मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

जमीन

जमीन
जिसने हमें पैदा किया
सिखाया
उछलना- कूदना , दौड़ना और धुपना
बीजों को अंकुरित कर, बताया
जनने का रहस्य
लहलहाते पौधों से कहलवाया
कि जिंदगी प्रेम का ही दूसरा नाम है
वृक्षों के छांव में बिठाकर, कहा
कि देना ही सबसे बड़ा लेना है
++
हमें याद है कि
हम बचपन में अक्सर लेख लिखते थे
'मां' पर
और चर्चा करते थे ' जमीन' की
और जीत लेते थे पहला पुरस्कार
++
बहुत कठिन है जमीन से कट जाना
जमीन से ऊपर उठ जाना
और सबसे दर्दनाक है
जमीन से कटकर वापस जमीन पर गिर जाना
 
 

8 टिप्‍पणियां:

समयचक्र - महेंद्र मिश्र ने कहा…

उम्दा सही है , धन्यवाद

रंजना ने कहा…

बहुत सही.......मन को छू कर झकझोर गयी यह रचना....

बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

MAN MEIN UTAR GAYEE AAPKI ZAMEEN SE JUDI PRABHAAVI RACHNAAYEN ...... KAMAAL KA LIKHA HAI RANJEET JI ....

संजीव गौतम ने कहा…

रजीत जी रंजना जी के ब्लाग पर आपकी टिप्पणी पढने को मिली. आपके विश्लेषण का कायल हो गया. आपने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया. इस बहाने आपका ब्लाग और आपकी रचनाओं से रूबरू हुआ. बहुत अच्छा लिखते हैं आप. मेरा सलाम स्वीकारें

रंजीत ने कहा…

संजीव जी, हौसला अफजाई के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद । इंटरनेट के समुद्र में ऐसे तो हर क्लिक पर मुलाकातें होती रहती हैं, लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसी मुलाकातें भी होती हैं कि लगता है जैसे खुद से मिलें हों। "दो पाटन के बीच' पर आने के लिए धन्यवाद।

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

बहुत कठिन है जमीन से कट जाना
जमीन से ऊपर उठ जाना
और सबसे दर्दनाक है
जमीन से कटकर वापस जमीन पर गिर जाना.


बहुत अच्छी कविता..बधाई.

satyendra... ने कहा…

सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना,
न होना तड़प का सब कुछ सहन कर जाना,
घर से निकलना काम पर और काम से लौटकर घर आना
सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना।

लगता है पॉश की इस कविता से प्रेरित होकर ही आपने कविता लिखी है। वाह गुरू१ क्या बात है।

रंजीत ने कहा…

आदर्णीय सत्येंद्र जी, पॉश महान कवि थे। आपके द्वारा उल्लेखित उनकी कविता काफी चर्चित है। मैं भी उस कविता से प्रभावित रहा हूं। लेकिन "जमीन' लिखते समय या उससे पहले मेरे मस्तिष्क में न तो पॉश आये न ही उनकी कविता। अगर गौर करें तो पॉश की जिस कविता का आपने उल्लेख किया है, उसकी पृष्ठभूमि "जमीन' से बिल्कुल अलग है। कहने की जरूरत नहीं कि महान पॉश ने समाज में घर करते यथास्थितिवाद के खिलाफ उल्लेखित कविता में आवाज उठायी है। मैंने कहीं पढ़ा था कि वे इस बात को लेकर व्यथित थे कि आदमी अपनी एक मौलिक प्रेरणा से दूर होते जा रहा है। वे इंसान को बदलाव-पसंद समूह के रूप में देखते थेऔर वे यथास्थितिवाद से दुखी थे।
लेकिन "जमीन' की प्रेरणा अलग है। "जमीन' से मेरा मतलब उन तमाम जड़ों से है जहां से इंसान जीवन की बुनियादी भौतिक और भावनात्मक प्रेरणा और संसाधन-स्रोत पाता है। आज के उपभोगतावादी दौर में अक्सर हम इस सच को भूल जाते हैं। द्रुत उन्नति की अंध दौड़ में जड़ों की परवाह नहीं करते। परिणामस्वरूप समाज से मानवजन्य करूणा, संवेदना और भावना लगातार कम होते चला जा रहे हैं। हालांकि एक हद के बाद हर किसी को इसका भान होता है। तत्पश्चात वह जड़ों से जुड़ने की कोशिश करता है, लेकिन तब तक काफी देर हो जाती है। ये जो , जड़ों से अलग हो जाने, अलग हो जाने के बाद लौट नहीं पाने का अंतर्द्वंद है- वही "जमीन' की केंद्रीय प्रेरणाा है।
हां, महान पॉश की उल्लेखित कविता से "जमीन' का रिदम मिलता है। शायद इसलिए आप उपर्युक्त निर्णय पर पहुंचे होंगे। शायद यह रिदम कहीं मेरे अंतर्मन में मौजूद हो और "जमीन' की अभिव्यक्ति के दौरान बाहर निकल आया हो। ऐसा हो सकता है, इससे मैं इनकार नहीं करता, लेकिन यह सच है कि "जमीन' की कथा-वस्तु को शरीर देने के दौरान मुझे पॉश कभी याद नहीं आये।
सधन्यवाद
रंजीत