा।''