सोमवार, 3 मई 2010

आखिरी पहर

तीन बार टूट चुका है चांद
तीन बार खांस चुकी हैं दादी
तीन गिलास पानी पी चुका हूं मैं
और पास के बरसाती खंतों (गड्‌ढे) से
अब तीसरे मेढक की कराह आ रही है
शायद यह पहले दोनों का बच्चा रहा होगा
जिसे खंते के सांप ने ही निगला होगा
मेरा मन कहता है वह धामिन होगा
कवि मन कहता है वह दोमुंहा होगा
मैं क्या करूं
मेरी बस्ती सो रही है
अपनी देह में दूसरे की नींद
शायद यह रात का आखिरी पहर है

11 टिप्‍पणियां:

Amitraghat ने कहा…

वाह क्या लिखा है.."

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना है !

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

राकेश कौशिक ने कहा…

वाह वाह - गाँव में लगातार बारिस का द्रश्य साकार कर दिया जो आपने कहा है वो आखों के सामने सजीव हो उठा - इस छोटी से रचना के माध्यम से साथ गहरा सन्देश भी - धन्यवाद्

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना ने कहा…

रंजीतजी
आपकी कविता की बिम्ब योजना दिल को छू गयी
इतनी बढ़िया कविता लिखने वाले को , अपनी इस प्रतिभा का और इस्तेमाल करना चाहिए.
आपसे और कवितायों की उम्मीद है. हमारी संवेदनाएं शहरी और सतही होती जा रहीं हैं.गाँव घर जेवार की कथा कहना फालतू हो चला है.
सादर

रंजीत ने कहा…

कौशल जी, इस सहृदय प्रोत्साहन और सलाह के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
आपने ठीक कहा, हमारी संवेदनाएं शहरी और सतही हो चली हैं। इसे मानवीय करने की जरूरत है और हमेशा रहेगी। क्योंकि मेरा मानना है कि तमाम भाग-दौड़, लुका-छिपी, नोच-खसोट के बावजूद इंसान तब तक संतुष्ट नहीं होता जब तक वह उस नैसर्गिक भावना को प्राप्त नहीं कर लेता, जो उसकी आत्मा और हृदय से निकलती है। मसलन व्यक्ति कोई भी हो, कितना ही ऊंचा और शक्तिसंपन्न क्यों न हो, लेकिन जब वह अकेले में , कभी किसी पेड़ की छाया में, कभी मंदिर में, कभी मस्जिद में, बैठता है तो पीछे मुड़कर देखता है। सोचता है कि वह कितना सफल इंसान-नागरिक, कितना सफल माता-पिता, भाई-बहन आदि बन सका। इसलिए मुझे यकीन है कि एक दिन यह दुनिया सुंदर बनेगी। आमीन।
रंजीत

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना ने कहा…

रंजीत जी
दो बातें फौरन जेहन में आती हैं.
नाजिम हिकमत की एक कविता है , तर्जुमाँ पूरा नहीं है , याददाश्त के सहारे लिख रहा हूँ.
द best story is yet टू बी written , द best song is yet टू बे sung . .........
समतामूलक समाज के मुहीम में शामिल लोगों के बीच एक गीत बेहद लोकप्रिय रहा है
" तू ज़िंदा है , तू जिंदगी की जीत में यकीन कर
है कहीं पे स्वर्ग तो उतार ला जमीं पर
तू ज़िंदा है तू जिंदगी की जीत में यकीन कर "
जिंदगी की धड़कन को अनसुना कर जिंदगी कैसे जिया जा सकता है.
कवितायें लिखते रहें.
सादर

आशीष/ ASHISH ने कहा…

Bau jee, padhe-kihe dehatiyon ke liye likhi hai kya?
Hamne to sab taraf se jor laga liya!
Tanik hum koopadhon ka bhi sochiye.....

रंजीत ने कहा…

आशीष जी,
आपकी टिप्पणी ने मुझे बार-बार सोचने के लिए बाध्य कर दिया। जो टिप्पणी आप ने की, अक्सर ऐसी ही राय मेरी भी रही है। अगर आप जैसे सचेत और समर्थ को भी "आखिरी पहर" में माथा लगाना पड़ा, तो निश्चित रूप से मुझे पुनर्विचार करना चाहिए। मैं सोच रहा हूं कि फुट नोट लिखकर उन प्रतीकों को स्पष्ट कर दिया जाये, जो किसी क्षेत्र विशेष के जीवन-संस्कृतियों से कविता में आ जाते हैं। तब शायद आप जैसे सचेत जनों को शिकायत नहीं रहेगी।बहरहाल, मैंने इस कविता के सारे बिम्ब गांव-देहात से उठाया हैऔर मुझे लगता है गांव में रहने वाले या रह चुके लोग इसे आसानी से रूपबद्ध कर सकते हैं।"चांद टूटना' कोशी अंचल की एक देसी लोकोक्ति है जिसका मतलब किसी अपशकुन या दुर्घटना से है। "दादी तीन बार खांस चुकी है' से मेरा मतलब संपूर्ण रात और रात के सूनापन (कविता में इसे अराजक/अंधकारमय समय का प्रतीक समझा जा सकता है)से है। "रात के आखिरी पहर' के बाद सबेरा होता है। अक्सर धामिन सांप ही मेढक का शिकार करता है, लेकिन कवि उसे "दोमुंहा' करार दे रहा है। आशय स्पष्ट है। आज दोमुंहापन ही शोषण का सबसे सफल औजार बन गया है। सुझाव के लिए सलाम।

आशीष/ ASHISH ने कहा…

रंजीत,
मुझ जैसे फूहड़ आदमी को इतनी संजीदगी से ले गए आप! दरअसल मैं गाँव की प्रष्ठभूमि नहीं रखता हूँ! शायद इसलिए कुछ शब्दों को समझ नहीं पाया!
अब आपके समझाने के बाद कुछ सहारा लगा है!
इश्वर करे के ये रात्रि का अंतिम प्रहार ही हो!
और हाँ, मेरे बारे में कोई गलत फहमी मत पालिएगा....
मैं बेसिकली एक वाहियात व्यक्ति हूँ जो कभी-कभी 'सूर्यास्त' जैसी रचना कर लेता है!
यकीन नहीं आता तो लेटेस्ट पोस्ट पढ़िए! खुद ही जान जाएँगे! हा हा हा...
इश्वर कल्याण करे!

sandhyagupta ने कहा…

Anchue se bimbon ka kya khub istmal kiya hai.badhai.