मंगलवार, 7 अगस्त 2012

रिक्शे पर एक अमर प्रेम

हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां हर अच्छी और जरूरी बात महज एक स्लोगन है। यत्र नार्यस्तु पूज्यते के आदिम मंत्र से लेकर नारी सशक्तिकरण के आधुनिक सरकारी जुमले तक के सफर की उलटबांसी यह है कि साल-दर-साल देश में महिला उत्पीड़न की घटना बढ़ती जा रही है। आश्चर्य की बात यह कि आज भी महिलाओं का सर्वाधिक उत्पीड़न और शोषण घर-परिवार में ही होता है। ऐसे समय में सुरेंद्र यादव की  कहानी मन को कुछ सुकून देती है, जो कैंसरग्रस्त पत्नी की दवा के लिए रिक्शा kखींचता है। द पब्लिक एजेंडा ने अपने हालिया अंक में इस युवक की मिसाल पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। ऊपर की तस्वीर पर क्लिक कर यह रिपोर्ट पढ़ी जा सकती है। आप द पब्लिक एजेंडा वेबसाइट पर भी यह रिपोर्ट पढ़ सकते हैं- रंजीत


3 टिप्‍पणियां:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

कैन्सर-ग्रस्त जोरू हुई, जर जमीन को हार |
रिक्शा खींचे मर्द यह, बचा रहा बीमार |
बचा रहा बीमार, साथ रहने की जिद है |
मिटने को तैयार, प्यार रविकर बेहद है |
शुभ-कामना असीम, पुरुष हों जाएँ आदी |
है पति का कर्तव्य, निभाये भरसक शादी ||

पुष्यमित्र ने कहा…

दिल को छू लेने वाली रिपोर्ट ... यह एक पूरी कहानी का विषय है..

विनोद सैनी ने कहा…

सूचना से अवगत कराने के लिये धन्‍यवाद

आपको जन्‍माष्‍टमी की शुभकामनाये

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