मंगलवार, 19 जनवरी 2010

बाजार में मरीज

बेशक
आदमी की आस और आदमी की जान
बड़ी हैं
गांव और शहर के बीच की दूरी से
वरना
"वह कौन-सी बीमारी है
जो झाड़ने-फूंकने से ठीक नहीं होती''
लेकिन
सात दिन पहले ही हुआ था सतना का गौना
और आठवें दिन
सुबह से ही उसे खून की उल्टी आ रही थी
शायद इसलिए
गांव के सभी "ओझा'' गायब हो गये
शायद उन्हें दया आ गयी थी
सतना पर
या फिर सात दिन के गौने पर
++
बड़े "इस्पीताल'' में किसी बड़े "डागडर'' की तलाश में
बारह घंटे बाद शहर पहुंचा था, बेहोश सतना
और एक नामचीन क्लिनीक के
बाहरी गेट के थोड़ा-सा बाहर
निजी सुरक्षा गार्डों से गुजारिश करता रहा
सतना का लाचार बाप
उसकी लाचार बीवी
मगर
गेट नहीं खुले
(-------)
एक गरीब बाप
एक लाचार बीवी
और एक बेहोश आदमी क्या है
डॉक्टरों की माने तो
वे मरीज नहीं
''किसी सफाईवाले का ठेला है''
(माफ़ करें डॉक्टर साहेब , जिनका यह बयान है )
जो धोखे से दूकान को अस्पतलाल समझ बैठा है
उन्हें नहीं मालूम
कि एटीएम के जवाने में
गुजारिश बेवकूफी है
फटी धोती, झुकी कमर और बटुए की रेजगारी
बाजार की सबसे बड़ी गाली है
++
हाय !
बाजार के बीचो-बीच खड़े उस बेजार बाप को
सीथ की सिंदूर से मुठभेड़ करती उस नवयौवना को
कोई तो बता दे
उस "इस्पीताल'' का पता
जहां "डागडर बाबू'' बैठते हैं

6 टिप्‍पणियां:

sandhyagupta ने कहा…

Jhakjhor kar rakh diya aapki is rachna ne.

मनोज कुमार ने कहा…

संवेदनशील रचना। बधाई।

shyam1950 ने कहा…

प्रिय रंजीत जी
आपके प्रश्नों के उत्तर भी आपकी कविता में छिपे बैठे हैं .. ये लाचारियाँ क्यों हैं ? कहाँ से उपजती हैं?..पत्ते न गिनिए जड़ों में उतरिये मेहरबान!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ग़रीब कमजोर आदिवासी के जीवन से जुड़ी ... सत्य बयान करती संवेदनशील रचना ...............

satyendra ने कहा…

ye to har desh me sadiyon se hota raha hai, ab bhee ho raha hai. Ab legata hai ki udarikaran ke baad vyapak taur par ye samasya ubhari hai.

BrijmohanShrivastava ने कहा…

इससे ज्यादा दर्दीली और व्यंग्य रचना कोइ हो ही नही सकती