बुधवार, 24 दिसंबर 2008

साधारण डब्बे की असाधारण बात (अंतिम)

दहाये हुए देस का दर्द -26
2001 की बात है। तब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राओं के बीच विश्वविद्यालय की एक खबर की बड़ी चर्चा चल रही थी। विश्वविद्यालय के हर कैफे व कैंटीन में छात्र-छात्राओं के बीच वह खबर महीनों तक मनोरंजन का विषय बनी रही थी। दरअसल , उन दिनों विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के एक छात्र ने खैनी और रचनाधर्म विषय पर डॉक्टरेट के लिए अर्जी दी थी और उसका कहना था कि यह अनुसंधान का विषय है। छात्र समुदाय के बीच खबर थी कि उसने हिन्दी के कुछ चोटी के साहित्यकारों की बकायदा सूची तक जमा की थी और उसका तर्क था कि इस सूची के साहित्यकारों की अमर रचना में खैनी का बहुत बड़ा योगदान था।
लेकिन उस वृद्ध की खैनी का असर था या फिर कोशी के विनाश-नाटक का हैंग ओवर ; मैं विचारों के समुद्र में डूबता चला गया। इस बीच गाड़ी कहां रूकी और किस वक्ता ने क्या कहा; मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया। मैं तो बचपन के एक देहाती नाटक, सती बिहला के दृश्यों में खोया हुआ था, जिसे स्थानीय लोग नाच कहते हैं। पता नहीं इस नाटक की पटकथा किसने लिखी, लेकिन जिसने भी लिखी होगी वह युगदृष्टा रचनाकार रहे होंगे। नाटक के एक दृश्य में नायिका अपने पति की प्राण के लिए यमराज के सामने नाना प्रकार की अग्नि परीक्षा देती है, जिसमें एक परीक्षा है सुई की नोंक पर चलने का। सुई की नोंक पर उतरना भी उसे मंजूर है, लेकिन यमराज उसे बहकाता है। होनी और होतब , विधि और विधान, करम की गति आदि के बारे में समझाता है। कहता है- विधना के विधान को मत बदलो। लेकिन नायिका के लिए पति के प्राण से बड़ा कुछ नहीं। कोई विधि नहीं, कोई गति नहीं ! पति ही नहीं रहेंगे, तो वह क्यों ? किस लिए और किसके सहारे जियेंगी। वह यमराज से तर्क करती है- मेरे गांव को देखो महाराज! कोशी नदी की प्रचंडता को देखो, आखिर कोई महिला ऐसे बीहड़ गांवों में पति के बिना जिंदा रह सकती है। हर वर्ष नये घर के लिए फूस, मिट्टी, बांस-बल्ली, डोरी-काठी इकट्‌ठे करने पड़ते हैं। कोशी हर साल बहा ले जाती है घरों को, मवेशियों को, खेत और खलिहानों को... अकेली मैं कैसे लड़ पाऊंगी , मुझे तो डोरी कातना भी नहीं आता , मिट्टी की टोकरी उठा सकती हूं, लेकिन कुदाली कोई स्त्री कैसे चलाये ? ??
मंच पर कलरव होता है। ढोल-नगाड़े बंद हो जाते हैं। दर्शक दीर्घा में सन्नाटा छा जाता है। स्त्रियों की आंखें भर रही हैं। साड़ी के आंचल भींग रहे हैं । सती बिहला सुई की नोंक पर उतर आती हैं... पार्श्व गान उभरता है- हमरो के घरवा जे देखियो, अहि साल बहि गेले, गैया -महिंसियो बहले आब घरवाला चलि जेते ते हो महाराज... जेजेजेतेतेते होओओओ मअहअहाराअजजज...
एक जोरदार कोलाहल से मेरी तंद्रा भंग हो गयी। गाड़ी सुपौल स्टेशन पर आ लगी थी। डब्बे में कई नये चेहरे दिखने लगे थे कुछ देखे हुए चेहरे उतर चुके थे। खैनी वाले वृद्ध ने कहा- जिनगी में बहुत कुछ देखे, लेकिन एैसा भीषण पानी कभी नहीं देखे थे। मैंने पूछा आपके गांव में भी पानी पहुंचा था क्या ?
पहुंचा था कोनो ऐसन-वैसन ? सांझ के बेर (वक्त) था। लोटा लेकर मैदान की ओर जा रहा था। आंख के सामने करीब आध कोस सामने में लगा जैसे काश का फूल पाट गिया है। उजरे-उजर (उजला ही उजला)। लोगों से पूछने लगे कि ऊ का है ? सबने कहा बोचहा धार (एक छोटी नदी) में पानी बढ़ गया है उसी का पलारी (अतिरिक्त) फेंका है। लेकिन रात तक हमारे टोला में सबके घर में पानी पहुंच गया था। जिसको जैसे हुआ भागा। अब के बचा और के मरा, किसी को कुछ नहीं पता।
बातों का सिलसिला फिर चालू हो गया था। नहीं पढ़े लिखे वाले युवक ने कहा- ई सरकार के बारे में एक ठो बात हम बतायें ? कहते हैं न कि जाने ढोड़िया के मंतर नै आर गेहुमन से खेलावाड़, वही बात है। नीतीश कुमार कहता है फिर से इलाका को बसायेंगे। अरे क्या खाक बसायेंगे? पहले भूखल-भागल और भासल के पेट में दाना तो पहुंचाओ। इतना सुनना था कि थोड़ा पढ़ा लिखा वाला युवक ने राजद नेताओं की पोल खोलनी शुरू कर दी। दोनों लड़कियां सबकी बात सुन रही थीं, लेकिन किसी की बात पर उनके सिर नहीं हिलते थे। उसकी दादी ने साड़ी के एक कोने में बंधी पांच रुपये का एक मुड़ा-तुड़ा नोट निकालकर थोड़ी मूड़ही खरीदी। दादी, पोती को खिलाने का प्रयास करती रही और पोतियां दादी को...खैनी वाले वृद्ध ने हस्तक्षेप किया- भूखे में गुल्लर मीठा ! खा ले बचिया ! हम बूढ़े लोगों की अंतड़ी बड़ी ठोस है, तुम लोग नया खून-पानी के हो, तुमसे भूख बर्दाश्त नहीं होगा ? (मैंने देखा कि लड़की के पिता की आंख पूरी तरह पनिया गयी )
इस दौरान गाड़ी पंचगछिया स्टेशन पार कर चुकी थी। रात के ग्यारह बज गये थे। गाड़ी में पुलिस के जवानों ने प्रयास किया। अगर और समय होता तो शायद वह बेटिकट और दैनिक मजदूरी करने वाले यात्रियों से वसूली करने में मशगूल हो जाते। लेकिन आज वे अपनी वीर गाथा सुनाने के मूड में थे। एक ने कहा- हम तो पंद्रह दिन में कम-से-कम पांच सौ लोगों को पानी से बाहर निकाला होगा। एक सब्जी वाली ने उसका जवाब दिया- ...और खूब लूटपाट भी किया ?
क्या बकती हो?
बकेंगे क्या, हमरे गांव में तो फी आदमी सौ-सौ टका तक लेते थे, पुलिस वाले, तब नाव में बैठने देते थे । नहीं देने वालों को चलती नाव से पानी में फेंक देने की धमकियो देते थे।
तू दी थी किसी को रुपया-पैसा ? और नहीं तो क्या, डेढ़ सौ टका था खूछ (साड़ी में बंधा) में , ऊ में से एक सौ टकही वाला नोट छीन लिया, उ पुलिसवन ! बेट खउकन !!
... मादर ... ! बड़ी हरामी रहा होगा। लेकिन सचे कहते हैं भाई साहेब, हम तो पंद्रह दिन से चौबीसो घंटे लोगों को बचाने में भीड़े हैं।
थोड़ा पढ़ा- लिखा वाला युवक ने जवाब दिया- नीतीश कुमार का स्पेशल आर्डर है। आप लोग ठीक से काम करिये। हम लोग सब देख रहे हैं। सबके बारे में खबर पहुंच रही है।
क्या खबर पहुंचाइयेगा। आप ही लोग तो लोगों को मरने के लिए छोड़ दिये हैं। पब्लिक के लिए नाव लेकर जाते हैं और नेता लोग उसे कब्जिया लेता है। कहता है, पहले मेरे लोगों को निकालो। हमारे जैसे छोटा आदमी क्या करेगा ???
गाड़ी सहरसा स्टेशन के काफी नजदीक पहुंच गयी थी। अचानक सारे बहस-विवाद बंद हो गये। लोग अपने-अपने बक्शे-बोरे को डब्बे के दरबाजे की ओर खींचने लगे थे।
आंधे घंटे के बाद जब सभी यात्री डब्बे से उतर चुके तो मैं भी उतर गया। प्लैटफार्म से एक नजर पूरी गाड़ी पर दौड़ायी। मुझे यह गाड़ी बड़ी उदास और मनहूस लगी। स्टेशन से बाहर निकलते समय ओवरब्रिज की ऊंचाई से पुनः गाड़ी की ओर देखा। एक बार, दो बार, तीन बार। चौथी बार देखने की हिम्मत नहीं हुई, क्योंकि मुझे यह गाड़ी अब बहुत भयावह लगने लगी थी। कोशी से भी ज्यादा भयावह।


4 टिप्‍पणियां:

चंद्रभूषण ने कहा…

bahut accha piece likha hai aapne. badhai.

सतीश पंचम ने कहा…

लग रहा है कि वहीं कहीं हूँ।

अशोक मधुप ने कहा…

बहुत रोचक। बधाई

रंजीत ने कहा…

aap sab ko sukriya, hausla aafzai ke liye.
Ranjit