शनिवार, 25 मई 2013

बगुला

  
 वह पानी का जीव कभी नहीं था
 पर पानी के पास ही रहता आया, सदियों से
 पानी के बिल्कुल पास, मगर लहरों से बहुत दूर
 हालांकि युगों के साथ उसके रंग बदलते रहे
 लेकिन उसके मुंह का गंध कभी नहीं बदला
 रत्ती भर भोथरा नहीं हुआ उसकी चोंच का नोक
 तमाम नारे
 और तमाम अकाल के बाद भी
 वह बगुला ही रहा

2 टिप्‍पणियां:

राकेश कौशिक ने कहा…

बगुला भगत - सटीक और सार्थक

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत कुछ कह जाती है रचना ...