मंगलवार, 10 जनवरी 2012

दो बीघा खेत

 सच है
 कि दो बीघा खेत
 नाम नहीं देता
 पहचान नहीं देता
 मैंसन-सा कोई मकान नहीं देता
 लेकिन, दो बीघा खेत
 प्रोडक्ट नहीं बाजार का
 पहचानी हुई पुरानी आवाज है
 आधा हम सुनते हैं
 आधा वह सुनता है
 एक आदिम हमदर्द है
 पहले हम रोते हैं
 बाद में खेत रोता है
 टूटे हुए टाट के भरोसे को देखो
 दो बीघा खेत
 हमारे होने का एहसास है
 चूते खाट पर तनकर लेटने का साहस है

 जब थे दो बीघे खेत
 पंगत में एक पात अपना भी था
 पांव के नीचे गांव था, प्लेटफार्म नहीं

 जब होता है दो बीघा खेत
 कोढ़िया बैल भी प्यारे लगते हैं
 हवा-बसात, पहचानी लगती है
 सूरज में हमारी भी साझेदारी होती है
 रात में कोई निवेश नहीं होता
 सूर्योदय हमारे द्वार भी आता है

 दो बीघा खेत
 हमें खड़ा करता है
 कड़ा करता है
 कि आंच बढ़ती रहे
 हम चटकेंगे नहीं
 साक्षी है इतिहास
 गांधी और मार्क्स
 दो बीघा खेत के बूते
 हम बचा लेंगे देश
 और देश की घास
 जैसे मेमनों ने बचा रखी है शराफत
 लाजवंती ने लाज
 पंछियों ने आकाश

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

कोशी की करजैनी


दहाये हुए देस का दर्द-79
हर साल एक जनवरी को करजैनी की याद आ जाती है। करजैनी से क्या कुछ नहीं करते थे हम !  करजैनी के लिए क्या नहीं सहते थे हम ! सांप-बिच्छू की परवाह किये बगैर बांस-बेर-अमती-बबूल की सघन झाड़ियों में गिलहरी की तरह एक झटके में घुस जाते थे हम। हाथ-पांव झरबेर, जलेवी, अमती के कांटों से बुरी तरह घायल हो जाता था। कपड़े फट जाते थे, लेकिन करजैनी पाने का जुनून कुछ ऐसा था कि सारा नुछाड़ (कांटों के घाव) ठेंगे पर! सवाल करजैनी बनाने का था। करजैनी के दाने हमारे लिए किसी रत्न से कम नहीं थे। गिल्ली-डंडे, गोली-गोली  से लेकर तमाम खेलों में हम करजैनी को ही दांव पर लगाते। जिसके पास करजैनी होती, उसे किसी बात की चिंता नहीं। करजैनी दो और किसी भी टोली की सदस्यता पा लो। करजैनी है, तो तुम सेठ हो। हर द्वार तुम्हारे लिए हमेशा खुले हुये हैं। करजैनी नहीं तो फिर तो समझो कि दिन वाम हो गये। बच्चों की टोली में तुम्हारी कोई हैसियत नहीं रही। जिसके पास करजैनी है वह मातवर और जिसके पास नहीं, वह दरिद्र। एक जनवरी को  वनभोज के दिन जब हम शाम को तरह-तरह का खेल खेलते, तो जीतने वालों को करजैनी देनी पड़ती थी। जो नहीं दे पाता, उसकी खैर नहीं। उसे विद्यालय जाते-आते समय जबर्दस्त हूटिंग सहना पड़ता था।
 करजैनी कोशी इलाके की एक जंगली और लत्तीनुमा घास थी। जंगली झाड़ियों में यह अपने-आप उग आती थी। बरसात के बाद इसमें फूल लगते थे। नवंबर में फूल फल में बदल जाते और इन्हीं फलों के बीच होता था- करजैनी का मोतीनुमा बीज। इसी बीज के हम बच्चे दीवाने होते थे। ऐसे लगता था जैसे किसी सिद्ध कलाकार हाथ ने पत्थर की रंगीन मोती पर इत्मीनान से नक्काशी उकेर दिया हो।
गहन छानबीन के बावजूद मैं आज तक नहीं जान सका कि वनस्पति विज्ञान में इसे किस नाम से जाना जाता है। मैं यह भी नहीं जानता कि हिंदी में इसे क्या कहते हैं और कोशी के अलावा कहीं और यह घास उगती है या नहीं। कोशी में भी शायद अब इसका अस्तित्व नहीं है। हालांकि अब करजैनी को खोजने का बाल-जुनून नहीं रहा, लेकिन मैं इसकी खोज करता रहा हूं। जहां कोई झाड़ी (हालांकि अब जंगली झाड़ी कहीं नहीं मिलती) नजर आती है, वहां आंख अनायास करजैनी को खोजने लगती है। पूछने में शर्म आती है, लेकिन जब कभी किसी वृद्ध किसान से बात करने का अवसर मिलता है, करजैनी का अता-पता जरूर पूछ लेता हूं। लेकिन अब तक निराशा ही हाथ लगी है। मेरे सवाल से उन्हें हैरानी होती है, गोया मुझे करजैनी की क्या जरूरत ? गांव के बच्चों से भी पूछताछ की है। उनका जवाब होता है- "यह किसी खिलौने का नाम है क्या चचा जी ? गांव के हाट-बाजार में तो नहीं मिलते। शहर में जरूर मिलता होगा। एक मेरे लिए भी लेते आना न अगली बार! '
दरअसल, हाल के कुछ वर्षों से कोशी इलाके की जैव-विविधता तेजी से घटती जा रही है। कोशी द्वारा हिमालय के हजारों वर्ग किलोमीटर से लाकर लगायी गयीं वनस्पतियां अब इलाके से गायब हो चुकी हैं। यही हाल इलाके के जीवों का भी है। चिडिया, मेंढक, जंगली मछली, कीट-पतंगों की दर्जनों प्रजातियां इलाके से गुम हो चुकी हैं। 20-25 साल पहले जब हम पुराने मेड़ों को काटते-छांटते थे, तो बड़ी संख्या में मिट्टी में रहने वाले जीव मसलन, केंचुआ, केकड़ा, उचड़िन आदि देखने को मिलता था। लेकिन अब केकड़ों का दर्शन भी मुश्किल है। चिड़ियों की कई मनमोहक प्रजातियां गायब हो चुकी हैं। एक चिड़ियां होती थी- मछगिद्धी। यह उद-विलाव की तरह पानी में लंबे समय तक डुबकी लगाती थी और मछली पकड़कर फुर्र से उड़ जाती थी। हम बच्चे इसका तब तक पीछा करते जब तक यह हदे-निगाह से ओझल नहीं हो जाती। एक चिड़ियां होती थी- धोविया। इसकी अपनी विशेषता थी। वैसे तो नीली रंग की इस चिड़िया में सारे गुण पंछियों के ही थे, लेकिन इसका आवास और इसकी प्रजनन-प्रक्रिया अनूठी थी। यह मिट्टी के बड़े टीलों में बील बनाकर रहती और उसी में अंडे देती। बचपन में हमारे बीच इस बात की प्रतियोगिता होती कि कौन कितने धोविया- बील को खोज सकता है।  घोबिया बील के खोजकर्ता हमारी नजरों में किसी कोलंबस और बास्को-डि-गामा से कम नहीं होता।
मुझे नहीं मालूम कि कोशी की जैव-विविधता को लेकर किसी सरकार-संस्था  या एजेंसी ने कोई अनुसंधान किया है अथवा नहीं, लेकिन इस बात में मुझे कोई संदेह नहीं कि हाल के वर्षों में इस इलाके की समृद्ध जैव-विविधता अप्रत्याशित  रफ्तार से घटी है। ठीक उसी तरह जैसे हाल के वर्षों में इस इलाके की बांस-मिट्टी-जूट आधारित शिल्प-कला गुम होती चली जा रही है। जिन लोक-थातियों ने यहां हजारों-लाखों सालों में आकार ली, उनमें से अधिकतर महज कुछ दशकों में ही लुप्त हो गये। आलम यह है कि अगर आप आल्हा-उदल या राजा सलहेस की पूरी कहानी जानना चाहे, तो आपको न तो इसके वाचक मिलेंगे और न ही आपको कोई किताब मिलेगी, जो सटीक जानकारी दे सके। एक जनवरी को बचपन के एक मित्र से जब करजैनी की चर्चा की, तो उसने जवाब दिया,"अरे भाई, हम अगर यही बात किसी से पूछेंगे तो वह हमें बताह (पागल) घोषित कर देगा।''

शुक्रवार, 16 दिसम्बर 2011

मेड़ पर माथा-हाथ (डायरी अंश / 1.12.11)

 पेंटिंग डब्लूडब्लूडब्लू डाट गूगल डाट को डाट इन से साभार
इस तेज रफ्तार दुनिया में पंद्रह साल कोई छोटी अवधि नहीं है। पंद्रह साल में कितना कुछ बदल गया है। पंद्रह साल में धरती ने पंद्रह बार सूरज का  चक्कर लगा लिया  है, ना जाने कितने सितारे खाकसार हो गये हैं खतो-किताबत की संस्कृति खत्म हो चुकी है, न नायी की खुशामद न संवदिया की जरूरत, नता-पता से लेकर न्यौता तक का काम 'मुबाइल' कर देता है। दो महीने की नवकनियां घर-द्वार से लेकर हाट-बाजार तक कर लेती हैं। खेतों में मचान नहीं मोबाइल के टॉवर नजर आते हैं। फुरसत में लोग टीवी देखते हैं, मुरदग नहीं भांजते। मुहर्रम में रेडीमेड ताजिये से काम चला लिये जाते हैं। मुआ कौन जाये बांस काटने, रस्सी बाटने और बत्ती चीरने।
लोक लाज का भय और बड़ों का लिहाज किसे कहते हैं ? बाप-पित्ती के सामने गर्ल-फ्रेंड की बात करने में अब युवकों के चेहरे लाल और आंखें नीचे नहीं होतीं। वे खड़ा होकर पेशाब करते-करते दो-तीन मिस्ड कॉल मार देते हैं।
अजब लीला है कोशी अंचल की, इसकी संस्कृति की। अनोखा मिजाज है यहां के बाशिंदों का। मन इतना चंचल कि नटवरलाल को भी दिन में तीन बार टोपी पहना दे, दिल इतना कोमल कि चांडाल भी पिघल जाये।
बहुत कुछ बदल जाने के बावजूद बहुत कुछ आज भी बासी नहीं हुआ है, कोशी में। वे सब टटका मछली की तरह ताजा और मड़ुवा रोटी की तरह सोन्ह हैं। दुख और सुख के बहुत-से  बिम्ब  अब भी नहीं बदले हैं। आज भी मवेशियों से फसल उजाड़ दिये जाते हैं और किसान माथ पर हाथ धरकर मेड़ पर घंटों बैठा रह जाता है। टुकूर-टुकूर ताकता है। राह गुजरते लोगों को भैंसों के खूर दिखाता है। उसके बाद जी भर के गाली देता है। सहानुभूति का एक शब्द सुनते ही दहाड़ मारकर रोने लगता है। इस रुदन की भी अपनी खासियत है। यह महज आंख का पानी नहीं, यह रूदन-रिपोर्टिंग होती है। रोते-रोते किसान फसल में लगी पूंजी और मेहनत का पूरा आंकड़ा पेश कर देता है।
कॉरियर के लिए जब लोग कबर में पैर रखे बाप को छोड़ कनाडा जाने में जरा-सी देर नहीं लगाते, तो कोशी के गांव में आज भी श्रवणकुमारों का टोटा नहीं है। आज भी एमए, एमएससी, एमटेक पास युवक बुढ़े बाप की सेवा के लिए नौकरी छोड़ गांव में बैठ जाता है। संजीव ने भी यही किया।
पंद्रह साल बाद संजीव से भेंट हुई, तो पहचानना मुश्किल हो गया। पंद्रह साल पहले जिस संजीव को मैंने देखा था, वह एक तेज-तर्रार, महत्वाकांक्षी, खूबसूरत, बड़ी आंख वाला वाक-चातुर्य आधुनिक युवक था। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से एमएससी कर रहा था, संजीव। लेकिन आज का संजीव विशुद्ध किसान है। सीधा और सादा। उसके संदर्भ बदल चुके हैं। वनस्पति विज्ञान की दुनिया में नया क्या हुआ यह बताना तो दूर, संजीव के लिए अब बोटेनी और कारी झांप की घास में कोई फर्क नहीं है।  मानो दोनों बेकार की चीज है, जिसे बकरी भी नहीं सूंघती।
बोटेनी में एमएससी करने के बाद नौकरी के लिए दरभंगा से किसी महानगर चला गया था, संजीव।  उसने बताया कि बुढ़े बाप की सेवा-टहल के लिए उसने अपनी डिग्री भुला दी और नौकरी छोड़कर गांव आ गया। जैसे-जैसे पिता की सेहत  खराब होती गयी गयी, संजीव के लिए गांव छोड़ना कठिन से असंभव होते गया। जब तक पितृ ॠण से उबर सका, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डिग्री पर समय ने धूल की इतनी मोटी परत बिछा दी कि उसका कोई मतलब नहीं रह गया । पिता के गुजरने के बाद ही शहर में रहने वाले संजीव के उच्च अधिकारी भाई गांव आ धमके। संपत्ति बंटवारे को लेकर केस-मुकदमें हुए और संजीव को अपने हाथों से बनाये घर से बेघर होना पड़ा। वह तंबू में रहने के लिए मजबूर हो गया ।
बाबू ने कहा था,"कुछ भी हो जाये घर की बात को कोर्ट नहीं ले जाना। सो संजीव के हिस्से में कुछ नहीं आया। जो लोग पिता भक्ति के लिए उनके नाम की दुहाई देते थे, उन्होंने भी अब संजीव का मजाक बनाना शुरू कर दिया था।''
सहोदर भाई की निर्दयता, बेईमानी, खुदगर्जी की दास्तां ने उसे इतना तोड़ दिया है कि सहसा यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि यह आदमी पंद्रह साल पहले पीजी हॉस्टल का प्रीफेक्ट था। संयमित और रिजर्व। 
वह बोलता गया, मैं सुनता रहा। शाम के चार बजे जब हम होटल के कमरे से बाहर निकले तो पता चला कि इस दरम्यान हमने आठ प्याली चाय पी ली थी। खाना हमने नहीं खाया। पांच बजे हमें बारात के लिए विदा होना था। एक प्रोफेसर साहेब के बेटे की बारात में शामिल होने हम दरभंगा पहुंचे थे, जो हम दोनों के रिश्तेदार हैं।
बारात की गाड़ी पर सवार होने से पहले मैंने पूछा,"संजीव भाई, आप प्रोफेसर साहेब के बेटे की शादी में कैसे ? इनकी और आपके बड़े भाई की कहानी में ज्यादा फर्क नहीं है।''
संजीव चुप हो गया। कुछ देर के बाद उसने कहा," हम तो आ गये, लेकिन तुम कैसे आये ? यह बात सुबह से मैंने कई बार सोची है, लेकिन पूछ न सका ।''
मेरे पास सही जवाब नहीं था। मैंने कहा, ''आग्रह टाल नहीं पाता हूं, शायद इसलिए। हां, यह सच है कि पंद्रह साल पहले इसी प्रोफेसर साहेब के कारण मुझे इस शहर तक से नफरत हो गयी थी।''
रात को शादी में मैंने देखा। सब कुछ पश्चिमी अंदाज में था। प्रोफेसर साहेब के गांव-गिरांव से आये लोग किनारे में कुछ इस तरह खड़े थे, जैसे वे बारात में नहीं, कचहरी में हों। मुझे एक बार फिर प्रोफेसर साहेब से नफरत हुई। एक पोटरी मेरे हृदय में बंद हो गयी ।
अगले दिन जब बस में बैठा तो रास्ते भर संजीव की याद आती रही।  भीषण उत्पीड़न के बावजूद उसके दिल में बड़े भाई के लिए कोई कठोर भाव नहीं था। वह आज भी अपने भाई का शुभचिंतक है। यह सोचकर मुझे संजीव का कद खुद से कई गुना बड़ा लगा। इतना बड़ा दिल उसे अपनी मिट्टी ने दी है। सच में संजीव माटी का असल पुत है।

बुधवार, 16 नवम्बर 2011

कवि तुम कब आओगे

बर्फ
सब
पिघल गयी
सांस भी
अब 
दवा हुई
देह ही है देश में
लोग बस  नारा है
भरोसा था जिस शोर पर
चौक पर
शराब हुई
शर्म
से बहुत आस थी
सुबह-सुबह
खतम हुई
कवि !
तुम कब आओगे

शुक्रवार, 4 नवम्बर 2011

ना वो नगरी ना वो ठाम (ठांव)



दहाये हुए देस का दर्द-78
बोल बम, दशहरा, कोजगरा, दीवाली, शुकराती, भ्रातिद्वितीया के बाद छठ पूरा हुआ और प्रवास का चौमासा भी। शहर जाती रेलगाड़ियां फिर से ठसाठस है
ट्रेनों के डिब्बे कर्राटे के ट्रेनिंग कैंप में तब्दील होने लगे हैं। अंदर जा पाना जंग जीतने जैसा है। सब की छुट्टी खत्म हो चुकी हैऔर हर कोई सही समय पर दिल्ली, अमृतसर, सूरत,लुधियाणा, गुवाहटी आदि पहुंच जाना चाहते हैं। लोग ज्यादा हैं, डिब्बे कम।  इसके उलट गांवों में डिब्बे ज्यादा हैं,  लोग कम ।
वे प्रवासी चिड़ियों की तरह आये और प्रवास-उपवास-त्यौहार के बाद लौट गये। कुछ ने बकरे की बलि दी, कुछ ने सिहेंश्वर बाबा को जल चढ़ाया और कुछ ने मंदिर में घंटी बांधकर उस पर अपना नाम खुदवा लिया- " ... मैया मनोकामना पूरी करे, तो अगले साल जोड़ा छागर चढ़ावेंगे (काटेंगे)।''
अब अगले चौमासे में ही लौटेंगे ये । जब कभी उनकी जरूरत होगी,  मोबाइल फोन और बैंक के दस नंबरी खाते से काम चला लिया जायेगा। तभी तो उस दिन मुनाई मड़र की पत्नी चहककर रामाधीनमा से कह रही थी-"जमाना बदल गिया है। टाका टेम पर आ जाता है। हां, बैंक का नवका मनिजर जनी-जाति (महिलाओं) सब को तुरंत टाका नहीं देता। हियां-हुआं पचीस जगह अंगुरी के टीप लेता है, बजरखसोना (बज्रपात करने वाला) !''
रामाधीनमा बायें-दायें, आगे-पीछे देखता है, फिर जवाब देता है- "ऐं, तोरा संग तो ऐसा कभियो नहीं हुआ, हे  बनेलवाली भाउजी ? मनिजरवा तोरे खोपा (बाल) पर मेहरबान जे है, हें-हें-हें !''
"धूर्र जिन्नदहा (जिन्न के संग रहने वाला) !!''
बनेलवाली लजा जाती है । कनखी से रामाधीनमा की ओर देखती है और  फुसफुसाती है-"बजरखसुआ राकश, आइये राइत से देहेर (देहरी) पर घुड़दौड़ करने लगेगा !!''
मुझे साल भर पहले पटना के एक दार्शनिक लेखक और अंग्रेजी पत्रकार की कही बातें याद आयीं। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग के बगल की चाय दुकान पर कहा था- "... इट्‌स नेचुरल डिमांड ऑफ बॉडी यार।  डू यू नॉट वांट टू प्लीज्ड योर बॉडी? आइ एम राइटिंग अ बुक ऑवर लेबर माइग्रेशन बट माई थीम इज डिफरेंट। माइग्रेशन वर्सस हाइब्रिडेजाइशन ! यह  शीर्षक कैसा रहेगा ??? ''
मैंने तकरीर की । " दादा, अभी तो माइग्रेशन पर बहस होनी चाहिए। एक पत्रकार के नाते पहले आपको  इस समस्या के असल कारणों के बारे में दुनिया को बताना चाहिए, लेकिन आप तो दीपा मेहता बनने पर उतारू हैं। आठ घंटे खेत में काम करने के बाद जब घर लौटेंगे, पांच-छह बच्चे को संभालेंगे, बुढ़े सास-ससुर की सलगी-नुआ (विछावन और वस्त्र) सुखायेंगे, तो भूल जायेंगे कि बॉडी प्लीजर किसे कहते हैं ...  '' 
दादा गंभीर हो गये । बोले, " प्वाइंट। वैलिड प्वाइंट। गो अहेड... ''
खेतों में धान पकने लगे हैं। दस-पंद्रह दिनों में काटने योग्य हो जायेंगे। लेकिन फसल काटने के लिए लेबर की चिंता से किसान दुबले हो रहे हैं। अब सबकी नजरें, जनी-जन (महिला कामगार) पर हैं। लेकिन कोई जनी खाली नहीं। उन्हें पहले खुद की फसल काटनी है। उगहनी से लेकर दाउनी (ढोन  से लेकर फसल तैयार करने तक) भी महिलाओं को ही करनी पड़ेगी। घर के तमाम जवान पुरुष सदस्य पंजाब-लुधियान जा चुके हैं। चौपाल के मचान पर बैठे यमुना यादव कहते हैं, "अगले साल से हम भी खेती छोड़ देंगे बबुआ। अप्पन इलाका में खेती करना आब ककरो वश के बात नहीं रह गिया है। लाख जतन से रोपाई किये थे। चार बीगहा में गरमा (धान की एक संकर किस्म) है। खूब लगा है ऐहि बेर गरमा, लेकिन चारों टोल घुम आये,  कटनी के लिए एको ठो जन (मजदूर) नहीं मिला।''   
मैंने पूछा, "चचा आपको कटनी के लिए जन नहीं मिल रहा है। उधर मुखिया कहते हैं कि गांव में इस साल मनरेगा में 20 लाख रुपये का काम हुआ है।''

"धुर्र ! के ? जलेसरा मुखिया !  उ बेइमनमा ते बड़का-बड़का नेता के कान काट रहा है। सब फर्जी है। मशीन से काम होता है। जभ कार्ड (जॉब कार्ड) वाले को दस-बीस देकर टीप ले लेता है बही में । उ कि बात करेगा ?  जब से मुखिया हुआ है, खेती करता है उ ?  काहे नहीं पूछे किआप काहे खेती छोड़ दिये? बाप-दादा के अरजल (अर्जित) 40 बीघा  धनहर खेत तो ओकरो पास है !'
मैंने पूछा- "तो फिर गांव का क्या होगा चचा ? ''
"कुछो नहीं। सब पैंजाब-हरियाणा चला जावेगा। जे गाम (गांव) में रहेगा ओ नेता-दलाल बनकर ब्लॉक में घुमेगा। सांझ में बोतल पीकर सोयेगा, सुबह में झक उजर (उजला) कुर्ता पहनकर घुमेगा।  हमर जैसे बढ़ू कुकुर (कुत्ता) भगायेगा। हेंहेंहें !  जनी-जाति सब अभी तो सब सह रही है। एक दिन इहो सब विद्रोह कर देगी। छोड़ा सबके निशा (नशा) में जनी-जाति जभ्भ (हलाल) हो रही है।''
"उसके बाद ?''
"ओकर बाद ?  नै (ना) ओ नगरी नै ओ ठाम ! नै राम नै रहीम। नै छागर नै जल। सब सदावरत ! सदावरत !!  शुकर (शुक्र) है सिंहेश्वर बाबा कें कि ई सब देखे के लेल (लिए) हम लोग जिंदा नहीं रहेंगे। जे जीवेगा से देखेगा। ''

सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

हजार साल पुराने गांव में

नवकी नेरू होती, तो पकड़कर बांध देते बथान में
उसे रोकना  नामुमकिन था
कोशिकी माय की तरह
अखबारी भाषा में वह पलायन था
गोबरधनियां की माय की जुबान में
उधार का वैधव्य
"बोंगमरना आठ महीना पैंजाब रहता है
आते ही कहता है -
 तोहर चाल-चलन ठीक नहीं , खोपा में गमकौवा तेल क्यों है !
 कपरजरूआ, गत्तर में जाबी क्यों न बांध जाता है ? ''

गांव हजार साल पुराना था
वैसे बांसुरी की जगह अब मोबाइल था
बिजली नहीं, खुट्टा पर तार तन आया था
हां, हजरबरसा वह गांव
पाखड़ के पेड़ पर लटके निस्पंद घोंसलों की  तरह था
दाना के लिए चिड़िया जिसे छोड़ गयी थी
चारा के लिए अजगर उसे निगल रहा था
 उसे हथियाने के लिए बंदर कतार में खड़ा था

राह-बाट पर लगे सरकारी बोर्ड, सबूत थे
कि गांव अब भी जिंदा था
खेत और मेड़ भी कायम थे
जैसे मुंडेरों पर रहते हैं घुन-खाये कुम्हड़
बाहर पुष्ट अंदर ठूठ
शायद इसलिए
सूरज उगने के साथ
जिन्हें होना था मेड़ पर
और सूरज डूबने के बाद
सोना था मकई के मचान पर
 वे उस दूकान पर थे
जिसे राजकीय भाषा में प्रखंड विकास कार्यालय कहा जाता है
जहां इंदिरा दीवार पर
और आवास दलालों की जेबों में बसते हैं
 जहां मनरेगा चास और मुखिया समार हैं
पंचायती राज हाइ यील्ड बीज की  तरह है
रिश्वत का खाद डालो
कट्ठा में बीस मन काट ले जाओ
2
अपने गांव में
सूरज सिर पर होने का एक मतलब है
मैंने सिटी भी सुनी
बरह-बज्जी रेलगाड़ी जा  चुकी  थी
बावजूद, हलवाहे नदारद थे
बारह बजे दिन में
खेत के सुनसान होने का भी एक मतलब है
इसलिए झलफल  शाम में
मैं गांव के सबसे पुराने पोखर पर था
मेरे पास महार पर
गांव के सबसे बूढ़े किसान की लाश थी
उसके माथे पर 20 लाख का बैंक-कर्ज था
लोटा लेकर मैदान जाता एक दूसरा बूढ़ा
मातमी शाम में भी प्राती गा रहा था
शाम में
प्राती गाने का भी एक मतलब है
क्योंकि वह बूढ़ा पागल नहीं था
उसकी मालिस से मरे मेमने भी मिमियाने लगते थे
जिस दिन वह कदवा करता
मेघ भी उसी दिन बरसता
उस बूढ़े ने कहा-
" एक फोन पंजाब-दिल्ली- सूरत से आवेगा
एक फोन कलेक्टर को जावेगा
फिर मुखिया का मुबाइल बजेगा
दारोगा रास्ते से लौट जायेगा ''
3
जो कोशी से लड़ते हुए जवान हुआ
अकाल में भी आठ बेटे का बाप बना रहा
वह फंसरी पर कैसे चढ़ा ?
हजार साल पुराने गांव में
इस सवाल का अब कोई मतलब नहीं है

रविवार, 2 अक्तूबर 2011

विकास की वेदीः खेती की कुर्बानी

 कृषि प्रधान भारत में  खेत, खेती और खेतिहर अब सबसे उपेक्षित उपक्रम बन गया है। संक्षेप में कहें तो हमारी खेती संकटों के मकड़जाल में फंस चुकी है। सरकार की प्राथमिकताओं से तो खेत, खेतिहर अब गायब हो ही चुके हैं, लेकिन चौथे खंबे का भी इस ओर ध्यान नहीं है। यह बात अलग है कि खाद्यान्न असुरक्षा से बड़ी असुरक्षा कुछ नहीं हो सकती। राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका द पब्लि एजेंडा ने अपने नवीनतम अंक में खेत,खेती और खेतिहरों के वर्तमान और भविष्य पर आवरण कथा की है। ऊपर की तस्वीर पर क्लिक कर  मुख्य रिपोर्ट पढ़ी जा सकती है।- रंजीत