शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

रेत भरे उस गांव में

रेत भरे उस गांव में
तलवे फटे उस पांव में
बीमारियों के छांव में
अब न चूं हैं न नाव हैं
फिर भी लोकतंत्र महफूज है !

दलित-भंगियों के उस टोले में
दहाये घरों के उन खूंटों में
नंगे बच्चों के उन झोलों में
न बेर है न बबूल है
फिर भी लोकतंत्र महफूज है !

कागज के पन्ने कहते हैं
नेताओं के चमचे पढ़ते हैं
कि इस गांव में पांच हजार वोटर रहते हैं
मुखिया-सरपंच को छोड़ दो, तो बांकी फांके करते हैं
सोनाई मुसहर कि माने तो
न वोट है न वोटर है
फिर भी लोकतंत्र महफूज है !
 

2 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

काबिले गौर रचना ...बिलकुल जमीनी हकीकत बयान करती रचना

ZEHAR ने कहा…

media ko kayon bakas rahe hain ...
eseb bhi lapatiye