बुधवार, 8 जुलाई 2009

दिल्ली वालों की 'दो दृष्टि'

( कोशी बाढ़ - २००८ : जो देखा वो रोया )
दहाये हुए देस का दर्द-50
मिर्जा आसदुल्लाह बेग खान गालिब का एक हर दिल अजीज शेर है- "हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम/ वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती ।'' कल और परसों लोकसभा में इसकी बानगी देखने को मिली। हुआ यह कि बिहार के कुछ सांसद केंद्र सरकार के सौतेले व्यवहार को लेकर सदन में हंगामा करने लगे और बेल तक पहुंच गये। अध्यक्ष मीरा कुमार ने उनकी हरकतों को सदन की गरिमा के विपरीत करार दिया परिणामस्वरूप उनकी बातें हवा में उड़ा दी गयीं, पतंगे की तरह... ताकि सनद नहीं रहे इसलिए उनकी बातें सदन के रिकार्ड में भी दर्ज नहीं हो सकीं। बिहार के सांसद कह रहे थे कि केंद्र सरकार ने कोशी-पीड़ितों के प्रति सौतेला व्यवहार किया है। पहले तो उन्होंने पिछले साल की प्रलयंकारी बाढ़ से उजड़े लोगों के पुनर्वास में कोई दिलचस्पी नहीं ली और अब राहत के नाम पर दी गयीं राशियों की वापसी के लिए तकादे भेजवा रही है। चूंकि बात में दम थी, इसलिए सत्ताधारियों के ललाट की लकीरें मोटी होती दिखीं। और जब इसी तरह के एक मामले को लेकर उड़ीसा के कुछ सांसद भी बिहारी सांसदों के हमराह हो गये, तो सत्तानसीनों की भृकुटियां तमांचे की तरह तन गयीं। ऐसे हालात में प्रत्याकर्मण के लिए भगदड़ और हो-हल्ला से बेहतर कोई औजार नहीं होता , जिसका उन्होंने सहारा लिया। असल मुद्दे गौण हो गये और पल भर में जैसे पसीने गुलाल हो गये।
भले ही इस मुद्दे को लेकर हंगामा सात तारीख को हुआ, लेकिन यूपीए सरकार ने इसकी पटकथा बजट के दिन ही लिख दी थी । सरकार ने बजट में 'आइला' तूफान से पीड़ित पश्चिम बंगाल और बारिश प्रभावित मुंबई के लोगों के राहत के लिए विशेष प्रबंध किया है। इसके लिए बजट में केंद्र सरकार ने करोड़ो रुपये की व्यवस्था की है। लेकिन सूनामी सदृश हादसे के शिकार कोशी के बाशिंदों पर उनकी नजरें नहीं गयीं। इससे एक बार फिर स्पष्ट हो गया कि "दिल्लीवालों'' के दिल में बिहार को लेकर कितनी ममता है। यह कहने की जरूरत नहीं कि बिहार में उन्हें सत्ता वापसी की संभावना नहीं दिख रही और वे पश्चिम बंगाल की जीत से काफी उत्साहित हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि दशकों पहले वामपंथियों के हाथों लूटी अपनी गद्दी को वे अगले विधानसभा चुनाव में हथिया लेंगे। महाराष्ट्र भी इस सोच में फिट बैठता है। लेकिन बिहार ! बिहार के दरबाजे तो उन्हें अभी भी पूरी तरह बंद दिख रहे हैं। 'हाथ' में वो ताकत ही नहीं कि इस दरबाजे पर दस्तक देने का प्रयास भी करे।
लेकिन यह सवाल वोट बैंक आधारित कांग्रेसी नीति से आगे भी जाता है। अगर हम कांग्रेस के स्वर्णकालीन दिनों के इतिहास को खंगालें, तो पता चलता है कि इन पृष्ठों पर भी उनकी बिहार-विरोधी पंक्तियां यत्र-तत्र बिखरी पड़ी हैं। 1980 के पहले के दशकों में बिहार कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। 54 में चालीस-पैंतालीस लोकसभा सीटें उनके झोले में जाती थीं । लेकिन बिहारी नेताओं को केंद्रीय कैबिनेट में जगह पाने के लिए तरसकर रह जाना पड़ता था। विकास की तमाम नयी योजनाएं जब अन्य राज्यों में पुरानी पड़ जाती थीं ,आजमा ली जाती थीं , तब बिहार पहुंचती थीं। चाहे वह ' गरीबी हटाओ' के तहत चलीं योजनाएं हों या फिर '20 सूत्री कार्यक्रम' की परियोजनाएं हों। 'जवाहर रोजगार योजना' हो या फिर रेलवे के अमान परिवर्तन और विद्युतीकरण की योजनाएं हों। इस बार भी रेल बजट में भारत सरकार ने एक नयी योजना की शुरुआत की है। वह है नॉन स्टॉप ट्रेन सेवा की। लेकिन इसमें भी बिहार शामिल नहीं है। यकीन मानिये, अगले पांच-दस वर्षों तक बिहार को यह सुविधा दी भी नहीं जायेगी। यह बात विकास के हर क्षेत्र में लागू होती है। अगर विस्तार से चर्चा हो तो इस पर पूरी किताब लिखी जा सकती है। अभी तक बिहार में कोई केंद्रीय विश्वविद्यालय नहीं खुल सका और न ही यहां आइआइटी और आइआइएम जैसी कोई संस्थान कभी खोली गयी।
ऐसे में अगर कोशी क्षेत्र के लोग कहें कि मुझे नहीं मालूम कि दिल्ली किस देश की राजधानी है , तो आपको उन पर गुस्सा करने का कोई नैतिक आधार नहीं है। पिछले साल कोशी की बाढ़ को जिसने देखा, सबने कहा- यह बाढ़ नहीं, सूनामी है। लेकिन सुनामी पीड़ितों के लिए केंद्र सरकार ने हजारों करोड़ खर्च किए और कोशी पर ? ... जो दिया उसे वापस करो ! देसी जुबान में इसे 'दो दृष्टि' कहते हैं और प्रचलित भाषा में सौतेला व्यवहार ...

7 टिप्‍पणियां:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

aisaa है jiski laathi uski bhains vaali kahaavat theek है yahaan............

Manish Kumar ने कहा…

Koshi nadi aur uske aas paas ke kshetron mein vartmaan halaat se roo baru karane ka shukriya.

Bihar sautele vyavhaar ka shikar raha hai. Par vartman kendriy avam rajya ke netritva se kuch aasha juroor hai ko wo sankeern rajneeti se oopar uthkar bihar ke logon ko badh ki vibhishika se bahar nikalne ke liye sajha sammilit prayason mein rat rahenge.

Madhaw ने कहा…

उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत शुक्रिया...

Kaushal Kishore , Kharbhaia , Patna : कौशल किशोर ; खरभैया , तोप , पटना ने कहा…

रंजीत जी , आपने सही कहा की अगर बिहार के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार पर चर्चा सिलसिलेबार की जाय तो एक पूरी किताब लिखी जा सकती है. नॉन स्टाप ट्रेन की तो चर्चा हुयी पर वर्ल्ड क्लास स्टेशन बनाने के लिए चयनित ५५ स्थानों में बिहार की उपेक्षा को क्या कहा जाय. आखिर किस पैमाने पर पटना को इस ऊची से अलग रखा गया है ?
ऐसा लगता है की भारत वर्ष ( बिहारब के अलावा बाकी
हिस्सों और राज्यों की ) की तरक्की बिना बिहार ( और झारखण्ड भी शामिल कर लें ) और बिहारियों के शोषण के वगैर नहीं होगा ? भारत वर्ष की जिम्मेदारी सिर्फ हमीं लोगों ने उठा रखी है.
कौशल

रंजीत/ Ranjit ने कहा…

हां कौशल जी, बिहार का यही दुर्भाग्य है। दशकों की उपेक्षा ने इस राज्य को कहां से कहां पहुंचा दिया ? कभी नंबर दो स्टेट था बिहार और आज पिछड़ेपन और गरीबी का पर्याय। लेकिन अब जागने का वक्त आ गया है। केंद्र से उपेक्षा का हिसाब मांगना, हर देशभक्त का कर्त्तव्य बन जाता है। बिहार को उपेक्षित रखकर और उसके साथ सौतेला व्यवहार कर के देश आगे नहीं बढ़ सकता। लेकिन आंदोलन की शुरुआत बिहारियों को ही करनी होगी। एक पुरानी कहावत है कि जबतक बच्चा रोता नहीं तबतक मां भी उसे दूध नहीं पिलाती।

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

उत्तर प्रदेश और बिहार - ये दोनों राज्य हमेशा से केन्द्र के सौतेलेपन के शिकार रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि सबसे ज़्यादा नेता इन्हीं दो राज्यों से आते हैं और राजनीति की फ़सल वहां अच्छी नहीं उतरती जहां लोगों के पेट में दाने होते हैं. इसलिए सोच-समझ कर इन दोनों राज्यों को भूखा-नंगा बनाने के लिए ज़ोरदार कोशिशें चल रही हैं. ज़रा ग़ौर फ़रमाएं- आज़ादी के बाद इन दोनों राज्यों कि कृषि योग्य भूमि भू माफ़ियाओं के हाथ गई है. उद्योग बन्द हुए हैं. नया कुछ लगा नहीं. आख़िर क्यों भाई?

kalpana lok ने कहा…

vastav me ye koi aj se yeh silsila nahichala aa raha hai... bhedbhao hamesa se hota aa raha hai.. nikammme sansad to bas apne rotian sekte hai... bahut achha ise tarah age bhe janta ki bato ko rakhte rahie.....