रविवार, 16 अगस्त 2009

दिनन के फेर

(बारह महीने बाद : इन उजडे दयारों को बसने में वर्षों लगेंगे )
दहाये हुये देश का दर्द-52
इसे दिनन के फेर ही कहिये हुजूर कि गांव का वह दब्बू-गंवार छोड़ा (युवक) मलखा मलखान सिंह जैसे बोलने लगा है। सरकारी जीप से उतरे बाबुओं और अधिकारियों से मलखा ने बीच सड़क पर तगड़ा बहस कर लिया। अधिकारियों को समझ में नहीं आया कि वह इस अर्घनंग छोड़ा का क्या करे। अगर कोई और मौका होता तो वे दो जोरदार डंडे में ही पूरे मामले को रफा-दफा करवा देते। सीना तानकर कर बड़े अदब से खड़े जमादार एक इशारे पर ही मलखा को छट्ठी का दूध याद करा देता। उसकी मां, बहन के नाम लेकर मिर्ची चबाता और कहता- तोरा माय..., तोरी बहिन .... दोगला के औलाद, साले तुम्हारी इतनी हिम्मत कि ब्लॉक के हाकिम से कहा-कही करेगा। लेकिन मौका ऐसा नहीं था। एक तो कोशी का उजाड़ और ऊपर से दहाये-भसियाये लोगों के गुस्से। तिस पर से पीछे-पीछे विधायक जी की गाड़ी। इसलिए बाबुओं को गम खाना पड़ा । और जब मलखा ने कहा कि आप लोग इधर आते हैं किसलिए ? शहर में रंडीबाजी से फुर्सत मिल जाती है तो दिल बहलाने गांव चले आते हैं ! हम मरे या जीयें आपको इससे का मतलब ? जाइये देश-विदेश से जो भी रिलीफ आये उसे अपने घर में रख लीजिए। थोड़ा मुखिया को, थोड़ा जनसेवक को चटाइये और बांकी अपने धोधर में ठूंस लीजिये। मैंने नोट किया कि मलखा बोल नहीं रहा था, बल्कि हथियार उठा रहा था। उसकी मुट्ठी चल रही थी और पांव जमीन से टकरा रहे थे। इससे पहले कि मलखा और लोगों को भढ़का देता सरकारी गाड़ी आगे निकल गयी। जमा हुये स्त्री-पुरुषों ने कुछ नहीं समझा। मैंने कहा, चिंता मत कीजिए- थोड़ी देर बाद आपके विधायक जी आयेंगे। उससे पहले आप लोगों को राहत-रिलीफ बांटा जायेगा। बात सबके समझ में आ गयी। वे प्रसन्न हो गये। लेकिन गोद में बच्ची को लेकर खड़े हरखू शाह का चेहरा पहले की तरह उदास रहा। वह मेरे बगल में था। मैंने उससे कहा- जाइये लिस्ट में अपना नाम चढ़वाइये। लेकिन वह कुछ नहीं बोला। जाते-जाते उसने कहा- हमको नै मिलेगा साहेब, हमरा आउर गांव के मुखिया के बीच में रार है। जें मुखिया के खासमखास होगा ओकरे (उसी को) मिलेगा। यह मामला था सुपौल जिले के त्रिवेणीगंज के नजदीक लक्षमीनिया गांव का। यह इलाका कभी समाजवादी आंदोलन का गढ़ हुआ करता था। इन दिनों मरने से पहले ही मरशिया पढ़ने लगा है। कोशी ने इलाका को मरघट्ट में तब्दील कर दिया है। लेकिन गांव के मुखिया, वार्ड मेंबर, पंचायत सेवकों के गाल दिनोंदिन चिकने होते जा रहे हैं।

... और मलखा का क्या पता ? शायद वह भूख के आगे समर्पण कर देगा। या फिर नवकी घरवाली के साथ शहर से आये सर्कस देखने चला जायेगा और शाम को दारू पीकर सो जायेगा ? मलखा या तो मरेगा या फिर मुखिया के साथ जायेगा। अगर इन दोनों से बच गया तो ? मैंने उसका नाम पता नोट कर लिया है। दो वर्ष बाद उससे फिर मिलूंगा और लिख सका तो लिखूंगा भी ।
 
 

4 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ऐसे कितने ही मल्खा भारत वर्ष के अनेकों गाँव में भरे पड़े हैं.............. ये त्रासदी है की इस व्यवस्था में कोई सुधार नहीं होता

रंजना ने कहा…

Aaj yah ek ansh padh hi man ki jo sthti hui hai.......bas kya kahun...
Pichhle sabhi bhaag jald hi padhungi...

Aapki lekhni ko naman !!!

Aapki baton ko samajh payi,kyonki andar se main bhi ek shahri dehatin hun...

Milan ने कहा…

straight and little bit bitter .. but its reality.

रंजीत ने कहा…

रंजना जी, बहुत धन्यवाद। ब्लॉग को एक गंभीर माध्यम के रूप में विकसित करने की जिम्मेदारी आज के ब्लॉगरों के ऊपर है। हम और आप और कई ब्लॉगर -लेखक , यह प्रयास कर रहे हैं। मुझे लगता है कि आज के दौर में सच्चाई को सामने लाने में ब्लाग से ज्यादा कारगर कोई माध्यम नहीं है। परंपरागत मीडिया यह भूमिका अब नहीं निभा सकती क्योंकि वह हजार तरह के हित-अहित के बीच पल-पल समझौता और सौदा का दूसरा नाम ही रह गया है। ब्लाग इससे आजाद है। ब्लॉगरों के ऊपर किसी तरह का कंपल्सन नहीं है। उनकी कलम मुक्त और आजाद हैं। इसलिए व्यक्तिगत तौर पर मुझे ब्लाग और ब्लॉगरों से बहुत अपेक्षा है।
रंजना जी, आप ने ठीक कहा है कि आप मेरी बात को सही-सही महसूस कर सकती हैं। शायद आप भी गांव की संस्कृति से सीधी जुड़ी रही हैं। लेकिन मैं तो कहूंगा कि हम सबों में यह शक्ति है। आखिर कब तक हम एकांगी विकास को संपूर्ण विकास मानने के मुगालते में जीते रहेंगे और रेत के महल पर भरोसा करते रहेंगे। अगर भारत में गांवों की स्थिति नहीं सुधरी तो शहर रेत के महल से ज्यादा कुछ नहीं है।
दिगंबर भाई और मिलन जी को बहुत-बहुत धन्यवाद।
स आभार
रंजीत