सोमवार, 18 मई 2009

प्रभाकरण के प्राण के बाद



17 मई 2009 । यह तारीख इतिहास में दर्ज हो चुकी है। क्योंकि इस दिन 21वीं शताब्दी के सबसे खतरनाक गुरिल्ला आर्मी के प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण का अंत हो गया। श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंघली, वहां की सरकार और सैनिक जस्न मना रहे हैं। जबकि श्रीलंका , भारत और विश्व के लगभग पंद्रह देशों में बसे लाखों तमिल भयानक मातम में डूबे हुए हैं।इससे स्पष्ट हो जाता है कि यह एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि एक विभत्स जंग का वह पड़ाव है, जो किसी के लिए जीत कहलाती है और किसी के लिए हार। लेकिन लिबरेशन टाइगर ऑफ तमिल इलम यानी एलटीटीआइ अथवा लिट्टे और श्रीलंकाई सैनिकों के लगभग तीन दशक पुराने संघर्ष की यह कहानी जीत और हार के आगे भी जाती है। क्योंकि जब दो मानव समुदाय किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए हथियार उठाता है, तो उसकी जड़ में कोई न कोई मुद्दा होता है। और जब तक उस मुद्दे को सुलझा नहीं लिया जाता तबतक किसी की जीत नहीं होती है। अगर विजेता समुदाय जंग में आगे रहने को जीत कहते हैं और इस जीत को ही मुद्दा का समाधान मान लेते हैं, तो समझ लीजिए कि कहानी अभी जारी है। यानी मुद्दे फिर उठेंगे, समय के साथ वह बलवान होगा और चिंगारी के संपर्क में आने के साथ ही वह फिर से धधक उठेगा। युद्ध के विजेताओं की सबसे बड़ी गलतफहमी यह होती है कि वह शस्त्र संघर्ष में आगे रहने यानी जीत को ही न्याय मान लेते हैं। लेकिन सनातन सच यह कि जब तक न्याय नहीं हो जता तबतक युद्ध अधूरा रहता है। स्थगित हो होकर वह फिर से भड़कता है और तबतक जारी रहता है जबतक अन्तिम तौर पर इंसाफ नहीं हो जाये। लिट्टे और श्रीलंका सेना के बीच के युद्ध की भी यही विडंबना है। श्रीलंका सरकार तमिलों के मुद्दे को सुलझाये बगैर, न्याय किए बगैर इस कहानी को पूरी करना चाहती है। मानव इतिहास गवाह है कि ऐसा नहीं होता है। यह मानव का बुनियादी स्वभाव है कि वह मुद्दे के लिए, हक के लिए, सिद्धांत और उसूल के लिए हमेशा हथियार उठाता रहा है। यह मानवीय स्वभाव का वह बिंदु है जहां वह खुद को ईश्वर और प्रकृति से भी ऊपर उठा लेता है। आप पूछेंगे कैसे ? तो इसको संक्षेप में कुछ इस तरह समझा जा सकता है। ईश्वर या प्रकृति ने हर जीवों में यह प्रेरणा दी है कि वह अपनी जान-प्राण की हर कीमत पर रक्षा करे। जानवरों से लेकर मानव तक में यह सहज प्रेरणा होती है। जान पर अगर संकट हो तो जीव कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है। जान रक्षा के लिए छोटे जानवर तक सबकुछ दांव पर लगा देते हैं। लेकिन मानव प्रकृति के इस सिद्धांत को चुनौती देता है। इतिहास में बहुत सारे ऐसे प्रकरण और उदाहरण सामने आये हैं जब देखा गया है कि मनुष्य ने अपने उसूल, सिद्धांतों और मुद्दों के लिए जान की बाजी लगा दी। जब एक इंसान किसी मुद्दे या सिद्धांत के लिए जान दे रहा होता है तो क्या वह ईश्वर के बनाये नियम को चुनौती नहीं दे रहा होता है ?
प्रभाकरण की मौत के बाद ये सवाल, ये मुद्दे फिर से उठते रहेंगे। तमिलों को दोयम दर्जे का नागरिक मानने, उनके साथ गुलामों जैसा वर्ताव करने, उन्हें अपनी मातृभूमि में ही शरणार्थी बना देने वाली श्रीलंकाई सरकार और वहां के बहुसंख्यक समुदायों की नीतियों में जबतक सच्चे अर्थों में परिवर्तन नहीं होता, तबतक प्रभाकरण जिंदा रहेगा। यह प्रभाकरण और श्रीलंकाई तमिलों के प्रति उपजी सहानुभूतियों के शब्द नहीं हैं, बल्कि समाजशास्त्र का बुनियादी सिद्धांत है। हिंसा हमेशा भर्त्सनीय होती है। हिंसा के नायक के प्रति किन्हीं के दिल में कोई सहानुभूति नहीं होनी चाहिए, ऐसा मैं भी मानता हूं। लेकिन हिंसा के हेतु -सेतु के प्रति , उनके उपजने के कारणों व कारकों के प्रति अगर वह वाजिब है, तो मानव में निश्चित तौर पर सहानुभूति होनी चाहिए। क्योंकि मनुष्य एक संवेदनशील प्राणी है।
तमिलों ने तीन दशकों के युद्ध में इतना कुछ गंवा दिया है कि अब उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। और जिस इंसान के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता , वह सबसे खतरनाक इंसान होता है। युद्ध और संघर्ष उसके लिए कोई नई बात नहीं होती, वे इसके लिए हमेशा तैयार रहते हैं। श्रीलंकाई तमिलों की भी यही स्थिति है। प्रभाकरण की मौत के बाद जस्न में डूबी श्रीलंका सरकार और वहां के बहुसंख्यक शायद इस सच से अनभिज्ञ हैं।

5 टिप्‍पणियां:

PD ने कहा…

sach hi kaha.. "Nanga Bhagwan se bhi nahi darta hai.." Aaj Shreelanka me Tamilon ke paas khone ko kuchh bhi nahi hai, to dar kaisa?

bahut badhiya aalekh..

P.N. Subramanian ने कहा…

बहुत ही सुन्दर तथ्य परक आलेख.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपने बहूत सोचने वाली बात लिखी है.........पर क्या इस बात का कोई भी समाधान है................और है तो क्या इतना आसान है.........

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

मैं आपकी बात का समर्थन करता हूं.

रंजीत ने कहा…

digamber bhai, mujhe lagta hai kee srilanka kee tamil-samsya kaa samadhan hai, jise wahan ke shasak warg bhee jaante hai. Rastrapati rajpakche ne bhee uska jikra kiya hai, lekin amal kitnaa karte hain yah to samay bataega.
sadhanyawaad
Ranjit