रविवार, 2 अगस्त 2009

...और छोड़ा बच गया

दहाये हुए देस का दर्द-51
चार बांस की बल्लियों पर लटके टिन के चदरे के नीचे महेसर पासवान की चाय दूकान है, जिसमें काम करता है मुनेसरा। बगल में एनएच-57 का काम चल रहा है। गेमन इंडिया के इंजीनियर और ठेकेदार को चाय पिलाता है, मुनेसरा। जब समय मिलता है तो हमउम्र लड़कों के साथ दो-चार दांव गुड्डी कबड्डी भी खेल आता है। चाय बनाने और पिलाने के अलावा वह देसी गाली बकने में भी माहिर है और अक्सर दारोगा, जमादार और बीडीओ को नाम लेकर गलियाता रहता है।
"... मादर चो... बेटी चो, तोरा घर में सुअर मरे... तोरा जोरू के धमना काटे... मघैया डोम के जनमल सार बीडीओवा...'
यही कोई 13-14 वर्ष का होगा मुनेसरा। उसका बाप कोसी की बाढ़ में भसिया गया। लाश भी नहीं मिली। मुनेसरा इसलिए बच गया क्योंकि वह तैरना जानता था और जब 19 अगस्त 2008 की अहले-सुबह कोसी ने फुफकार के साथ भीमपुर बाजार को ग्रस लिया, तो वह लोटा खाली करके मैदान से लौट रहा था। पल भर में ही पूरे भीमपुर में डूबा पानी फैल गया। मुनेसरा तैरकर सरकारी स्कूल की छत पर पहुंचा। दो दिन और दो रात खुली छत के एक कोने में बैठे रहा। शुरू में छत पर कई लोग थे, लेकिन धीरे-धीरे वे प्राइवेट नाव के सहारे सुरक्षित स्थानों की ओर निकल गये। मुनेसरा अपने मां-बाप की प्रतीक्षा करता रहा, जो कभी नहीं आये। तीन-चार दिनों तक बिना कुछ खाये-पीये मुनेसरा स्कूल की छत पर बैठे रहा। कोसी के कठ-खेल को देखते रहा, कभी रो कर तो कभी आंख मूंदकर। जब भूख बर्दाश्त से बाहर हो गयी, तो उसने एक उपाय खोज निकाला। बगल में कदम का पेड़ था, जिसमें खूब फल लगे थे। मुनेसरा उसी के सहारे दिन काटने लगा । प्यास जब असहनीय हो जाती, तो वह बाढ़ के पानी में ही चुलू लगा देता। लेकिन दो दिन के बाद वह बीमार हो गया। पेट और मूंह साथ-साथ चलने लगा। लेकिन मरने से कुछ वक्त पहले एक एनजीओ कार्यकर्ता की नजर उस पर पड़ गयी। बोला- इट इज एक्यूट केस ऑफ डॉयरिया, अ फ्लड वाटर ड्रंक !
उसकी हालत को बयां करते चायवाला महेसर पासवान कहता है- "सरवा के पेट पीठ से सट गिया था। येनजीओ वाला डॉगडर निरैश (समर्पण कर देना) दिया था। नाउ होफ , नाउ होफ कहता था डॉगडर। उन लोगों के पास कुछ खास दवा-दारू भी नहीं था। लेकिन दो बोतल पानी चढ़ाने के बाद मुनेसरा को प्राण आने लगा। द्वि मास तक तें खटिया पर पड़ा रहा, चलता भी था तो लंगड़ी बकरी के जैसन ... हा- हा ! आब देखिये ने सरवा कें , भर दिन में दस पुड़िया गुटखा गटक लेता है...''
मुनेसरा- "हं, हं, आप ही देखते हैं कि दस गो पुड़िया गुटखा खाते हैं ?''
महेसर - "तो क्या ? हम झूठ कहते हैं, सरवा दांत दिखाओ तो इनको, सैड़ गिया है, रे बहान कें ... और गप्प नहीं मारो, तीन कप चाय तेनालिया के दूकान पर जल्दी से पहुंचा आओ । ''
लेकिन मुनेसरा नहीं हिला। मालिक ने क्या कहा, जैसे उसे सुनाई ही नहीं दिया। वह एक टक हमें देखते रहा। जब हम उठने लगे, तो उसने कहा, "साहेब मेरे बाप के बारे में अखबार में छापिये ना... ऊ मरा नहीं होगा, लगता है भसिया कर किसी दूसरे मुलूक में पहुंच गिया है। मेरी बात कोई नहीं सुनता। दरोगा-जमादार मादर्च... '' इतना कहकर वह जैसे किसी अनंत सून्य में खो गया।
जब हम वहां से जाने लगे तो दूकानदार महेसर ने भी उसकी पैरवी की, "छोड़ा ठीके कहता है साहेब एकर बाप के लिए कुछ कीजिए न साहेब। सरवा जब-तब भोकार पार-पार कें रोने लगता है।''

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

मोरे द्वार ख़डे अकाल

सन्‌ 64 का अकाल देख चुके भरथी कमार अब सत्तर के ऊपर के हो चले हैं । कभी न सूखने वाले बोचहा पोखर के महार पर केले के भालर (सूखी डाल) की तरह ख़डे भरथी कभी सूखे ताल की थाल को घूरते हैं तो कभी सफेद रूई का कारवां हांकते बादलों को। जैसे वे बादल नहीं, झग़डकर नैहर भागती निर्मोही जोरू हो। सावन के इन बेवफा बादलों को भरथी लगातार घूर रहा है। कुछ इस तरह जैसे शिकार के बचकर भाग जाने के बाद शिकारी कभी हथियार को तो कभी निशाने चूके हाथ को देखते हैं। और बाद में मन-ही-मन दोनों को कोसकर चुप हो जाते हैं। पैरों पर च़ढते बदतमीज लहरचिट्टे को बायें हाथ से झा़डते भरथी बुदबुदाते हैं- " किछ दिन आउर रूक सार, फेर तें नै तू बचेगा नै हम ! जे 64 में बइच (बच) गिया था सेहो नै बचेगा एही साल!! ''
महार पर ही बरगद का एक विशाल वृक्ष है। एक महीना पहले तक यह वृक्ष सारस, पनकाैआ, बगुला और गरूर के शोर से हर पल गुलजार रहता था। लेकिन अब उनके घोंसले खाली हो चुके हैं। जीवन के जुगा़ड में ये उत्तर की ओर निकल गये हैं... शायद हिमालय की ओर। गृहस्थ की गैरहाजिरी का उदविलाव और धामिन सांप ने जमकर फायदा उठाया है। बड़े पक्षियों के अंडों को चट करने के बाद अब उनकी नजरें मैनों, बगड़ों और धनचिहों जैसी कमजोर चिि़डयों के गेलहों व अंडों पर पर हैं। ठीक बस्ती के धनवानों और प्रखंड एवं अनुमंडल कार्यालयों के बाबू-अधिकारियों की तरह। इन बाबुओं के गालों पर जगह-जगह चौअन्नी मुस्कान उभरने लगा है। आखिर क्यों न उभरे ? अकाल की तिजारत तो इन्हें ही करनी है ना ! अकाल की फसल खूब लहलाहायेगी एही बेर , का हो यादव जी ! हें -हें -हें .... देखिये , पहले विधायक -मंत्री से बचेगा , तबे न !! हें -हें -हें ...
यह बिहार के उत्तर-पूर्वी जिले अररिया के कुसमौल गांव का एक दृश्य है, जो अब समूचे बिहार में पसर गया है। सूख कर पुआल बन चुके धान के बिचड़े और खेतों में उड़ते धूल इस दृश्य को भयावह बना रहे हैं। नाद पर बंधे बैलों की जोड़ी, जो मानसून की बेवफाई से बेकार हो गये हैं, अक्सर एक-दूसरे के माथे को चाटते रहते हैं। पता नहीं, एक-दूसरे को सांत्वना दे रहे या मातम मना रहे ! कहते हैं कि पशुओं को अनिष्ट का भान पहले हो जाता है।
उधर खेतों में मानसून के अत्यधिक विलंब के कारण खरीफ के सीजन में ही रवी का नजारा है। रोपनी के लिए तैयार हाथ रेलवे स्टेशनों पर पंजाब, लुधियाना, सूरत और दिल्ली की टिकट खरीद रहे हैं। फारबिसगंज, कटिहार, सहरसा, बरौनी, समस्तीपुर, हाजीपुर, रक्सौल, दरभंगा, पटना जैसे स्टेशनों पर पलायन करने वालों का हुजूम उमड़ रहा है। बेटे तो पलायन करके पेट पाल लेंगे, लेकिन गांव में रह जाने वाले बूढ़े मां-बाप, बहन, बेटी, पत्नी और बच्चों का क्या होगा? भरथी कहता है- "आब जे होगा, से देखा जायेगा। ऊपर वाले की मर्जी होगी तो बइच जायेंगे, नहीं तो ???? ... मर जायेंगे !!! ''

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

सौंदर्य और भरोसा

इस पेड़ को पिछले साल सुपौल जिले के दौलतपुर गांव में देखा था । कोशी की प्रलयंकारी बाढ़ में यह बाल-बाल बच गया था। पहली बार जब इसे देखा तो देर तक निहारते रह गया। तकरीबन 10 मिनट तक। फिर इसके नीचे बेमतलब घंटों बैठा रहा। आसपास के लोगों ने समझा - " शायद दुखियारा है, ग्राम देवता को मनोती रखने आया है।'' जब तस्वीर उतारी तो वे हैरत में पड़ गये और बोले- " कोई सरकारी आदमी होगा, गाछी (पेड़) का नापी-जोखी कर रहा है।'' तस्वीर शहरी मित्रों को दिखाई, तो उन्होंने पेड़ का नाम पूछा और कहा- "क्या मस्त पेड़ है, यार ? लेकिन तुम इसे इतना महत्व क्यों दे रहे हो ? क्या खास बात है इसमें ? '' मैंने कहा- इसमें सौंदर्य है। यह मुझे भरोसा दिलाता है कि दुनिया में अब भी सुंदरता बची हुई है।
 

सोमवार, 20 जुलाई 2009

... तो चिड़िया उड़ा दूंगा रनवे पर ! (एक अजूबे शख्स की कहानी )

जादूगर नहीं है वह और न ही कोई आतंकवादी है, लेकिन वह अकेले हवाई जहाजों को उ़डान भरने से रोक सकता है। उसके करतब फंतासी कहानी जैसी है। जो भी उसे देखता है बस दांतों तले अंगुली दबा कर रह जाता है। वह हवाईअड्डे के रनवे को जाम कर सकता है। उन पर चिडयों का प्रदशर्न करवा सकता है, उनसे धरना दिलवाकर एयर ट्रैफिक कंट्रोल के इंजीनियरों को निस्सहाय कर सकता है। विमानन कंपनियों के टाइम-टेबल की ऐसी की तैसी कर सकता है, क्योंकि उसके एक इशारे पर हजारों चिड़िया जान देने के लिए न्योछावर रहती हैं। वह जब जहां चाहे वहां हजारों चिडियों को बुला सकता है। उसकी आवाज सुनते झुंड-के-झुंड पंक्षियां भागे-उ़डे चले आते हैं।
इस अद्‌भुत शख्स का नाम है- गौतम सप्तकोसा। 25 वर्ष का यह युवक तराई नेपाल के गधीगांव, मकवानपुर का रहने वाला है और अलग-अलग प्रजातियों की 175 चिडियों की आवाज निकालने में माहिर है। गौतम सप्तकोसा चिडियों का नकल ही नहीं करता, बल्कि चिडियों की आवाज में ही उनसे संवाद व समन्वय भी कायम कर लेता है। पल भर में चिडिया उसका गुलाम बन जाती है और सामने आदेशपाल की तरह हाजिर रहती है।
गौतम ने यह हैरतअंगेज गुर एक दिन में नहीं सिखा है। बकौल गौतम , " चिडियों की भाषा समझने के लिए मैंने अकेल चार वषर् घने जंगलों में बिताया है। लाख कष्ट उठाकर दिन-रात मेहनत की हैै। मुझे मालूम है कि चिडिया कब काैन-सा स्वर निकालेगी। मैं जानता हूं कि चिडिया उ़डने से पहले, प्रणय निवेदन से पहले, घोंसला में लाैटते वक्त और लाैटने से पहले कैसी-कैसी आवाज निकालती है। मैंने चिडियों के आपसी संवाद आैर समन्वय प्रक्रिया का बारीक अध्ययन किया है कि वह किस गतिविधि के लिए कैसी आवाजें निकालती है। बस इसी जानकारी के बल पर मैं उन्हें अपने पास बुला लेता हूं।'
गौतम अपनी इस अजीबोगरीब उपलब्धि को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज करवाना चाहता है। इसके लिए उसने नेपाल सरकार को कई मतर्वे चिट्ठी लिखी और गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के ऑथिरिटी से भी संपर्क किया। लेकिन अभी तक वह इसमें कामयाब नहीं हो सका है। ग्रामीण पृष्ठभूमि के गौतम का कहना है कि सरकारी अधिकारी उनकी मदद नहीं कर रहे। सरकारी असहयोग के कारण वह काफी दुखी है।
सरकार के असहयोग से हतोत्साहित गौतम ने हाल में ही नेपाल सरकार को धमकी देते हुए कहा है कि अगर उनकी इस अनूठी उपलब्धिक को वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल कराने लिए प्रयास नहीं हुये, तो वह काठमांडू के त्रिभुवन हवाईअड्डे पर विमानों का परिचालन बंद करवा देंेगे। बकौल गौतम,"मैं गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल होने के लिए लंबे समय से प्रयास कर रहा हूं। हमने सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं। देश के विदेश, वित्त और वन मंत्रालय को भी सारे कागजात व सबूत मुहैया करा दिये हंै, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिल रहा है। कोई मेरी सहायता नहीं कर रहा। अगर सरकार मेरी नहीं सुनेगी, तो मैं तीन महीने बाद त्रिभुवन हवाईअड्डे पर विमानों का परिचालन ठप करवा दूंगा। मेरी आवाज पर हजारों चिड़िया रनवे के ऊपर मंडराने लगेंगी और सब देखते रह जायेंगे।'
लेकिन यह बात समझ में नहीं आ रही कि दुनिया भर के पक्षीशास्त्री (ऑरनिथोलॉजिस्ट) गौतम से संपर्क क्यों नहीं कर रहे ? अगर वास्तव में इस युवक ने पक्षियों की चहचहाहट को डिकोड किया है, तो यह मानवेत्त्ार भाषा विज्ञान के क्षेत्र की एक युगांतकारी घटना है। गौतम की मदद से चिड़ियों के बारे में कइर् अनसुलझे सवालों को सुलझाया जा सकता है। गौतम चिड़ियों की विलुप्तप्राय प्रजातियों को पहचानने और उनके संरक्षण के काम में भी ब़डा योगदान दे सकता है।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

एक जरूरी किताब

जनपक्षीय पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध कलमकार पुष्पराज की पुस्तक "नंदीग्राम डायरी' का बीते बुधवार को नयी दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में लोकार्पण हुआ। पुस्तक का लोकार्पण प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी और कुलदीप नैयर के हाथों संपन्न हुआ। समारोह में देश के कई जाने-माने लेखक-पत्रकारों ने नंदीग्राम डायरी और इसके लेखक पर अपने विचार रखेे। इनमें प्रिसद्ध हिन्दी आलोचक नामवर सिंह व मैनेजर पांडेय और मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर शामिल हैं। लोकार्पण समारोह में समकालीन हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण कवि-पत्रकार मंगलेश डबराल और कवि मदन कश्यप व अशोक चक्रधर भी उपस्थित थे। इनके अलावा प्रसिद्ध पत्रकार वेंकटेश रामकृष्णन , आनंद स्वरूप वर्मा, अजीत भट्टाचार्या, पुण्य प्रसून वाजपेयी, अरविंद मोहन और कथाकार हिमांशु जोशी समेत कई जाने-माने बुद्धिजीवी लोकार्पण समारोह में उपस्थित हुये।
"नंदीग्राम डायरी ' पुष्पराज के लगभग डेढ़ वर्षों के गहन परिश्रम के बाद सामने आयी है। नंदीग्राम हादसे का पुष्पराज गवाह रहे हैं। उन्होंने नंदीग्राम हादसे पर कई अखबारों के लिए रिपोर्टिंग भी की थी।
पुस्तक का प्रकाशन पेंगुइन बुक्स के हिन्दी इकाई यात्रा बुक्स ने किया है। यात्रा बुक्स पेंगुइन प्रकाशन के लिए भारत में समन्वय का काम करता है। 326 पृष्ठों की पुस्तक का मूल्य 250 रुपये रखा गया है। पुस्तक विभिन्न वितरकों के माध्यम से देशभर में उपलब्ध होगी अथवा सीधे यात्रा बुक्स से संपर्क करके भी इसे प्राप्त किया जा सकता है।
बिहार की माटी के कलमकार पुष्पराज ने विगत के वर्षों में कलिंगनगर में आदिवासियों के विस्थापन के मुद्दे से लेकर प्लाचीमाडा, केरल में कोका कोला के खिलाफ जन उभार और कोशी बाढ़ तक पर बेहतरीन रिपोर्टिंग की है। उनकी अपनी विशिष्ट लेखन शैली है और वे आम जन की बोलियों में संवाद करते हैं। उनका लेखन बरबस फणीश्वरनाथ रेणु की याद दिला देती है। यही कारण है कि "नंदीग्राम डायरी ' के प्रति मेरी जिज्ञाशा काफी बढ़ गयी है, लेकिन जबतक पुस्तक पढ़ नहीं लेता हूं तबतक इस पर कोई कमेंट नहीं करूंगा। ग्लोबल पूंजीवाद बनाम रूरल इंडिया के अंतर्द्वंद्व का नंदीग्राम एक ऐतिहासिक बिंदु है। और जब तक यह अंतर्द्वंद्व कायम रहेगा तबतक नंदीग्राम प्रासंगिक रहेगा। इस कारण भी नंदीग्राम की घटना के अंदरुनी सच को जानना बेहद जरूरी हो जाता है। उम्मीद है कि 'नंदीग्राम डायरी' के जरिये यह सच आम जन के सामने प्रकट होगा।
 

आसमान ही फट गया, दर्जी कितना सिता

वह अपूर्व था। जमाने में उससे ब़डा दर्जी एक न था । हर ओर उसका नाम, हर किसी में थी उसकी पहचान। सिलाई का ऐसा उस्ताद दोबारा फिर कभी इस धर्ती पर नहीं जन्मा। फटे को सिना उसका काम था। वह अपने काम में भगवान तो नहीं पर उनसे कम भी न था। उसके पास हर फटे का इलाज था। चाहे जैसा फटा हो, चाहे जितना फटा हो, मैला हो या कुचला; वह सबको पल भर में जोड़ देता था। लेकिन जमाना भी कम न था। वह लोकतंत्र का साठ सालगिरह मना चुका था। जमाना तेजी से बदल रहा था। वह कीचड़ में भी अब टहलने लगा था। उसे फाड़ने और कुचलने में मजा आता था। इसलिए उसे इस दर्जी से चीढ़ होने लगी। दर्जी को हताश करने के लिए उसने अपनी फटाई ब़ढानी शुरू कर दी। क्या छोटा, क्या बड़ा, क्या औरत, क्या मर्द ; जिसे देखो फाड़ने और फोड़ने में जी-जान से जुट गया। क्या ऊपर, क्या नीचे, क्या आगे और क्या पीछे ; हर दिशा दो-फाड़ हो रहा था। दर्जी सिता गया और लोगों की फटाई ब़ढती गयी। और एक दिन ऐसा हुआ कि पूरा आसमान ही फट गया। उसने इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानी और आसमान को टांकना शुरू कर दिया, जो कभी पूरा नहीं हुआ। कहते है कि प्राण त्यागने से एक क्षण पहले तक उसने हार नहीं मानी। मरने के बाद भी उसके हाथों में सुई और धागे मौजूद थे। लेकिन वह अंततः हार गया। दर्जी की हार पर जमाना बहुत खुश हुआ। इसके बाद तो सारे 'दर्जी' दोमुंहे हो गये और हर सिलाई जैसे नकली हो गयी...

शनिवार, 11 जुलाई 2009

एक दिन मैंने जाना

पर्वत के उस प्रतिष्ठित शिखर पर चढ़कर मैंने मैदान को हिकारत भरी नजरों से देखा। हवाई जहाज की एग्जीक्यूटीव क्लास की खिड़की से मैंने पत्थर तोड़ते मजदूरों को देखा और अपनी हथेली की गांठों से घृणा की। खेतों में हल जोतते हलवाहे मुझे बहुत कुरुप लगे। हर आदमी का कद खुद से छोटा लगा। ऊंचाई के इस सफर में मैंने हमेशा ऊपर देखा और जमीन मेरी आंखों से ओझल होती चली गयी। और इस तरह एक दिन मैंने जाना िक उठना हमेशा गिरना होता हैकि उत्थान और पतन के बीच की रेखा बहुत पतली होती है ।

बुधवार, 8 जुलाई 2009

दिल्ली वालों की 'दो दृष्टि'

( कोशी बाढ़ - २००८ : जो देखा वो रोया )
दहाये हुए देस का दर्द-50
मिर्जा आसदुल्लाह बेग खान गालिब का एक हर दिल अजीज शेर है- "हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम/ वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती ।'' कल और परसों लोकसभा में इसकी बानगी देखने को मिली। हुआ यह कि बिहार के कुछ सांसद केंद्र सरकार के सौतेले व्यवहार को लेकर सदन में हंगामा करने लगे और बेल तक पहुंच गये। अध्यक्ष मीरा कुमार ने उनकी हरकतों को सदन की गरिमा के विपरीत करार दिया परिणामस्वरूप उनकी बातें हवा में उड़ा दी गयीं, पतंगे की तरह... ताकि सनद नहीं रहे इसलिए उनकी बातें सदन के रिकार्ड में भी दर्ज नहीं हो सकीं। बिहार के सांसद कह रहे थे कि केंद्र सरकार ने कोशी-पीड़ितों के प्रति सौतेला व्यवहार किया है। पहले तो उन्होंने पिछले साल की प्रलयंकारी बाढ़ से उजड़े लोगों के पुनर्वास में कोई दिलचस्पी नहीं ली और अब राहत के नाम पर दी गयीं राशियों की वापसी के लिए तकादे भेजवा रही है। चूंकि बात में दम थी, इसलिए सत्ताधारियों के ललाट की लकीरें मोटी होती दिखीं। और जब इसी तरह के एक मामले को लेकर उड़ीसा के कुछ सांसद भी बिहारी सांसदों के हमराह हो गये, तो सत्तानसीनों की भृकुटियां तमांचे की तरह तन गयीं। ऐसे हालात में प्रत्याकर्मण के लिए भगदड़ और हो-हल्ला से बेहतर कोई औजार नहीं होता , जिसका उन्होंने सहारा लिया। असल मुद्दे गौण हो गये और पल भर में जैसे पसीने गुलाल हो गये।
भले ही इस मुद्दे को लेकर हंगामा सात तारीख को हुआ, लेकिन यूपीए सरकार ने इसकी पटकथा बजट के दिन ही लिख दी थी । सरकार ने बजट में 'आइला' तूफान से पीड़ित पश्चिम बंगाल और बारिश प्रभावित मुंबई के लोगों के राहत के लिए विशेष प्रबंध किया है। इसके लिए बजट में केंद्र सरकार ने करोड़ो रुपये की व्यवस्था की है। लेकिन सूनामी सदृश हादसे के शिकार कोशी के बाशिंदों पर उनकी नजरें नहीं गयीं। इससे एक बार फिर स्पष्ट हो गया कि "दिल्लीवालों'' के दिल में बिहार को लेकर कितनी ममता है। यह कहने की जरूरत नहीं कि बिहार में उन्हें सत्ता वापसी की संभावना नहीं दिख रही और वे पश्चिम बंगाल की जीत से काफी उत्साहित हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि दशकों पहले वामपंथियों के हाथों लूटी अपनी गद्दी को वे अगले विधानसभा चुनाव में हथिया लेंगे। महाराष्ट्र भी इस सोच में फिट बैठता है। लेकिन बिहार ! बिहार के दरबाजे तो उन्हें अभी भी पूरी तरह बंद दिख रहे हैं। 'हाथ' में वो ताकत ही नहीं कि इस दरबाजे पर दस्तक देने का प्रयास भी करे।
लेकिन यह सवाल वोट बैंक आधारित कांग्रेसी नीति से आगे भी जाता है। अगर हम कांग्रेस के स्वर्णकालीन दिनों के इतिहास को खंगालें, तो पता चलता है कि इन पृष्ठों पर भी उनकी बिहार-विरोधी पंक्तियां यत्र-तत्र बिखरी पड़ी हैं। 1980 के पहले के दशकों में बिहार कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। 54 में चालीस-पैंतालीस लोकसभा सीटें उनके झोले में जाती थीं । लेकिन बिहारी नेताओं को केंद्रीय कैबिनेट में जगह पाने के लिए तरसकर रह जाना पड़ता था। विकास की तमाम नयी योजनाएं जब अन्य राज्यों में पुरानी पड़ जाती थीं ,आजमा ली जाती थीं , तब बिहार पहुंचती थीं। चाहे वह ' गरीबी हटाओ' के तहत चलीं योजनाएं हों या फिर '20 सूत्री कार्यक्रम' की परियोजनाएं हों। 'जवाहर रोजगार योजना' हो या फिर रेलवे के अमान परिवर्तन और विद्युतीकरण की योजनाएं हों। इस बार भी रेल बजट में भारत सरकार ने एक नयी योजना की शुरुआत की है। वह है नॉन स्टॉप ट्रेन सेवा की। लेकिन इसमें भी बिहार शामिल नहीं है। यकीन मानिये, अगले पांच-दस वर्षों तक बिहार को यह सुविधा दी भी नहीं जायेगी। यह बात विकास के हर क्षेत्र में लागू होती है। अगर विस्तार से चर्चा हो तो इस पर पूरी किताब लिखी जा सकती है। अभी तक बिहार में कोई केंद्रीय विश्वविद्यालय नहीं खुल सका और न ही यहां आइआइटी और आइआइएम जैसी कोई संस्थान कभी खोली गयी।
ऐसे में अगर कोशी क्षेत्र के लोग कहें कि मुझे नहीं मालूम कि दिल्ली किस देश की राजधानी है , तो आपको उन पर गुस्सा करने का कोई नैतिक आधार नहीं है। पिछले साल कोशी की बाढ़ को जिसने देखा, सबने कहा- यह बाढ़ नहीं, सूनामी है। लेकिन सुनामी पीड़ितों के लिए केंद्र सरकार ने हजारों करोड़ खर्च किए और कोशी पर ? ... जो दिया उसे वापस करो ! देसी जुबान में इसे 'दो दृष्टि' कहते हैं और प्रचलित भाषा में सौतेला व्यवहार ...

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

Growing panic among koshi resident

दहाये हुए देस का दर्द -49
Panic is rising with the water level of Kosi in the villages of Supaul, Araria, Madhepura and Saharsa districts. Breach related rumour is spreading every morning and evening. I don't Know who are behind this, but such kind of vague informations putting rural peaple at stake. They are unable to live normal life and do routine work. In the mean time main line media of the region is also unable to put real ground situation of embankment and erosion. It is duty of local administration to manage these rumours but they have no response at all. Why Govtt of Bihar not broadcasting special radio bulletine on the status of embankment . I am recieving phone-calls from the villagers of Kosi region Everyday. It is only because I am a media person. I am unable to understand why they are not calling district administration ? I am in Ranchi but DA is more nearer to them . This reflect the arrogance of so called peaple (popular) Govtt of Nitish kumar and his bureaucrat. Actually bureaucrat of Bihar are still living in British age . There is no sign of change in their attitude and charactor. In that situation who will dare to call them on phone ? Rural, hunger and depressed villagers ? This is really a million dollar question .

शनिवार, 4 जुलाई 2009

कोशी तटबंध पर भयानक खतरा

दहाये हुए देस का दर्द-48
नेपाल के कुसहा और मधुबन इलाके में कोशी नदी के नवनिर्मित पूर्वी तटबंध पर गंभीर संकट मंडराने लगा है। मिली जानकारी के अनुसार आज सुबह से दो स्पॉटस पर नदी ने तटबंध का अपरदन करना शुरू कर दिया है। कहा जाता है कि कल शाम नदी में पानी का डिस्चार्ज एक लाख 90 हजार क्यूसेक के आसपास पहुंचने के बाद तटबंध पर धारा का दबाव काफी बढ़ गया। वैसे कुसहा में नवनिर्मित स्परों पर तो पिछले एक सप्ताह से खतरा मंडरा रहा था। कल एक स्पर का मुहाना बुरी तरह क्षतिग्रस्त भी हो गया था। स्पर पर दबाव का मतलब साफ है कि नदी का अगला निशाना तटबंध ही होगा। लेकिन दो लाख क्यूसेक से कम में जब यह हाल है, तो आगे क्या होगा ? इस बात की सहज कल्पना की जा सकती है। उल्लेखनीय है कि कोशी में कभी-कभी पानी का डिस्चार्ज 8-9 लाख क्यूसेक तक पहुंच जाता है। वैसे सुखद समाचार यह है कि आज सुबह से ही पानी डिस्चार्ज की मात्रा में कमी आ रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर अविलंब युद्ध स्तर पर तटबंध को अपरदन से नहीं बचाया गया, तो पिछले साल की तरह एक बार फिर नदी तटबंध को तोड़ देगी। उधर सूचना यह भी है कि पानी के दबाव के कारण भीमनगर स्थित कोशी बराज का एक गेट (फाटक) बह गया है। फिलहाल 56 में से 29 गेट को खोलकर रखा गया है। लेकिन डाउन स्ट्रीम में पानी के दबाव को देखते हुए और गेट खोलने की जरूरत है। पता नहीं, बांकी गेटों को क्यों नहीं खोला जा रहा । पिछले साल भी जब कुसहा में तटबंध टूटा था, तो 30 से ज्यादा गेट बंद थे। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर आपात स्थितियों में भी भीमनगर बराज के सभी गेट क्यों नहीं खोले जाते? कहीं सरकार और अधिकारी किसी कड़वा सच को छिपाने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि यह बराज अपनी सारी शक्ति खो चुका है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि अधिकारी समझ रहे हैं कि अगर सभी गेटों को खोला गया तो बराज ध्वस्त हो सकता है ? अगर यह सच है और इसे छिपाने की कोशिश की जा रही है, तो जनता के प्रति इससे बड़ा विश्वासघात और कुछ नहीं हो सकता है। वैसे भी भीमनगर बराज का निर्धारित कार्यकाल वर्ष 1988 में पूरा हो चुका है। कुसहा हादसे के बाद बराज के सशक्तिकरण या पुननिर्माण पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया ? किन्हीं के पास आज इस सवाल का जवाब नहीं है।
कोशी, कोशी है कोई हंसी-ठट्ठा नहीं ! पहले भी इसके साथ काफी मजाक किया जा चुका है। भ्रष्टाचार के कारण इसका तल गादों से भर चुका है। दशकों की लूट के कारण तटबंध भी मेड़ में परिणत हो चुके हैं। कोशी का फूंफकार तो पिछले वर्ष दुनिया देख ही चुकी है। अगर समय रहते नहीं चेता गया तो नदी डंसने के लिए मजबूर होगी। कोशी से खेलने वालों, जरा इस बात पर भी विचार कर लो। हमेशा तिजोरी की सोचने वालो, सोचो ! जिस दिन जनता सारी सच्चाई जान जायेगी, उस दिन तुम्हारा क्या होगा ?

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

अब पूंछ भी बढ़ा ही डालो

विकासवाद का सिद्धांत कहता है कि मनुष्य भी लाखों-लाख साल पहले जानवर ही था। अन्य जानवरों की तरह वह भी चार पैराें पर चलता था और नंग-धड़ंग रहता था। न जाने उसके दिमाग में कहां से सभ्यतावाद का कीड़ा प्रवेश कर गया कि वह अपने को अन्य जानवरों से अलग करने लगा। जैसे-जैसे इंसान की बुद्धि बढ़ती गयी वैसे-वैसे सभ्य होने का कारवां भी तेज होते गया। उन्होंने जंगलों से तौबा कर ली और मैदानों में आ बसे। भोजन व्यवहार बदला और बातचीत के लिए भाषा तक का इजाद कर लिया। फिर कबीले बनाकर समूह में रहने की आदत डाली। पहले टोला बनाया फिर कबीला और अंततः समाज तक रच डाला। जब इंसान समाज में रहने लगा तो उन्हें कुछ कानून-कायदों की आवश्यकता भी महसूस होने लगी। इसके लिए उसने देश बनाया, हथियार बनाया और आखिरकार चीजों को नियंत्रण करने के लिए सरकार व संस्थाएं तक बना डालीं। कहते हैं कि इन्हीं के बदौलत वे लगातार सभ्य होते गये और लाखों जीव-जंतुओं को पछाड़कर अंततः ईश्वर की सबसे खूबसूरत कृती बन बैठे। उन्होंने जानवर-सरीखे आदतों पर मिट्टी डाल दिया और जो भी पुरानी आदतों से लाचार पाये गये उन्हें सीखचों में कैद कर डाला। अगर इससे भी नहीं हुआ तो जान भी ले ली। मसलन यौन संबंधों के "व्याकरण' बनाये गये और कहा गया कि हम आदमी हैं, इसलिए जानवरों की तरह जब जिसके साथ मन किया यौन संबंध नहीं बना सकते। हमें पाश्विक विचारों का दमन करना होगा और मनुष्य बने रहने के लिए नैतिक नियमों का पालन करना होगा। भले ही हमें कितनी भी भूख लगे हम हाथ के बदले पैर से नहीं खायेंगे। काम उत्तेजना चाहे हमारी जान ले लें हम कहीं भी किसी समय किन्हीं के साथ हमबिस्तर नहीं हो सकते।
लेकिन लगता है कि मानव अब सभ्यतावाद के इस इकहरे वन डायरेक्शनल सफर से ऊब गया है। इसलिए वे सभ्यतावाद की इस गाड़ी को रिवर्स गियर में डालने को आतुर है। नंग और अर्द्धनंग रहने को वह फैशन कह रहा है। पश्चिमी देशों में लगातार नंगे रहने का अभ्यास हो रहा है। समुद्री बीच से लेकर सड़क तक। स्वीडेन में सड़क और पार्कों में यौन-संबंध बनाये जाने लगे हैं। खुल्लमखुल्ला। ऐसे कि कुत्ते और कुत्तिया भी शर्मा जाये। सिनेमा, फैशन शो, मॉडल शो, सौंदर्य प्रतियोगिताओं के जरिए वे नंगई को स्थापित करने की जीतोड़ जद्दोजहद में लगे हुए हैं। फ्रांस में कुछ दिनों पहले बाकायदे एक नंग-धड़ंग कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया। सैकड़ों स्त्री-पुरुषों ने इसमें भाग लिया और इसके फायदे गिनाये। लेकिन वापस पशु योनि में जाने के लिए उन्हें अभी लाखों मिल का सफर तय करना है। उन्हें यौन संबंधों के सदियों पुराने कायदों को बदलना है। इसके लिए पहले अप्राकृतिक यौन संबंधों को मान्यता देनी होगी। इसलिए वे समलैंगिकता को स्थापित करने में लगे हुए हैं। पांच महीने पहले ही उन्हें इस दिशा में बड़ी कामयाबी भी मिली है। फरवरी में आइसलैंड में एक समलैंगिक महिला जोहाना सिगुरदरदोत्री को वे प्रधानमंत्री बनवाने में सफल हुए हैं। लेकिन अधिकतर देश अब भी इससे परहेज कर रहे हैं, लेकिन उन्हें विश्वास है कि रिवर्स सभ्यतावाद का यह सफर एक दिन मंजिल तक अवश्य पहुंचेगा। शायद वे सही हैं, अब तो भारत में भी समलैंगिकता को मंजूरी मिल गयी है। लेकिन अभी बहुत सारे असभ्य आचरण को मंजूरी दिलानी हैै, उन्हें। जंगल पहुंचने से पहले उन्हें अपने पीछे में पूंछ विकसित करनी पड़ेगी। सभी तरह के कानून, बंदिश, सरकार, संस्था, आस्था को तिलांजलि देनी होगी। चार पैरों पर चलने का अभ्यास करना पड़ेगा और अराजकतावाद को पराकाष्ठा पर पहुंचाना पड़ेगा। जानवर से इंसान बनने में उन्हें करोड़ों वर्ष लगे थे, लेकिन पता नहीं वापसी में कितना समय लगेगा?

सोमवार, 29 जून 2009

ऊपर भूख मरी, नीचे भुखमरी (एक लघु कथा)

अमूमन ऐसा होता नहीं है, लेकिन ऐसा हो गया। एक ऐसे दौर में जब अमीरों के कुत्ते तक भी गरीबों के कुत्तों के साथ नहीं बैठते तब एक आइएएस अधिकारी और एक आकाल पीड़ित किसान के चूल्हे में मुलाकात हो गयी। और यह चमत्कार झारखंड के कालाहांडी कहलाने वाले पलामू प्रमंडल में हुआ। शायद यह बेमेल संयोग इस कारण संभव हुआ कि पिछले कुछ दिनों से आइएएस साहेब और उस गरीब किसान, दोनों के चूल्हे बहुत परेशान थे। हालांकि दोनों के रुतबा में आसमान-जमीन का फर्क था फिर भी वे एक पेड़ की नीचे बैठे और अपना-अपना दुखड़ा सुनाने लगे।
किसान के चूल्हे ने रोते हुए कहा- " क्या कहूं हवेली वाले भाई, पिछले पंद्रह दिनों में पंद्रह बार किसान की घरवाली से मिन्नत कर चुका हूं। मुझे यूं तिरस्कृत मत करो। कुछ तो सुलगाओ, कुछ तो पकाओ। लेकिन लगता है कि पूरे परिवार ने मरने की कसम खा ली है। लेकिन उन लोगों का भी क्या दोष ? उस बेचारे के घर में अन्न का एक दाना नहीं है। पकाये तो पकाये क्या ? भुखमरी की नौबत है, भाई । मुझसे यह अपमान सहा नहीं जाता। ''
आइएएस के चूल्हे ने भी लगभग रोते हुए जवाब दिया - " भाई मेरा गम भी कुछ कम न है। मेरे साहेब के नौकर खाना तो खूब पकाते हैं। हर दिन रंग-विरंग की डिस बनती है, लेकिन मेरा दुर्भाग्य यह है कि उन्हें खाने वाला कोई नहीं। साहेब को हाइ ब्लड प्रेसर है और डॉक्टर ने उन्हें डाइटिंग की सलाह दी है। मैडम का वेट पहले से ही ज्यादा है और वे अब तला-भूना बिल्कुल ही नहीं खाती। जब से उन्हें गैस की समस्या हुई है, तब से तो मानो फास्टिंग पर ही रहती हैं। घर में खाने के समान भरे रहते हैं, लेकिन घरवालों की भूख मर गयी है। अब बताओं मैं कैसे खुश रहूं। तुम्हारे यहां भुखमरी है और मेरे यहां भूख ही मर गयी है।''
 

शनिवार, 27 जून 2009

जाने क्या हो गया है मानसून को

(इलाहाबाद के पास एक गांव में बारिश के लिए इंद्र भगवान को मनाते बच्चे)
बिचड़े सूख रहे हैं। खेतों में दरार पैदा होने लगी है। हरियाली गायब हो रही है। कहीं जट्ट-जट्टिन का नाच हो रहा है तो कहीं कीचड़ में लथ-पथ होकर प्रार्थना की जा रही है। लेकिन मेघ का दिल नहीं पसीज रहा। किसान माथा पर हाथ धर के बैठे हैं। गांवों में हर जुबान पर एक ही सवाल हैं, कब होगी बारिश? मृग नहीं बरसा, तो आद्रा बरस के ही क्या होगा। बिचड़े ही नहीं रहेंगे, तो रोपेंगे क्या ? रोपेंगे नहीं तो खायेंगे क्या?
जवाब किन्हीं के पास नहीं है। सरकारी अमले से आश्वासन की बारिश हो रही है। थोड़ी देर से ही सही, लेकिन इंद्र आयेंगे, मेघ लायेंगे और बारिश होगी। आदि-आदि... लेकिन वे यह नहीं कह रहे कि मानसून में देरी के कारण क्या हैं ? इस देर की असल वजह क्या है ? सरकार सच पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है। सच यह है कि पर्यावरण असंतुलन खतरनाक मोड़ तक पहुंच चुका है। समुद्र का चरित्र बदल चुका है। प्रदूषण ने पर्यावरण को घायल कर दिया है। इसलिए ये खतरे तो अब आते ही रहेंगे। कभी मानसून नहीं आयेगा, तो कभी शीत ॠतु लंबा खींच जायेगा। कभी बेमौसम अत्यधिक बारिश होगी तो कभी गर्मी में शर्दी लगने लगेगी और शर्दी में गर्मी। यह पर्यावरण की पीड़ा है, जिसे हम सुनना नहीं चाहते। और पीड़ित पर्यावरण पर इंद्र भगवान का भी नियंत्रण नहीं। टोना-टोटके में लगे मासूम किसानों को शायद यह नहीं मालूम।

शुक्रवार, 26 जून 2009

बांस का कछुआ !

उत्तर बिहार, असम, अरुणाचल प्रदेश और नेपाल में सदियों से बांस से तरह-तरह की कलाकृति बनायी जाती रही है। बांस आधारित लोक तकनीक इन इलाकों में कभी इतनी समृद्ध थी कि इससे घरेलू उपयोग के तमाम समानों के अलावा तरह-तरह के खिलौने, मूर्तियां, गहने आदि बनाये जाते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यह लोक कला लगभग लुप्तप्राय हो गयी है। लेकिन आज भी पूर्वी नेपाल के सुनसरी और सप्तरी जिले में बांस-तकनीक जिंदा है। सुनसरी के एक होटल के सामने बांस से बने ये कछुए इस बात के प्रमाण हैं । इस कलाकृति के कारण आजकल इटहरी का यह होटल आकर्षण का केंद्र बन गया है।
(यह जानकारी सप्तरी नेपाल के पत्रकार धीरेंद्र कुमार बसनैत ने मुहैया करायी और तस्वीर कांतिपुर डाट कॉम से साभार )

बुधवार, 24 जून 2009

अपने विचारकों का पिंड दान करतीं पार्टियां (संदर्भ मिश्र हत्याकांड)

भारतीय राजनीति की यह मनविदारक विडंबना है। यहां हर राजनीतिक धारा अंततः सत्ता-आकांक्षा और शक्ति-पिपासा के समुद्र में तिरोहित हो जाती है। चाहे वह मुद्दों के आगोश से निकली पार्टी हो या फिर सरोकार और विचार की कोख से जन्मी पार्टी, भारत में सत्ता सब का आखिरी लक्ष्य हो जाती है।परिणामस्वरूप हर राजनीतिक पार्टी आखिरकार गिरोहों में तब्दील हो जाती है जिसकी पहली और आखिरी तमन्ना कुर्सी होती है। हर हाल में वे सत्ता के खजाने पर कब्जा जमाना चाहती हैं। और इसे पाने के लिए किन्हीं हदों की परवाह नहीं करतीं। इसका परिणाम यह होता है कि राजनीतिक पार्टियां सिद्धांत, उसूल और विचारधाराओं से दूर होती चली जाती हंै। और एक समय ऐसा आता है कि जब पार्टियों को यह भी याद नहीं रहती कि उनकी अपनी पहचान खत्म हो चुकी है। धीरे-धीरे वे अपने संस्थापकों से भी बहुत दूर हो जाती हैं। सत्ताई-वासना में पार्टियां इतना अंधा हो जाती हैं कि उन्हें पता भी नहीं चलता कि बिना गया गये ही कब उसने अपने-अपने विचार-पुरुषों का पिंड-दान कर दिया।
कांग्रेस पार्टी को आज महात्मा गांधी से कोई लेना-देना नहीं । समाजवादी पार्टियां लोहिया को भूल चुकी हैं। बहुजन समाज पार्टी में बाबा साहेब की छाया भी कहीं नहीं दिखती। भारतीय जनता पार्टी श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, डॉ हेडगवार के विचारों का दाह-संस्कार कर चुकी है। कम्युनिस्ट पार्टियां मार्क्स और लेनिन का विसर्जन कर चुकीं हंै। ऐसे में जो नेता वैचारिक प्रतिबद्धता पर कायम रहते हैं वे या तो हाशिए पर रहते हैं या फिर पार्टियों के लिए एक बोझ की तरह होते हैं। पार्टियों को ऐसे नेताओं के जीवित रहने या मर जाने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता। वे इस बात को भूल जाती हैं कि आज वे जिस सत्ताई फसल को काट रही हैं उनकी जड़ें प्रतिबद्ध नेताओं के पसीने से ही तैयार हुई थीं।
पांच दिन पहले मौंत की नींद सुला दिए गये बिहार के अररिया के वयोवृद्ध जनसंघी नेता देव नारायण मिश्र उर्फ देबू मिश्र के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। स्वर्गीय देव नारायण मिश्र उन चंद नेताओं में शामिल थे जिसने बिहार में जनसंघ की जमीन तैयार की। प्रखर विद्धान और सरस्वती-पुत्र देव नारायण मिश्र ने अपनी सारी जिंदगी भगवा-विचार के प्रचार में लगा दिया। भागलपुर के तेज नारायण बनेली महाविद्यालय से रिकार्डतोड़ अंकों के साथ एमए करने वाले देव नारायण मिश्र ने सरकारी नौकरी को ठोकर मारकर समाज सेवा को अपना जीवन-लक्ष्य निधार्रित किया। यह उनकी अथक मेहनत का ही परिणाम था कि जब बिहार के अन्य हिस्से में भाजपा को लोग जानते तक नहीं थे तब पूर्णिया, अररिया, किशनगंज और कटिहार में उस पार्टी के उम्मीदवार अच्छा-खासा मत हासिल करने लगे थे। नब्बे के दशक आते-आते ये क्षेत्र भाजपा के गढ़ में तब्दील हो गये। लेकिन देव नारायण मिश्र को श्रेय नहीं मिला। पार्टी जब खड़ी हो गयी तो मिश्र जैसे लोग हाशिए पर डाल दिए गये और धनवानों , बाहुबलियों और जातीय समीकरण वालों को एमपी, एमएलए का टिकट दिया गया। हालांकि मिश्र को इस बात का कभी भी मलाल नहीं रहा।
छह साल पहले अररिया में एक दिन उनसे मेरी मुलाकात हुई थी। वे कई वर्षों से अररिया में रह रहे थे और इलाके के अत्यंत प्रसिद्ध वकील थे। लेकिन उनके पास रहने के लिए एक टूटा-फूटा फूस का घर ही था। पक्के और आलीशान घर बनाने की उन्हें कभी कोई इच्छा नहीं हुई। जबकि उनके कई जूनियर वकीलों ने चंद वर्षों में ही बड़े-बड़े अट्टालिका खड़े कर लिए। मुझे आज भी याद है , स्व. मिश्र के साथ , दो-घंटे की वह मुलाकात । क्या तेज था उस व्यक्ति में ? पूरी दुनिया का राजनीतिक-सामाजिक इतिहास उनकी जुबान पर था। पत्रकारिता के कॉरियर में आज तक किसी दूसरे राजनेता ने मुझे इतनी वैचारिक शीतलता प्रदान नहीं की। पत्रकारीय जिज्ञाशा को संतुष्ट करना किसी भी नेता के लिए आसान नहीं होता, लेकिन स्व. मिश्र की बात करने की यह पहली शर्त थीकि वे जबतक आपको संतुष्ट नहीं कर देंगे उठेंगे नहीं ।आज सोचता हूं तो लगता है कि मिश्र ऐसा इसलिए कर पाते थे क्योंकि सच से घबराते नहीं थे और राजनीति को समाज- सेवा मानते थे। इसलिए उन्हें बात को छिपाने की आवश्यकता नहीं होती थी।
शहर में हमेशा पैदल चलने वाले देव नारायण मिश्र (हमेशा सौ-दो- सौ मुकदमा लड़ने वाले मिश्र के पास कोई गाड़ी नहीं थी) निर्भिकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन की लाख धमकी के आगे कभी घूटने नहीं टेके। वे तस्लीमुद्दीन समेत इलाके के कई दुर्दांत अपराधियों के खिलाफ सरकारी वकील थे।
लेकिन पिछले दिनों उन्हें गोली मार दी गयी। नीतीश कुमार के तथाकथित सुशासन राज में एक प्रतिष्ठित राजनेता और नामी वकील की हत्या कर दी गयी, लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेगा। पांच दिन बाद जब मुख्यमंत्री अररिया में सभा कर रहे थे तो लोगों ने उन्हें मिश्र हत्याकांड की बात बतायी। लेकिन मुख्यमंत्री ने कोई टिप्पणी नहीं की। इसलिए घटना को एक सप्ताह हो चली है, लेकिन पुलिस उनके हत्यारों की पहचान करने में असफल है। यह स्थिति तब है जब प्रदेश में भाजपा सत्तारुढ़ है। उनके चेले सैयद शाहनवाज हुसैन की पार्टी में तूती बोलती है, फिर भी पार्टी खामोश है। जिस दिन देव नारायण मिश्र को गोली मारी गयी हुसैन पार्टी कार्यकारिणी में मेनका गांधी से बहस कर रहे थे। शायद भाजपा को अब देव नारायण मिश्र जैसे नेताओं की आवश्यकता नहीं रही। इस बात को दूसरे तरीके से भी कहा जा सकता है कि पार्टी को अब किसी विचारधारा की भी आवश्यकता नहीं रही। पर समाज को हमेशा देव नारायण मिश्र जैसे लोगों की आवश्यकता रहेगी। यह बात उनके विरोधी भी कहते हैं और उनके कॉलेज के मित्र रहे मेरे पिताजी भी कहते हैं।
 

शनिवार, 20 जून 2009

हमारे गांवों की लोकोक्ति-1

कोशी अंचल में लोक कला की सदियों पुरानी परंपरा है। यहां की बोली लोकोक्ति, मुहावरा, चुटकलों और फकड़ों से भरी है। लेकिन दुर्भाग्य यह कि आंचलिक साहित्य की सतत उपेक्षा के कारण आज ये सदियों पुरानी लोकोक्तियां लुप्तप्राय हो गयी हैं। ये लोकोक्ति और फकड़े अपने आप में गहन दार्शनिक अर्थ रखते हैं और सदियों के जीवनानुभवों को समेटे हुए हैं। मैं इन्हें "हमारे गांवों की लोकोक्ति' कॉलम के जरिए आप लोगों के सामने लाने की कोशिश कर रहा हूं।
हम सुनर हमर कनिया सुनरी
बांकी सब बनरा- बनरी
(विश्लेषण- अहंकार और आत्मुग्ध लोगों की कुपित मानसिकता की व्याख्या। ऐसी मनोस्थिति का शिकार आदमी मानने लगता है कि पूरी दुनिया में या तो वह श्रेष्ठ है या फिर उनकी पत्नी बांकी लोग तो निरा मूर्ख हैं , बंदर और बंदरिया की तरह )
भेल ब्याह मोर करबअ कि
धिया छोड़ि कें लेबअ कि
(विश्लेषण- अवसरवादी लोगों की मानसिकता की व्याख्या। अवसरवादी आदमी काम निकल जाने के बाद उसी तरह मुख मोड़ लेता है जैसे बेटी की शादी के बाद थका हुआ बाप बेफिक्र होकर चैन की नींद सो जाता है और लड़के वालों की संभावित मांगों का अनुमान लगाकर खुद को आश्वासन देता है कि अब तो शादी हो गयी, अब तो मैं अपनी बेटी उन्हें दे चुका हूं। इसके अलावा और क्या दूंगा और वे लेना भी चाहेंगे तो क्या लेंगे ?)
 
 

गुरुवार, 18 जून 2009

यह क्या हो रहा है नेपाल में

(नेपाल के शहर धनकुट्टा में भारत विरोधी बैनर के साथ प्रदर्शनकारी, राष्ट्रीय सम्मान के खातिर मैंने भारत विरोधी अपमानजनक शब्दों को ब्लॉक कर दिया है)

वैसे तो पड़ोसी मुल्क नेपाल के साथ भारत के रिश्ते उसी दिन से खराब होने शुरू हो गये जिस दिन वहां माओवादी शक्तियां अस्तित्व में आयीं। इसकी नींव 1995 के आसपास पड़ी जो 2000 आते-आते सतह पर दिखाई देने लगी। माओवादी पार्टी के सरकार में शामिल होने के बाद इसमें क्रांतिकारी तेजी आयी। लेकिन हाल-फिलहाल तक माओवादियों के तमाम प्रयास के बावजूद आम नेपाली नागरिक के मन में भारत के प्रति नफरत की भावना न के बराबर थी। परंतु पिछले कुछ दिनों यह भावना अप्रत्याशित रूप से बदली है। वहां भारत विरोधी शक्तियां तेजी से आकार ले रही हैं जिनका एक ही मकसद है कि दोनों देशों के सदियों पुराने रिश्ते में किसी न किसी तरह नफरत का जहर घोलना। इसका नतीजा यह हुआ है कि पिछले पंद्रह-बीस दिनों में नेपाल के विभिन्न हिस्सों में एक दर्जन से ज्यादा भारत विरोधी रैलियां निकाली गयी हैं। इन रैलियों में भारत को विस्तारवादी से लेकर आक्रांता तक की संज्ञा दी जा रही है। नेपाल-भारत की सीमा पर तैनात भारतीय अर्धसैनिक बल, एसएसबी को रेपिस्ट तक कहा जा रहा है। और सबसे अचरज की बात यह है कि भारत विरोधी शक्तियों की इस मुहिम में नेपाल के मुख्यधारा के कुछ मीडिया और पत्रकार भी शामिल हो गये हैं। लेकिन प्रतिपराकाष्ठा देखिये कि भारतीय मीडिया में इस बात की कहीं कोई चर्चा तक नहीं है। यहां तक कि सीमाई इलाकों में पढ़े जाने वाले अखबारों में भी इस आशय की कोई खबर प्रकाशित नहीं हुई है।
भारत विरोधी शक्तियों का आरोप है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश से सटे नेपाल के डांग जिले में भारतीय अर्धसैनिक बल एसएसबी ने बड़े पैमाने पर नेपाली जमीन का अतिक्रमण किया है । उनका कहना है कि एसएसबी ने जिले के करीब छह हजार एकड़ नेपाली जमीन पर कब्जा जमा लिया है और वहां के लोगों को अपने घरों से बेघर कर दिया है। उनका यह भी आरोप है कि एसएसबी ने इलाके में कई नेपाली महिलाओं के साथ बलात्कार किया है। मामला यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि नेपाल के उच्चतम न्यायालय में इसे मुद्दा बनाकर एक जनहित याचिका भी दायर की गयी, जिस पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि वह अविलंब मामले की उच्च स्तरीय जांच करें और भारत सरकार से बात करे। ये सब खबरें पिछले एक महीने से नेपाल के तमाम अखबारों और टेलीविजन चैनलों में चल रही हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि नेपाली लोगों के मन में भारत के प्रति कटुता फैल गयी है और वे भारत को संदेह की नजर से देखने लगे हैं।
मसले का सबसे हास्यास्पद पहलू यह है कि किसी भी नेपाली पत्रकार ने आजतक उन क्षेत्रों की न तो कोई तस्वीर छापी है और न ही किन्हीं भुक्तभोगी महिलाओं का बयान प्रसारित किया है। जब मैंने सच्चाई जानने के लिए बीरगंज और विरॉटनगर के अपने कुछ नेपाली पत्रकार मित्रों से बात की तो उनका कहना था कि सभी सुनी-सुनाई बातों के आधार पर खबर चला रहे हैं। बीरगंज के मित्र पत्रकार ने कहा, " मुझे नहीं लगता कि किसी पत्रकार ने डांग जिले तक पहुंचने का कष्ट किया है, वे काठमांडू में बैठकर खबर लिख-पढ़ रहे हैं और बड़े शहरों में हो रहे भारत विरोधी प्रदर्शनों की तस्वीर उतारकर जनता को परोस रहे हैं।'' दूसरी ओर नेपाल सरकार ने मामले की जांच के लिए जिस उच्च स्तरीय कमेटी को डांग जिले के प्रभावित स्थलों में भेजा था उन्होंने अपनी प्राथमिक रिपोर्ट में इन आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि बलात्कार की कोई शिकायत अभी तक प्राप्त नहीं हुई है। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इलाके में सबकुछ ठीक नहीं है। हाल के दिनों में वहां के लोगों ने पलायन किया है। यह सच बात है। कुछ जगहों से सीमाई पोस्ट (अधिकृत पिलर) गायब हो गयेहैं। यह समिति अपनी विस्तृत रिपोर्ट कुछ ही दिनों में सरकार को सौंपेगी। लेकिन इन्होंने जो प्राथमिक रिपोर्ट दी है उसे नेपाली मीडिया अंडरप्ले कर रहे हैं ।
पूरे प्रकरण पर अगर तटस्थ दृष्टि डालें, तो जो निष्कर्ष निकलते हैं वे काफी चिंताजनक है। दरअसल, एसएसबी को कुछ साल पहले भारत सरकार ने नेपाल-भारत सीमा की निगरानी के लिए तैनात किया था। लेकिन जैसा कि अक्सर होता है, वहीं हुआ। इस बल ने भी तैनाती के शुरुआती वर्षों में तो काफी मुस्तैदी दिखाई, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतते गये वे निष्क्रिय होते गये। आज अगर नेपाल-भारत के बोर्डर एरिया में आप घूमें तो आपको हजारों ऐसे स्पाॅर्ट मिलेंगे जहां से हर दिन भारी मात्रा में तस्करी होती है। एसएसबी तस्करों से खुलेआम कमीशन ले रहे हैं। वे सीमापार आने-जाने वाले लोगों के लिए तरह-तरह के गैरकानूनी संहिता बनाते हैं। मसलन कभी कहा जाता है कि आप चावल तो इधर से उधर ले जा सकते हैं मगर नमक नहीं। कभी कहा जाता है कि दो बैग लेकर जा सकते हैं तो कभी कहा जाता है कि आप कोई भी समान लेकर इधर-उधर नहीं जा-आ सकते। शादी-विवाह के मौके पर वह बेवजह बारात-गाड़ियों को रोक देते हैं और भारी रकम वसूल कर उन्हें आने-जाने की इजाजत दे देते हैं। जबकि वे अपने मूल कर्त्तव्य को निभाने में असफल हैं।
सभी जानते हैं कि नेपाल सीमा से होकर भारत में बड़ी तादाद में हथियार आ रहे हैं। गांजा और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी हो रही है। आइएसआइ और माओवादी इसमें लिप्त हैं। लेकिन एसएसबी इन्हें रोकने में नाकाम है। ऐसे में कहावत है न कि "खाली मन सैतान का', तो वे इन दिनों यही कर रहे हैं। बैरक और चेक पोस्ट से ज्यादा समय सीविलियन एरिया में व्यतीत करने में एसएसबी के जवान ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जबकि उन्हें साफ-साफ ऐसी गतिविधियों में शामिल होने से मना किया गया है। सुपौल और अररिया जिले में तो मैंने एसएसबी को जिला प्रशासन के कार्य में बेवजह पैर अड़ाते देखा है। एक बार नहीं दर्जनों बार। उनकी इन कारगुजारिओं में जो कोई आड़े आता है उन्हें वे प्रताड़ित करने से नहीं चूकते। डांग में भी ऐसा ही कुछ हुआ है, जिसे भारत विरोधी शक्तियों ने तील से ताड़ बना दिया है, लेकिन एसएसबी के आला अधिकारी चुप हैं। वे कोई बयान नहीं दे रहे।
ऐसे में भारत सरकार की भूमिका बहुत अहम हो जाती है। इससे पहले कि भारत विरोधी शक्तियां भारत-नेपाल के रिश्ते में जानलेवा जहर घोल दे, भारत को पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच करानी चाहिए ताकि नेपाल के लोगों तक सच्चाई पहुंचेऔर उनका विश्वास कायम रहे । साथ ही एसएसबी को अनुशासनहीन होने से बचाने के लिए निगरानी एजेंसियों को कडा निर्देश देना चाहिए साथ ही दोषी के ख़िलाफ़ तुंरत कारवाई करनी चाहिए ।
 

शुक्रवार, 12 जून 2009

नदी की लाश / (एक लघु कथा )

सात दिनों तक सौ मन सड़र-धुमन जलाया गया । कई क्विंटल चंदन की लकड़ी जलायी गयी । धूप और अगरबत्ती से वह घाट धुआं-धुआं रहा। लेकिन अफसोस ! नदी से बदबू नहीं गयी। लोग हताश होने लगे। वे एक-दूसरे को पूछने लगे कि आखिर नदी को हुआ क्या है? इसका पानी काला क्यों हो गया है? यह इतना बदबू क्यों दे रही है? नामी पंडित बुलाये गये। विख्यात पुजारी आये। पर्यावरण प्रेमियों और जल वैज्ञानिकों ने भी तशरीफ लाया । और लंबी बहस-मुबाहिसों के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया कि यह नदी जो कभी जीवनदायिनी थी अब अत्यधिक प्रदूषित हो गयी है। इसलिए इसके जल काले और बदबूदार हो गये हैं।
इसके पश्चात एकमत से फैसला लिया गया कि नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकार से अपील की जायेगी। "नदी मुक्ति मोर्चा' और "नदी बचाओ आंदोलन' जैसे संगठन बनाये जायेंगे। अगर सरकार नहीं सुनी तो बड़ा आंदोलन छेड़ा जायेगा। इसके बाद देर रात तक नदी-चिंतकों की पार्टी-शार्टी चलती रही। उनकी सूची में एक और नदी का नाम जुड़ गया था। इस बात से वे फूले नहीं समा रहे थेऔर जाम पर जाम छलकाये जा रहे थे।
जबकि उधर घाट पर सोये हुए भिखारी ने मध्य रात्रि में एक सपना देखा। उसके सपने में नदी आयी और हंसने लगी। नदी हंसती जा रही थी, हंसती जा रही थी, हंसती ही जा रही थी। इससे भिखारी भयभीत हो गया। वह हाथ जोड़कर नदी के सामने नतमस्तक हो गया और बोला-
"माते, आप इस तरह लगातार हंसती ही क्यों जा रही हो, मेरे से कोई भूल हो गयी है क्या ?'
नदी बोली- " मैं तुम पर नहीं, लोगों की मुर्खता पर हंस रही हूं । वे मुझे साफ करने की बात कर रहे हैं और बदबू से छुटकारा पाना चाहते हैं ? लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि लाश को लाख साफ कर लो , इत्र-धुमन दिखा दो, वह कभी साफ हो सकती है क्या ? उसकी बदबू खत्म हो सकती है क्या?'
भिखारी ने कहा- "माते, यह आप क्या कह रही हैं ?'
नदी ने कहा- "सच कह रही हूं । मैं मर चुकी हूं। अब घाटों से होकर मैं नहीं, मेरी लाश बह रही है।'
सुबह जब भिखारी की नींद खुली,तो वह देर तक यह सोचते रहा कि आखिर नदी माता उसके सपने में ही क्यों आयी? न तो वह धुप-अगरबत्ती जलाने वालों में शामिल था और न ही नदी चिंतकों की बैठक और रात वाली पार्टी में शरीक हुआ था। इस बात को लेकर भिखारी दिन भर परेशान रहा, फिर भी वह किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका।

बुधवार, 10 जून 2009

थोड़ा गोबर लगाओ थोड़ी माटी डालो

दहाये हुए देस का दर्द-47
कुसहा हादसा को हुए नौ महीने बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक दोषियों की सिनाख्त नहीं हो पायी है। बिहार सरकार ने इस हादसे की जांच के लिए और दोषी अधिकारियों की पहचान के लिए एक जांच कमीशन बैठाया था। जांच कमीशन ने नौ महीने में क्या कार्रवाई की ? किन्हीं को नहीं मालूम। जबकि कुसहा हादसा खुली हुई किताब की तरह है। कोशी इलाके के आम लोग तक इस हादसे के दोषियों को सीधे चिह्नित कर रहे हैं, लेकिन कमीशन को दोषी दिखाई नहीं दे रहे। सच यह है कि जिन विभागों और अधिकारियों की लापरवाही के कारण कुसहा में बांध टूटा उन्हें अंधेरी रात में भी पकड़ा जा सकता है। उनकी लापरवाही और कर्त्तव्यहीनता के प्रमाण दूर से ही दिखाई पड़ते हैं। लेकिन जांच आयोग सूक्ष्मदर्शी लेकर उनकी तलाश कर रहा हैफिर भी उन्हें कुछ नजर नहीं आ रहा। "साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल'' से जुड़े हिमांशु ठक्कर ने पिछले दिनों आयोग को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में लापरवाह विभागों और अधिकारियों को प्रमाण के साथ चिह्नित किया गया है। इस पत्र को पढ़ने के बाद यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अधिकारियों ने कितनी निडरता से कर्त्तव्यहीनता की इंतिहा कर दी। लेकिन जांच आयोग ? मुझे कुछ शब्द मिल रहे हैं- दृष्टिदोष, मोतियाबिंद, लीपापोती.... भारत में जांच आयोग गोबर-माटी का ही दूसरा नाम तो नहीं ??
(हिमांशु ठक्कर के दस्ताबेजी पत्र को पढ़ने के लिए नीचे के मैटर के बॉडी पर डबल क्लिक कीजिए।)

ठीक किया जो छोटे के मुंह नहीं लगा

वातानुकूलित कार में बैठे
उस रइश कुत्ते पर
आवारा कुत्ते बहुत हैरान हुए
और कार के पीछे दूर तक भागते रहे, भौंकते रहे
कार में बैठी वह छोटी लड़की
' डॉली ' की ऐसी इंसल्टी पर बहुत परेशान हो गयी
आवारा कुत्ते भौंकते रहे
लेकिन "डॉली ' ने मुंह नहीं खोला
++
घर पहुंचकर लड़की ने डैडी से पूछा
डैडी- डैडी ??
अपना "डॉली ' ऐसा क्यों है ?
वे भौंकते रहे
लेकिन इसने दूम दबा लिया
डैडी ने कहा-
" बेटा, ' डॉली ' ने ठीक किया जो छोटे के मुंह नहीं लगा "
++
दो सप्ताह बाद
आज, वह छोटी लड़की बहुत खुश थी
आज
मोहल्ले में यत्र-तत्र आवारा कुत्तों की लाश पड़ी थी

शनिवार, 6 जून 2009

गरीब का गम और गांजा का दम

दहाये हुए देस का दर्द-46
नशा, बिपत्ति और दरिद्रता में शायद कोई-न-कोई रिश्ता है। गरीबी और त्रासदी जहां कहीं जाती हैं, नशा व व्यसन को संग कर लेती हैं। शायद इसलिए कि गरीबी और त्रासदी को मौत व मातम से गहरा लगाव है। सदियों-सदी से वे एक-दूसरे के सहोदर बने हुए हैं। अगर मौत व मातम न रहे, तो दरिद्रता व बिपत्ति कितनी बदसूरत लगेगी। लोग गरीबों के रंग-ढ़ंग पर शंका करने लगेंगेऔर फिर गरीबों के कारोबारियों का क्या होगा ? शायद इसलिए , नशा रोग का सबसे प्रिय दोस्त है और रोग मौत का परम-मीत। शायद इसलिए गरीबी व बिपत्ति का जी जब कुपोषण, आत्महत्या, पलायन आदि से नहीं भरता, तो वे अपने साथ गांजा, हड़िया, ताड़ी, भंग आदि को ले आती हैं।
पिछले दिनों कोशी के उजड़े दयारों से लौटने के बाद मेरे मन में ऐसे ख्याल बार-बार आते रहे। हालांकि मैं जानता हूं कि मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री मेरे इस गंवार विचार को सुनकर चौअन्नी निपोड़ लेंगे। विद्वानों की तो छोड़िये, वे किन्हीं पर हंस सकते हैं, किन्हीं को व्यंग्य-पात्र बना सकते हैं। उनके सात खून माफ हैं। लेकिन मुझे शक है कि कोई भी समझदार आदमी मेरे इस ठेठ मत से सहमत होंगे।
खैर, मैं भी मान लेता हूं। अक्सर सन्निपात का शिकार आदमी बकने लगता है। लेकिन डॉक्टर लोग भी कहते हैं कि कभी-कभी सन्निपातियों के बकवास में ही उसके इलाज के सूत्र छिपे होते हैं, इसलिए उनकी बातों को माने या न माने, लेकिन सुने जरूर। तो आप भी मेरे साथ चलिए कोशी के उन गांवों में, जहां आजकल भनसा घरों (भोजन बनाने वाले घर) से चूल्हा का धुआं भले नहीं उठे, लेकिन हर घर से गांजे के धुएं उठ रहे हैं, हर पहर और हर तरफ। घर में अन्न नहीं है, लेकिन गांजा है। घर में बर्त्तन नहीं है, लेकिन चीलम (गांजा पीने वाला, मिट्टी की डिबिया)है। अजी घर भी क्या है, बांस-फूस से बनी सिर छिपाने की झोपड़ी है। सुपौल के प्रतापगंज ब्लॉक के तिलाठी गांव का है मुन्नीलाल। तिलाठी गांव पिछली बाढ़ में मटियामेट हो गया था। कुछ मुन्नीलाल की सुन लीजिए।
"2100 रुपये दिए थे नीतीश बाबू के बीडीओ-कलस्तर ने... पांच सौ तो पंचायत सेवक जोधन जादव खा गिया, बचा 1600 । तीन सौ टका में बुढ़िया के नुआ (साड़ी) खरीदा, बचा 1300। सौ टका में एक मन मड़ुआ खरीदा, बचा 1200। अपने लिए एक ठो लूंगी खरीदा और एक ठो गंजी जिसमें 100 टका खरिच हो गया। बचा 1100 सौ। सिघेंश्वर भगवान की कसम, अब ई ग्यारह सौ में पांच मास (माह)से टिके हैं। '
"अगला खेप कब मिलेगा हो जोधन ?'
"जब मिलेगा तो बता देंगे... वैसे सब बेर तुमको ही मिलेगा क्या ? वोट दिया था तीर में ???'
"नहीं ...'
" किसको दिया था रे, उ सरवा हाथ छाप को कि बंगला छाप को ? '
" इ तो हम आपको नहीं बतायेंगे... '
"... तो घड़ीघंट बजाओ आउर खूब गांजा फूंको, साला ! नेपाल का सब गांजा कोशी में भर गिया है...'
" जब पेट में दाना नहीं रहेगा न, तब तुम भी गांजे को याद करेगा। एक सोंट खैंच लेते हैं तो न कल्लो (खाना)का फिकर न जलखई (नास्ता) के... हेंहेहें... '
जोधन ने ठीक कहा। नेपाल का सारा गांजा कोशी में पहुंच गया है। सुपौल, अररिया, मधेपुरा और सहरसा जिले के हर छोटे बाजार-हाट में आजकल गांजा धड़ल्ले से बिक रहे हैं। लोग कहते हैं कि बिपत्ति में यह बड़ा सहायक सिद्ध हो रहा है। त्रासदी के मारे लोग आजकल गांजा पीकर ही दिन बिता रहे हैं। लेकिन पुलिस-थाने वालों को कोई खबर नहीं। वे पहले तो इस मुद्दे पर कुछ बोलते नहीं। बहुत कुरेदने पर भड़क उठते हैं। प्रतापगंज के दारोगा ने मुझसे कहा- "आप पत्रकार लोग न किसी चीज को लेकर बैठ जाते हैं। अरे इसमें नया क्या है ? घर में खाने के लिए कुछ नहीं है, तो गांजा और भंग नहीं खाये, तो क्या बालू फांके ??? फिर संयत हो गये, बोले- छापियेगा नहीं, वैसे हमलोग पूरी कार्रवाई कर रहे हैं...'
तिलाठी से आगे बढ़ा, तो चुन्नी पहुंचा। वही नजारा। उधमपुर पहुंचा, वही दृश्य। जहां कहीं धुआं, वहां-वहां गांजाका दम। जहां कहीं भी दरिद्रता, वहां-वहां गांजाका सोंट । छत्तापुर, भीमपुर, जीवछपुर... गांजा, गांजा, गांजा... ये सारे गांव पिछले साल कोशी में दहा गये थे, अब इन गांवों में पानी का राज नहीं है। आजकल इन गांवों में गांजा राज हो गया है। इन गांवों की हवा में धुआं है और जमीन पर बालू। और इन दोनों के बीच इंसान कहीं खो गया है।
... तो अब आप ही बताइए ऐसी जगहों में चक्कर लगाने के बाद आदमी सही रह पायेगा। वो या तो बकवास करेगा या फ़िर अजीब-अजीब विचार से घिरेगा । चाहे कोई माने या कोई नहीं माने! मानो तो देव नहीं तो पत्थर ....

मंगलवार, 2 जून 2009

तू आखिरी आराम कर

इंकलाब से इत्तेफाक रख
दर- फतह को सब्र कर
बढ़ रही है आग
बस, थोड़ा इंतजार कर।
हठ अपने रद्द कर
अब भी पाप जब्त कर
हर किला दहायेगा
उफन रहा जनता का नद
घास को न फूस कर
बस्ती को न ठूठ कर
धुआं उठा है धौड़ा में
तू आखिरी आराम कर ।
 

शनिवार, 30 मई 2009

स्याही सूखने से पहले / पत्रकारिता दिवस पर

183 वर्ष पहले आज ही के दिन हिन्दी का पहला समाचार पत्र - उद्दंत मार्तण्ड प्रकाशित हुआ था, इसलिए हर साल 30 मई को पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। यह अभिव्यक्ति और सूचना संप्रेषण के कार्यों में लगे पत्रकारों के लिए खास दिन तो है ही साथ ही जो इस पेशे में नहीं हैं उनके लिए भी विशेष तारीख है। चूंकि पत्रकारिता की उत्पति मनुष्य की बुनियादी जरुरत - विचार की स्वतंत्रता, विचार की अभिव्यक्ति और सूचनाओं के साझेकरण से हुई है; इस कारण भी आज का दिन हर किसी के लिए खास है। 183 वर्षों के लंबे सफर के बाद आज अपने देश की पत्रकारिता कहां पहुंची है ? पत्रकारिता आज किस पड़ाव पर है ? आज उसका चरित्र कैसा है ? आज वह जिस चरित्र को जी रहा है वह उसे आने वाले दिनों में किस भविष्य की ओर ले जायेगा ? जो भूमिका आज वह निभा रही है और जिस चरित्र को पत्रकारिता आज जी रही है, वे उनकी प्रासंगिकता को जिंदा रख पायेंगे भी कि नहीं ? ये कुछ ऐसे चीखते सवाल हैं, जो आज की पत्रकारिता के ललाट पर सिद्यत से चिपके हुए हैं ? समाज इसका जवाब पत्रकारों से मांग रहा है, जबकि जवाब उनके हिस्से से भी आने चाहिए । और मुझे लगता है कि आखिरकार समाज को ही इस सवाल का जवाब ढूंढना होगा।
बहुतेरे लोग आज पत्रकारों और पत्रकारिता की भूमिका पर सवाल उठाते हैं। हालांकि उनकी असहमति के कारण अलग-अलग होते हैं। कोई पत्रकारिता से गायब होती सुचिता पर गहरा क्षोभ प्रकट कर रहा है, तो कोई उसे अपने मूल सरोकार से भटका हुआ करार दे रहा है। कोई पत्रकारिता से इसलिए खफा है कि वह उसके वाद (इज्म) में फिट नहीं होता । कोई पत्रकारिता के पूर्वाग्रह से त्रस्त है तो कोई खबरों से गायब होती संवेदनशीलता के कारण निराशा प्रकट कर रहे हैं। सवालों के अगले अध्याय में तो सीधे-सीधे पत्रकारों को संदेह के घेरे में ले लिया जाता है। बहुतेरे लोग और अक्सर साधन-शक्ति से संपन्न लोग पत्रकारों पर नैतिक पतन, भ्रष्टाचार, दोमुंहें व्यवहार के आरोप लगाते हैं और अपने निजी या सुने-सुनाये अनुभवों के आधार पर सारे पत्रकारों को भ्रष्ट और च्यूत घोषित कर देते हैं। हैरानी तो तब होती है जब मीडिया के सहारे रातों-रात स्टार बनने वाले भी किसी एक पत्रकार, अखबार या टेलीविजन की किसी रिपोर्ट के आधार पर पूरे मीडिया को ही नकारा और पथभ्रष्ट करार देते हैं। इनमें नेता, अधिकारी, न्यायमूर्ति, खिलाड़ी और अभिनेता तक शामिल हैं। ऐसे लोग मीडिया से हमेशा मनपसंद कार्यक्रम-रिपोर्ट की ही उम्मीद रखते हैं । गोया मीडिया, मीडिया न होकर कोई हिट फिल्म हो!
मेरे विचार से ऊपर हमने जिन सवालों पर विचार किए वे सभी आधे-सच हैं और आधे झूठ। सच इसलिए कि आज कोई भी पत्रकार यह नहीं कह सकता कि पत्रकारिता का दामन पाक-साफ है। झूठ इसलिए कि इन दागों के लिए अंततः समाज जिम्मेदार है और उनके आरोप असल में उनकी पलायनवादी या स्वार्थी मानसिकता से उपजते हैं न कि तटस्थ मूल्यांकन से। आखिर हम यह क्यों नहीं सोचते कि पत्रकारिता भी इसी समाज का एक अंग है। पत्रकारिता में भी इसी समाज के लोग आते हैं।अखबार जन्नत से छपकर धरती पर नहीं उतरते। आज जब समाज का जर्रा-जर्रा बाजारवादी व्यवस्था और उसके आदर्शों में आकंठ डूब चुका है, तो पत्रकार उससे कैसे मुक्त रहे। समाज रुपये की अराधना कर रहा हो, उसी से प्रेरित, उसी से मोहित हो तो पत्रकार कलम से कितना अलख जगा पायेगा? पत्रकारिता में परिवर्तन की आस लेकर आने वाले पत्रकारों से, जिन्होंने मालिकों के एजेंडा को पब्लिक पर नहीं लादा और एक क्षण में बेरोजगार हो गये; क्या आज तक किसी ने उनसे पूछा कि उनके घर में दो दिनों से चूल्हे क्यों नहीं जले? कलम को बंदूक के बल पर चुप करा देने वालों के खिलाफ क्या किसी भी समाज ने आज तक सड़कें जाम की? यह कैसा विरोधाभास है ? एक तरफ अश्लील और उत्तेजक सामग्रियों पर आंसू भी बहाई जाती हैं और दूसरी ओर उनकी टीआरपी भी बढ़ती रहती है?
दरअसल कलम की स्याही दवात से नहीं संवेदनशील और जागरूक समाज से आती है। अगर समाज ही सो जायेगा तो स्याही को सूखने से कोई नहीं रोक सकता ?पत्रकारिता की प्रासंगिकता को अगर बचाये रखना है जोकि उसकी तटस्थता, विश्वसनीयता और वस्तुनिष्ठता से आती है, तो पत्रकारों और अखबारों के मालिकों को भी अपनी सोच बदलनी होगी। इसे लाभ कमाने वाला व्यवसाय समझने की जीद त्यागनी होगी। मीडिया को औजार या फ़िर पावर लॉबी में पहुँचने का रास्ता समझने के बाल-हठ से मुक्ति पानी हगी । क्योंकि पत्रकारिता विशुद्ध बाज़ार नहीं है और है भी तो कुछ दूजा किस्म का । यहां विश्वसनीयता खत्म, तो दूकान बंद।

शुक्रवार, 29 मई 2009

परिवारवाद जिंदावाद !

देशवासियों को यूपीए सरकार का एहसान मानना चाहिए क्योंकि इसने परिवारवाद को एक बार फिर ऐतिहासिक बुलंदियों पर पहुंचाया है, जो मुगल वंश के पतन के बाद कहीं खो गया था । यूपीए के कर्णधारों ने देशवासियों को सदियों पुराने राजतंत्र की याद दिलायी है, इसलिए वे हार्दिक अभिनंदन के हकदार हैं। हमें करुणानिधि को कोटि-कोटि धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने लोगों की इस गलतफहमी को दूर कर दिया है कि भारत में लोकतंत्र है। हमें आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्‌डी को नमन करना चाहिए क्योंकि उन्होंने राखी की लाज रख ली है और सगी बहन काे राज्य की गृह मंत्री की कुर्सी नवाजा है। वैसे भी कुछ समय से न्यूक्लियर फैमिली के रोग के कारण देश पर परिवारों के विघटन का खतरा मंडरा रहा था।
यूपीए सरकार की इस परिवारवादी मुहिम से सदियों पुराने भारतीय संयुक्त परिवार की परंपरा को जीवन दान मिलेगा। इसके कारण इन्हें अलग से धन्यवाद प्रेषिद किया जाना चाहिए। करुणानिधि ने अपने घर के सभी प्रमुख सदस्यों को राजगद्दी पर बिठाकर यह साबित कर दिया है कि वे हरियक, शुंग, मौर्य, सातवाहन,पाल, गुप्त, खिलजी, लोदी और मुगल वंश की परंपराओं को भूले नहीं हैं। चाहे जो भी तंत्र हो, वह राजतंत्र की लौ को मद्धिम नहीं पड़ने देंगे। पहले देश में परिवारवाद का उपासक सिर्फ गांधी परिवार हुआ करता था अब तमाम बड़े नेताओं ने इस धर्म को अपना लिया है। इसलिए गांधी परिवार अब खुद को अल्पसंख्यक महसूस नहीं करेगा। आंध्र प्रदेश से लेकर मेघालय और तक परिवारवादी धर्म का पताका फहरा रहा है।गांधी परिवार इस धर्म के प्रणेता हैं, इसलिए उन्हें जल्द ही पूज्यनीय और अराध्य घोषित कर देना चाहिए। परिवारवाद के समर्थक तेजी से इस ओर बढ़ रहे हैं। देश में जगह-जगह उनके नाम के मंदिर बनने चाहिए। अराध्य गीतों की रचना होनी चाहिए। एक गीत यह हो सकता है- जय हो यूपीए, जय हो गांधी परिवार। जय हो परिवारवाद ! जय हो... जय हो... जय-जय-जय, जय हो...

बुधवार, 27 मई 2009

कोशी का पायलट चैनल टूटा, कुसहा तटबंध फिर गंभीर संकट में

चार महीनों से मैं जिन खतरों की आशंका प्रकट कर रहा था वे आज दोपहर सामने आ ही गये। कुसहा से मिली जानकारी के अनुसार, कोशी नदी ने आज कुसहा के निकट मधुबन (नेपाल) में तीन पायलट चैनल को ध्वस्त कर दिया है और वह दोवारा पिछले साल के अपने परिवर्तित मार्ग से होकर बहने की कोशिश कर रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि नदी अपने परंपरागत मार्ग को त्यागने की चेष्टा कर रही है। हालांकि अभी दो पायलट चैनल के टूटने की ही सूचना है, लेकिन अगर कोशी के जलग्रहण क्षेत्रों में बारिश जारी रही , तो सभी चैनलों का टूटना लगभग निश्चित है। गौरतलब है कि पायलट चैनल की मदद से कोशी को पिछली जनवरी में उसके असली मार्ग में लाया गया था। इसके बाद ही कुसहा में तटबंध मरम्मत का काम प्रारंभ हुआ था। योजना के मुताबिक , इस वर्ष मार्च से पहले ही कुसहा में तटबंध को पुख्ता कर लिया जाना था। अगर यह काम पूरा हो गया रहता तो अभी कोई खतरा नहीं रहता। लेकिन यह काम अभी तक अधूरा है और अभी तटबंध की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह नदी के वेग को संभाल सके ।
पायलट चैनलों के टूटने का सीधा असर कुसहा में नवनिर्मित तटबंध पर पड़ेगा। चूंकि अभी तक इस तटबंध के स्पर नहीं बनाये जा सके हैं और तटबंध का पक्कीकरण भी नहीं हुआ है, इसलिए अब इस बात की संभावना काफी ज्यादा है कि नदी एक बार नवनिर्मित नाजुक तटबंध को तोड़ दे और पिछले अगस्त की नयी धारा की ओर बढ़ जाये। ऐसी परिस्थिति में पूर्वी बिहार के सुपौल, सहरसा, अररिया, पूर्णिया और मधेपुरा जिले के अलावा नेपाल के सुनसरी जिले में फिर जलप्रलय आ जायेगा। अब सबकुछ इंद्र भगवान पर निर्भर है अगर बारिश रूकी तो कुछ प्रयास भी हो सकते है, अगर नहीं रूकी तो फिर हाथ पर हाथ धरकर तमाशा देखने के सिवा कुछ नहीं किया जा सकता। पता नहीं सरकारी महकमें को इसकी सूचना है भी की नहीं। खुदा हाफिज। आमीन...

मंगलवार, 26 मई 2009

कहीं पुनर्प्रलय का कारण न बन जाये ये सुस्ती

दहाये हुए देस का दर्द-45
दशकों की आदत कुछ दिनों में खत्म नहीं हो सकती, भले ही इसके कारण लाखों लोगों का जीवन खतरे में पड़ जाये। हमारी सरकारी मशीनरी एक बर्ष के कार्य को पांच वर्ष में और पांच वर्ष की योजना को पच्चीस वर्ष में पूरी करने की इतनी आदि हो चुकी हैं कि वह अब सामान्य और आपात स्थिति में भी फर्क नहीं कर पाती। कोशी के कुसहा तटबंध के मरम्मत-कार्य की सुस्ती को देखने के बाद बिहार सरकार की अफसरशाही और उसकी कार्यशैली के प्रति यही राय बनती है। मानसून दरबाजे पर दस्तक दे रहा है, लेकिन कोशी नदी के कुसहा तटबंध की मरम्मत अभी तक पूरी नहीं हो सकी है। लोग सहमे हुए हैं, विशेषज्ञ माथा पीट रहे हैं, लेकिन बिहार और केंद्र सरकार कान में घी डालकर सोयी हुई है। कुसहा में कटे हुए तटबंध को बांध तो दिया गया है, लेकिन उसका पक्कीकरण नहीं किया गया है, जिसके कारण हल्की बारिश में ही तटबंध की कच्ची मिट्टी अपरदित होकर इधर-उधर बह रही है। इसके अलावा अभी तक तटबंध के टूटे हुए हिस्से के स्परें (ठोकर ) भी नहीं बन पाये हैं। जबकि 1700 मीटर के इस क्षतिग्रस्त हिस्से में कुल मिलाकर पांच स्परों का निर्माण प्रस्तावित है। गौरतलब है कि स्पर के बगैर तटबंधों की कोई अहमियत नहीं होती। अगर स्पर नहीं हो तो नदी की साधारण जलधारा भी तटबंध को बहा ले जा सकती है। दरअसल स्पर ही तटबंधों की असल शक्ति होते हैं। यह जलधारा के वेग को कम करते हैं और साथ ही धारा के वेग को तटबंध तक नहीं पहुंचने देते हैं। लेकिन इस तथ्य को जानते हुए भी सरकारें निष्क्रिय हैं। अगर बारिश शुरू होने से पहले स्परों का निर्माण नहीं हुआ तो दुनिया की कोई शक्ति कुसहा में तटबंध को दोबारा टूटने से नहीं रोक सकती। ऐसी स्थिति में एक बार फिर कुसहा में तटबंध के टूटने और पूर्वी बिहार में दोबारा प्रलय आने की आशंका प्रबल हो गयी है। उल्लेखनीय है कि कुसहा में मार्च तक सभी कार्यों को पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। लेकिन अभी तक यह तिथि आधा दर्जन बार आगे बढ़ायी गयी है। लगभग डेढ़ दर्जन बार काम को रोका गया, जबकि इसे युद्ध स्तर पर पूरा किया जाना था।

शायद भविष्य के लिए

1
आज नहीं, तो कल
जवानी में नहीं, तो शायद बुढ़ापे में
सौ से नहीं, तो शायद हजार से
नकदी से नहीं, तो उधार से
खुरपी से नहीं, तो कुल्हाड़ से
जीकर नहीं, तो मरकर ही सही
हमें नहीं, तो हमारे बेटे-पोते को ही
शायद वे सब कुछ होंगे
गांव में आलीशान मकान, मकान में नौकर और बैंकों में खाते
2
आज नहीं, तो कल
मेहनत से नहीं, तो रिश्वत से
छोटी -मोटी घूस या फिर फिक्सड कमीशन से
पहले चोरी-चोरी फिर सीनोजोरी से
दलाली, बेईमानी और झूठखोरी से
आंसुओं के सौदे से हो या फिर मासूमों के लहू से
लेकिन एक दिन
हमारे वश में होगा यह शहर
इस की आयतें और क्लास-वन स्टेटस
वीआइपी कॉलोनी की शानदार इमारतें, एसी गाड़ियां और सारी सुंदर छोड़ियां
3
आज नहीं, तो कल आयेगा
बैलेट नहीं, तो बुलेट से
तुष्टीकरण, पुष्टीकरण या फिर मुष्टिकरण से
हिन्दू नहीं, तो मुस्लिम से
अगड़े नहीं, तो पिछड़े से
दंगा से या फसाद से
घपले या घोटाले से
या फिर आले दर्जे की मक्कारी से
एक दिन
हमारे हाथ भी आयेंगे
ये कुर्सी, ये सत्ता, वो शक्ति वो रुतवा
उपसंहार
माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोहि
एक दिन ऐसा आयेगा मैं रौंदूंगा तोहि
 
 
 

सोमवार, 25 मई 2009

वट वृक्ष पूजा / परम्परा और पर्यावरण का अद्‌भूत पर्व

उत्तर बिहार के मिथिला और कोशी अंचल का प्रसिद्ध वट वृक्ष पूजा यानी वट सावित्री पूजा कल पूरे देश में मनाया गया। हालांकी शहराती जिंदगी और मेट्रो कल्चर के कारण शहरों में यह प्राचीन पूजा तेजी से लुप्त हो रही है, लेकिन गांवों में आज भी इसे पूरे उल्लास के साथ मनाया जाता है। मिथिला और कोशी का यह प्राचीन पूजा सुहागिन औरतें मनाती हैं। परम्परागत तौर पर वट सावित्री पर्व स्त्री-पुरुष के प्रेम को समर्पित है जिसमें विवाहित औरतें अपने पति के दीघार्यु होने की कामना करती हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन औरतें दीघार्यु जीवन के प्रतीक - वट वृक्ष की जड़ों में पानी देकर अपने पति के लंबे जीवन की कामना करती हैं। लेकिन अगर इसके गूढ़ार्थ में जायें तो यह पर्व प्रकृति और पर्यावरण के महत्व को रेखांकित करता है। मिथिला और कोशी अंचल में वट, पाखर, पीपल जैसे लंबी उम्र वाले वृक्षों की कटाई निषिद्ध है। लोग इन पेड़ों की लकड़ियों का इस्तेमाल नहीं करते। इलाके में इन पेड़ों को देव तुल्य माना जाता है। इसलिए इनकी कटाई और घरेलू इस्तेमाल में इसका किसी भी तरह का उपयोग पाप है। इन पेड़ों की रक्षा करने और उन्हें रोपने वालों को सम्मान की नजर से देखा जाता है और कहा जाता है कि जो ये पेड़ लगायेंगे वे पुण्य के भागीदार होंगे। यही कारण है कि मिथिलांचल और कोशी अंचल में अक्सर ग्राम देवताओं, सरायों और सूनसान जगहों पर ये पेड़ बहुतायत में मिलते हैं।
आज जब प्राकृतिक असंतुलन और पर्यावरण के खतरे ने पूरी दुनिया को अपने आगोश में ले लिया है, तो वट सावित्री जैसे पर्वों की प्रासंगिकता स्पष्ट होती है और इसका महत्व समझ में आता है । इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हमारे पूर्वजों ने लौकिक जीवन के तमाम पहलुओं पर काफी गंभीर अध्ययन किए थे। उन्हें प्रकृति और पर्यावरण के अन्योन्याश्रय संबंधों की विशद जानकारी थी। इसलिए उन्होंने पर्यावरण संतुलन को बनाये रखने के लिए तरह-तरह की पंरपराओं की शुरुआत की क्योंकि उन्हें मालूम था किकानून बनाकर पर्यावरण की रक्षा नहीं की जा सकती। लेकिन उत्तर आधुनिक संस्कृति इन परंपराओं को ढोंग मानती है। आज ऐसी परंपराओं को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। आधुनिकता की एकरंगी रोशनी में हम परंपराओं के गूढ़ार्थ को नहीं समझ सकते। इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोणों के साथ-साथ तटस्थ आध्यात्मिक दृष्टि की भी जरूरत है।

बुधवार, 20 मई 2009

नेपाली संसदीय समिति की सिफारिश, बंद करो खुली आवाजाही

नेपाल की एक संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि भारत-नेपाल की खुली सीमाओं पर बाड़ लगाया जायेऔर नेपाल आने के लिए पासपोर्ट और पहचान कार्ड अनिवार्य कर दिया जाये। इस समिति का गठन साल भर पहले माओवादी प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड की सरकार ने की थी। नेपाल इंटरेस्ट प्रीजर्वेशन कमिटि (एआइपीसी) ने कल अपनी रिपोर्ट वहां की संविधान सभा को सौंपी है। मिली जानकारी के अनुसार, सिफारिशों में कहा गया है कि खुली सीमा और खुली आवाजाही नेपाल की एकता और अखंडता के लिए घातक है। इसके कारण नेपाल में देश विरोधी गतिविधियां बढ़ रही हैं और कानून-व्यवस्था बनाये रखने में समस्याएं आती रहती हैं। समिति ने अपनी सिफारिशों में कहा है कि इस मसले को नेपाल के लिए बनने वाले संविधान में भी जगह दी जाये और उसमें ऐसा प्रबंध किया जाये कि आने वाले दिनों में भारत-नेपाल की खुली सीमा और खुली आवाजाही पर नियंत्रण पाया जा सके। सिफारिश में कहा गया है कि नेपाल सरकार भारत से लगी 1800 किलोमीटर की सीमा पर अर्द्धसैनिक बलों की प्रतिनियुक्ति करे। अगर इसके लिए नये सीमा सुरक्षा बल की आवश्यकता हो, तो उसका गठन किया जाना चाहिए। इसके अलावा इस मसले पर भारत सरकार से भी नये सिरे से बात करने की सिफारिश की गयी है।
गौरतलब है कि करीब डेढ़ साल पहले जब माओवादियों ने वहां चुनाव में जीत हासिल की थी और सरकार बनाया था, तो उसके प्रधानमंत्री प्रचंड और शीर्ष नेता बाबूराम भट्टराय ने सबसे पहले यही बयान था। दोनों नेताओं ने 1950 की भारत-नेपाल मैत्री संधि को बदलने की बात कही थी। दोनों नेताओं ने यह भी कहा था कि यह संधि भेदभावपूर्ण है, जिसे बदलने की जरूरत है। प्रचंड ने तो यहां तक कह दिया था कि भारत ने इस संधि के जरिए नेपाल को गुलाम बना लिया है। उल्लेखनीय है कि इसी संधि के जरिए ही सदियों पुराने भारतीय-नेपाली लोगों की बेरोकटोक आवाजाही को जारी रखा गया था, जिसे माओवादी सरकार खत्म करने की बात कर रही थी। इस समिति ने उसी बात को अपने सिफारिशों में कलमबद्ध किया है। हालांकि जब प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रचंड भारत आये, तो वे कुछ और बोलने लगे।
नेपाल की संसदीय समिति की इस ताजा सिफारिश के बाद अब इस बात में कोई शक नहीं रह गया है कि नेपालाी माओवादी चीन के हाथों खेल रहे हैं। उन्हें चीनी आका जो आदेश देते हैं, वे बीना सोचे-विचारे उस पर अमल कर रहे हैं। भारत-नेपाल के बीच सदियों से बेटी-रोटी की संस्कृति है। लाखों नेपाली लोग भारत में रोजगार पाते हैं, दोनों ओर के लाखों लोगों के वैवाहिक संबंध एक-दूसरे देश में है। सोचने वाली बात है कि पलक झपकते कोई भी सरकार इस परंपरा को कैसे तोड़ पायेगी। न तो नेपाली लोग इसे बर्दाश्त कर पायेंगे और न ही भारतीय लोग। इससे दोनों ओर जन विद्रोह फैल सकता है। और माओवादियों का यही लक्ष्य है। वे चाहते हैं कि सीमाई इलाके में विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो जाये और वे अपने एजेंडे को तेजी से फैला सके।
दरअसल भारत-नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा विश्व की अनोखी सीमा रेखा है, जिसे पार करने के लिए वीजा व पासपोर्ट की जरूरत नहीं होती। वैसे बेरोकटाक आवाजाही की यह परंपरा काफी पुरानी है। इसकी शुरुआत नेपाल के एक राष्ट्र के रूप में गठित होने (1780 से पहले नेपाल नामक देश का अस्तित्व नहीं था)और दोनों देशों के बीच वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा के निर्धारण से पहले हो चुकी थी। यह क्रम नेपाल के शाह और राणा वंश के शासन काल और मुगल काल से लेकर स्वतंत्र भारत की शासन व्यवस्था में भी चलता रहा। उन दिनों हिमालय से निकलने वाली नदियों से आने वाली नियमित बाढ़ के कारण दोनों देशों के लोगों का दोनों ही ओर विस्थापन होता रहता था। बाढ़ ग्रस्त इलाके में हैजा और मलेरिया जैसे रोगों के जबर्दस्त प्रकोप और चारागाह के अभाव में दोनों ओर के कृषक समुदाय को जहां कहीं भी सूखा स्थल मिलता था वे वहीं बस जाते थे। राणा वंश के प्रधानमंत्री जंग बहादुर राणा ने तो अपने शासन काल में नेपाल के तराई प्रदेश में भारतीय लोगों को जमीन खरीदने, घर बनाने और व्यापार करने तक की खुली छूट दी। अंग्रेज शासकों ने व्यापारिक स्वार्थ और पुलिस बल में नेपाली गोरखा जवानों की भर्ती के लोभ में इस प्रवृति को हमेशा बढ़ावा दिया। ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच वर्ष 1816 हुई सुगोली संधि इस बात का प्रमाण है। इन तमाम सकारात्मक और नकारात्मक कारणों से आवाजाही में भारी वृद्धि हुई और रिश्ते प्रगाढ़ होते चले गये।
पूर्वोत्तर में सिक्किम व पश्चिम बंगाल, उत्तर में बिहार एवं उत्तरप्रदेश और पश्चिम में उत्तराखंड राज्य के 21 जिले नेपाल के 26 जिलों से सीधे लगे हुये हैं। भारत के 50 जिले ऐसे हैं जहां से अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा की दूरी 40 किलोमीटर या उससे कम है । 1580 किलोमीटर की लंबी सीमा रेखा में से लगभग 1100 किलोमीटर की पट्टी ऐसी है जिसके आसपास घनी आबादी है। इसकी शुरुआत उत्तरप्रदेश के पीलीभित जिले से होती है जो पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग तक जाती है। बिहार के मिथिलांचल इलाके के सभी 16 जिले नेपाल की सीमा के आसपास हैं और प्रति वर्ष हजारों की संख्या में इन जिलों के मैथिलीभाषी नेपाली और भारतीय लड़के-लड़कियों के बीच शादियां होती हैं। हिन्दी फिल्म के प्रसिद्ध पार्श्व गायक उदित नारायण की विवादित शादी भी इनमें से एक है। उदित नारायण के पिता की शादी भी बिहार के सुपौल जिले के बाइसी गांव में हुई थी। वैसे वे मूल रूप से नेपाल के वारदाह के हैं। ज्ञातव्य है कि मैथिली नेपाल की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। पश्चिम बंगाल में बंगाली भाषी भारतीय-नेपाली लड़के-लड़कियों के बीच विवाह होते हैं और उत्तरी उत्तरप्रदेश के भोजपुरी-अवधि भाषी लोग भी नेपाली सहभाषियों के साथ भारी तादाद में वैवाहिक रिश्ते बनाते हैं। बिहार के किशनगंज, अररिया, सुपौल, मधुबनी, सीतामढ़ी, मोतिहारी, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण जिले में तो ऐसे सैंकड़ों मां-पिता मिल जाते हैं जिनकी सभी संतानों की शादी नेपाल में है। यहां तक कि नेपाल के शाह वंश और राणा वंश के लड़के एवं लड़कियों की भी भारत में शादियां हुई हैं। सीमाई इलाकों के समाजिक तानेबाने का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सीमाई इलाके में दर्जनों ऐसे मंदिर-मस्जिद हैं, जिनका निर्माण और जीर्णोद्धार भारतीय लोगों के पैसे से हुआ है। इन देव स्थलों पर लगने वाले मेलों में दोनाें देश के लोग भारी संख्या में भागीदारी करते हैं।
इसके अतिरिक्त सीमा के आसपास बसे लोगों के बीच व्यावसायिक रिश्ते भी काफी प्रगाढ़ हैं। सीमावर्ती इलाके के अल्पकालीन बाजारों (हाटों) में दोनों देशों के दुकानदार और ग्राहक मौजूद होते हैं। कुछ ऐसे व्यावसायिक घराने भी हैं जिनकी दूकानें एवं प्रतिष्ठान दोनों देशों में हैं। इसके उदाहरण सीमावर्ती सम्मुख शहरों के जोड़े मसलन, रक्सौल-बीरगंज, फारबिसगंज-विरॉटनगर, नक्सलबाड़ी-काकरभिट्ठा, सिरहा-जनकपुर, कुनौली-राजबिराज, बिरतामोड़- जालेश्वर और बनवासा-महेंद्र नगर आदि में प्रत्यक्ष रूप से देखे जा सकते हैं।
रोजगार और चिकित्सा के लिए भी दोनों देशों के लोग भारी संख्या में आवाजाही करते हैं। नेपाल के शहर लहान में एक नेत्र चिकित्सालय हैं जहां हर वर्ष हजारों भारतीय इलाज कराने पहुंचते हैं। जबकि बिहार के दरभंगा, मुजफ्फरपुर और उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पतालों में प्रति वर्ष भारी तादाद में नेपाली लोग चिकित्सा के लिए पहुंचते हैं। तराई क्षेत्र के नेपाली मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल समेत पंजाब व हरियाणा तक मजदूरी करने चले जाते हैं।
 
 
 

सोमवार, 18 मई 2009

प्रभाकरण के प्राण के बाद



17 मई 2009 । यह तारीख इतिहास में दर्ज हो चुकी है। क्योंकि इस दिन 21वीं शताब्दी के सबसे खतरनाक गुरिल्ला आर्मी के प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण का अंत हो गया। श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंघली, वहां की सरकार और सैनिक जस्न मना रहे हैं। जबकि श्रीलंका , भारत और विश्व के लगभग पंद्रह देशों में बसे लाखों तमिल भयानक मातम में डूबे हुए हैं।इससे स्पष्ट हो जाता है कि यह एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि एक विभत्स जंग का वह पड़ाव है, जो किसी के लिए जीत कहलाती है और किसी के लिए हार। लेकिन लिबरेशन टाइगर ऑफ तमिल इलम यानी एलटीटीआइ अथवा लिट्टे और श्रीलंकाई सैनिकों के लगभग तीन दशक पुराने संघर्ष की यह कहानी जीत और हार के आगे भी जाती है। क्योंकि जब दो मानव समुदाय किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए हथियार उठाता है, तो उसकी जड़ में कोई न कोई मुद्दा होता है। और जब तक उस मुद्दे को सुलझा नहीं लिया जाता तबतक किसी की जीत नहीं होती है। अगर विजेता समुदाय जंग में आगे रहने को जीत कहते हैं और इस जीत को ही मुद्दा का समाधान मान लेते हैं, तो समझ लीजिए कि कहानी अभी जारी है। यानी मुद्दे फिर उठेंगे, समय के साथ वह बलवान होगा और चिंगारी के संपर्क में आने के साथ ही वह फिर से धधक उठेगा। युद्ध के विजेताओं की सबसे बड़ी गलतफहमी यह होती है कि वह शस्त्र संघर्ष में आगे रहने यानी जीत को ही न्याय मान लेते हैं। लेकिन सनातन सच यह कि जब तक न्याय नहीं हो जता तबतक युद्ध अधूरा रहता है। स्थगित हो होकर वह फिर से भड़कता है और तबतक जारी रहता है जबतक अन्तिम तौर पर इंसाफ नहीं हो जाये। लिट्टे और श्रीलंका सेना के बीच के युद्ध की भी यही विडंबना है। श्रीलंका सरकार तमिलों के मुद्दे को सुलझाये बगैर, न्याय किए बगैर इस कहानी को पूरी करना चाहती है। मानव इतिहास गवाह है कि ऐसा नहीं होता है। यह मानव का बुनियादी स्वभाव है कि वह मुद्दे के लिए, हक के लिए, सिद्धांत और उसूल के लिए हमेशा हथियार उठाता रहा है। यह मानवीय स्वभाव का वह बिंदु है जहां वह खुद को ईश्वर और प्रकृति से भी ऊपर उठा लेता है। आप पूछेंगे कैसे ? तो इसको संक्षेप में कुछ इस तरह समझा जा सकता है। ईश्वर या प्रकृति ने हर जीवों में यह प्रेरणा दी है कि वह अपनी जान-प्राण की हर कीमत पर रक्षा करे। जानवरों से लेकर मानव तक में यह सहज प्रेरणा होती है। जान पर अगर संकट हो तो जीव कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है। जान रक्षा के लिए छोटे जानवर तक सबकुछ दांव पर लगा देते हैं। लेकिन मानव प्रकृति के इस सिद्धांत को चुनौती देता है। इतिहास में बहुत सारे ऐसे प्रकरण और उदाहरण सामने आये हैं जब देखा गया है कि मनुष्य ने अपने उसूल, सिद्धांतों और मुद्दों के लिए जान की बाजी लगा दी। जब एक इंसान किसी मुद्दे या सिद्धांत के लिए जान दे रहा होता है तो क्या वह ईश्वर के बनाये नियम को चुनौती नहीं दे रहा होता है ?
प्रभाकरण की मौत के बाद ये सवाल, ये मुद्दे फिर से उठते रहेंगे। तमिलों को दोयम दर्जे का नागरिक मानने, उनके साथ गुलामों जैसा वर्ताव करने, उन्हें अपनी मातृभूमि में ही शरणार्थी बना देने वाली श्रीलंकाई सरकार और वहां के बहुसंख्यक समुदायों की नीतियों में जबतक सच्चे अर्थों में परिवर्तन नहीं होता, तबतक प्रभाकरण जिंदा रहेगा। यह प्रभाकरण और श्रीलंकाई तमिलों के प्रति उपजी सहानुभूतियों के शब्द नहीं हैं, बल्कि समाजशास्त्र का बुनियादी सिद्धांत है। हिंसा हमेशा भर्त्सनीय होती है। हिंसा के नायक के प्रति किन्हीं के दिल में कोई सहानुभूति नहीं होनी चाहिए, ऐसा मैं भी मानता हूं। लेकिन हिंसा के हेतु -सेतु के प्रति , उनके उपजने के कारणों व कारकों के प्रति अगर वह वाजिब है, तो मानव में निश्चित तौर पर सहानुभूति होनी चाहिए। क्योंकि मनुष्य एक संवेदनशील प्राणी है।
तमिलों ने तीन दशकों के युद्ध में इतना कुछ गंवा दिया है कि अब उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। और जिस इंसान के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता , वह सबसे खतरनाक इंसान होता है। युद्ध और संघर्ष उसके लिए कोई नई बात नहीं होती, वे इसके लिए हमेशा तैयार रहते हैं। श्रीलंकाई तमिलों की भी यही स्थिति है। प्रभाकरण की मौत के बाद जस्न में डूबी श्रीलंका सरकार और वहां के बहुसंख्यक शायद इस सच से अनभिज्ञ हैं।

शनिवार, 16 मई 2009

बधाई हो, स्वच्छ छवि के सभी नेता जीत रहे हैं...

पंद्रहवें लोकसभा चुनाव के परिणामों में एक बहुत ही शुभ संकेत सामने आ रहा है। वह यह कि पूरे देश के मतदाताओं ने स्वच्छ और ईमानदार छवि के एक भी नेता को निराश नहीं किया है। स्वच्छ छवि के लगभग सभी नेता चुनाव जीत रहे हैं। उड़ीसा के लोगों ने तो नवीन पटनायक की स्वच्छ और ईमानदार छवि के कारण उन्हें भारी बहुमत दिया है। बिजू जनता दल उड़ीसा में क्लीन स्वीप कर रहा है। बिहार में भी कमोबेश यही हुआ है। नीतीश कुमार की अच्छी छवि को लोगों ने पसंद किया है। वहां बदनाम और दागदार पार्टी के सभी नेताओं का सूपड़ा साफ हो गया है। भ्रष्टाचार के लिए कम ही दिनों में कुख्यात हो चुके झारखंड में भी ईमानदार छवि के सारे नेता चुनाव जीत रहे हैं। इनमें झारखंड विकास मोर्चा के बाबूलाल मरांडी, भारतीय जनता पार्टी के कड़िया मुंडा और रामटहल चौधरी शामिल हैं और इस बार चुनाव जीतने के करीब हैं। झारखंड के एक अन्य स्वच्छ छवि के नेता इंदर सिंह नामधारी तो निर्दलीय होकर भी जीत के करीब हैं। आंध्र प्रदेश में विकास के लिए समर्पित और ठीक ठाक छवि के नेता चंद्र बाबू नायडू की पार्टी भी बेहतर प्रदर्शन कर रही है जबकि सारे राजनीतिक पंडितों ने उन्हें चूका हुआ मान लिया था। कांग्रेस की जीत में भी मुझे लगता है कि डॉ मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि का बहुत बड़ा योगदान है। भले ही राजनीतिक पंडित कांग्रेस की जीत का सारा क्रेडिट सोनिया और राहुल को देते रहे, लेकिन मेरे विचार से इस जीत में डॉ मनमोहन सिंह का फैक्टर ने भी काम किया है। केरल में वामपंथी पार्टियों की बुरी हार हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह रही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के आला नेताओं का समझौतावादी रवैया। गौरतलब है कि केरल माकपा के महासचिव पिन्नरई विजयन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। वे करोड़ों रुपये के एक घोटाले में दोषी बताये जा रहे थे, लेकिन माकपा ने उनका समर्थन किया। पार्टी ने सबकुछ जानबूझकर भी विजयन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, बल्कि उन्हें ज्यादा तरजीह दी। नतीजा सामने है। केरल में वामपंथी पार्टियों के पांव के नीचे से जमीन खिसक चुकी है।
यह इस बात का संकेत है कि देश के लोग भ्रष्टाचार के कैंसर से मुक्ति पाना चाहते हैं। भ्रष्टाचार के राक्षस से छटपटा रहे भारतीय मतदाता अब इससे मुक्ति पाना चाहते हैं। उन्होंने राजनीतिक पतन और भ्रष्टाचार के समुद्र में डूबे भारतीय राजनीति में ईमानदार लोगों को खोज-खोजकर समर्थन दिये हैं। भले ही अधिकांश लोकसभा सीटों पर लोगों को मैदान में खड़े उम्मीदवारों में अच्छे उम्मीदवार ढूंढने से भी नहींमिले, लेकिन जहां कहीं उन्हें ईमानदार और अच्छे उम्मीदवार दिखाई दिए उन्होंने पार्टी लाइन , धार्मिक लाइन और जातीय लाइन को छोड़कर अच्छे नेताओं का समर्थन किया। यह इस बात का संकेत भी है कि आने वाले समय में वही राजनेता राजनीति में टिके रहेंगे, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ होंगे। इससे पतनशील भारतीय राजनीति को एक नया दिशा मिलेगा । उम्मीद की जानी चाहिए कि भ्रष्टाचार को राजनीतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा मानने वाले नेता इससे सबक लेंगे। आइये हम कामना करें कि पंद्रहवें लोकसभा चुनाव के समुद्र मंथन का यह अमृत देश के सभी राजनेताओं को मिले। जो युवा राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं और अपने समाज को नेतृत्व देना चाहते हैं, वे इस संदेश को हृदयागम कर लें। भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए छटपटा रहे इस देश के सवा सौ करोड़ लोग उनकी राह देख रहे हैं। हिन्दुस्तान जिंदावाद। ईमानदारी जिंदावाद।

गुरुवार, 14 मई 2009

ए नेता जी, बोलो तुम क्या-क्या लेगा जी


ए नेता जी, ओय नेता जी !
हंग एसेंबली होगा जी
बोलो तुम क्या- क्या लेगा जी
ऑफर बहुत से आयेंगे
कोई बोरा भर कर लायेंगे
कोई झोरा भर कर लायेंगे
अपनी रेट लगाओ जी
ए नेता जी, ओय नेता जी
हंग एसेंबली होगा जी
बोलो तुम क्या- क्या लेगा जी
नंगे-भूखे को गोली मारो
अपने मत का भाव बताओ
जीते हो तो मौज उड़ाओ
जनता की फिकर छोड़ो जी
ए नेता जी, ओय नेता जी !
हंग एसेंबली होगा जी
बोलो तुम क्या- क्या लेगा जी
काले - सफ़ेद का टेंशन छोड़ो
सिर्फ़ अपना डिमांड बताओ
बांकी सब हम पर छोड़ो
हावाला एजेंट पर भरोसा रखो
तकदीर अपनी सबारो जी
ए नेता जी, ओय नेता जी !
हंग एसेंबली होगा जी
बोलो तुम क्या- क्या लेगा जी  

बुधवार, 13 मई 2009

काश ! ये कोशी फिर आ जाती

दहाये हुए देश का दर्द-44
जीवछपुर का पांचू राम, बालू फांके दोनों शाम
देह से हड्डी करे लड़ाई
तीन बच्चों की हो चुकी विदाई
चौथे की हो रही तैयारी
काश ! ये कोशी फिर आ जाती
सब कष्टों से मिल जाती मुक्ति
फिर न आंख से उड़ती लुत्ती
और दिल से चूता घाम
जीवछपुर का पांचू राम, बालू फांके दोनों शाम
पंद्रह दिन प्रलय में बीता
भसिया कर पांचू भित्ता पहुंचा
राघोपुर में रिक्शा खींचा
छठे माह जीबछपुर लौटा
निज जन्म भूमि में बन अंजान
जीवछपुर का पांचू राम, बालू फांके दोनों शाम
(शब्दार्थ- लुत्तीः चिंगारी, घामः पसीना, भित्ताः किनारा)
 
 
 

मंगलवार, 12 मई 2009

Constitutional deadlock in Nepal

KAMAL RAJ SIGDEL
If the prevailing political polarization continues, it could lead Nepal to a constitutional crisis, according to experts.
And early signs are ominous. It all began with Prime Minister Pushpa Kamal Dahal failing to seek consensus from coalition partners on the removal of Chief of Army Staff Rookmangud Katawal last Sunday and President Ram Baran Yadav overriding the prime ministerial directive that very day. “The Interim Constitution has nowhere envisaged a situation where prime minister and president operate in two different directions,” says Laxman Aryal, who led the team that drafted the Interim Constitution. If the row over Katawal began the slide towards constitutional stalemate, subsequent events de-monstrated that constitutional breaches have become commonplace. The parties have failed to form a new government since Prime Minister Dahal resigned last Monday, a day after the presidential overruling. According to the Interim Constitution, the parties have to form a government based on political consensus, and failing to do so, allows the president to call on the parties to form a government through majority vote in the Constituent Assembly (CA). If the parties fail to form a government as per Article 38 (2) of the constitution, a constitutional crisis is inevitable given the fact that the constitution has given no other option -- for example, formation of a minority government. President Yadav has already directed the parties to go for majority government, which, say experts, is not a normal development “at this point of time” for two reasons. First, opting for the 'politics of mathematics' is itself a constitutio-nal aberration as the constitution stresses on consensus, according to Daman Nath Dhungana, who was a member of the committee that drafted the 1990 constitution. Sec-ond, to approach government formation with the assumption that a majority vote can be garnered in a hung parliament is in itself a wrong premise, argues Govinda Bandi, a constitutional lawyer. “Morning shows the day,” says Bandi. “That the parties have to look to form an elusive majority government in a hung parliament clearly shows the country is heading towards constitutional crisis.” Try unraveling the Gordian knot and it gets even tougher. The Maoists have declared they will not let the House function until the President corrects his “unconstitutional” move. This precludes exploration of any constitutional possibilities, according to Bhimarjun Acharya, a constitutional expert. “Even if the Maoists let the House function, it is most unlikely that Nepali Congress and CPN-UML -- which are trying to lead a new coalition -- will be able to operate a government without Maoists,” adds Bandi. And the breakdown of politics of consensus will have long-term repercussions. In normal situation, the case would land in the Supreme Court, which would then resolve the crisis. “But this is a political issue, not a legal one,” says Acharya. “This therefore can only be resolved politically, not legally.”

(कांतिपुर डाट कॉम से साभार )

सोमवार, 11 मई 2009

बिहारी मुसलमान फिर से कांग्रेस की ओर

बिहार की मुख्य राजनीतिक पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के लिए 15वां लोकसभा चुनाव एक दुःस्वप्न साबित होने वाला है। हालांकि अभी नतीजे आने शेष हैं और अभी यह निर्धारित होना भी बांकी है कि राजद ने इस चुनाव में क्या-क्या खोया, लेकिन यह बात निश्चित है कि लालू यादव इस बार बिहार में "वाटर लू' की लड़ाई लड़ रहे हैं। राजद का हाल बाढ़ में डूबे घर को निहार रहे गृहस्थ की तरह हैै, जो पानी निकलने तक नुकसान का अनुमान ही लगा पाता है। उसे इस बात का पूरा यकीन होता है कि पानी निकलने के बाद का दृश्य बहुत दुखदायी होगा। साथ ही उसे किसी चमत्कार की भी आस रहती है कि काश ! ऐसा न होकर वैसा हो जाये तो ऐसा न होकर वैसा हो जायेगा।
दरअसल इस चुनाव ने बिहार में पिछले दो दशकों से चल रही राजनीति का पटाक्षेप कर दिया है। इसके कारण बिहार में बेगाना बन चुकी कांग्रेस को पुनर्जीवन मिला है। लगभग 25 वर्षों के बाद एक बार फिर कांग्रेस को अपना खोया हुआ जनाधार वापस मिलते दिख रहा है। हालांकि इसके बावजूद उसे इस राज्य में लोकसभा की कोई ज्यादा सीटें प्राप्त नहीं होने वालीं। लेकिन उसके लिए यह बहुत बड़ी खुशखबरी है कि ब्राह्मण और मुसलमान के बिछड़े हुए वोट बैंक पुनः उनकी ओर आने लगे हैं। इस बार बिहार के अधिकतर मुस्लिम और ब्राह्मण खासकर मैथिल ब्राह्मण के वोट कांग्रेस को मिले हैं। वह भी तब जब पार्टी ने आनन-फानन में उम्मीदवार की सूची तैयार की। चुनाव घोषणा के पंद्रह दिन बाद तक कांग्रेस समूचे बिहार में चुनाव लड़ने के लिए सोच भी नहीं रही थी। राजद और लोजपा गठबंधन और लालू यादव द्वारा बेइज्जत होकर उसे यह कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा। जब कांग्रेस बिहार की सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने का फैसला ले रही थी, तो उसके एक भी बड़े नेता को यकीन नहीं था कि उनके प्रत्याशी कोई अप्रत्याशित प्रदर्शन कर पायेंगे। लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं, उनसे तो यही लगता है कि कांग्रेस के प्रत्याशियों ने अप्रत्याशित प्रदर्शन किया है। कांग्रेस के प्रत्याशियों को मुसलमान और ब्राह्मणों के सत्तर फीसद से ज्यादा मत मिले हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि कांग्रेस अधिकतर सीटों पर मुकाबले में आ गयी है, क्योंकि इनकी संख्या बिहार के कुल मतदाताओं के लगभग 23 प्रतिशत है। बिहार के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से मिलने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि इस बार कांग्रेस बिहार की कम-से-कम दो दर्जन सीटों पर दूसरे या तीसरे स्थान पर रहेगी। हालांकि पार्टी ने कुछ सीटों पर यादव और अन्य पिछड़ी जाति के नेताओं को टिकट दी, लेकिन इन जातियों के वोट उसे नहीं मिल सके।
मुसलमानों के कांग्रेस की तरफ मास शिफ्ट को देखकर राजद के नेता बदहवास हैं। उन्हें अभी तक इसकी वजह मालूम नहीं है। लेकिन सरजमीन में घूमने के दौरान आम मुसलमान इसके लिए जो वजह बता रहे हैं वह काबिले गौर है। उनका कहना है कि राजद उनका सिर्फ इस्तेमाल कर रहा है। बीस वर्षों में इस पार्टी ने अल्पसंख्यकों के लिए कुछ खास नहीं किया। वह सिर्फ मुसलमानों को भाजपा और आरएसएस का भय दिखाकर वोट लेती रही। जबकि कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों के व्यापक हित के लिए कुछ काम किए हैं। साथ ही कांग्रेस ने अपनी कार्य-पद्धति में यह संदेश छोड़ी है कि वह धार्मिक तुष्टीकरण के ऊपर उठकर काम करना चाह रही है।
हालांकि मुसलमानों के कांग्रेस में जाने की यही एक मात्र वजह नहीं है। इसके लिए उनमें "एंटी-राजद इनकम्बेसी' की भावना भी है। साथ ही मुसलमान मतदाता जिला, ब्लॉक और पंचायत स्तर पर राजद द्वारा लगातार बरती जाने वाली उपेक्षा से भी खिन्न हैं। मुसलमान मतदाताओं को इस बात का गहरा एहसास है कि कांग्रेस ने वर्षों पहले उन्हें जो राजनीतिक सम्मान दिया था, राजद ने उसका दशांश भी नहीं दिया। कुछ ऐसी ही भावना ब्राह्मण मतदाताओं की भी है। गौरतलब है कि बिहार के ब्राह्मण मतदाता पिछले 15 वर्षों से राजग को वोट दे रहे हैं। लेकिन राजग के दोनों धड़े उन्हें खूंटे से बंधे बैल से ज्यादा अहमियत नहीं देते। इस बार तो जदयू ने एक भी ब्राह्मण नेता को टिकट नहीं दी। इसलिए लोग कांग्रेस को याद कर रहे हैं। कोशी इलाके में जब मैंने प्रबुद्ध ब्राह्मण मतदाताओं से पूछा कि क्या वे कांग्रेस को वोट देकर अपने मतों को जाया नहीं कर रहे हैं ? तो उनका जवाब था- बिल्कुल नहीं। उनका कहना था कि हम सभी पार्टियों को एहसास दिलाना चाह रहे हैं कि हमारे वोट भी जीत-हार को तय कर सकते हैं। अगर आप हमें टिकट नहीं देंगे, तो हम आपके उम्मीदवार को हरा भी सकते हैं। सहरसा जिले के ब्राह्मण बहुल गांव के एक युवक का कहना था, " जितने वोट कांग्रेस को पड़ेगा उतने वोट से ही कोई जीतेगा और कोई हारेगा। यानी पार्टियां जान लें कि हम जिनके साथ रहेंगे वही लोकसभा पहुंचेगा।'
कुल मिलाकर कहें तो बिहार की राजनीति इस लोकसभा चुनाव में एक नया करवट ले चुकी है। कांग्रेस को इससे तत्काल कोई खास फायदा तो नहीं मिलने वाला, लेकिन राजद और जदयू को इससे भारी नुकसान जरूर होने वाला है। अगर कांग्रेस लोगों के बदलते रुझान को समझ सकी और सांगठनिक स्तर पर मेहनत कर पायी, तो वह अगले विधानसभा चुनाव तक एक बार फिर इस राज्य में अपनी खोयी प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकती है।

सोमवार, 4 मई 2009

ये तो होना ही था

(चीन के राष्ट्रपति जिन्ताओ के साथ प्रचंड )
... और अंततः नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड ने इस्तिफा दे ही दिया। इस समाचार से नेपाल समेत भारत और बांकी दुनिया स्तब्ध है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह कोई अप्रत्याशित घटना है। इसकी पृष्ठभूमि तो उसी दिन तैयार हो गयी जिस दिन नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने यह फैसला किया कि वह किसी भी शर्त पर अपने लड़ाके कैडरों को सेना में शामिल कराकर ही दम लेंगे। लेकिन प्रस्तावना उस दिन लिखा गया जिस दिन माओवादियों ने इसके लिए नेपाली सेना के वर्तमान सेनाध्यक्ष रूकमंद कतवाल को हटाने का फैसला कियाथा। इस फैसले के बाद नेपाल की गैर-माओवादी पार्टियों में खलबली मच गयी। उन्हें इस बात का पक्का एहसास हो गया कि माओवादी नेपाल को कम्युनिस्ट रिपब्लिक स्टेट बनाने के एजेंडे पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और वर्तमान सरकार की मुख्य जिम्मेदारी के प्रति यानी संविधान निर्माण के प्रति उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। माओवादी पहले सेना में अपने 25 हजार लड़ाके को शामिल करेंगे फिर उसके बाद देश की सारी शक्ति मसलन न्यायपालिका, कार्यपालिका और सेना को अपने में कब्जे में करेंगे फिर उन्हें एक ही काम करना होगा। वह यह कि नेपाल को एक कम्युनिस्ट रिपब्लिक स्टेट घोषित कर देनाऔर रास्ते में आने वाले लोगों व संगठनों को बंदुक के बल पर खामोश करा देना।
जाहिर सी बात है कि नेपाल की दोनों प्रमुख पार्टियां मसलन नेपाली कांग्रेस और एमाले का इसके बाद अस्तित्व समाप्त हो जाना तय था। इसलिए इस मुद्दे पर दोनों पार्टियों के नेताओं ने बैठक की और फैसला किया कि सेनाध्यक्ष कतवाल की बर्खास्तगी को वे लोग किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए जैसे ही प्रचंड ने सेनाध्यक्ष कतवाल को हटाने का फैसला किया, दोनों पार्टियों ने इसका विरोध कर दिया। चूंकि वर्तमान राष्ट्रपति रामबरन यादव नेपाली कांग्रेस के हैं, इसलिए उन्हें प्रधानमंत्री के फैसले को पलटने के लिए एक वाजिब अस्त्र भी मिल गया। रामबरन यादव ने प्रचंड के फैसले को असंवैधानिक करार देते हुए मानने से इंकार कर दिया। उधर एमाले ने प्रचंड सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। अब इसके बाद प्रचंड के पास इस्तिफा देने के सिवा कोई चारा नहीं बचा और आखिरकार अपने समर्थकों और खासकर लड़ाके कैडरों के सामने अपनी साख बचाने के लिए उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
आगे क्या
अभी लाख टके का सवाल यह है कि नेपाल में अब आगे क्या होगा? हालांकि तत्काल इसका एकदम सटीक पुर्वानुमान लगा पाना थोड़ा कठिन है, लेकिन इतना तय है कि नेपाल में एक बार फिर अशांति की आंधी आनी तय है। अभी जो संकेत मिल रहे हैं उसके मुताबिक नेपाली कांग्रेस और एमाले और जनाधिकार फोरम मिलकर वैकल्पिक सरकार बना सकते हैं। लेकिन अगर यह सरकार बन भी जाती है तो भी इसके लिए आगे काम कर पाना और नेपाल के लिए संविधान का निर्माण करना काफी कठिन होगा। क्योंकि नेपाली कांग्रेस और एमाले भी विचारधारा के स्तर पर दो विपरीत ध्रुव की पार्टियां हैं। जनाधिकार फोरम का भी नेपाली कांग्रेस के साथ ज्यादा देर तक रह पाना कठिन ही लगता है। अगर ये तीनों पार्टियां माओवादी को कमजोर करने के लिए साथ आ भी जाती हैं तो भी संकट कम नहीं होगा। क्योंकि सरकार से हटते ही माओवादियों का सड़क पर उतरना तय है। उनके कैडरों के पास सारे हथियार और गोला-बारूद आज भी ज्यों के त्यों रखे हुए है, इसलिए प्रशासन और माओवादियों में नये सिरे से हिंसक टकराव शुरू होना अवश्यसंभावी लगता है।
भारत की भूमिका
इन सारे प्रकरणों में भारत की कूटनीति एक बार फिर बुरी तरह से बिफल हुई है। भारत पूरे प्रकरण से भिज्ञ था, लेकिन अपनी कूटनीतिक भूमिका निभाने में वह असफल रहा। जब प्रचंड की सरकार बनी थी, उस समय भारत के पास मौका था कि वह नेपाल को चीन के गोदी में बैठने से बचाये। इसके लिए नेपाली माओवादियों को विश्वास में लेना जरूरी था। यह काम भारत नेपाली माओवादी के लड़ाके कैडरों को नियोजित करवाकर कर सकता था। लेकिन भारत ने प्रचंड को विश्वास में लेने के बदले नेपाली कांग्रेस और जनाधिकार फोरम पर ज्यादा भरोसा किया, जो बिफल साबित हुआ। भारत मुंह ताकते रह गया और प्रचंड चीन के गोद में बैठ गये। चीन ने उनका इतना हौसला आफजाई किया कि उसने देश की न्यायपालिका और जनता और भारत की परवाह किए बगैर नेपाली सेना में अपने पसंद के सेनाध्यक्ष खोज लिए और कतवाल को हटाने का निर्णय तक कर लिया। यह फैसला लेते हुए प्रचंड ने सोचा भी नहीं कि उसका देश जिस हवा में सांस लेता है वह भी भारत से ही आती है। चीन उन्हें मुंह से जितना समर्थन दे दे, लेकिन नेपाली-भारतीय लोगों के बीच में जो खून का रिश्ता है, क्या उसकी भरपाई चीन कर सकता है? यह बात प्रचंड ने नहीं सोची। भारत के पास इसी बात के कारण हमेशा एक अपर एज रहता आया है कि वहां की जनता भारत को अपने दिल के करीब मानती है। लेकिन इस समर्थन को कूटनीतिक रूप से भूनाने के लिए भारत को जितना प्रयास करना चाहिए था, वह उसका एकांश करने में भी असफल रहा। नेपाल की ताजा राजनीतिक घटनाएं किसी भी स्थिति में भारत के लिए शुभ समाचार नहीं है। अगर नेपाली सेना एवं माओवादी में टकराहट बढ़ी तो हो सकता है कि नेपाल के तराई इलाके में गृह युद्ध की नौबत आ जाये। ऐसी परिस्थिति में भारत में शरणार्थियों के खेप आने शुरू हो जायेंगे। पड़ोस में लगी यह आग जितनी जल्दी बुझे उतना ही अच्छा है। लेकिन चीन की गंदी राजनीति के कारण अब इस आग को जल्द बुझना किसी के मुमकिन नहीं रह गया है। बांकी तो राम ही राखे...