रविवार, 29 मई 2011

मन का हंस

 सामने तालाब पर
 भोरे-भोर आया था वह
 झलफल होने तक इंतजार करता रहा
 न जाने किसका
 न जाने क्यों
 शाम को जब वह उड़ गया अकेला
 मन मेरा फिर बैठ गया 
 
मैं जानता हूं
वह कल फिर उतरेगा
और कल भी शाम आयेगी
उड़ेगा हंस
तन्हा मैं हो जाऊंगा

7 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

भोरे-भोर, झलफल
सुंदर प्रयोग इन शब्दों का
जिस मनःस्थिति की चर्चा आप कर रहे थे उसके लिए इस शब्द का बहुत सही प्रयोग है।
विचार

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत रचना ...मन का हँस ...शब्दों का चातुर्य दिखता है

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 31 - 05 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना !

ग़ज़ल में अब मज़ा है क्या ?

रंजीत/ Ranjit ने कहा…

aap sabhi Kavya-premiyon ko bahut-bahut dhanyawad.
@Sangita G- Charcha Manch me "Man Ka Hans" ko Shamil Karne K liye Bahut-bahut Abhar.

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत खूबसूरत रचना

Richa P Madhwani ने कहा…

खूबसूरत सुन्दर रचना

http://shayaridays.blogspot.com