गुरुवार, 14 जून 2012

सोने के बाद कोई नहीं आया : एक लघु कथा



उस साल बहुत बारिश हुई थी। नदी-खेत एकारनल हो गये थे। कोशी के कछार में बनैया सूअरों का प्रकोप कुछ ज्यादा ही हो गया था। रात में सूअर के झूंड आते और मकई की फसल उजाड़ देते । किसानों को मचान बनाकर रात भर पहरा देना पड़ता था। उस किसान के घर में दो ही समांग थे- बाप और बेटा। शाम से रात 12 बजे तक बेटा खेत पर पहरा देता और उसके बाद अगली सुबह तक बाप। सदा की तरह रात के 12 बजे किसान बेटे का खाना लेकर खेत पहुंचा। उसने पूछा- "कोई सूअर तो नहीं आया था, बेटा ? '' बेटे ने कहा,"बाबू जी, जब तक मैं जगा रहा , चार-पांच आये थे। मैंने सबको दूर खदेड़ दिया। लेकिन सोने के बाद एक भी नहीं आया।'' किसान ने माथा पिट लिया।

3 टिप्‍पणियां:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

फिर से चर्चा मंच पर, रविकर का उत्साह |

साजे सुन्दर लिंक सब, बैठ ताकता राह ||

--

शुक्रवारीय चर्चा मंच

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Ha ha ... Sahi matha peseta hai ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

:):) सब परेशानी जागते हुये ही है