शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संगठन की अच्छी पहल

(पत्रकारों पर बढ़ते हमले के खिलाफ सिर मुंडाकर प्रदर्शन करते नेपाली पत्रकार, लेकिन सरकार पर कोई असर नहीं हो रहा)
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संगठन (आइएफजे - इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट) ने एक अच्छी पहल की है। कल इस संगठन का एक दल नेपाल पहुंचा है। नेपाल में पत्रकारों पर लगातार हो रहे हमले, अपहरण, हत्या आदि की बढ़ती घटनाओं के संदर्भ में यह संगठन नेपाल आया है। इस दल में पूरी दुनिया के कई वरिष्ठ पत्रकार शामिल हैं। यह दल नेपाल की सरकार से स्थानीय पत्रकारों की सुरक्षा और प्रेस पर हो रहे हमले के संदर्भ में बात करेगा। इसने आज से ही अपना काम चालू कर दिया है। जनकपुर से मेरे एक पत्रकार मित्र ने आइएफजे की पहल की सूचना देते हुए कहा कि वे पहले चरण में स्थानीय पत्रकारों के साथ बैठकें करेंगे। इस क्रम में उन्होंने कल जनकपुर के पत्रकारों के साथ एक बैठक की भी। इसके बाद यह दल नेपाल की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेता से मिलेंगे। इनमें नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष और नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइरला, मधेशी जनाधिकार फोरम के अध्यक्ष उपेंद्र यादव, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के नेता झालनाथ खनाल और कुछ माओवादी नेता भी शामिल हैं। इसके अलावा यह दल नेपाल के राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एवं संयुक्त राष्ट्र मिशन के अधिकारियों से भी विचार-विमर्श करेंगे। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संगठन के हस्तक्षेप से नेपाली पत्रकार काफी राहत महसूस कर रहे हैं।
ज्ञातव्य है कि पिछले एक साल से नेपाल में प्रेस और पत्रकारों पर लगातार हमले किए जा रहे हैं। गत दिनों यह मामला तब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया जब एक महिला पत्रकार को अराजकतावादियों ने गोली मार दी। ऐसा माना जाता है कि प्रेस और पत्रकारों पर हो रहे हमले को सरकार का समर्थन प्राप्त है। इस कारण हिमालय की वादी में मौजूद इस नवलोकतांत्रिक देश में प्रेस की आजादी खतरे में पड़ती दिखाई दे रही है। चूंकि नेपाल की सरकार स्थानीय प्रेस संगठनों के प्रदर्शन और विरोध को सुन नहीं रही थी, इसलिए अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप आवश्यक हो गया था। उम्मीद की जानी चाहिए कि नेपाल की सरकार इस मसले को गंभीरता से लेगी और अपने पत्रकारों पर हो रहे जुल्मों को बढ़ावा नहीं देगी। यह नेपाल में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए अनिवार्य है क्योंकि प्रेस की स्वतंत्रता के बगैर कोई भी लोकतंत्र आगे नहीं बढ़ सकता।

2 टिप्‍पणियां:

अनुनाद सिंह ने कहा…

"बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाय!"

Milan ने कहा…

perfect analysis.