मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

पीसते रहो किसान को / उपजाओ तो 7 रुपये बेचो तो 20 रुपये

जब मंदी की मार से अमेरिका, यूरोप और कई अन्य औद्योगिक देश पीपल के पात की तरह फड़फड़ा रहे हैं, तो अपने यहां के नेता-मंत्री मूंछ टेरकर कह ते फिर रहे हैं कि देखिए- हम अभी भी बचे हुए हैं। हमारी स्थिति उतनी खराब नहीं है। मंदी के बाघ ने अमेरिका-यूरोप को काट खाया है, लेकिन हमें बख्श दिया है। हमें सिर्फ खरोंचे आयी हैं। हमें दाद दीजिए, हमारी सरकार की नीतियों की पीठ को थपथपाइये कि हमने आपको मंदी के बाघ से अभी तक बचाये रखा है। इसके बाद वे अर्थशास्त्र के बड़े-बड़े गूढ़ आंकड़ें और ग्राफ सुनाने-दिखाने लगते हैं। और हम कुछ देर के लिए राहत महसूस करने लगते हैं। हालांकि अगले ही क्षण जब हम झोला लेकर किराना दुकान पहुंचते हैं, तो हमें चीजें अभूतपूर्व तौर पर असामान्य और अविश्वसनीय लगती हैं। सब्जी बाजार पहुंचते-पहुंचते हमारे हलख सूख जाते हैं। मंदी से बचे रहने और महंगाई से घायल होने में क्या फर्क है, हमारी बुद्धि में यह बात नहीं अंटती। हालांकि हम संदेह खूब करते हैं और सोचते हैं कि घर में कहीं- न -कहीं कोई चोर छिपा हुआ है।
असलियत पर से पर्दा तब उठता है जब हम शहर से गांव पहुंचते हैं। अभी देश के गांवों में गेहूं की फसल तैयार हो रही है। लेकिन शायद बहुत कम शहरी लोगों को पता होगा कि किसानों केगेहूं किस दर पर बिक रहे हैं? कहीं-कहीं सात रुपये किलो, तो कहीं आठ रुपये किलो। बस। शहर में इसी गेहूं का आटा 20 रुपये किलो बिक रहे हैं। मतलब यह कि एक किलो गेहूं को आटा बनाने और उन्हें थैलों में बंद करने के लिए उपभोक्ताओं से 12-13 रुपये वसूले जा रहे हैं। क्या दुनिया के किसी भी अर्थशास्त्र में इसे व्यापार कहा जायेगा। अगर यह व्यापार है, तो लूट किसे कहेंगे? दरअसल, गेहूं तो एक उदाहरण है, सच्चाई यह है कि किसान की चीजों का अब कोई मूल्य ही नहीं रहा, इस देश में। किसानों के उत्पाद जबतक उनके पास रहते हैं तबतक वह कौड़ी है, लेकिन व्यापारियों और बिचौलिए के पास पहुंचते ही वह सोना हो जाता है। हिमाचल और महाराष्ट्र के अंगूर और संतरा उपजाने वाले किसानों से पूछिये कि वे किस दर पर बेचते हैं अपने अंगूर और सेव। जिस संतरा को शहर में हम 30-40 रुपये किलो खरीदते हैं, वही संतरे किसानों से 2-3 रुपये किलो खरीदे जाते हैं। यही हाल चावल, सरसों, अरहर, जूट और अन्य फसलों का भी है।
अब आप कहेंगे कि इसका मंदी से क्या रिश्ता है। मंदी से इसका सीधा रिश्ता नहीं है, लेकिन मंदी के बाघ से बचे रहने के पीछे की सबसे बड़ी वजह यही है। इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य, लेकिन यह सच है कि आज भी भारतीय किसान वैश्विक अर्थव्यवस्था के जाल से बचे हुए हैं। देश की पैंसठ प्रतिशत आबादी आज भी गांव में रहती है और उनकी आजीविका का बड़ा आधार आज भी खेती है। और भारतीय खेती आज भी वैश्विक अर्थ- प्रणाली के हिस्से नहीं हैं। इसलिए मंदी और तेजी की करंट उन तक नहीं पहुंचती। साथ ही मंदी की जो करंट देश में पहुंच रही हैं उन्हें किसान सोख भी रहे हैं। पूछियेगा कैसे ? तो जवाब है- भूखे रहकर, निर्वस्त्र रहकर, गरीबी रेखा से नीचे जाकर, अशिक्षित रहकर और आत्महत्या कर...
इन बातों को और स्पष्ट किया जा सकता है। किसान न्यूनतम-से-न्यूनतम आय में भी जीने के आदि हैं। उनके पास न पैसा है और न ही उपभोक्तावादी मानसिकता। जिनके परिणामस्वरूप वे बाजारवादी व्यवस्था के हिस्सा नहीं बन पाये हैं। यही कारण है कि वे वैश्विक अर्थव्यवस्था के उदय और अस्त, उतार व चढ़ाव से अछूते हैं। जबकि दूसरी ओर ये देश की अर्थव्यवस्था के लिए शॉक एबजार्बर की भूमिका भी निभा रहे हैं। इनका कोई संगठन नहीं है। कोई सामूहिक आवाज नहीं है। इसलिए सरकार इन्हें बहुत आसानी से उपेक्षा करती आगे बढ़ जाती है। गेहूं आठ रुपये बीके या पांच रुपये, सरकार को इससे कोई लेना-देना नहीं। सरकार को इस बात से भी कोई लेना-देना नहीं कि उनके द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य का कौन पालन कर रहा है और कौन उल्लंघन। आखिर न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ किसानों को निश्चित कराने के लिए देश की किसी भी सरकार ने आज तक कोई एजेंसी का गठन क्यों नहीं किया। क्या आपने कभी सुना है कि सरकार ने किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दर पर फसल खरीदने वाले किसी व्यवसायी या संगठन को दंडित किया है ? या अपने स्तर से खरीद सुनिश्चित करने का पुख्ता इंतजाम किया है ?
दरअसल सरकारों को इस बात से भी कोई मतलब नहीं कि एक किलो गेहूं को आटा बनाने के लिए व्यावसायिक कंपनियां 12-13 रुपये जनता से वसूल रही हैं। इतनी रकम तो सोना से गहना बनाने वाले कारीगर भी नहीं वसूलते होंगे। लेकिन सरकार ब्यूरोक्रेट, व्यापारी, कंपनियों के साथ यही सलूक नहीं कर सकती। उन्हें थोड़ी-सी भी खरोंच आये , तो सरकार मल्हम-पट्टी लेकर खड़ी हो जाती है। चाहे जैसे भी हो, सब्सिडी देकर या वेतन-भत्ते बढ़ाकर, आयात-निर्यात-व्यापार शुल्कों में कमी-वृद्धि करके सरकार उनकी खिदमत के लिए तैयार रहती है। क्योंकि कुर्बानी देने और मरने के लिए तो साठ-सत्तर करोड़ ग्रामीण आबादी है ही।
वस्तुतः जो समुदाय सरकार पर दबाव बना सकता है, उनके लिए वे भारी मात्रा में सहायता राशि की घोषणा कर रहे हैं। इसके लिए किसानों की बलि चढ़ायी जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो सत्तर करोड़ लोगों की कीमत पर चंद करोड़ लोगों की रक्षा की जा रही है। और सरकार कह रही है कि हम मंदी की मार से बचे हुए हैं। अरे भाई ! मंदी की मार से आप नहीं बचे हुए है, बल्कि यह किसानों का बलिदान है जो आपको बचाये हुए है। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर आप कब तक किसानों का खून चूसते रहेंगे। कभी न कभी तो वह आह कहेगा और पत्थर उठायेगा, तब आप क्या करेंगे?

4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

रंजीत जी आपने किसानों की व्यथा को सही उकेरा है। उनके पसीने की सही कीमत नही मिल पाती। दलाल कही भी हो मौज करता है। जब तक किसानों को उनकी मेहनत का वाजिब दाम नही मिलेगा तब तक यह देश सही मायनों में तरक्की नही कर सकता है।

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

बिलकुल सही बात आपने कही है और बड़े प्रभावशाली ढंग से. एक सन्दर्भ में मेरा निवेदन है आपसे. आपने लिखा है :

'अब आप कहेंगे कि इसका मंदी से क्या रिश्ता है। मंदी से इसका सीधा रिश्ता नहीं है, लेकिन मंदी के बाघ से बचे रहने के पीछे की सबसे बड़ी वजह यही है।'

मेरी समझ से इस पर पुनर्विचार की ज़रूरत है. मन्दी की सबसे बड़ी वजह ही अत्यधिक मुनाफ़ाखोरी है. चीज़ों के दाम इतने ज़्यादा बढ़ा दिए गए कि ख़रीदना आम लोगों के बस की बात नहीं रह गई. बस ख़रीदने की प्रक्रिया बन्द हो गई और मन्दी आ गई. इस बारे में आपका क्या ख़याल है?
और हां! सोचिए कि इस दिशा में किया क्या जा सकता है. क्या इससे उबरने के लिए छोटे स्तर से कुछ किया जा सकता है?

Jayant Chaudhary ने कहा…

जो आपने कहा है वोह १००% सच है.
आपने इस देश को आइना दिखाने का प्रयास किया है.
हार्दिक धन्यवाद..

सच में जय तो आपकी और हमारे किसानो की है!!

जयंत

रंजीत ने कहा…

आदर्णीय सांकृत्यायन जी, टिप्पणी और सुझााव के लिए शुक्रिया। तुलनात्मक तौर पर विश्व व्यापी मंदी के भारत पर कम प्रभाव पड़ने के पीछे की एक वजह पर आपने कुछ सुझााव दिए हैं। मैं भी आपके इस विचार से सहमत हूं कि यह मंदी अत्यधिक मुनाफाखोरी का परिणाम है। यह तो स्थापित सच है और इससे इंकार कौन कर सकता है कि जब आम लोगों की क्रय शक्ति कमजोर पड़ने लगती है और चीजों के दाम बढ़ते या स्थिर होते चले जाते हैं तो बाजार का गणित नकारात्मक हो जाता है और मंदी आ जाती है।
मैंने आलेख में इस बात की जिक्र की है कि इस मंदी के प्रभाव को किसान या ग्रामीण अर्थ व्यवस्था ने कैसे न्यूट्रीलाइज किया है। बताने की आवश्कता नहीं है कि देश के सत्तर से ज्यादा फीसद लोग गांव में रहते हैं। इनमें से अधिकांश आज भी आधुनिक अर्थ व्यवस्था में सीधे-सीधे भागीदार नहीं हैं। मसलन शेयर मार्केट में ग्रामीणों का निवेश शायद नगण्य ही होगा। बैकिंग, टेलीकम्यूनिकेशन, आउटसोर्सिंग आधारित अर्थव्यवस्था में भी ग्रामीणों की भागेदारी न के बराबर होगी। और आप भी मानेंगे कि यही वे प्रक्षेत्र हैं जहां आर्थिक मंदी का सीधा प्रभाव पड़ा है। तो इसका मतलब यह हुआ कि देश की बड़ी ग्रामीण आबादी को इन प्रक्षेत्रों की गिरावट ने सीधा अपने आगोश में नहीं लिया। हालांकि सूक्ष्मतर प्रभाव उन पर भी पड़ेगा ही। मैंने यह कहने का प्रयास किया है कि मंदी के दिनों में भी देश की बड़ी ग्रामीण आबादी ने सरकार के लिए चिंता पैदा नहीं की है।
जहां तक मंदी से निपटने के लिए छोटे स्तर पर प्रयास के संदर्भ में सोचने की बात है, तो मुझे लगता है कि भारत के लिए आज भी पारंपरिक उद्यम प्रणाली बेहतर है। हालांकि मुझे अर्थशास्त्र की गूढ़ जानकारी नहीं है फिर भी मुझे लगता है कि हमें तीव्र विकास के सपने देखने बंद करने होंगे। लघु, कुटीर और लोक उद्यम इस देश में आज भी प्रासंगिक है। दैनिक उपभोग की वस्तुओं के उत्पादन में बड़ी कंपनियों को प्रवेश देना हमें बंद करना चाहिए। कृषि प्रक्षेत्र को विदेशी पूंजी निवेश या वृहत आर्थिक निवेश से अलग रखना ही हमारे लिए बेहतर होगा। हम कृषि उत्पादों के वैल्यू एडीशन और प्राइमरी प्रोसेसिंग में काम कर विदेशी अर्थ व्यवस्था के जाल से मुक्त हो सकते हैं। औद्योगिक देशों के आर्थिक मॉडलों को कॉपी करने की प्रवृत्ति हमें छोड़नी ही होगी। और सबसे बड़ी बात यह कि देश के मध्य वर्गों को तीव्र धन वृद्धि की आस छोड़कर, स्थायी पूंजी निवेश के बारे में सोचना होगा। हमें अपनी चिंता करनी चाहिए न की औद्योगिक देशों की। और अगर हम अनुपयोगी, विलासी, स्टेटस सिंबॉल की चीजों से परहेज करते हैं, तो हम अपना ही भला कर रहे हैं।
आपको बहुत-बहुत धन्यवाद
सप्रेम
रंजीत, रांची