मंगलवार, 30 सितंबर 2008

घर जला तो क्या, खटमल तो मारे गये न !

दहाये हुए देस का दर्द - 9
रंजीत
बहुत पहले सहरसा- फारबिसगंज छोटी रेलवे लाइन की छोटी गाड़ी के साधारण डब्बे में सवार एक अपरिचित वृद्ध ने एक अद्‌भूत व्यंग्य-कहानी सुनाई थी। कहानी यूं थी- एक बार एक गांव में भयानक अगजनी हो गयी आैर दर्जनों घर स्वाहा हो गये। हादसे में उस गांव के जमींदार के घर भी जल गये। आग बूझने के बाद पूरे गांव में मातम-सा छा गया। कोई छाती पीट रहा था, तो कोई मूर्छित हो रहा था तो कोई पागल की तरह राख बीन रहा था। जमींदार साहेब गांव से बाहर थे आैर हादसे की खबर सुनकर दाैड़े-दाैड़े अपनी बस्ती पहुंचे। जमींदार को देखकर लोगों को कुछ ढांढस बंधा कि शायद ये कुछ उपाय करेंगे। लोग रोना-धोना भूलकर उन्हें घेरकर खड़ा हो गये। जमींदार साहेब ने जले हुए घरों पर एक उड़ती-हुई नजर दाैड़ाई आैर बोले- चलो चिंता की कोई बात नहीं। जो हुआ अच्छा ही हुआ । घर जले तो क्या हुआ, खटमल से तो निजात मिला। लोग भौचक्क रह गये, जमींदार की बात उनके मगज में नहीं अटी। बोले- सरकार, हमलोग कुछ समझे नहीं ! जमींदार साहेब बोले- अरे बुड़बकों ! कितने खटमल बढ़ गये थे बस्ती में, किसी रात चैन से नहीं सो पाता था। आग में घरों के साथ खटिया भी तो जल गये हैं न ? तो अब बताओ, वे साले खटमल बच पाये होंगेइस आग से ??
कोशी हादसा के बाद की राजनीतिक बाजीगरी को देखकर यह व्यंग्य-कथा रह-रहकर मेरे जेहन में कौंध जा रही है। कोशी की हाहाकारी बाढ़ के बाद कुछ राजनीतिक पार्टियां अंदर-ही-अंदर खुशी से ताली पीट रही है। बाढ़ से लोग तबाह हो गये तो क्या ? उनके घर-द्वार, जमीन-जायदाद, माल-मवेशी बह गये तो क्या ? चारों ओर भूख और बिमारी से कोहराम मचा हुआ है तो क्या ? उनके राजनीतिक खटमल तो मर गये न! विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं की खुशी को तो कोई ठिकाना ही नहीं मिल रहा है। इन्हें इस बाढ़ में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी रूपी खटमल के मरने का सौ फीसदी भरोसा है। इन्हें इस बाढ़ के प्रलय में सत्ता-रथ की वापसी की आहट साफ सुनाई दे रही है। रोते-कलपते लोगों की आंसुओं में उन्हें कुर्सी की तस्वीर दिख रही है। इसलिए पार्टी के नेताओं ने तो सहरसा-पटना-दिल्ली को तीन डग में ही समेट लिया है। कैमरा के सामने समर्थकों को रुपये बांटे जा रहे हैं। स्थिति तो यह है कि पार्टी कार्यकर्ताओं ने नेता जी के निर्देश पर जगह-जगह शिविरों के सामने बाकायदा पार्टी के चुनाव चिह्न वाले बड़े-बड़े पोस्टर-बैनर टांग दिये हैं। ताकि पीड़ितों को कौर का कसम दिलाकर उनसे वोट की गारण्टी ले ली जाय। अगर अचानक कोई इन बैनर-पोस्टरों को देखे, तो उन्हें आम चुनाव का भ्रम हो जाय।
किसी भी समाज ने शायद नैतिक पतन के ऐसे नमूने नहीं देखे होंगे जैसे आजकल कोशी अंचल के लोग देख रहे हैं। पहले तो लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण उन्हें मानव-निर्मित आपदा में झोंक दिया गया अब उनकी फटेहाली का मजाक उड़ाया जा रहा है। कहते हैं कि पतन की भी सीमा होती है। लेकिन बिहार की राजनीतिक पार्टियों ने गिरने की तमाम हद को पीछे छोड़ दिया है। निर्लज्जता और हया के सारे मानदंड खत्म हो गये हैं। एक पार्टी के नेता ने तो यहां तक कह दिया कि इस अंचल के यादव और मुस्लिमों का तबाह करने के लिए तटबंध तोड़ने की साजिश रची गयी।
यह तो हुआ विपक्षी दलों के कृत्य। अब कुछ सत्तानसीनों की भी सुन लीजिए। सत्ताधारी पार्टी के नेताओं में शिविर के उद्‌घाटन की होड़ मची हुई है। कई शिविरों का उद्‌घाटन तो बाकायदा फीता काटकर हुआ। लोग भूख से बिलाबिला रहे थे और नेता जी उद्‌घाटन के रिबन काटने में मशगूल थे। यही नहीं नेताओं ने नावों पर बाकायदा अपने नाम लिखवा दिये हैं। यह नाव - माननीय फलाना, विधायक जी के सौजन्य से। यह नाव- माननीय फलाना मंत्री जी के सौजन्य से... आश्चर्य की बात यह है कि ये कवायद तब शुरू हुई जब लोगों ने सारा कुछ गंवा दिया। जब उन्हें मदद की दरकार थी, तब सारे राजनीतिक दल और उनके नेता कान में तेल डालकर सोये थे। लगता है इस देश के लोग अब राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के लिए एक वोट-संसाधन के सिवा कुछ भी नहीं है। ये बगैर स्वार्थ के हरिद्वार भी नहीं जाते।
शायद भारत की राजनीतिक पार्टियां और नेता मानवीय संवेदनाओं से ऊपर उठ चुके हैं। इस श्रेणी में अबतक राक्षस और ईश्वर को रखा जाता था। लगता है अब इसमें राजनीतिक पार्टियां और राजनेता भी शामिल हो गये हैं।

सोमवार, 29 सितंबर 2008

हरदा-बो का घिनौना खेल

दहाये हुए देस का दर्द -8
रंजीत
बच्चे जहां रहे वहीं खेल ढूंढ़ लेते हैं; जिन चीजों के साथ रहे उन्हीं से खेलने लगते हैं। शायद इसलिए किसी कवि ने लिखा है- जहां बूढ़ों का संग वहां खर्चे का तंग/ जहां बच्चों का संग वहां बाजे मृदंग। मेरे गांव के उच्च-मध्य विद्यालय के बिल्कुल नजदीक से कोशी नदी की एक मृत धारा बहती थी। इसे न तो आप नदी कह सकते हैं और न ही नाला। बस इसे एक पुरानी नदी का अवशेष मात्र कह लीजिए। जब कोशी ने 1938-40 में अपना प्रवाह बदला, तो यह धारा सूख गयी। लेकिन इसमें बारहों महीने पानी बहते रहता था। कभी कम कभी ज्यादा। लेकिन कुसहा में बांध टूटने के बाद एक बार फिर यह धारा नदी जैसी शक्ल अख्तियार कर चुकी है। उन दिनों विद्यालय से छुट्टी मिलते ही हमलोग इस धारा में नगं-धड़ंग होकर कूद पड़ते थे और हरदा-बो (एक देसी जल-खेल) का खेल खेलने लगते थे। यह हरदा-बो बड़ा मजेदार खेल था, अच्छे घरों के बच्चे अब यह खेल नहीं खेलते; हां, कहीं-कहीं किसी सुदूर-पिछड़े गांवों में अभी भी यह खेल जिंदा है।
हरदा-बो में एक खिलाड़ी चोर होता था बांकी सभी खिलाड़ी सिपाही होते थे।वैसे हर कोई इस खेल में हमेशा सिपाही ही बना रहना चाहता था। जो चोर बन जाता उसकी तो समझिए शामत आ जातीथी। चोर को पानी के बाहर सिर निकालने की इजाजत नहीं होती। जैसे ही वह पानी के बाहर सिर निकालता, सिपाहियों के झुंड उनपर कीचड़ से आक्रमण करने लगतेऔर अगर किन्हीं के द्वारा फेका गया कीचड़ चोर के सिर से टकरा जाता, तो उसे अगले राउंड का चोर भी मुकर्रर कर दिया जाता। ऐसी परिस्थिति में उसके पास दो ही उपाय होता, एक यह कि वह पानी के अंदर ही अंदर किसी सिपाही को गिरफ्तार कर ले या फिर जोर से हरदा-बो, हरदा-बो बोल दे ... हरदा-बो का मतलब कि हम हार गये, हम समर्पण करते हैं। जैसे ही चोर हरदा-बो बोलता सारे सिपाहियों का गगनभेदी विजयी स्वर उभरता- बम-फचाका, बम फचाका ... (यानी हम जीत गये )
कोशी अंचल का यह देसी खेल आज भले ही अप्रासंगिक हो गया हो, लेकिन कोशी की प्रलयंकारी बाढ़ के बाद राजनेताओं और अधिकारियों का समूह इन दिनों हरदा-बो के खेल का भरपूर मजा ले रहे हैं। हमें तो शिक्षक और गार्जियन के भय भी होते थे, इसलिए हम हमेशा सशंक रहते थे। लेकिन राजनेताओं और अधिकारियों को किनका डर ? कोई भी उनके शिक्षक नहीं बन सकते ! ये बिन गार्जियन के बालक हैं। हरदा-बो के इस खेल में सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, पूर्णिया और अररिया जिले के तीस लाख लोग चोर बने हैंऔर राजनेता व अधिकारी सिपाही की भूमिका में हैं।
जनता कह रही है- माय-बाप ! लो हम हार गये। हमारा दम फूल रहा है, सांसे उखड़ रही हैं, अब सिर डुबाने की हिम्मत नहीं.. . लो हम हार मान रहे हैं। हरदा-बो. .. हरदा- बो... हरदा-बो. ..
जवाब में उधर से अधिकारियों और नेताओं का अट्टाहासपूर्ण विजयी स्वर उभर रहा है - मारो, फेंको... फेंको, फेंको, कीचड़ फेंको, सरबा के मुंडी पानी के ऊपर ना आ पाये !!! हेहेहे- ये लो , बम-फचाक, फचाक, फचाक.. .
बाढ़ पीड़ित जनता के सिर कीचड़ों से सन रहे हैं। लेकिन सिपाहियों के कीचड़ भरे हाथ नहीं थम रहे। हरदा-बो, हरदा-बो, हरदा-बो ???
बम-फचाका, बम फचाका, फचाका, फचाका; हाहाहा...
तुम चोर हम सिपाही, तुम हरदा-बो, हम बम फचाका। राउंड- दर -राउंड।
मारो साले को लाठी से, मारो सालों को बंदूक के कुंदा से , भगाओ यहां से .. .
रोटी मांग रहा है ? खीचड़ी नहीं खायेगा ?? सड़क जाम करेगा ???
इलाज कराओ। डॉक्टर को भेजिए हमारे गांवों में, हुजूर ।। बच्चे मर रहे हैं हुजूर ।।।
हरदा-बो, हरदा-बो, हरदा बो...
मारो साले को- बम-फचाका, बम फचाका, बम फचाका ।
सहरसा मेगा कैंप में रोटी मांग रहा है, नरपतगंज में खीचड़ी लेकर प्रदर्शन कर रहा है, सोनवर्षा में सड़क जाम कर रहा है, बेलही कैंप में तो कपड़ा तक मांगने लगा। मवेशी मर गये तो हम क्या करें ? मवेशी वाली बीमारियां तुम्हे लग गयीं तो हम क्या करें ?? जीवछपुर, भीमपुर, उधमपुर, ठूठी में भुखमरी शुरू हो गयी है, तो हम क्या करें ???
हरदा-बो का खेल नहीं खेले हो क्या ? इस खेल में चोरों की खैर नहीं।
समझे।
बम-फचाका, बम फचाका, बम फचाका ...

रविवार, 28 सितंबर 2008

क्या सच क्या झूठ

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( लेखक स्वतंत्र पत्रकार के साथ-साथ सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं और इन दिनों बाढ़ से ध्वस्त इलाके में घूम रहे हैं। उनकी रिपोर्ट पत्र -पत्रिकाओं में लगातार छप रही हैं .)

रविवार, 21 सितंबर 2008

Utter Negligence

(A damaged spur near kusha breach on 5-09-08 )

Chaos had already been inflicted in Shripur and Western Kushaha when an Indian team led by District Magistrate of Supaul, Bihar Sarif Aalam, arrived at Judhgunj in Sunsari with 10 trucks loaded with wire-nets. Villagers were chasing cattle towards the east while the settlements started getting vacant. People desperately gathered to cross the Koshi on trucks, tractors and whatever they could find and with whatever they could carry with them.
The army did not stop people from entering the Koshi Tappu Wildlife Reserve, which otherwise is prohibited for civilians. On August 18 at around 12.50 noon the Koshi embankments were worn away within six hours of the panic period. While the rate of people, who did not sleep the previous night fearing the floods, fleeing their villages increased, the Indian team that had come to repair the embankment also went back to India along with its equipment.

54 out of 56 sluicegates at the Koshi Barrage were fully opened shortly after the embankments started to wear away. Still, the water flow rate showed no signs of decreasing that day. India’s Ganges Flood Control Commission (GFCC) had already asked Chief Engineer Satyanarayan, in-charge of the Barrage, to return exactly a day before the disaster occurred.

The GFCC had called him back for his blunder of not opening the sluice gates in the Barrage allowing the flood to start submerging the neighbouring area..

According to technicians, the flow of water towards the east increased as the sluice gates were not opened. The embankment could not be repaired on time and the embankment located 12 kilometres upwards the Barrage began to erode. The question is why weren’t the sluice gates opened in time? The Indian party which has full control over the Barrage is silent on this. ? The present state is how to lessen the damage,? said Executive Engineer of GFCC Jain Singh, sent to Nepal by the central government of India.? Rather than pointing out whose fault led to the accident, it?s time to think what we have to do now.?

The Governments are trying to cover up their weakness. A day before the disaster, it tried to submit a letter to the Sunsari District Administration Office (DAO) mentioning that repair work could not be continued because lack of security. The Indian project has accused the Sunsari DAO of not accepting its letter.

After that the project went to another government office in the district and the letter written in Hindi was translated into Nepali. The letter addressed to the Executive Engineer of the Project?s top working committee Awadhesh Kumar on August 17 stressed mainly on three topics:
- Obstacles of labourers in embankment repair must be removed,
- Army mobilised in the Wildlife Reserve must assist in repair work,
- The Wildlife Reserve must help stop the breach by cutting down plants at the areas where embankment breach is taking place.

In the letter, Government accused the Nepali labourers of obstructing the embankment repair work, it also mentioned that the Nepal Army (NA) was being uncooperative. However, the NA has claimed that this is completely untrue. The Indian party accused the NA of not letting the party carry out the repair work because the army men used the area for training and exercise. On the other hand, the NA denied the claim. Meanwhile, incidents like obstruction of work by labourers and stealing of wire-nets are not new in the Koshi area.
Stealing of wire-nets in the embankment along the river is not a new story. A recent example of this is the theft on August 17 in which 2,000 sacks of sand and 60 wire-nets were stolen from near the Koshi Barrage. Over a dozen complaints about the stealing of sacks and installed wire-nets are registered at the Samparka and Bhu-arjan Office, Sunsari.

Signs of trouble
No trouble comes at one?s feet with warning bells. Still, the flowing pattern of the Koshi?s course was not new. There was some reason behind calling the Koshi ?Sorrow of Bihar?, and that is the Koshi can cause damage. Not just that, a team of Indian experts had submitted a report that mentioned that the Koshi was changing its course from the west towards the east for three months.

The report had also asked to pay special attention to the security of the embankment since it could be swept away any time. The team had given the signal based on satellite photographs. However, the government of Bihar remained mute on the warning and did not begin the work on time. No appeals were made to alert India from the Nepali side as well. As a result, it was already very late when repair work started.

The Indian team of experts had pointed out the risk of an arm of the river flowing away from the main stream shortly after the embankment breach. It said that because of sand deposited land inward the embankment was higher than the outward land.

The Indians were very late; this is clear from the Koshi Project requesting Nepal only on August 15 to provide the required help after the Spur 1210 and 1219 RD at the eastern embankment fell into the breach. Mohammed Haaroon, 35, of Judgunj, Sripur-8, says, ?Lalu Prasad Yadav had himself come to inspect the area when there were rumours about the wearing away of the embankment eight years ago.?
Not only did Nepal get into trouble of being inundated after the Koshi?s main course started flowing towards the east, the Koshi Project located at Birpur of India which monitors the Koshi Barrage itself was submerged. Nadir Mohammed of Western Kushaha says, ?We felt that the water may come towards the east due to an increase in its volume, but not that it would eat up the embankment also.?
Earlier, the embankment along the River had been breached at India?s Chandrayan, which lies 40 kilometres down the Barrage, in 1987. However, it was not devastating as this time.
On the viewpoint of the investment, the experts estimated that the embankment repair could be carried out with Rs 2.5 to 3 million if it were carried out on time. However, this time a colossal loss that can never be recovered even by billions of rupees has been inflicted. More than 35,000 people in Sunsari district have been displaced due to inundation.
In the case of Nepal, embankment repair allocation stood at 14,000 and 13,000 cubic metres of stone for the fiscal year 2061/62 and 062/63 respectively. However, in 063/64 allocation stood at only 5,000 cubic metres of stone and in the last fiscal year at only 6,000. The rate of decrease in the use of stone also applies to the use of wire-nets to stop the breach. This is just a minor model of India?s apathy in embankment repair. Idrish Miya of Shripur, Judgunj says, ?There used to be bulks of stone near the Barrage and the embankment earlier. For a year or two nothing is there.? According to the Koshi Treaty, Nepal does not levy taxes on stone used in the embankment while the stone and soil is provided by Nepal itself.
Executive Engineer of the eastern Koshi embankment Birpur, Sukhdev Ram, claims that the work could not be carried out on time due to incidents like protests carried out by the labourers and the army?s exercises. He says, ?Nepal?s customs do not release the materials that are used in embankment repair on time.? He claims that he has already given information to the Sunsari DAO in writing about the problems. However, both the locals and the administration disagree with what the Indians say. Tek Narayan Yadav of Western Kushaha says, ?They (Indian side) bring two nets when 50 are required; when we protest, they claim we didn?t let them work.?
The Nepal-India High Level Committee for Koshi control has declared the time from June 15 to October 15 ?flood period?. The provision mentions that the other time period must be used for monitoring and repair work. The Committee assesses the year?s flood effects, what effect the flood may have the following year, etc. at the time other than the ?flood period?. Based on the Committee?s recommendation, the Delhi government allocates the budget to keep the Koshi flood under control.
According the Koshi Treaty, although the Koshi Barrage is under full control of India, the Nepali side has been participating in the issues of its effect and control. The Nepali side should have said more about a possible breach on that basis; however, that did not happen. Moreover, Nepal should have been more vigilant towards the present disaster that the Koshi floods caused. Besides, the monitoring of the Koshi?s present and possible effects is carried out in the winter, at a time when both the water level and flow rate recedes. According to the locals, whatever groups that come from Patna, India to monitor the Koshi so far, have come in the dry season.
Thus, the water did not recede in the Koshi although most of the sluice gates of the Koshi Barrage were opened. While sand seems to have increased in the western part and the water level is still two meters below the sluice gates (at the time of writing). Electricity generation has been halted at the Kattaiya Power House, which runs by the water brought from the Barrage. Not because of the flood, but the turbine has not be able to rotate as there is no water. The change in the Koshi?s course has inundated India?s Arariya, Madhepura, Supoul and Saharsa districts affecting 2 million Indians. It is clear that India has faced more damages comparatively than Nepal due to the blunder of its own technical experts over the Koshi. The reason being: the river joins the Ganges only after crossing 125 kilometres from the Koshi Barrage. As the river changed its course, the size of the area affected may have matched the length of the river.
Saptakoshi into two courses
In 1953, the Indian government had decided to construct the Koshi Barrage and a year later the Nepal government gave the permission for the construction.
King Mahendra inaugurated the Barrage on April 30, 1959.
The process of diverting the course of the Koshi River into the Barrage started only four years after the inauguration, from March 31, 1963.
Now the river has started flowing towards the east washing away nearly two kilometres of embankment. On the first day of the havoc, the Koshi swept away 270 metres of embankment 12 kilometres up the Barrage. Shortly after 15 hours, the River swept away another 300 metres of embankment again. The swollen river breached another 300 metres within a week. The wiping out of the embankment is still going on.
Technicians say that the river used to flow in the same course it is flowing now about 200 years back. As two kilometres of the embankment has been swept away, it has led to the formation of two courses. One of the courses is on its original route, while the other is again divided into three parts. The largest course is nearby the entrance gate of the Koshi Tappu Wildlife Reserve.
This course has swept away almost 500 metres of the highway and has started flowing over it. About 500 metres east of that course, another arm has been formed that has swept away 50 metres of the highway.
If the Koshi has really changed its course, the tributaries will merge at a distance of 500 metres as both of them continue sweeping away the highway. Besides, the road has been cut in Laukahi to let water flow as the water-level increased in Western Kushaha. Laukahi lies about 15 kilometres away from the Koshi Barrage.
The flow of the water in the Barrage is about 300,000-400,000 cusec during the monsoon. It dropped to 168,000 cusec after breaching the eastern embankment. As large amounts of water in the Koshi started flowing eastward, it has been speculated that the river has changed its course. The highest velocity of water in the Koshi is recorded to be 993,000 cusec, which occurred on August 5, 1968.
What next?
As the effect of the flood is devastating, the Delhi government has sent a different team to Sunsari besides the Koshi Project. This is the most difficult and challenging problem the team led by Chief Engineer L Sanyal has come across. The team also includes Chief Engineer Ram Prasad Ram, Superintendent Engineer SB Ram and Executive Engineer JN Singh. Though the team includes technicians who have worked for different embankments in India, they find this situation new as it damaged the embankment heavily.
The team has been given a primary order to resume transportation immediately along the East-West highway in Sunsari and to decrease the flood effects. The team will carry out aerial and field surveys in the affected areas. It will start working ?upstream? and ?downstream? based on the surveys to stop further embankment breaching. The Indian technicians concluded that work could not be carried out effectively unless the rain abates. ?After all sorts of study, we will come up with short term and long term programmes,? said team member J.N. Singh, ?As the Delhi government is worried, we are using all our resources.? However, because of the inundation, it is quite difficult to even figure out the border area of the two countries.
As per the Koshi Treaty, the Indian government provides compensation for the loss caused by the Koshi inundation. Earlier, when the Koshi inundated Hanumannagar VDC in 1991, India had given compensation after an appraisal as per the agreement in the Treaty. Nevertheless, this time nobody knows the exact loss. All the statistical data obtained so far is based on assumptions only.
Even after a week of the breach, rescue teams have not been able to reach the breached areas (at the time of writing). A rescue team of police personnel had gone missing and were later found in India on the fourth day of the first breaching. Moreover, the flood itself has hindered the estimation of the loss that has occurred.
To redirect Saptakoshi?s courses towards the Barrage, 45 spurs have been constructed along the eastern embankment from Bhantabari to Chakraghatti at a distance of 32 kilometres. Similarly, 15 spurs have been constructed along the western embankment from Bhardaha to Pathari at 12 kilometres. But nobody has paid attention to the condition of the spurs. The problem cannot be solved if the apathy towards embankment repair continues and the condition of all the spurs is not assessed.

(Note- Please read Fortnightly Magazine The public agenda, 17th issue to understand how Nepal's Government violate the Koshi agreement-1954 and they were reluctant as same as Indian Government)

शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

कुहन-खराबे में अपनों की तलाश

(बेलही राहत - स्थल पर अपने परिवार से बिछुड़ी एक महिला )

दहाये हुए देश का दर्द -7
रंजीत

विरक्ति और वैराग्य से भरे किसी क्षण में शायर मीर तकी मीर ने लिख दिया होगा- इस कुहन- खराबे (सुनसान रेगिस्तान) में आबादी न कर मुनीम/ एक शहर नहीं यहां जो सहरा (खण्डहर) न हुआ हो। इन पंक्तियों को लिखते वक्त मीर साहेब ने सोचा भी नहीं होगा कि धरती पर पलक झपकते ही दर्जनों शहर और सैकड़ों बस्तियां कुहन-खरापे में बदल सकते हैं। अगर आज मीर साहेब की आत्मा कोशी अंचल को देख रही होगी तो पूछती होगी कि ये शहर सहरा क्यों हुआ और आबादी कहां गयी मुनीम ? कोई चेहरा तो दिखा जो रोया न हुआ हो।
कोशी की प्रलयंकारी बाढ़ के मारों के गमों-दर्द को शब्दों में बयां करना अब बहुत कठिन होते जा रहा है। राहत-शिविरों, मैदानों, नहरों, खेतों तथा यत्र-तत्र आश्रय लिए हुए लोगों से मिलने के बाद संसार से विरक्ति होने लगती है। क्या आधुनिक मानव-समाज; प्रकृति की श्रेष्ठ रचना- मानवऔर उसके जीवन का यही इष्ट है ? कि पलक झपकते मनुष्य इंसानी जीवन के सारे मुलभूत तौर-तरीके, जरूरत और आवश्यकताओं के बगैर जीने की आदत डाल ले ? कि कीचड़ से सनी झुग्गियों-झोपड़ियों में वे गंदे जानवरों की तरह रहनेे लगे? कि भूख से बिलबिलाते बच्चे पेट दबाकर बेहोश हो जाये और उसे एक कौर निवाला तक न मिल सके ? कि गर्भवती स्त्रियां आने वाले बच्चों से आग्रह करें कि वह कुछ दिनों के लिए अपने जन्म को टाल दे ? कि डायरियाग्रस्त बच्चे माता-पिता की गोदी में कय करते-करते दम तोड़ दें, लेकिन मां-पिता उसे चिकित्सक से दिखाना तो दूर घरेलू दवा तक न पिला सके? अगर मानव-जीवन का यही इष्ट है, तो शायद मौत इससे बेहतर होती होगी !!!
कोई दो दिनों से भूखा है तो कोई तीन दिनों से। कोई खुद बीमार है तो किसी के बच्चे बीमार हैं। कोई आंखें शून्य में अपने विछड़े बंधु-बांधव को तलाश रही है, तो कोई आंखें धरती में जम गयीं हैं। सुपौल के बेलही आश्रय-स्थल (मैं इन झुग्गियों को शिविर नहीं कहूंगा) के आसपास हजारों कराहते-कुहरते मानव समुदायों में मेरी नजर एक अधेड़ महिला पर टिक जाती है। कुछ भी पूछने का साहस नहीं होता, क्योंकि मुझे मालूम है कि मैं इनके गमों को हल्का नहीं कर सकता। फिर भी साहस बटोरकर उसके पास जाता हूं। कुछ पूछने से पहले ही वह महिला, जिसका नाम रेणु देवी है ; रोने लगती हैं। उसे अपने बिछड़े बेटे-बेटियों-दामादों और पति की तलाश है। यह महिला अपने गांव चुन्नी से बाहर निकलते समय नाव तक अपने दो बेटे, एक बेटी और पति के साथ आयी थी। अफरातफरी में वह अपने कुनबे से अलग हो गयी। क्योंकि उस सरकारी नाव में महिला और बच्चों को ही बिठाया गया था। इसके बाद वह बेलही में आश्रय ली हुई है, लेकिन परिवार के बांकी लोगों का कोई अता-पता नहीं है। रेणु देवी कि आंखों से अविरल धारा रूकने का नाम नहीं ले रही। आश्रय-स्थलों में दिन-रात बिता रहे ऐसे लोग अपने को भाग्यशाली मान रहे हैं, जिनके परिवार के सभी सदस्य एक साथ हैं। हर दूसरा व्यक्ति अपनों से अलग होने के गम से दो-चार है। अब जबकि कुसहा हादसा के 32 दिन बीत गये हैं, तब भी किसी सरकारी या गैरसरकारी एजेंसी का इस ओर ध्यान नहीं है। स्थानीय अधिकारियों ने कुछ रटे-रटाये जवाब तैयार कर लिए हैं। सवाल कोई भी हो जवाब यही होगा- मेगा कैंप में शिफ्ट करने के बाद ... यानी जबतक लोग मेगा कैंप में शिफ्ट नहीं हो जाते वे उनके लिए कुछ नहीं कर सकते।
अब मेगा कैंप का हाल जान लीजिए । सहरसा जिला मुख्यालय के पटेल मैदान में बिहार सरकार एक मेगा कैंप चला रही है। हर दिन यहां से न्यूज चैनल का लाइव कवरेज हो रहा है। बड़ी-बड़ी बातें की जा रहीं है। यहां तक कि वे बच्चों के पढ़ने से लेकर मनोरंजन तक की व्यवस्थाओं का दावा करते हैं। इसी पटेल मैदान के बगल में मेरे एक रिश्तेदार का घर है। सुबह से शाम तक कम से कम आठ-दस लोग उनके घर का दरवाजा खटखटाते हैं। एक दिन, दोपहर के समय एक वृद्ध पहुंचते हैं और भोजन की मांग करते हैं। घरवाले उन्हें खाने के लिए देते हैं। वृद्ध को आधा भोजन करने के बाद अचानक जैसे कुछ याद आ जाता है। वह थाली में बचे जूठे भोजन को अंगोछा में बांधने लगता है। मेरे लाख मना करने के बाद भी वह पूरा भोजन नहीं करता है। पूछता हूं - बाबा, आप इस जूठे खाना का क्या करेंगे ? जवाब आता है - बुदरूआ सब के लेल बाबू , द्विव सांझ से भूखले छै (बच्चों के लिए बाबू, दो शाम से भूखा है)! पूछता हूं- कहां ठहरे हुए हैं ? जवाब आता है- पेटेल मीदां में (पटेल मैदान में)।
अंग्रेजी में मेगा का मतलब होता है- महा। मेगा कैंप यानि महा कैंप ! महान कैंपेन !!

गुरुवार, 18 सितंबर 2008

कौन सरकार ? कहां की सरकार ??


दहाये हुए देस का दर्द- 6

रंजीत
राजनीति शास्त्र के पंडितों का कहना है कि तंत्र (लोकतंत्र, राजतंत्र या फिर तानाशाही तंत्र) कोई भी हो, वह चलता है शासन के इकबाल (प्रताप) से । सरकार, हर जगह, हर समय, हर किसी के लिए नहीं हो सकती; लेकिन उसका प्रभाव, उसका हस्तक्षेप आैर उसकी जिम्मेदारी हर जगह नजर आनी चाहिए। दुनिया से राजशाही आैर तानाशाही इसलिए खत्म होती गयी क्योंकि वह लोकोन्मुख नहीं हो सकी। प्रजातंत्र इसलिए फूलता-फैलता गया क्योंकि वह यह भरोसा दिलाने में सफल रहा कि यह तंत्र कम-से-कम लोगों से दूर नहीं होगा आैर लोगों के सुख-दुख में बराबर का हिस्सेदार रहेगा। क्या भारत की विभिन्न सरकारें (कोसी प्रलय के संदर्भ में) इस सिद्धांत की कसाैटी पर खरा उतर रही हैं? खासकर भ्रष्टाचार के दैत्य के उदय के बाद के दाैर में क्या सरकारों को आम लोगों के कष्ट से कोई रागात्मक रिश्ता रह गया है ? क्या यहां की सरकारों का अर्थ, चुनाव जीतने, संसद या विधानसभा में अंकगणित साबित करने तक तो सीमित नहीं होते जा रहा है। यह सवाल अक्सर ही उठता रहता है। अलगाववाद का जन्म इन्हीं सवालों के कोख से होता हैऔर हुआ भी है। उपेक्षित होकर बेटा भी बाप के विरूद्ध खड़ा हो जाता है। भले ही यांित्रक लोकतंत्र के समर्थक इन्हें अन्य चीजों से जोड़ें आैर राज्य शिक्त के बदाैलत अपनी विफलताओं को छिपाने की कोशिश करें।
कोशी अंचल में पिछले दिनों सरकारों की जो भूमिका रही और जो भूमिका वह अभी निभा रही है, उसने उस अंचल के लगभग चालीस लाख लोगों का भरोसा तोड़ दिया है। आप एक सामान्य नागरिक की हैसियत से सुदूर गांवों में जाइये आैर विपदाग्रस्त लोगों की भावनाओं को टटोलिए। विस्थापितों के गुस्से का आलम यह है कि आपसी बातचीत के क्रम में अगर सरकार शब्द का गलती से भी उल्लेख हो जाये तो वे भढ़क उठते हैं। सुपौल जिला के निर्मली गांव के बाढ़पीड़ितों को जब मैंने सरकारी राहत की बात कही, तो वे बुरी तरह भढ़क उठे। उन्होंने हमसे आक्रामक लहजे में सवाल किया- कौन-सी सरकार ? कहां की सरकार ??
यह गुस्सा पानी घटने के साथ-साथ बढ़ता ही जा रहा है। यह पटना-दिल्ली में बैठों को भले ही विचित्र और आशा के विपरीत लगे, लेकिन सच्चाई यही है। यत्र-तत्र सिर छिपाये लोगों को जैसे ही पानी कम होने की सूचना मिल रही है वे बेतहाशा अपने गांवों-घरों की ओर भागे जा रहे हैं। इस उम्मीद के साथ कि देखें तो कहीं उनके माल-मवेशी जिंदा तो नहीं ! उनके घर जमीन पर हैं कि नहीं ! कोशी के कहर से उनके खेतों में लगी फसल आंशिक रूप से भी बच पाये हैं कि नहीं! यानी आशा के खिलाफ भी आशा कर रहे हैं लोग। लेकिन गांव पहुंचते ही उनकी उम्मीदों पर बज्रपात हो जाता है। छातापुर, बसंतपुर, आलमनगर, कुमारखंड, त्रिवेणीगंज, मूर्लीगंज, जदिया और उदाकिशुनगंज जैसे प्रखंडों में घर तो दूर कई गांवों तक को पहचानना मुश्किल हो रहा है। घटते हुए पानी में जो एक चीज उगकर सामने आ रही है वह है- रेत का सफेद मैदान और मवेशियों एवं इनसानों की बिखरी एवं सड़ती हुई लाशें। यानि कहर में बचे लोगों की बची-खुशी आशाए,ं गांव की सीमा में दाखिल होते ही दम तोड़ रही है। एक भयावह भविष्य उनके सामने सुरसा की तरह मुंह बाये खड़ा हो जा रहा है। उजड़े घर कैसे बने? झोपड़ी-झुग्गी बनाकर अगर सिर छिपा भी लिया तो खाओगे क्या? खेत बंजर हो चुके हैं। मवेशियां पानी में बह चुकी हैं। चापानल काम नहीं कर रहा। घर या तो बह गये या रहने लायक नहीं है। संक्रामक बिमारियां घोड़े की रफ्तार में दौड़ रही हैं।
.. . और सरकार ? वह जिला मुख्यालय से बाहर निकल ही नहीं सकती। इनके रहनुमाओं को प्रेस-कैमरा व माइक से फुर्सत नहीं है। घोषणा-दर-घोषणा हो रही है और लोग मारे जा रहे हैं। पहले पानी के कहर से अब बिमारियों से। ऐसा नहीं है कि सरकारी रहनुमा को पता नहीं है कि लोगों को उनकी जरूरत है। उन्हें मालूम है कि बाढ़ पीड़ितों के लिए एक तिनका भी अभी आशियाने के समान है। माचिस की एक तिली भी उनके लिए किसी स्वर्ण-संपदा से कम नहीं है। फिर भी उनकी जनविमुखता कायम है। शायद उन्हें डर है कि कहीं जनाक्रोश उन्हें लील न जाये। जान बचेगी तो राजनीति होती रहेगी। यानी लापरवाही के बाद अब पलायनवाद का सहारा ...
ऐसे में अगर लोगों के बीच जाने की हिम्मत करने वाले पत्रकारों को कौन सरकार और कहां की सरकार जैसे नारे सुनने पड़ रहे हैं तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। सैकड़ों स्थलों पर मैंने खुद स्थानीय प्रतिनिधि- विधायक, संासद, मुखिया, प्रखंड प्रमुख एवं जिला परिषदों के सदस्यों के खिलाफ भदेस गालियां सुनी। सरकारी अधिकारी को स्वतंत्रता प्राप्ति के 62 वर्षों के बाद भी कोसी अंचल के लोग सरकार-बहादुर (अंग्रेज अधिकारी) ही कहते हैं। अगर समय रहते राहत-पुनर्वास का काम युद्ध स्तर पर नहीं हुआ तो ये गालियां स्थायी जनाक्रोश का रूप भी ले सकती है। तब इसके लिए जिम्मेदार कौन होंगे ? समाजशास्त्रियों और विद्ध- जनों को अभी से इसका जवाब ढूंढना चाहिए ताकि कम-से-कम इतिहास तो सही-सही लिखा जा सके।

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

समाज को सलाम

(विस्थापित बच्चों को भोजन कराते सुपौल जिले के सिमराही के पास के गाँव के लोग )

दहाये हुए देस का दर्द -5
रंजीत
विद्वेश, विभेद, विघटन आैर नैतिक पतन की घटनाओं की बेशुमार वृिद्ध के बावजूद हृदय की हस्ती मिटती प्रतीत नहीं होती। कोसी की हाहाकारी बाढ़ के दाैरान जो एकमात्र संतोषजनक व सकारात्मक बात सामने आ रही है, वह है- कोसी क्षेत्र के लोगों का गहरा समाजबोध, आपद-ध्ार्म के निर्वाह का गहरा कत्त्र्ाव्यबोध। हालांकि अपवाद यहां भी है। कुसहा (नेपाल) में पिश्चमी तटबंध को तोड़कर निकली कोशी जब तांडव रूप धारण कर लोगों को राैंद रही थी,जब सारे सरकारी प्रतिनिधि (यहां तक कि लोगों के सबसे नजदीकी प्रतिनिधि मुखिया, प्रखंड प्रमुख आैर जिला परिषद के सदस्य एवं अध्यक्ष तक ने लोगों की फिक्र नहीं की), समूची प्रशासनिक मशीनरी नििष्क्रय बने हुए थे; तब पीड़ितों को बचाने में आसपास का समाज पूरे तन-मन-धन से लगा हुआ था। यह सिलसिला पिछले 18 अगस्त से वहां लगातार जारी है। आज अगर पानी में विलीन हो चुके गांवों के लाखों लोग जिंदा बचे हुए हैं, तो इसका पूरा श्रेय उस क्षेत्र के जिंदा समाज को जाता है,वरना शासन-व्यवस्था ने तो उन्हें उनके रहमोकरम पर छोड़ ही दिया था। कोसी अंचल का ही एक तकियाकलाम है- कोई मरे वाह-वाह, हम जिंदा।
मारने वालों से बचाने वालों का हाथ ज्यादा लंबा होता है, इस कहावत को कोसी के समाज ने चरितार्थ कर दिखाया है। आैर पूरी दुनिया को यह संदेश दिया है कि मानवीय करुणा आैर उसकी जिजीविषा कभी खत्म नहीं होगी, भले ही हुकूमती-भ्रष्टाचार का विषबेल पूरी सृिष्ट को ग्रस ले। सुपाैल जिला के राघोपुर प्रखंड में एक छोटा-सा बाजार है सिमराही। इसकी आबादी महज छह हजार है। गत 19 अगस्त को इस बाजार में पचास हजार लोग शरणार्थी बनकर चले आए और इनकी संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही थी। लेकिन दाद देनी होगी सिमराही के लोगों की हिम्मत की। वे घबराये नहीं, वे भागे भी नहीं और न ही शरणार्थियों के रेले से उनके होश गुम हुए। जबकि खुद सिमराही बाजार पर भी पानी का खतरा लगातार मंडरा रहा था। जिसको जैसे हुआ, जिस चीज से हुआ; पीड़ितों की मदद में भिड़ गये। 6 सितंबर को मैं सिमराही बाजार में था। मैंने देखा कि वहां हर घरों में बाढ़ पीड़ित आश्रय लिए हुए थे। जिसको जैसे बन पड़ रहा था, पीड़ितों की सेवा कर रहे थे। इस बाजार के पूरब में कुछ गांवों में मैंने देखा कि लोग बांस-बल्ली लेकर पीड़ितों के लिए शिविर बनाने में लगे हुए हैं। जबकि सामान्य परििस्थति में इन गांवों में अगर कोई किसी का एक बांस काट ले, तो बड़ी लड़ाई छिड़ जाती है।
कोसी के प्रलय से वीरपुर-मधेपुरा सड़क बच गयी है। इस कारण इस पट्टी के आसपास रहने वाले लगभग दो सौ गांव और एक दर्जन बाजार भी बच गये हैं। इन गांवों और बाजारों में कम से कम सात-आठ लाख पीड़ितों को शरण मिला है। इस पट्टी के गांवों के किसी ग्रामीणों के घर चले जाइये, उनके यहां भारी संख्या में पीड़ित मिल जायेंगे। इनसे पूछिये कि क्या आजतक कोई सरकारी मदद उन तक पहुंची। सच सामने आ जायेगा। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि जिला मुख्यालय में किए जा रहे बड़े-बड़े दावों आैर बाहर से भेजी जा रही सामग्रियों का आखिर हो क्या रहा है ? मुख्यमंत्री आते हैं, जिला मुख्यालय के शिविरों के कुछ बाढ़ पीड़ितों से मिल लेते हैं आैर अधिकारियों के साथ बैठककर प्रेस-कैमरा के सामने खड़ा होकर अपने माथे का पसीना लोगों को दिखा देते हैं। यही अभिनय अन्य मंत्री- महोदय आैर अन्य नेता भी कर रहे हैं। लालू प्रसाद आते हैं तो अपने समर्थकों में से किन्हीं को कैमरा के सामने नोटों की गड्डी थमा देते हैं आैर राहत-मसीहा की पदवी पा लेते हैं। रामविलास पासवान का भी यही हाल। स्थानीय विधायकों का भी यही हाल। मानो तमाम राहत-कार्य प्रेस के माइक आैर कैमरा के मोर्चे पर ही चल रहा हो। अधिकारी भी अपने आका की नकल कर रहे हैं । प्रेस रिपोर्टरों के माइक के सामने लंबी-चाैड़ी राहत प्रवचन बांच देते हैंआैर पता नहीं उसके बाद किस बिल में समा जाते हैं। दुनिया को लगता है कि राहत-कार्य बहुत तेजी से चल रहा है। सरकार को आैर क्या चाहिए ?
सहरसा शहर में मुझे एक महिला (गोबरधनिया) मिली,जहां सदर अस्पताल में डॉक्टरों के सामने एक पांच वर्ष के शिशु का 14 सितंबर को डायरिया से निधन हो गया, क्योंकि उसके मां-पिता के पास बाहर से दवा खरीदकर लाने की क्षमता नहीं थी। वह महिला, शहर के डीबी रोड में चाय की दुकान चलाती है। उसने पिछले 15 दिनों से अपनी दुकान बंद कर रखी है। वह नित सबेरे आसपास के गांवों के किसानों से दूध मांगने के लिए निकल जाती है। हर दिन वह 15-20 लीटर दूध एकत्र कर लेती है आैर वापस आकर बाढ़पीड़ित शिशुओं को बांट देती है। महिला गोबरधनियां कहती हैं- यैह समय छे बाबू किछ पुण्य करै के (यही समय है बाबू कुछ पुण्य कमाने का).. . गोबरधनियां की महानता के सामने मुझे अपना व्यिक्तत्व बहुत छोटा लग रहा है।
हे माई गोबरधन, हम पढ़े-लिखे लोग हैंं। हम आइएएस (देश के टॉप मेरिट), हम नेता (सर्वशिक्तमान), हम विद्वान, हम नीति-निर्माता (सर्वज्ञ) पाप-पुण्य के फेर में नहीं पड़ते। हमारी दुकाने कभी बंद नहीं होंती, न बाढ़ में, न सुखाड़ में, न दंगा न फसाद में...

शनिवार, 13 सितंबर 2008

तार-तार जिंदगी...

(बेचारगी की इंतिहा- सिमराही-प्रतापगंज सड़क- NH 57 पर किसी फरिश्ता का इंतजार करता एक बेघर वृद्ध )
दहाये हुए देस का दर्द -4
रंजीत
बेटे को अच्छे कॉलेज में दाखिला दिलाने का सपना देख रहा था। बेटी तेरह वर्ष की हो गयी है, उसकी पढ़ाई आैर शादी के लिए बड़े-बड़े ख्वाब देख रहा था। इस बार धान की फसल बहुत अच्छी थी। चालीस-पचास हजार की आमदनी की उम्मीद लगाये हुए था। बीच में दो-तीन महीने के लिए गुजरात चला जाता आैर वहां से भी दस-बीस हजार कमाकर ले ही आता। मेरे सारे सपने पूरे हो जाते। लेकिन हाय रे भाग! एक दिन में ही भिखारी बनने पर विवश कर दिया है, लेकिन दुर्भाग्य यह कि आत्मस्वाभिमान भीख भी मांगने नहीं देगा। घर के सारे कपड़े पानी में बह गये। पांच दिन से बीवि-बच्चे एक ही कपड़े में है। न रहने के लिए घर है आैर न खाने के लिए अन्न। आगे क्या होगा ??? अंधेरा, अंधेरा, ... घोर अंधेरा !!!
सुपाैल के राघोपुर रेलवे स्टेशन पर मेरे साथ बाढ़ स्पेशल ट्रेन में सवार हुए उस व्यिक्त ने एक घंटे के सफर में पहली बार अपनी जुबान खोली थी। उसकी मानसिक िस्थति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उपरोक्त दास्तां उसने किससे कही यह डब्बे में सवार किसी भी व्यिक्त को मालूम नहीं हो सका। एक क्षण के लिए मुझे लगा कि जैसे उसने मुझे संबोधित की है, लेकिन जब मैंने उसके चेहरे की ओर देखा तो जाना कि उसे मेरी उपिस्थति का जैसे कोई संज्ञान ही न हो। दरअसल वह किसी से भी मुखातिब नहीं था। उपरोक्त आपबयानी उसका एकालाप था। डॉक्टर लोग कहते हैं कि वेदना के गहरे सागर में डूबा व्यिक्त को देश-काल-पात्र का ज्ञान नहीं रहता। वेदना उसे इतना तड़पाती-तरसाती है कि व्यिक्त रह-रहकर चेतनाशून्य हो जाता है। कुछ देर के बाद मैंने किसी तरह उससे संवाद-संबंध बना लिया। उसका नाम अमरेश झा है आैर कोसी प्रलय से पहले तक उसका पता - ग्राम विशनपुर, प्रखंड- बसंतपुर, जिला- अररिया, बिहार हुआ करता था। फिलहाल वह एक शरणार्थी है, घर छूटने के सात िदन बाद तक उसे कहीं शरण नहीं मिल पाया था। सरकार कहती है कि उसने पर्याप्त राहत शिविर बना लिये हैं। मैं कहता हूं- हा- हा- हा.. .
जिला मुख्यालय के चंद शिविरों के सिवा सरकार ने कहीं भी कोई शिविर नहीं लगाया है। पीड़ितों ने खुद अपने हताश हाथों से सैकड़ों जगह हजारों झुग्गियां बनाई है, हां स्थानीय लोग दिलो-जान से उनकी मदद कर रहे हैं। लेकिन यह अपर्याप्त है। अगर राहत शिविरों की सच्चाई जाननी हो तो सुपाैल के प्रतापगंज-सिमराही सड़क पर चले जाइये। उस सड़क पर कम से कम पचास हजार आदमी शरण लिए हुए हैं। सात अगस्त को मैं उन लोगों के बीच था। लेकिन मुझे दूरदराज क्षेत्रों में कहीं कोई सरकारी शिविर नहीं नजर आया। आसपास के जो लोग इन पीड़ितों के लिए खाने-पीने की जुगाड़ कर रहे हैं, उनके संसाधन धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। पीड़ित मांगकर लाये गये बांस आैर संठी (जूट का तना) आैर फूस से झुग्गी बनाकर किसी तरह उसमें सिर छुपा रहे हैं। ये झुग्गियां ऐसी हैं कि सुख के दिनों में इनमें सूअर भी रहने से इनकार कर दे। प्रतापगंज-सिमराही सड़क पर दुअनिया पूल के पास एक जगह पांच-छह युवक गर्म हो रहे हैं। वे कहते हैं विजेंद्र यादव (जल संसाधन मंत्री, बिहार सरकार) मिल जाय तो उसकी खाल उतारकर चील-गिद्ध को खिला दूंगा। मैंने हस्तक्षेप किया- कि भेलै, किया गरमाय रहलिए ये अहां सब ? सभी युवक एक क्षण के लिए खामोश हो जाते हैं। उसके बाद एक स्वर उभरता है- कुछो नै भाईजी, हमर सबके तकदीर में जे लिखल रहै ओकरा के बांटते ? दूसरा कहता है- अगर जिंदा रैह गेलये ते चुइन-चुइन के गोली माइर देवे - ई मादर... बहान.. . सब के ... मेरा दिल कहता है - एक आैर नार्थइस्ट का जन्म...
सुपाैल-वीरपुर सड़क के समदा चाैक से एक सड़क सीधे 22 आरडी, बड़ी नहर तक जाती है आैर नहर के 22 आरडी स्थित पश्चिमी महार को कोसी नहीं तोड़ सकी। इसको आसपास के ग्रामीणों ने बचा लिया, जिससे राघोपुर, किशनपुर आैर करजाईन बाजार प्रखंड के तीन लाख लोग कहर से बच गये। लेकिन इस नहर के बगल एक मैदान में नहर के पूर्वी इलाकों के गांवों से हजारों लोग शरण लिए हुए हैं। एक 18-20 वर्ष की युवती की आंख रो-रोकर इतना सूख गयी है कि जैसे महीने भर से उनकी आंखों ने नींद नहीं देखी हो। वह अपने मां-बाप,चाचा-चाची, भाई-बहन को खोज रही है जो पता नहीं जिंदा भी हैं कि नहीं। लड़की बहुत डरी हुई थी और उसके चेहरे की भयानकता से मैं भी भयभीत हो गया। जवान लड़की, बिना मां-बाप और समाज के ? वहीं पर बगल में भूख से बिलबिलाते एक आठ वर्ष के बच्चे को जब मैंने बििस्कट दी, तो उसने उसे इस तरह झपटा जैसे लड़के को बििस्कट नहीं कुबेर का खजाना मिल गया हो।
बलुआ बाजार के बगल में बड़ी नहर पर एक शानदार शामियाना लगा हुआ है। उसमें अच्छे कपड़े में एक पूरा परिवार आराम कर रहा है। वे सभी संतुष्ट हैं। बगल में दो बड़ी जीपें आैर एक ट्रैक्टर लगे हुए हैं। पता चला कि ये विशनपुर गांव के मुखिया हैं। अमरेश झा के गांव के मुखिया.. . इन्हें गांव के लोगों के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। कुरेदने पर कोसी की गाथा सुनाने लगते हैं कि कैसे उसके पुरखों ने कोसी को पस्त किये थे। वे उसी पुरखे के संतान है और कोसी को पछाड़ ही देंगे।

गुरुवार, 11 सितंबर 2008

अति प्रभावित इलाका

प्रतापगंज प्रखंड के बेल्ही सड़क पर सर्नार्थियों को तिन दिनों से भोजन नहीं मिला है । परमानंदपुर के पलार पर ५००० लोग खुले आसमान के नीचे भगवान् भरोसे हैं । कुमारखंड और छातापुर प्रखंड के दर्जनों गावों में अभी भी सैकडों लोग फंसे हैं । मवेशी को बचाने का कहीं कोई प्रबंध नहीं है । मेरे एक दर्जन दोस्त - महीम पानी की भेंट चढ़ गए हैं । खुदा हाफिज़ ...



मंगलवार, 2 सितंबर 2008

आसुंओं का सैलाब

दहाये हुए देस का दर्द (3)
रंजीत
कि गलती भेले हमरा से गे माय कोशिकी
किया भेलै एतैक प्रचंड ???
कतैक भौजी के रांड़ बनेले, कतैक बुदरू भेले टूगर
गोहाली में बांधल गैया भासि गेले , द्वार पर सूतल बाबू के कुनू थाह-पता नै
असगर हम जीव कै कि करबै गे कोशिकी मैया
हमरो ले अपने में समाय
कि गलती भेले हमरा से गे माय कोशिकी

(हे कोशी मां, हमसे क्या गलती हुई, किस बात से नाराज होकर तुमने यह प्रचंड रूप धारन कर लिया ? कितनी ही भावियां विधवा हो चुकी हैं, गोशाला में बंधी गायें भसिया गयीं और द्वार पर मेरे पिताजी सोये हुए थे जिनका कोई अता-पता नहीं चल रहा। अब अकेले मैं जिंदा रहकर क्या करूंगी , मुझे भी अपने आगोश में ले लो)
सदियों पुराना यह आंचलिक लोकगीत अब शायद ही किसी को याद हो। मुझे भी यह गीत ठीक से याद नहीं आ रहा। इन पंक्तियों को लिखने के लिए मुझे 25-26 वर्ष पुरानी स्मृतियों में जाना पड़ रहा है। स्मृतियों के धुंधले व उलझे धागे को पकड़ने की कोशिश करता हूं तो कुछ पंक्तियां याद आ जाती हैं। यह गीत मेरी दादी गाती थी, तब शायद हम पांच-छह वर्ष के रहे होंगे। दादी भी आदतन ही यह गीत गुनगुनाती थी और यह गीत उनके जीवन काल में ही अप्रासंगिक हो चुका था,क्योंकि तबतक कोशी को तटबंधों के अंदर कैद किया जा चुका था। लेकिन जब भी दादी यह गाना गाने लगती उनकी आंखें भर आतीं। पड़ोस की दादियां इकट्ठा हो जातीं और साथ मिलकर विलाप करने लगतीं। जिसका मतलब तब हम बच्चे नहीं समझ पाते थे। बाद में समझा कि दादियां इसलिए रोने लगती थीं क्योंकि यह गाना उन्हें कोशी द्वारा दी गयीं मौतें-बीमारियां, दरीद्रता और कष्टों की याद दिला देता था।
आज साठ-सत्तर वर्षों के बाद एक बार फिर यह गीत प्रासंगिक हो गया है। लेकिन कई हजार गुना ज्यादक भयानक और करूण होकर। लगता है कि 30 लाख की आबादी दादियों की एक समूह में परिवर्तित हो गयी है। ये लोग बाढ़ में नहीं डूबे हैं, बल्कि आसुंओं के सैलाब में कोशी मैया डूब गयी हैं। छातापुर प्रखंड के जीबछपुर गांव के मेरे दोस्त रामनारायण मंडल का स्वर डिस्चार्ज होते मोबाइल पर टूट रहा है। 31 अगस्त को कई घंटों के प्रयास के बाद रामनारायण से मेरी बात हो पायी थी। हमलोग एक ही हाइ स्कूल में पढ़े थे। वह पढ़लिखकर किसान बन गया और मैं कलमघिस्सू पत्रकार ! जिनकी कलम न जाने कब नपुंसक हो गयी पता ही नहीं चला। लीजिए आप भी सुन लीजिए एक पत्रकार के मरते हुए मित्र का अंतिम शब्द और पत्रकार की बेबसी, जो सरकार के आंख-कान माने जाते हैं।
रंजीत भाई, आब फेर मुलाकात नै हेत अ... भाई धीरज राखअ, सरकारी नाव पहुचैये वला हेतअ. .. ... आठ दिन भै गेलो हो भाई, नै पीये ले पैन छै, नै पेट में दैय ले दाना, दुनू बुदरू बेर-बेर बेहोश भै रहलै ये, मन हैछे फेक दियै एकरा सब कोशिकी में आउर अपनों कुइद जैपानि में । भाई.. . भाई ... मोबाइल के बैट्री खत्म भै रहल ये , हम सब मैर रहलिअ ये.. . रामनरैन ? ? ?
पेंपेंपें... मोबाइल का बैट्री खत्म, रामनरायण खत्म ! .. . सरवा बड़ा अच्छा फुटबाल खेलता था, रमनरैना !!! । पत्नी पूछती है- ऐं क्या हुआ, कौन था ? ... लगता है माथा में दस पसेरी कोयला का गरदी भर गया है।
फिर साहस नहीं हुआ कि फोन करूं, लालपुर के अरूण को, बेला के विवेक को, लछमिनिया के झिरो को , बलभद्रपुर के मुस्तकिम को .. . लेकिन मोबाइल घिधिंयाते ही जा रहा है। मूर्लीगंज के रामपुर से देवी प्रसाद ने फोन किया है कि वह किसी तरह उसके गांव की सूचना प्रशासन को दे। देवी के गांव में पांच सौ लोग फंसे हुए हैं। बच्चा, औरत, बूढ़ों की स्थिति बहुत खराब है। लेकिन सबके सब लाचार। राजेश्वरी से मनोज मिश्र ने फोन किया है, उसके गांव में दो हजार लोग पानी में फंसे हैं। कच्चा मकान गिरते जा रहा है। गांव में पांच-छह ही पक्के मकान हैं। एक-दो दिनों तक अगर उन्हें नहीं निकाला गया तो सबके सब खत्म। दिमाग काम करना बंद कर देता है। घर में मन नहीं लगता। क्या करूं ? किधर जाऊ ? टेलीविजन खोलूं तो वही दृश्य नहीं खोलूं तो भी वही दृश्य।
चालीस लाख लोगों का सवाल है। कहां जायेंगे वे ? दिमाग कहता है कि एक-डेढ़ लाख तो मर गये होंगे। दिल कहता है - नहीं-नहीं , ऐसा नहीं होगा। कोई न कोई चमत्कार जरूर होगा। किसी को कुछ नहीं होगा। फिर दिमाग कहता है नहीं-नहीं ? पिछले साल देखा नहीं था कि कोशी के पानी में कितना वेग होता है। पांच-पांच मीटर ऊंचा लहर उठता है। भीमपुर, जीवछपुर,सीतापुर, घूरना, कोरियापट्टी , तुलसीपट्टी जैसे सैकड़ों गांव के अस्तित्व मीट चुके होंगे। इसकी तस्वीर कोई कैमरा नहीं उतार सकता, कोई प्रेस रिपोर्टर वहां तक नहीं पहुंच सकता , क्योंकि ये गांवें नदी की मुख्य धारा में आ गयी हैं। अबतक विलीन हो चुकी होंगी ये बस्तियां। कोसी के जोर के सामने फूस के बने ये घरें कितने घंटे टिके होंगे।
टेलीविजन बंद कर देता हूं। मोबाइल ऑफ करके पस्त होकर पड़ जाता हूं। दादियों की झुंडें स्मृति पटल पर तैर जाते हैं। धरती पर नंग-धड़ंग और भूख से बिलबिलाते बच्चों की फौज घूम रहा है। रोती-बिलखती औरतें के दर्द से मानवता मरती नजर आ रही है। मानवता हार रही है। सरकारें जीत रही हैं, उनकी लापरवाही जीत रही है। भ्रष्टाचार जीत रहा है, अधिकारियों और नेताओं के गंठजोड़ जीत रहे हैं ...

शनिवार, 30 अगस्त 2008

तटबंध को बचाओ

(कुसहा के पास तटबंध को बचाने की कोशिश करते स्थानीय लेकिन सरकारी प्रयास नदारद , भीषण रूप लेती कोशी )

टूटे तटबंध की चौडाई लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन सरकार बाँध को बचाने के लिए कुछ खास नहीं कर रही है। कोशी और पुरनिया प्रमंडल के ३५ लाख लोगों को अगर बचाना है तो तटबंध को बांधना ही होगा । दूसरा कोई उपाय नहीं है ।

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

विधवा विलाप छोड़िये और तटबंध को बांधिये


रंजीत
कोशी और पूर्णिया प्रमंडल में आयी अभूतपूर्व और अप्रत्याशित बाढ़ को लेकर अब नेताओं ने विधवा विलाप करना शुरू कर दिया है। बिहार सरकार और उसका प्रशासनिक महकमा राहत और बचाव उपाय छोड़कर मगरमच्छी आंसू बहाने में जुटा हुआ है। नेता और अधिकारी की या तो मति मर गयी है या फिर उनका पुरुषार्थ खत्म हो गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत तमाम हुकूमती अमला इलाके को खाली करने का नपुंसक और तर्कहीन सलाह दे रहे हैं। इतना ही नहीं वे लोगों में पैनिक भी फैला रहे हैं। उनकी मति को शायद लकवा मार गया है या फिर वे राजशी सन्निपात के शिकार हो गये हैं। आखिर उन्हें ये बात समझ में क्यों नहीं आ रही कि जलप्लावित प्रखंडों के सारे सम्पर्क मार्ग खत्म हो चुके हैं। सुपौल, अररिया, मधेपुरा और पूर्णिया जिले के लगभग 20 प्रखंडों के 200 गांवों के सारे सम्पर्क मार्ग घ्वस्त हो चुके हैं। सरकार लोगों को भागने की सलाह दे रही है, क्या आपदाग्रस्त लोगों को सरकार के कहने पर पंख लग जायेंगे कि वे चिड़िया की तरह उड़कर बाहर निकल जायेंगे। न तो लोगों के पास नाव हैं और न ही प्रशासन के पास। तो फिर वे कैसे बाहर निकल जायेंगे? दूसरी बात यह कि जिन क्षेत्रों में पानी नहीं पहुंचा है या जहां से लोग अभी भी निकल सकने की स्थिति में हैं , ऐसे लोगों की संख्या लगभग 14 लाख के करीब है। ये चौदह लाख लोग आखिर कहां जायेंगे ? सहरसा शहर में पचास हजार अतिरिक्त लोगों को समायोजित करने की क्षमता नहीं है, जबकि खुद सहरसा भी महफूज नहीं है। लोग न तो पूरब की ओर जा सकते हैं और न ही दक्षिण और न ही उत्तर की ओर। पश्चिम की ओर जाने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता क्योंकि उधर कोशी का विशाल और अभेद्यय दियारा है। सरकार की सलाह की सच्चाई यही है। दस दिन में जो सरकार दो सौ नावों की भी व्यवस्था नहीं कर सकी वे अगले दो-तीन दिनों में हजारों नाव लाकर लोगों को निकाल लेगी, ऐसी कल्पना कोई विक्षिप्त व्यक्ति भी नहीं कर सकता।
बाढ़ में फंसे लगभग 30 लाख लोगों को जलसमाधि लेने से रोकने का एकमात्र विकल्प है, टूटे तटबंधों की मरम्मत। जबकि इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहाहै। यहां तक कि इसकी बात भी नहीं की जा रही है। ऐसा मान लिया गया है कि तटबंध को अभी बांधा ही नहीं जा सकता। लड़ाई लड़ने से पहले समर्पण करने का ऐसा कायरतापूर्ण मानसिकता भारत के पिछले एक हजार वर्ष के इतिहास में कभी देखा-पढ़ा नहीं गया होगा। आखिर क्यों नहीं बांधा जा सकता 1 लाख क्यूसेक की एक धारा को। जिस देश में समुद्र को बांधने की परियोजना के लिए सरकार तत्पर हो उस देश में नदी की एक धारा को नहीं बांधा जा सकता। ऐसा नहीं है कि इसकी तकनीक मौजूद नहीं है। तकनीक भी है और तरीका भी है। जरूरत है इच्छाशक्ति की। केंद्र सरकार चाहे तो एक सप्ताह के अंदर टूटे तटबंध को बांधा जा सकता है। हां, इसमें अतिरिक्त संसाधन जरूर लगेंगे और सेना के इंजीनियरों की मदद लेनी पड़ेगी। तो क्यों नहीं इसके प्रयास किए जा रहे। चीन के पास टूटे तटबंध को बांधने की उन्नत तकनीक मौजूद है अगर सरकार चाहे तो उससे भी मदद ली जा सकती है। लेकिन किसी को फिकर नहीं है। क्या यह बिहार का मामला है इसलिए या फिर यह ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के लोगों का कष्ट है इसलिए ? सरकार का रुख देखकर तो ऐसा ही लगता है। मुंबई में बरसाती पानी से बाढ़ आ जाती है तो पूरा देश उसकी राहत में लग जाता है। लेकिन बिहार में 30 लाख लोग मौत के कगार पर खड़े हैं, लेकिन केंद्र सरकार के कानों पर जू तक नहीं रेंग रही।

सोमवार, 25 अगस्त 2008

हजारों मरे, लाखों जान खतरे में

रंजीत
सुनामी ! जी हां, नदीनिर्मित सुनामी !! सरकार निर्मित सुनामी !!! कल ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बाढ़ प्रभावित इलाका का दौरा किया था , लेकिन उनके अधिकारियों को शायद भयानक दृष्टिदोष हो गया था या फिर उन्होंने गांधारी की तरह आंख पर पट्टी बांध ली थी कि उन्हें हजारों की संख्या में बहती लाशें नहीं दिखी। फारबिसगंज से एक बाढ़ प्रभावित ने बताया है कि तिलावे धार से होकर दर्जनों की संख्या में लाशें बह रही हैं। ये लाशें तटबंध टूटने के बाद विकसित हुई मुख्य धारा के आसपास के गांवों की हैं। ऐसे तो भयानक रूप से प्रभावित बसंतपुर अनुमंडल से लेकर ग्वालपाड़ा तक के इलाके की फोन सेवाएं ध्वस्त हो चुकीं हैं और इसके कारण वास्तविक तस्वीर से पूरी दुनिया अज्ञात हैं। लेकिन विभिन्न स्रोतों से जो खबर मुझे मिल रही है उसके मुताबिक बसंतपुर से ग्वालपाड़ा के बीच अवस्थित लगभग तीन सौ गांवों में भारी जानमाल की हानि हो चुकी है। क्योंकि ये क्षेत्र नदी के उदर में समा चुके हैं। वीरपुर, भीमनगर शहर और सीतापुर, बबुआन, घूरना, तिलाठी, टड़हा, कोरियापट्टी,बलुआ बाजार, छातापुर, राजेश्वरी जैसे गांवों में अबतक सैकड़ों मौतें हो चुकी है। लगभग सभी मीडिया हाउस के रिपोर्टर पूर्णिया शहर में कैंप किए हुए हैं, जहां से हादसे की सही तस्वीर का पता लगाना असंभव है। सभी मीडिया हाउस अनुमान के आधार पर समाचार दे रहे हैं, क्योंकि स्थानीय रिपोर्टर से उनका संबंध स्थापित होना नामुमकिन है। लेकिन सरकार को कुछ भी नहीं दिख रही। न ही राज्य सरकार को और न ही केंद्र सरकार को ! यह महाशक्ति बनने का दावा करने वाले भारत का सच है कि वह एक तटबंध को नहीं बचा पा रहा।

सरकारों कुछ करो !!!

दहाये हुए देस का दर्द (भाग-2)
रंजीत
नेपाल में कुसहा के पास पूर्वी कोशी तटबंध के टूटने से बिहार के कोशी और पूर्णिया प्रमंडल के जिले- सहरसा, सुपौल, अररिया, मधेपुरा , पूर्णिया में अभूतपूर्व बाढ़ आ गयी है । इस बाढ़ का चरित्र और इससे हो रही तबाही उत्तर बिहार में हर बर्ष आने वाली नियमित बाढ़ के चरित्र और तबाही से पूरी तरह अलग है , जबकि राज्य और केंद्र सरकार इसे नियमित बाढ़ की माइंड सेट में देख रही है। तटबंधों के अंदर कैद पानी समुद्री तूफान की तरह नेपाल के दो जिलों के लगभग 100 गांवों के अलावा कोशी और पूर्णिया प्रमंडल के सैकड़ों गांवाें में घूस रहा है, जहां तटबंध निर्माण के बाद पिछले 50 वर्षोसे बाढ़ नहीं आ रही थी। पानी की तेज प्रवाह के कारण लगातार टूटे हुए तटबंध की चौड़ाई बढ़ रही है और कोशी नदी का 95 प्रतिशत पानी टूटे तटबंधों से बहने लगा है। इस कारण सैकड़ों गांवों में अथाह जल प्रवेश कर रहा है और लगातार प्रभावित क्षेत्रों का क्षेत्रफल बढ़ रहा है। इसे प्राकृतिक आपदा से ज्यादा मानव निर्मित आपदा कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा। क्योंिक कोशी नदी के विशेष जल चरित्र (हाइड्रोलॉजी) और विशेष भूगोल को जानने के बावजूद सरकार ने लापरवाही बरती। उल्लेखनीय है कि कोशी नदी में बड़े पैमाने पर सिल्टिंग होती है। इस कारण इसकी धाराएं खिसकती रहती हैं। चूकि कोशी बाराज के पास पानी को रोका जाता है इसलिए बाराज से उत्तर में नदी के बेड लगातार सिल्टिंग के कारण उठते रहते हैं। प्रावधानों के अनुसार बेड की टोपोग्राफी को संतुलित रखने के लिए हर वर्ष अतिरिक्त सिल्टिंग को हटाया जाना चाहिए। लेकिन विगत 20 वर्षों से इस कार्य में भारी लापरवाही बरती गयी। कोशी प्रोजेक्ट लगभग एक दशक से डिफंग है । इसके परिणामस्वरूप तटबंधों के रखरखाव में भारी उदासीनता बरती गयी।
अब जब नदी ने बाराज से उत्तर ही तटबंध को तोड़ दियाा है तो नदी की दक्षिण की ओर निकासी लगभग स्थिर हो गयी है। इसका मतलब यह हुआ कि कोशी और पुर्णिया प्रमंडल में रातों-रात एक नई नदी पैदा हो गयी। अगर किसी सूखे क्षेत्र में अचानक कोई नदी उतर आये तो जो स्थिति हो सकती है कुछ वैसी ही कुछ स्थिति इन दिनों इन क्षेत्रों की है। दूसरी ओर हादसा के एक सप्ताह बाद तक टूटे तटबंध की मरम्मत में भारी लापरवाही बरती गयी। बात को टालने के लिए नेपाल सरकार पर असहयोग का आरोप लगा दिया गया। जबिक वही समय था जब टूटे तटबंध की मरम्मत की जा सकती थी। अब स्थिति इतनी विकराल हो गयी है कि केंद्रीय हस्तक्षेप और विश्व की उन्नत से उन्नत तकनीक का सहारा लिए बगैर नवंबर से पहले टूटे तटबंध को दुरूस्त करना और नदी को अपने पुराने कोर्स में लाना असंभव है। बिहार सरकार स्थिति के विकरालता को अविलंब केंद्र सरकार के पास रखे और अपनी पूरी शक्ति लगाकर तटबंध को मरम्मत करें। इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय मदद से भी परहेज नहीं किया जाना चाहिए। नीतीश जी, आप खुद अभियंता हैं, आप स्थिति को समझने की कोशिश कीजिए अन्यथा इतिहास आप लोगों को कभी माफ नहीं करेगा। यह राजनीति नहीं पुरुषार्थ की परीक्षा का समय है।
अगर ऐसा नहीं हुआ तो आगे क्या होगा, इसकी कल्पना से ही किसी जानकार के रोंगटे कांप जा रहे हैं। क्योंकि रिकार्ड के अनुसार कोशी नदी में सितंबर में सबसे ज्यादा पानी निष्कासित होता है। कभी-कभी यह 10 लाख क्यूसेक तक पहुंच जाता है। अभी नदी में महज 1 लाख क्यूसेक पानी ही डिस्चार्ज हो रहा हैऔर इतने पानी ही सैकड़ों गांवों को लील चुका है अगर 10 लाख क्यूसेक पानी टूटे तटबंधों से बहने लगेगा तो इन चारों जिलों के कई गांव और शहर बाद में ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे।

(भाग २ में हम किन्हीं कारणवश कोशी का वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं कर पा रहे हैं , लेकिन यह हम जल्द आपके पास लेकर आयेंगे )

शुक्रवार, 22 अगस्त 2008

‘Non-maintenance by India led to Koshi havoc’

BY THIRA L BHUSAL
KATHMANDU, Aug 23 - A high-level government team that inspected areas devastated by the flooded Koshi River has held India responsible for the havoc. The devastation took place as the Indian side did not carry out repair and maintenance work on the Koshi barrage and the embankment along the river, thereby violating the Nepal-India Koshi agreement, said top officials. India is entirely responsible for repair and maintenance work and operation of the barrage, as per the bilateral agreement signed in 1954. "Every year in the past the Indian side used to do at least some maintenance work. But this year they did not carry out the repairs," Khom Raj Dahal, Deputy Director General of the Department of Water Induced Disaster Prevention (DWIDP), told the Post. "This was the main reason why the Koshi breached the embankment and submerged about 10,000 hectares of cultivated land and villages." The Indian side used to contact the Regional Directorate of the Department of Irrigation (DoI) in Biratnagar. The DoI plays a facilitating role as and when requested by the Indian teams. "But, this year they did not contact the DoI regional office" Dahal said.
However, issuing a strongly worded press statement on the matter Tuesday, the Indian embassy in Kathmandu blamed Nepali authorities for the disaster. "The Indian technical team mobilized required resources and has remained in readiness to carry out the required work to strengthen the embankment but it was prevented from reaching the site. As a consequence, thousands of people in Nepal and India have been forced to suffer a calamity that could have been avoided," the embassy said.
When the Indian technical team arrived at the Koshi River as in past years, it was too late to control the situation, according to Dahal. "They arrived there when the river had already started damaging the spurs whereas the maintenance work should have been done before the monsoon to prevent such a tragedy," he added. Another major reason for the river's diversion is the increasing level of the riverbed. "The riverbed is two to three meters higher than the countryside (areas outside of embankment)," Dahal said. About 32 kilometer stretch of the embankment from the Koshi barrage to Chakraghatti is in a vulnerable condition. "Thorough reconstruction of that total area is the permanent solution," he added. After bilateral talks an Indian team has agreed to immediately start work at the site. The two sides have reached a seven-point agreement. Deputy Director General of DoI Anil Kumar Pokharel led the Nepali delegation. Dahal of DWIDP, Regional Director of DoI Kamal Prasad Regmi and Senior Divisional Engineers Hemant Kumar Jha and Basistha Raj Adhikari were members of the Nepali team. Likewise, the Deputy Secretary of Water Resource Department of the Government of Bihar led the six-member team of India.
The Nepali side has agreed to back the Indian team in establishing link and access roads to the damaged areas. For that, the displaced people who have been staying along the safe embankment areas need to be relocated to safer places. The embankment areas are also being used as roads. Nepali authorities will help establish roads through the Koshi Tappu Wildlife Reserve, Dahal informed. Then only will the Indian side start reinstatement of the damaged areas. "The reconstruction work needs to be completed prior to the monsoon in 2009 so as to avoid any disaster next year," Dahal said.
Embankment not permanent solution: Expert
Ajay Dixit, Director of the Nepal Water Conservation Foundation, has said that there is a need for rethinking the very concept of building embankments for flood control. "Embankment is an easy way to address flooding but not a sustainable solution. The notion that technology can solve all types of problems is wrong," Dixit told the Post, adding, "Preventing water from its natural flow is not a permanent solution but to give it an outlet is the right way. Drainage or other types of outlets can be better options." Hydro expert Dixit, suggested that the concept of an open basin allowing a river's main course to expand to its flood plain may be a better option.
(यह स्टोरी कांतिपुर डॉट कॉम से साभार है और इसे प्रकाशित करने का उद्देश्य यह है की लोग नेपाल सरकार का पक्ष भी जान सके )

दहाये हुए देस का दर्द (भाग-1)

रंजीत
लगभग साठ वर्षों के बाद एक बार फिर सुपौल, अररिया, मधेपुरा , पुर्णिया और किशनगंज जिले के लोग कोशी मैया का कहर झेल रहे हैं। कोशी के कहर की जो कहानियां नवतुरिया लोग दादा-दादी और नाना-नानी की जुबानी सुनते थे उसे बिहार और नेपाल सरकार ने अपने संयुक्त लापरवाही से 17 अगस्त, 2008 को प्रत्यक्ष जमीन पर मंचित करके दिखा दिया। उसके बाद क्या होना था? कोशी तो तांडवी के नाम से प्रसिद्ध है ही; 60 वर्षों के बाद जब उसे एक बार फिर अपने पुराने अखाड़े मिले तो वह जमकर, कहर बरपाकर एवं बिजली गिराकर नाची। .. . लो और करो मुझे तटबंधों में कैद ! डायन कोशी की पदवी तो तुमलोगों ने मुझे एक सदी पूर्व ही दे दी थी अब देखो मेरा चुड़ैल रूप ! मेरे राह में जो आओगे, सबको दहा-बहा लूंगी। क्या सड़क , क्या नहर, क्या शहर, क्या गांव ; सब मेरे उफान में भसिया जाओगे। मैं बौराकर घुमूंगी और बौआती-ढहनाती हुई कितने को अपने साथ ले जाऊंगीइसका ठीक-ठीक मुझे भी कोई आइडिया नहीं । एक तो मुझे कैद करते हो दूजा डायन की उपाधि देते हो तीजा मेरे नाम पर करोड़ों रुपये का आवंटन कराकर मौज करते हो। मैं तो सिर्फ बदनाम हूं, तुम तो भ्रष्ट और धोखेबाज भी हो। मुझे कैद तो कर दिया, लेकिन अपने जंग खाये सीखचों की ओर कभी झांका तक नहीं। पिछले २० वर्षों में तुमलोगों ने एक कुदाली मिट्टी भी अपने तथाकथित ताकतवर तटबंधों पर डाली क्या ? कभी गौर से देखा कि जिस तटबंध के बल पर तुम मुझे कैद करने का गुमान पाल रहे हो वह मेड़ में तब्दील हो चुका है। मैंने तो कई बार कहा कि देखो अब मुझे और मत ललचाओ, तुम्हारे इस मेड़ सरीखे, जर्जर और जंग खाये तटबंधों को मैं कभी भी लांघ जाऊंगी। अगर मुझे नियंतित्र रखना है तो इन सीखचों को दुरूस्त कर लो, लेकिन तुम तो मेरी ताकत आकने पर आमदा थे। तो लो अब देखो मेरी ताकत और झेलो मेरा तांडव। ताक धिनादिन ता.. . गिरगिरररर, गरगररररर, ताक धिनादिन ता.. . भरररर, भर्रर्रररररर-भराकअअअ, भड़ाककक... गिरगिरगिर ...
हुआ भी यही। 16 अगस्त को जो बच्चे मैदान में बैट-बॉल खेल रहे थे वे 17 अगस्त की सुबह अपने मां-बाप के साथ भसियाये भैंस की तरह सुरक्षित स्थल तलाश रहे थे। सुरक्षित बचे लोग कोशकी देवी की किंवदंती सुनने-सुनाने लगे। दर्जनों बच्चे दूध के अभाव में स्थायी रूप से मूंह बा गये। बलुआ बाजार में 15 लोग एक साथ दहा गये और नरपतगंज के चैनपुर इलाके में 150 लोग एक ऊंचे स्थल पर पानी की मार खाकर सुस्ता रहे थे। लेकिन दबाड़ते-दहाड़ते वहां भी पहुंच गयी कोशिकी मैया और डेढ़ो सौ लोग पलक झपकते गायब ! ताक धिनादिन ता ... गिरगिररर, गरगरररर...
नेपाल के कुसहा में तटबंध तोड़कर निकली कोशी, तो पूरब की ओर नेपाले-नेपाल 40 किलोमीटर तक सरपट दौड़ती चली गयी। तब अचानक उसने फैसला किया कि अब और पूरब की ओर नहीं जाना, अब नेपाल में नहीं बहना ! फिर क्या था, मुड़ गयी दक्षिण की ओर । उसके बाद अररिया जिला के फारबिसगंज से लेकर सुपौल के राघोपुर तक के इलाके उसकी खूर-पेट में आ गये। अररिया जिले के घूरना,मुक्तापुर, भदेसर, बसमतिया, बलुआ, विशनपुर, वतनाहा इलाके को उसने एक ही रात में रौंद कर रख दिया। उसके बाद निशाने पर आये सुपौल और पुरनिया जिला के सैकड़ों गांव। प्रतापगंज, छातापुर प्रखंड में डूबा पानी फैल गया। बचके कहां जाओगे बच्चू ? गिरिधरपट्टी, ललितग्राम, मधुबनी, अरराहा, निर्मली, गोविंदपुर, श्रीपुर, बरमोतरा, जयनगरा, सूर्यापुर, तिलाथी , चुनी जैसे गांव के हजारों स्त्री-पुरुषों को उसने अपना जल- जलवा दिखाया। साठ बर्ष बाद नैहर लौटी हूं, तामझाम, धूम-धड़ाका तो होगा ही... गिरगिररर, ताक धिनादिन ता.. . तीसरे दिन उसके निशाने पर था- जिला मधेपुरा। मधेपुरा को पारकर ही वह शांत होती। इसलिए इस जिले के कुमारखंड, त्रिवेणीगंज, मूर्लीगंज, जदिया और उदाकिशुनगंज इलाके को नदी ने पूरी तरह से जलप्लावित कर लिया।
शुरू में एक-दो दिनों तक तो नेता-हाकिम राहत उपाय के बड़े-बड़े दावे करते रहे। उ अंग्रेजी नाम वाले विभाग के मंत्री को बहुत कुछ निर्देश भी दिया गया , आखिर उसी के चाचा (स्व. ललित नारायण मिश्र) ने तो कोशी को कैद करवाया था ... शायद इसलिए... लेकिन तीन दिनों के बाद उनके सारे दावे, बोलम-बच्नम , हवा-हवाई हो गये। सूबे के वजीरेआलम ने हेलीकॉप्टर उड़ा लिए, कहीं-कहीं एक दो जगह पैकट गिरा दिया गया और उसके बाद कवायद खत्म। घंटी बजावो और आरती ले लो । मानो वे मन ही मन कह रहे हों- कौन जाये उ डनियाही कोशिकी के फेर में पड़ने। सा... बात-बात पर मारने-डूबाने, बहाने और काट खाने की बात करने लगती है। जेकर करम ठीक होगा उ तो बचिए जायेगा। वैसे भी कौशिकी देवी के हाथों मरेगा तो सीधे बैकुंठ पहुंचेगा। वैसे भी मरम्मत के नाम पर हमलोगों को साइट विजिट करना ही है। अब तो टेंडर पास होने के बाद ही जायेंगे। तभिये कोशी के दर्शनो कर लेंगे और ? हें-हें-हे...! ऐसे भी कोशिकी उतनी निर्दयी नहीं है , जब भी उपद्रव करती है तो हमलोगों को बहुत कुछ देकर जाती है। दुहाई मैया कोशिकी.. .
(भाग- 2 में कोशी और उस क्षेत्र के भूगोल के बारे में पढ़े, जिसके द्वारा हम इस नदी की विचित्रता के वैज्ञानिक कारण जानने का प्रयास करेंगे )

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

आदमखोर अधिकारी, बेपरवाह सरकार

बिहार सरकार झूठ बोल रही है । उसके अधिकारियों ने झूठी जाँच रिपोर्ट दी और कहा की कोशी बाँध को कोई खतरा नहीं है जबकि बाँध में दरार मौजूद थे । ये अधिकारी लाखों लोगों की जान और घोर कष्ट के जिम्मेवार हैं ।

(... और जमकर उतरा गुस्सा ! अररिया जिला के नरपतगंज के विधायक जनार्दन यादव की बाढ़ पीडितों ने पिटाई कर दी )

(दुहाई माई कोशिकी ! जल में डूबा नेपाल का हरिपुर इलाका )


(कहाँ जायें ? बाढ़ में फंसे नेपाल के सुनसरी जिला के श्रीपुर गावं के लाचार बाशिंदे )

(सुपौल जिले के नेपाल सीमा के निकट स्थित गावं में बाढ़ में फंसी हताश महिलाएं )

बुधवार, 20 अगस्त 2008

और तटबंध टूट गया !



(आशियाने की तलाश में भटकते बाढ़ में फंसे सुपौल जिले के बीरपुर के आसपास के गावों के लोग )

कोशी नदी के पूर्वी तटबंध के टूटने से नेपाल और बिहार के कोशी एवं पुरनिया कमिश्नरी के लाखों लोग पानी से घिर गए हैं । सुपौल जिला के बीरपुर अनुमंडल के सैकड़ों गावों के लोग भारी संकट में हैं , लेकिन प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठे है। बाँध क्यों टूटा ? यह सवाल हर कोई जानना चाहेगा , यह टूटा या फ़िर इसे तोड़ दिया गया ? नेपाल और केन्द्र के पाले में गेंद फेककर राज्य सरकार बच नहीं सकती। अगर अबिलम्ब युद्ध पैमाने पर रहत कार्य शुरू नहीं किया गया तो हजारो लोग काल के गाल में समां जायंगे ।

मंगलवार, 19 अगस्त 2008

एक आदिम सच की तरह

रंजीत
यह तथ्य हमारे गांवों की है जिसकी पुष्टि गत दिनों इंग्लैंड के ससेक्स और कैंट शहर में हुई। इंग्लैंड के इकोनोमिक एंड सोशल रिसर्च काउंसिल के समाज शास्त्री रूपर्ट ब्राउन ने गत दिनों अपने एक वर्ष के गहन अनुसंधान का निचोड़ रखते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को कट्टर या सेकुलर (धर्मनिरपेक्ष) बनाने में प्राथमिक विद्यालयों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है। ब्राउन साहेब ने आनुसंधानिक सर्वेक्षण के हवाले से कहा कि अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, उच्च जाति, निम्न जाति जैसी भावनाएं अगर बाल्यावस्था में एक बार पैदा हो गयीं तो वे ताजिन्दगी खत्म नहीं होंती। अगर किसी तरह चेतन मन से ये भावनाएं गायब भी हो गयीं तो भी अवचेतन में वे जिंदा रहती हैं और समय-समय पर पूर्वाग्रहपूर्ण व्यवहार के द्वारा अभिव्यक्त होती रहती हैं। प्राथमिक विद्यालय वह मंच है जहां बच्चों को ऐसी परिस्थितियों से सीधा सामना होता है , जहां वे विभिन्न जाति, धर्म और नस्लीय समुदायों के साथ साझा समय व्यतीत करते हैं। अगर विद्यालय का माहौल सेकुलर हुआ तो बच्चे के सेकुलर होने की संभावना काफी ज्यादा होती है। अगर माहौल उलट रहा तो भेदभाव की ग्रंथियां विकसित होने की भी पूरी संभावना रहती है।
जी हां, बाउन साहेब आप सही कह रहे हैं।आप सौ फीसदी सही फरमा रहे हैं। यह सर्वेक्षण अचानक मुझे अपने गांवों के पुराने प्राथमिक विद्यालय और मध्य विद्यालय की याद दिला गया। जहां नौवें वर्ग तक हमलोग अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, बैकवर्ड और फारवर्ड जैसे शब्दों से अपरिचित थे। हमलोग आपस में लड़ते-झगड़ते जरूर थे, लेकिन ऐसा एक भी वाकया मुझे याद नहीं आ रहा है जब हमने जाति या धर्म की किसी बात पर लड़ाई, झगड़ा या गुटबंदी की हो। दिमाग पर लाख जोर देने के बाद भी किसी शिक्षक का कोई ऐसा व्यवहार या वाणी याद नहीं आता जिनमें जाति या धर्म की कोई बू रही हो। हमारे शिक्षक छात्र-छात्राओं को उपनाम जरूर देते थे, लेकिन वे विद्यार्थियों की जाति या धर्म के सूचक नहीं होते थे बल्कि उनके बाह्य गुण-अवगुण के सूचक होते थे। मुझे गणित के शिक्षक मोहमद खुरशीद आलम (सर) याद आते हैं- वे तीव्र बुद्धि के इंसान थे और उनसे बड़ा सेकुलर व्यक्ति मैंने अपने जीवन में दूसरा नहीं देखा। वे वात्सल्य की प्रतिमूर्ति थे। वे संयोगवश भी किन्हीं विद्यार्थियों को उनके वास्तविक नाम से नहीं पुकारते थे। किसी को विभीषण कहते तो किसी को तेलचट्टा तो किसी को बनसियार, किसी को भूतनाथ तो किसी को गोनू झा तो किसी को मियां नसीरुद्दीन। उन्होंने एक दिन पान की एक दुकान पर पान खाते समय खड़े-खड़े घोषणा कर दी कि अगर बोर्ड की परीक्षा साफ-सुथरी हुई तो उनके पचास छात्र और दस छात्राएं ही पास कर पायेंगेऔर प्रथम श्रेणी में सिर्फ एक लड़का ही पास करेगा। मास्टर साहेब की यह सार्वजनिक घोषणा उनके बगल में खड़े इलाके के एक दबंग को पसंद नहीं आया और उसने उन पर एक जाति विशेष की तरफदारी करने का आरोप जड़ दिया। यह बात मास्टर साहेब को इतनी बुरी लगी कि उन्होंने उस व्यक्ति से कभी बात नहीं करने की कसम ले ली। वह व्यक्ति कालांतर में विधायक और मंत्री तक बन गये, लेकिन खुरसीद आलम सर ने उनसे कभी बात नहीं की।
हालांकि आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। जातिवाद और धर्मवाद की गंदी राजनीति उन विद्यालयों में भी सांप्रदायिकता की बीज पहुंचा चुकी है। प्राथमिक कक्षा के छात्र भी बैकवर्ड, फारवर्ड, मंदिर- मस्जिद , दंगा -फसाद के मायने समझने लगे हैं। मुझे एक अन्य घटना याद आती है। तब हम आठवें वर्ग के छात्र थे और उन दिनों भागलपुर में भीषण सांप्रदायिक दंगा हो रहा था। एक दिन हमारे वर्ग के एक छात्र ने समाज शास्त्र के शिक्षक से पूछ डाला था- दंगा क्या होता है, मास्टर साहेब ? मास्टर साहब ने इसका उत्तर कुछ यूं दिया था- जब आदमीपर पागलपन का भूत सवार हो जाता है तो वह दंगा करने लगता है .. .
मैट्रिक पास करने के बाद कॉलेज में प्रवेश किया तो पहली बार अगड़ा-पिछड़ा, मंदिर-मस्जिद का अर्थ समझ में आया। इस दौरान उच्च शिक्षा के दौरान विश्वविद्यालय और कॉलेजों में कई अवसरों पर विभिन्न गुटों में शामिल कराया गयाया मजबूरी और जिज्ञाशा में खुद भी शामिल हुआ। कभी जाति के आधार पर तो कभी धर्म के आधार पर। लेकिन मुझे ये गुट कभी रास नहीं आये। आज सोचता हूं कि आखिर यह कैसे संभव है कि मैं आज भी अपने कई दोस्तों की जाति नहीं जानता। जबकि कुछ के साथ दोस्ती हुये कई वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन मैं उनकी जाति नहीं जानता। .. . शायद मेरे विद्यालय मेरे साथ चल रहे हैं, कर्म में भी और वचन में भी और जीवन में भी .. . एक आदिम सच की तरह यह मेरे जीवन में शामिल है। हमेशा, हमेशा, हमेशा .... किसी को हो न हो भारत को तो इसपर जरूर फक्र होगा।

सोमवार, 4 अगस्त 2008

'restaurant' for vultures



By Charles Haviland BBC News, Nawalparasi, Nepal
As the early morning mist lifts on the farmlands at the edge of the jungle, Yam Bahadur Nepali embarks on a job which many would find difficult but which, for him, is a regular chore.
He wheels his tricycle cart to collect the carcass of an old and sick cow which died during the night. It is to be fed to the vultures, under a unique initiative to conserve the scavenging birds. It is called the "vulture restaurant".
With some difficulty Yam Bahadur and his wife wheel the heavy beast past houses and down across wet paddy fields to the vulture feeding area.
The "restaurant" is a big grassy area surrounded by tall, fragrant sal trees. The peaceful scene is broken only by the cattle skeletons scattered around - and the vultures nestled above.
'Kidney failure'
Nepali ornithologists have established it as a place where vultures can eat healthily.
Two of the seven vulture species in the Indian subcontinent - slender-billed and white-rumped - have declined catastrophically in number and are now endangered, explained ornithologist Dhan Bahadur "DB" Chaudhary.
[Vultures] are ugly looking, but they are really helpful for us Dhan Bahadur Chaudhary, Nepali ornithologist
"In 1997 in eastern parts of Nepal there were about 67 nests," he says. "And in four or five years, in 2001, there was zero.
"So that rapidly they declined from India, Nepal and Pakistan. And over 12 years they started declining - now more than 95% of the vultures' number has gone down."
Scientists recently pinpointed the cause - the drug, diclofenac.
Farmers often give it to their cows as a painkiller. But if the cows die soon afterwards, the drug is deadly for the vultures which feed on their flesh. Mr Chaudhary says they rapidly die of kidney failure and gout.
As Hem Sagar Baral, executive director of Bird Conservation Nepal (BCN) explains, Nepal and India have now banned diclofenac because it was harming the vultures. It has been replaced by a safe drug called meloxicam.
"It is also anti-inflammatory but has been tested against vultures and other birds of prey and general birds and does not cause damage to these birds," he says.
'Massive creature'
As Yam Bahadur skins the carcass, we go into a spacious, brand-new observation hide. With us are several of the villagers who serve as volunteers on the project committee. We watch as the vultures wait.
After half an hour we are still waiting. A stray dog starts feeding on the carcass but seems worried and keeps barking.
The birds gain confidence and 22 of them land, still just watching the dog. Nearly all are the endangered White-rumped Vultures but there is also a massive creature - the biggest, the Himalayan Griffon Vulture.
They look like a rather grotesque gathering of clergymen with their blackish coats and white "collars".
Then, suddenly, they close in on the cow's corpse. It is like a rugby scrum of vultures, all wanting to gorge on the carcass, fighting with each other, the strongest in front, the weaker behind.
One vulture attacks another which has a long strand of raw meat dangling from its mouth, already half-swallowed.
The scavenging birds jump clumsily around, their wings outstretched. I tell Mr Chaudhary I think they are truly ugly animals.
"Yes, they are ugly looking, but they are really helpful for us," he says. "See - within half an hour they finished eating all that dead animal. Only the skeleton is left. It is really helpful to clean the nature."
Nepalis even nickname these birds "kuchikar", meaning a broom.
The villagers on the project's committee are engrossed by the spectacle. One is a woman farmer, Tila Devi Bhusal.
'Preserve them'
"Traditionally we see the vulture as a very bad bird," she says. "If it passes your house, then the house has to be purified. They can bring danger.
"But that belief is disappearing. People realise that vultures eat rotten things and we must preserve them."
The vulture restaurant has many volunteers but only two full-time employees.
One is Yam Bahadur who looks after the cows when they are living, not only when they die.
The project buys elderly or sick cows from farmers, looks after them humanely and treats them, if necessary, with the safe drug, meloxicam.
The cows, considered sacred by Hindus, die a natural death.
The other employee is Ishwari Chaudhary, the educational officer. He is spreading the vulture conservation message among villagers and in veterinary shops.
"We tell them about the new medicine, meloxicam, and how we can save the birds by using it," he says.
The banned drug diclofenac is still being rounded up all over Nepal. Meloxicam is more expensive, but it is injected in much smaller doses which partly compensates.
The numbers of endangered vultures are rising again.
Mr Chaudhary says that before the project was opened, he used to see a maximum of 72 vultures around one carcass.
"Once we established the vulture restaurant, in five or six months we found double that number - the maximum number I have recorded is about 156, all at the same time on the same carcass."
BCN, with support from others like Britain's Royal Society for the Protection of Birds, now wants to open more "vulture restaurants" - and scientists in India too are now showing interest in the idea.
यह स्टोरी बीबीसी से साभार ली गयी है