मंगलवार, 25 मई 2010

इस दिल्ली में

कोई दो आषाढ़ पहले
लायी गयी थी मां
'कुसहा' से कोसों दूर
इस दिल्ली में

खोजती है मां
खड़, खेत और खलिहान
बांस के जंगल और चिड़ियों की चहचहाहट
इस दिल्ली में

बेटा-बहु करते है खूब सेवा
पोता रोज ले जाता है पार्क
लेकिन
नहीं लगता मां का मन
इस दिल्ली में

बुदबुदाती है मां
अकेल में
न परिछन, न डहकन ना चुमाउन,!
न कोहवर न अरिपन !!
रामा हो रामा !
कैसी-कैसी शादी !!
इस दिल्ली में

सोचती है मां
क्या कभी आयेगी कोशी
राह भटक कर
इस दिल्ली में

4 टिप्‍पणियां:

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत मार्मिक कविता है ...

manojaaush ने कहा…

main aapko patrakar ke taur par janta tha, magar aap to kavita men bhi acchi baat kahte hain........acchi kavita hai...... jindagi se gayab hoti ragatmkta ki ek chhatpatahat dikhti hai ........
Bhut marmik kavita hain, dil ko chhu gaya.

manoj kumar, ajay prakash

राकेश कौशिक ने कहा…

खोजती है मां
खड़, खेत और खलिहान
बांस के जंगल और चिड़ियों की चहचहाहट
इस दिल्ली में

बेटा-बहु करते है खूब सेवा
पोता रोज ले जाता है पार्क
लेकिन
नहीं लगता मां का मन
इस दिल्ली में
वो बात कहाँ इस दिल्ली में - सच्चा दर्द - भावात्मक प्रस्तुति

दिगम्बर नासवा ने कहा…

gahri rachna ... sach mein shahar ki machini jundagi mein vo apna pan nahi hai ... maarmik .. dil ko choone waali rachna ...