शनिवार, 4 अक्तूबर 2008

रेणु इधर नहीं आना

दहाये हुए देस का दर्द -10
रंजीत
रेणु
जी ! हां-हां, फणीश्वरनाथ रेणु जी! मैं आपसे ही मुखातिब हूं। आप सुन रहे हैं न ! आपको अपनी पिछली जिंदगी के संवेदनशील हृदय की कसम। आपको हीरामन के पोते हरकिशन की कसम, जो बाढ़ के बाद पूरे परिवार के साथ पंजाब-दिल्ली या मोरंग कहीं पड़ा (भाग) गया है। आपको गीतकार शैलेंद्र के साथ मिलकर रोये हुए उन अश्रुपूर्ण लम्हों की कसम, जब आपने शैलेंद्र जी को कोशी-व्यथा का एक गीत सुनाया था और दोनों पटना के राजेंद्रनगर मोहल्ले के उस बंद कमरे में घंटों रोते रहे थे।
रेणु बाबा, आप कहीं चले जाइयेगा। दिल्ली-पटना के सचिवालय भवन चले जाइयेगा। अगर कोशी के कहर से तबाह हुए लोगों की चिंता बहुत ज्यादा सताने लगे तो टेलीविजन ऑन करके समाचार चैनल के सामने बैठ जाइयेगा। लेकिन अपने कोशी अंचल नहीं जाइयेगा। अररिया नहीं जाइयेगा, सुपौल नहीं जाइयेगा, सहरसा नहीं जाइयेगा, मधेपुरा नहीं जाइयेगाऔर पूर्णिया भी नहीं जाइयेगा। अगर इससे भी मन नहीं भरे तो, मंत्री-विधायकों के साथ जिला मुख्यालय चले जाइयेगा, लेकिन अपने गांव सिमराहा नहीं जाइयेगा, प्लीज !
हालांकि मुझे आपको अपनी मातृभूमि की ओर जाने से मना करने में तनीकों निमन (अच्छा) नहीं लग रहा है, लेकिन आप इसे अन्यथा नहीं लीजियेगा। ऐसा नहीं सोचने लगियेगा कि एक आफत क्या आयी कि ये लोग अपने सदियों पुराने आतिथ्य-संस्कार तक भूल बैठे। यह सच नहीं है। आपकी मिट्टी में आतिथ्य-धर्म आज भी कायम है। कोशी मैया के कहर से बचे घरों में गजगजाते मेहमानों के समुद्र इस बात के गवाह हैं। हर खटिया तीहरी हो गया है , गृहस्थ खुद जमीन पर सो रहे हैं, लेकिन पीड़ित कुटुम्बों को खटिया पर सुला रहे हैं। लेकिन उनकी आंखें अब लज्जित होने लगीं हैं। चावल वाले बेड़ही-कोठी (अनाजों को रखने वाला देसी ड्रम) खाली हो गये हैं। अब क्या खुद खाये और क्या मेहमानों को खिलायें ? मस्जिदों में मौला से इज्जत-प्रतिष्ठा बचाने की गुहार लगा रहे हैं गृहस्थ। या मौला, बचा ले बंदों की लाज ! हे महादेव, पास करा दे यह परीक्षा !!
मुझे दुख है कि आपको भी सफाई देनी पड़ रही है, लेकिन आप ही तो कहते थे- लाचार को विचार नहीं...
वस्तुतः हम नहीं चाहते कि आप इन दिनों अपने पुराने गांवों में जायें। आखिर आपकी रुहों को वहां क्या मिलेगा। मैं आपको बता दूं कि निज आपके सिमराहा में पुलिस के जवानों ने ऐन ईद के दिन चार अबला औरतों को बुरी तरह पीटा। ये औरतें रोजे के दिन अच्छा भोजन मांग रही थी, लेकिन अच्छे भोजन के बदले में उन्हें लाठी परोसी गयी। जुल्मो-सितम का आलम यह कि गर्भवती औरतें तक लाठी-भाला लेकर सरकार बहादुर के खिलाफ नारे लगाने लगीं।
आपको याद होगासुपौल जिला का पीपरा बाजार। हां, वही पीपरा जहां की खाजा-मिठाई के कभी आप और जेपी मुरीद हुआ करते थे। इधर वहां एक उच्च विद्यालय बना है, जिसमें दो हजार बाढ़-व्यथित शरण लिए हुए हैं। आपको कोई टेलीविजन चैनल वाला नहीं बताया होगा, इसलिए मैं बता देता हूं । उस विद्यालय में कलस्थापन की रात सोयी हुई एक नवविवाहित महिला के साथ पुलिस ने उसके पति की मौजूदगी में बलात्कार करने की कोशिश की। जब पीड़ितों ने इसका विरोध किया तो सारे पुलिस वाले एक हो गये और उस महिला के पति-देवर-भैंसुर और गोतिनी को मरनासन्न अवस्था में पहुंचा दिया। अब आप बताइये जिस कोशी-अंचल में महिलाओं की इज्जत के लिए शहीद हो जाने की दर्जनों वीर -गाथाएं हैं वहां के लोग अपनी नजरों के सामने पुलिस और सैनिकों के व्यभिचार को कैसे बर्दाश्त करेंगे। लोग भूख और बिमारी से कृशकाय हो रहे हैं, लेकिन वे अपनी मां-बहनों की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं।
मैं आपकी भावुकता को देखते हुए ही उधर जाने से मना कर रहा था। इतना सुनने के बाद भी अगर आपकी रुहें नहीं माने और और मातृभूमि की बेबसी को देखने के लिए विद्रोह कर दे, तो मेरी एक सलाह मानियेगा। आप प्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्री या किसी केंद्रीय मंत्री के साथ उधर जाइयेगा। इनमें से अधिकतर आपके सोश्लिस्ट पार्टी के ही चटिया (विद्यार्थी) हैं, जिनकी नींब आपने कभी जेपी के साथ मिलकर रखी थी। मैं आपको आपकी परतीपरिकथा की कसम देता हूं । मैला आंचल के सुमरीतलाल की सच्चाई व सादगी की शपथ लेकर वचन देता हूं अगर आप मेरा सलाह मानियेगा तो आपकी रुहें जार-जार होकर नहीं रोयेंगी , जिसका मुझे डर है।

6 टिप्‍पणियां:

सतीश पंचम ने कहा…

काफी संवेदनशील पोस्ट।

shyam kori 'uday' ने कहा…

प्रसंशनीय अभिव्यक्ति है।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत आभार इस प्रस्तुति का. बहुत बढ़िया पोस्ट.

रंजीत ने कहा…

Aap sabhee shriday bandhuon ka aabhar
Ranjit

makrand ने कहा…

आपकी रुहें जार-जार होकर नहीं रोयेंगी , जिसका मुझे डर है।
this line is the summary of this beautifully crafted lines
regards

रंजीत ने कहा…

makrand bhai, ajneya jee ne kaha hi- vedna drishtee detee hai, jo gahan vedna me hai wah drashta ban sakta hi.
Ham sabhee drashta kee bhumika me hee hain, waise jitna ban pad raha utna kar raha hun. aapka remark mere liye sambal ka kam karega. Aapka aabhar.
Ranjit