बुधवार, 20 मई 2009

नेपाली संसदीय समिति की सिफारिश, बंद करो खुली आवाजाही

नेपाल की एक संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि भारत-नेपाल की खुली सीमाओं पर बाड़ लगाया जायेऔर नेपाल आने के लिए पासपोर्ट और पहचान कार्ड अनिवार्य कर दिया जाये। इस समिति का गठन साल भर पहले माओवादी प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड की सरकार ने की थी। नेपाल इंटरेस्ट प्रीजर्वेशन कमिटि (एआइपीसी) ने कल अपनी रिपोर्ट वहां की संविधान सभा को सौंपी है। मिली जानकारी के अनुसार, सिफारिशों में कहा गया है कि खुली सीमा और खुली आवाजाही नेपाल की एकता और अखंडता के लिए घातक है। इसके कारण नेपाल में देश विरोधी गतिविधियां बढ़ रही हैं और कानून-व्यवस्था बनाये रखने में समस्याएं आती रहती हैं। समिति ने अपनी सिफारिशों में कहा है कि इस मसले को नेपाल के लिए बनने वाले संविधान में भी जगह दी जाये और उसमें ऐसा प्रबंध किया जाये कि आने वाले दिनों में भारत-नेपाल की खुली सीमा और खुली आवाजाही पर नियंत्रण पाया जा सके। सिफारिश में कहा गया है कि नेपाल सरकार भारत से लगी 1800 किलोमीटर की सीमा पर अर्द्धसैनिक बलों की प्रतिनियुक्ति करे। अगर इसके लिए नये सीमा सुरक्षा बल की आवश्यकता हो, तो उसका गठन किया जाना चाहिए। इसके अलावा इस मसले पर भारत सरकार से भी नये सिरे से बात करने की सिफारिश की गयी है।
गौरतलब है कि करीब डेढ़ साल पहले जब माओवादियों ने वहां चुनाव में जीत हासिल की थी और सरकार बनाया था, तो उसके प्रधानमंत्री प्रचंड और शीर्ष नेता बाबूराम भट्टराय ने सबसे पहले यही बयान था। दोनों नेताओं ने 1950 की भारत-नेपाल मैत्री संधि को बदलने की बात कही थी। दोनों नेताओं ने यह भी कहा था कि यह संधि भेदभावपूर्ण है, जिसे बदलने की जरूरत है। प्रचंड ने तो यहां तक कह दिया था कि भारत ने इस संधि के जरिए नेपाल को गुलाम बना लिया है। उल्लेखनीय है कि इसी संधि के जरिए ही सदियों पुराने भारतीय-नेपाली लोगों की बेरोकटोक आवाजाही को जारी रखा गया था, जिसे माओवादी सरकार खत्म करने की बात कर रही थी। इस समिति ने उसी बात को अपने सिफारिशों में कलमबद्ध किया है। हालांकि जब प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रचंड भारत आये, तो वे कुछ और बोलने लगे।
नेपाल की संसदीय समिति की इस ताजा सिफारिश के बाद अब इस बात में कोई शक नहीं रह गया है कि नेपालाी माओवादी चीन के हाथों खेल रहे हैं। उन्हें चीनी आका जो आदेश देते हैं, वे बीना सोचे-विचारे उस पर अमल कर रहे हैं। भारत-नेपाल के बीच सदियों से बेटी-रोटी की संस्कृति है। लाखों नेपाली लोग भारत में रोजगार पाते हैं, दोनों ओर के लाखों लोगों के वैवाहिक संबंध एक-दूसरे देश में है। सोचने वाली बात है कि पलक झपकते कोई भी सरकार इस परंपरा को कैसे तोड़ पायेगी। न तो नेपाली लोग इसे बर्दाश्त कर पायेंगे और न ही भारतीय लोग। इससे दोनों ओर जन विद्रोह फैल सकता है। और माओवादियों का यही लक्ष्य है। वे चाहते हैं कि सीमाई इलाके में विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो जाये और वे अपने एजेंडे को तेजी से फैला सके।
दरअसल भारत-नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा विश्व की अनोखी सीमा रेखा है, जिसे पार करने के लिए वीजा व पासपोर्ट की जरूरत नहीं होती। वैसे बेरोकटाक आवाजाही की यह परंपरा काफी पुरानी है। इसकी शुरुआत नेपाल के एक राष्ट्र के रूप में गठित होने (1780 से पहले नेपाल नामक देश का अस्तित्व नहीं था)और दोनों देशों के बीच वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा के निर्धारण से पहले हो चुकी थी। यह क्रम नेपाल के शाह और राणा वंश के शासन काल और मुगल काल से लेकर स्वतंत्र भारत की शासन व्यवस्था में भी चलता रहा। उन दिनों हिमालय से निकलने वाली नदियों से आने वाली नियमित बाढ़ के कारण दोनों देशों के लोगों का दोनों ही ओर विस्थापन होता रहता था। बाढ़ ग्रस्त इलाके में हैजा और मलेरिया जैसे रोगों के जबर्दस्त प्रकोप और चारागाह के अभाव में दोनों ओर के कृषक समुदाय को जहां कहीं भी सूखा स्थल मिलता था वे वहीं बस जाते थे। राणा वंश के प्रधानमंत्री जंग बहादुर राणा ने तो अपने शासन काल में नेपाल के तराई प्रदेश में भारतीय लोगों को जमीन खरीदने, घर बनाने और व्यापार करने तक की खुली छूट दी। अंग्रेज शासकों ने व्यापारिक स्वार्थ और पुलिस बल में नेपाली गोरखा जवानों की भर्ती के लोभ में इस प्रवृति को हमेशा बढ़ावा दिया। ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच वर्ष 1816 हुई सुगोली संधि इस बात का प्रमाण है। इन तमाम सकारात्मक और नकारात्मक कारणों से आवाजाही में भारी वृद्धि हुई और रिश्ते प्रगाढ़ होते चले गये।
पूर्वोत्तर में सिक्किम व पश्चिम बंगाल, उत्तर में बिहार एवं उत्तरप्रदेश और पश्चिम में उत्तराखंड राज्य के 21 जिले नेपाल के 26 जिलों से सीधे लगे हुये हैं। भारत के 50 जिले ऐसे हैं जहां से अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा की दूरी 40 किलोमीटर या उससे कम है । 1580 किलोमीटर की लंबी सीमा रेखा में से लगभग 1100 किलोमीटर की पट्टी ऐसी है जिसके आसपास घनी आबादी है। इसकी शुरुआत उत्तरप्रदेश के पीलीभित जिले से होती है जो पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग तक जाती है। बिहार के मिथिलांचल इलाके के सभी 16 जिले नेपाल की सीमा के आसपास हैं और प्रति वर्ष हजारों की संख्या में इन जिलों के मैथिलीभाषी नेपाली और भारतीय लड़के-लड़कियों के बीच शादियां होती हैं। हिन्दी फिल्म के प्रसिद्ध पार्श्व गायक उदित नारायण की विवादित शादी भी इनमें से एक है। उदित नारायण के पिता की शादी भी बिहार के सुपौल जिले के बाइसी गांव में हुई थी। वैसे वे मूल रूप से नेपाल के वारदाह के हैं। ज्ञातव्य है कि मैथिली नेपाल की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। पश्चिम बंगाल में बंगाली भाषी भारतीय-नेपाली लड़के-लड़कियों के बीच विवाह होते हैं और उत्तरी उत्तरप्रदेश के भोजपुरी-अवधि भाषी लोग भी नेपाली सहभाषियों के साथ भारी तादाद में वैवाहिक रिश्ते बनाते हैं। बिहार के किशनगंज, अररिया, सुपौल, मधुबनी, सीतामढ़ी, मोतिहारी, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण जिले में तो ऐसे सैंकड़ों मां-पिता मिल जाते हैं जिनकी सभी संतानों की शादी नेपाल में है। यहां तक कि नेपाल के शाह वंश और राणा वंश के लड़के एवं लड़कियों की भी भारत में शादियां हुई हैं। सीमाई इलाकों के समाजिक तानेबाने का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सीमाई इलाके में दर्जनों ऐसे मंदिर-मस्जिद हैं, जिनका निर्माण और जीर्णोद्धार भारतीय लोगों के पैसे से हुआ है। इन देव स्थलों पर लगने वाले मेलों में दोनाें देश के लोग भारी संख्या में भागीदारी करते हैं।
इसके अतिरिक्त सीमा के आसपास बसे लोगों के बीच व्यावसायिक रिश्ते भी काफी प्रगाढ़ हैं। सीमावर्ती इलाके के अल्पकालीन बाजारों (हाटों) में दोनों देशों के दुकानदार और ग्राहक मौजूद होते हैं। कुछ ऐसे व्यावसायिक घराने भी हैं जिनकी दूकानें एवं प्रतिष्ठान दोनों देशों में हैं। इसके उदाहरण सीमावर्ती सम्मुख शहरों के जोड़े मसलन, रक्सौल-बीरगंज, फारबिसगंज-विरॉटनगर, नक्सलबाड़ी-काकरभिट्ठा, सिरहा-जनकपुर, कुनौली-राजबिराज, बिरतामोड़- जालेश्वर और बनवासा-महेंद्र नगर आदि में प्रत्यक्ष रूप से देखे जा सकते हैं।
रोजगार और चिकित्सा के लिए भी दोनों देशों के लोग भारी संख्या में आवाजाही करते हैं। नेपाल के शहर लहान में एक नेत्र चिकित्सालय हैं जहां हर वर्ष हजारों भारतीय इलाज कराने पहुंचते हैं। जबकि बिहार के दरभंगा, मुजफ्फरपुर और उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पतालों में प्रति वर्ष भारी तादाद में नेपाली लोग चिकित्सा के लिए पहुंचते हैं। तराई क्षेत्र के नेपाली मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल समेत पंजाब व हरियाणा तक मजदूरी करने चले जाते हैं।
 
 
 

2 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ये एक खतरनाक खेल है जो खेला जा रहा है चीन द्बारा............भारत सरकार को जागने की जरूरत है............पता नहीं कब हम जागेंगे.......

Milan ने कहा…

International border are to be managed according to the need of a nation. National interest is most important than local interest. And in any national issue definitely there are prows and cons.

Its true that there is heavy linkage between the people around Nepal India border line, but it is also true that it is the risk zone for both country.

Indian media and leaders every time blem open border for weapons, drug and fake currency smuggling and somehow the activity of so called ISI.

Whereas Nepali side also not happy for open border. We feel our national interest are dominated due to open border. Most of Nepali Terai/Madhesh separatist movement are based in India. They have easy access in Nepal only because of open border.

Passport system does not mean closure of border for ever and zero access to both side. Rather it means managing the border. Controlled access is beneficial for both country.

Thats why, I don't think open Nepal-India border work anymore. Whatever our parliamentary committee suggested I think that is good.