सोमवार, 11 मई 2009

बिहारी मुसलमान फिर से कांग्रेस की ओर

बिहार की मुख्य राजनीतिक पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के लिए 15वां लोकसभा चुनाव एक दुःस्वप्न साबित होने वाला है। हालांकि अभी नतीजे आने शेष हैं और अभी यह निर्धारित होना भी बांकी है कि राजद ने इस चुनाव में क्या-क्या खोया, लेकिन यह बात निश्चित है कि लालू यादव इस बार बिहार में "वाटर लू' की लड़ाई लड़ रहे हैं। राजद का हाल बाढ़ में डूबे घर को निहार रहे गृहस्थ की तरह हैै, जो पानी निकलने तक नुकसान का अनुमान ही लगा पाता है। उसे इस बात का पूरा यकीन होता है कि पानी निकलने के बाद का दृश्य बहुत दुखदायी होगा। साथ ही उसे किसी चमत्कार की भी आस रहती है कि काश ! ऐसा न होकर वैसा हो जाये तो ऐसा न होकर वैसा हो जायेगा।
दरअसल इस चुनाव ने बिहार में पिछले दो दशकों से चल रही राजनीति का पटाक्षेप कर दिया है। इसके कारण बिहार में बेगाना बन चुकी कांग्रेस को पुनर्जीवन मिला है। लगभग 25 वर्षों के बाद एक बार फिर कांग्रेस को अपना खोया हुआ जनाधार वापस मिलते दिख रहा है। हालांकि इसके बावजूद उसे इस राज्य में लोकसभा की कोई ज्यादा सीटें प्राप्त नहीं होने वालीं। लेकिन उसके लिए यह बहुत बड़ी खुशखबरी है कि ब्राह्मण और मुसलमान के बिछड़े हुए वोट बैंक पुनः उनकी ओर आने लगे हैं। इस बार बिहार के अधिकतर मुस्लिम और ब्राह्मण खासकर मैथिल ब्राह्मण के वोट कांग्रेस को मिले हैं। वह भी तब जब पार्टी ने आनन-फानन में उम्मीदवार की सूची तैयार की। चुनाव घोषणा के पंद्रह दिन बाद तक कांग्रेस समूचे बिहार में चुनाव लड़ने के लिए सोच भी नहीं रही थी। राजद और लोजपा गठबंधन और लालू यादव द्वारा बेइज्जत होकर उसे यह कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा। जब कांग्रेस बिहार की सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने का फैसला ले रही थी, तो उसके एक भी बड़े नेता को यकीन नहीं था कि उनके प्रत्याशी कोई अप्रत्याशित प्रदर्शन कर पायेंगे। लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं, उनसे तो यही लगता है कि कांग्रेस के प्रत्याशियों ने अप्रत्याशित प्रदर्शन किया है। कांग्रेस के प्रत्याशियों को मुसलमान और ब्राह्मणों के सत्तर फीसद से ज्यादा मत मिले हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि कांग्रेस अधिकतर सीटों पर मुकाबले में आ गयी है, क्योंकि इनकी संख्या बिहार के कुल मतदाताओं के लगभग 23 प्रतिशत है। बिहार के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से मिलने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि इस बार कांग्रेस बिहार की कम-से-कम दो दर्जन सीटों पर दूसरे या तीसरे स्थान पर रहेगी। हालांकि पार्टी ने कुछ सीटों पर यादव और अन्य पिछड़ी जाति के नेताओं को टिकट दी, लेकिन इन जातियों के वोट उसे नहीं मिल सके।
मुसलमानों के कांग्रेस की तरफ मास शिफ्ट को देखकर राजद के नेता बदहवास हैं। उन्हें अभी तक इसकी वजह मालूम नहीं है। लेकिन सरजमीन में घूमने के दौरान आम मुसलमान इसके लिए जो वजह बता रहे हैं वह काबिले गौर है। उनका कहना है कि राजद उनका सिर्फ इस्तेमाल कर रहा है। बीस वर्षों में इस पार्टी ने अल्पसंख्यकों के लिए कुछ खास नहीं किया। वह सिर्फ मुसलमानों को भाजपा और आरएसएस का भय दिखाकर वोट लेती रही। जबकि कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों के व्यापक हित के लिए कुछ काम किए हैं। साथ ही कांग्रेस ने अपनी कार्य-पद्धति में यह संदेश छोड़ी है कि वह धार्मिक तुष्टीकरण के ऊपर उठकर काम करना चाह रही है।
हालांकि मुसलमानों के कांग्रेस में जाने की यही एक मात्र वजह नहीं है। इसके लिए उनमें "एंटी-राजद इनकम्बेसी' की भावना भी है। साथ ही मुसलमान मतदाता जिला, ब्लॉक और पंचायत स्तर पर राजद द्वारा लगातार बरती जाने वाली उपेक्षा से भी खिन्न हैं। मुसलमान मतदाताओं को इस बात का गहरा एहसास है कि कांग्रेस ने वर्षों पहले उन्हें जो राजनीतिक सम्मान दिया था, राजद ने उसका दशांश भी नहीं दिया। कुछ ऐसी ही भावना ब्राह्मण मतदाताओं की भी है। गौरतलब है कि बिहार के ब्राह्मण मतदाता पिछले 15 वर्षों से राजग को वोट दे रहे हैं। लेकिन राजग के दोनों धड़े उन्हें खूंटे से बंधे बैल से ज्यादा अहमियत नहीं देते। इस बार तो जदयू ने एक भी ब्राह्मण नेता को टिकट नहीं दी। इसलिए लोग कांग्रेस को याद कर रहे हैं। कोशी इलाके में जब मैंने प्रबुद्ध ब्राह्मण मतदाताओं से पूछा कि क्या वे कांग्रेस को वोट देकर अपने मतों को जाया नहीं कर रहे हैं ? तो उनका जवाब था- बिल्कुल नहीं। उनका कहना था कि हम सभी पार्टियों को एहसास दिलाना चाह रहे हैं कि हमारे वोट भी जीत-हार को तय कर सकते हैं। अगर आप हमें टिकट नहीं देंगे, तो हम आपके उम्मीदवार को हरा भी सकते हैं। सहरसा जिले के ब्राह्मण बहुल गांव के एक युवक का कहना था, " जितने वोट कांग्रेस को पड़ेगा उतने वोट से ही कोई जीतेगा और कोई हारेगा। यानी पार्टियां जान लें कि हम जिनके साथ रहेंगे वही लोकसभा पहुंचेगा।'
कुल मिलाकर कहें तो बिहार की राजनीति इस लोकसभा चुनाव में एक नया करवट ले चुकी है। कांग्रेस को इससे तत्काल कोई खास फायदा तो नहीं मिलने वाला, लेकिन राजद और जदयू को इससे भारी नुकसान जरूर होने वाला है। अगर कांग्रेस लोगों के बदलते रुझान को समझ सकी और सांगठनिक स्तर पर मेहनत कर पायी, तो वह अगले विधानसभा चुनाव तक एक बार फिर इस राज्य में अपनी खोयी प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकती है।

4 टिप्‍पणियां:

उपाध्यायजी(Upadhyayjee) ने कहा…

congress ne to lalu ke viruddh me lada hai. janta to tab thagi rah jayegi jab oonka vote barbad hoga. Kyonki congress to jitegi nahin aur baad me phir se wahi laalu-passwan se dosti. ye to pichhale 10 saal se chala aa raha hai aur agale 10 sal tak chalega.

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

लालू यादव.. से मुस्लिम ही क्यूँ..सभी नाराज़ है क्यूंकि उन्होंने अपनी राजनीती चमकाने के अलावा कोई काम किया भी तो नहीं है..क्यूँ दे वोट???

रंजीत ने कहा…

jee Rajnish jee, Bihar ke log bhee yahee kah rahe hain, ab unke saath sirf yadav matdata hee hain.
sukriya
Ranjit

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कितनी अजीब बात है.................अज भी मुस्लिम मतदाता, हिन्दू मतदाता की बात होती है...............शायद कभी तो वक़्त आएगा जब हम ऐसी राजनीति से ऊपर उठेंगे...............