बुधवार, 1 अप्रैल 2009

कोशी से मुंह छिपाते नेता

दहाये हुए देस का दर्द-40
आठ महीने में पहली बार कोशी नदी को बधाई देने का मन करता है। लेकिन यह सकारात्मक नहीं नकारात्मक बधाई है। बधाई इसलिए क्योंकि गत अगस्त में आयी कोशी की प्रलयंकारी बाढ़ ने राजनेताओं के असली चेहरे सामने ला दी है और नकारात्मक इसलिए कि यह हर्ष नहीं, बल्कि विषाद भरी अभिव्यक्ति है। कुछ वैसे ही जैसे छद्म दोस्तों और शुभचिंतकों की पहचान कराने के लिए हम दुर्दिन को बधाई देने लगते हैं। मैं भी राजनेताओं के असली चेहरे और जनता के प्रति उनके दिखावे के प्रेम को उजागर करने के लिए अगस्त की कोशी-बाढ़ को बधाई देता हूं।
आज जब पूरे देश में चुनावी बयार बह रही है और राजनीतिक पार्टियां एवं उनके नेता सड़कों की खाक छान रहे हैं, तब कोशी क्षेत्र में ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं देता। बिहार की वर्तमान राजनीति के चारों महारथी खगड़िया जिले से पूर्व -उत्तर की ओर जाने की हिम्मत नहीं बटोर पा रहे हैं। क्या लालू क्या रामविलास, क्या नीतीश, क्या मोदी, सबों की दौड़ खगड़िया की सीमा में पहुंचकर खत्म हो जा रही हैं। अगर यह सच नहीं होता, तो लालू इस बार भी यादवों के रोम के नाम से प्रख्यात मधेपुरा से फिर चुनाव लड़ रहे होते और कोशी क्षेत्र के जदयू क्षत्रप विजेंद्र यादव सुपौल से टिकट लेकर मैदान में पसीना बहाते नजर आते। साल भर पहले वे चुनाव लड़ने का मंसूबा बना रहे थे और आज चर्चा तक नहीं कर रहे।
दरअसल, बिहार के नेताओं को यह अच्छी तरह पता चल चुका है कि कोशी क्षेत्र अब उनके पहुंच से बाहर जा चुका है। उन लोगों ने बाढ़ से पहले, बाढ़ के समय और उसके बाद अपनी भूमिका नहीं निभायी। उस पर तुर्रा यह कि वहां कि जनता भी उनकी हकीकत पहचान गयी। जनता को पता चल चुका है कि नेताओं ने उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया। जनता किसी एक दल से गुस्सायी नहीं है। उसने प्रलय के इतिहास को खंगाल दिया है। उन्हें यह जानकारी हासिल हो चुकी है कि सभी सरकारों ने इस प्रलय की पृष्ठभूमि तैयार की। वर्षों तक कोशी के रखरखाव व तटबंध मरम्मत की राशि को लूटा गया और नदी को खूंखार बनने के लिए छोड़ दिया गया। इसलिए कोई भी माफी के काबिल नहीं। ईश्वर को छोड़ बाकी सब ने उनके साथ मजाक किया है। उनकी छह दशकों की कमाई, घर-द्वार, खेत-मवेशी को स्वाहा होने का रास्ता बनाया है । हम उन्हें कभी माफ नहीं करेंगे।
यही कारण है कि जब बिहार में हर एक सीट के लिए , हर एक टिकट के लिए, हर एक पार्टी में कुश्ती हो रही है, कोशी में कोई बड़े नेता चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। न ही इस क्षेत्र में टिकटों की मार है। यह किसी एक पार्टी की स्थिति नहीं, बल्कि सभी पार्टियों का हाल है। जो नेता चुनाव लड़ रहे हैं, वे भगवान के भरोसे हैं। किन्हीं पार्टी के किन्हीं नेता को अपनी जीत का विश्वास नहीं है। अगर दूसरे शब्दों में कहें तो वह यह मानकर चलने लगे हैं कि कोई एक तो जीतेगा ही, शायद वह लॉटरी मेरे नाम लग जायें!
मुझे नहीं लगता कि भारत के चुनावी इतिहास में ऐसी स्थिति कभी देखने को मिली होगी जब हर पार्टी एक हारे हुए मुकाबले को लड़ रही है। जनता की मजबूरी है, इसलिए कोई एक तो चुनाव में विजयी होगा ही, लेकिन वह कौन होगा, इसके बारे में कोई नहीं जानता। क्या यह प्रजातंत्र की सीमा नहीं है ? क्या यहां आकर प्रजातंत्र की सारी खूबियां खत्म नहीं हो जाती हैं ? जनता को एक भी ऐसा उम्मीदवार नजर नहीं आ रहा, जिन पर वे विश्वास करें और जिनसे वे उम्मीद करें कि वह हमारे बारे में सोचेगा। यह यक्ष सवाल है, जो कोशी ने उठाया है ? अगर हमारी राजनीति नहीं सुधरी तो शायद देश के अन्य भागों में भी यह सवाल आगे उठता रहेगा, क्योंकि हमारी राजनीति लोक-विमुख हो चुकी है।

3 टिप्‍पणियां:

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

कुछ भी कहना नहीं चाहूंगा, विस्थापन का दर्द इस बार मतदान के बाद ही पता चलेगा......

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सही विचार ... सटीक आलेख लिखा है।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कोशी के लोगों को इस बार बता देना चाहिए अपनी बात ..........
किसी भी नाम वाली पार्टी का नेता नहीं जीतना चाहिए........सब की जमानत जब्त हो तब इनको पता चलेगा....लोगों को भी कोशी की तरह आपने तेज दिखाना चहिये